संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 96, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २५ ] इक्ष्वाकुकी तपस्या और ब्रह्माजीद्वारा विष्णुप्रतिमाकी प्राप्ति ८५ ग्रीष्मे पञ्चाग्निमध्यस्थोऽतपत्काले महातपाः। महातपस्वी राजा इक्ष्वाकु ग्रीष्म ऋतुमें पञ्चाग्निके बीच वर्षाकाले निरालम्बो हेमन्ते च सरोजले ॥ २७ स्थित होकर तपस्या करते थे, वर्षाके समय खुले मैदानमें रहते और शीतकालमें सरोवरके जलमें खड़े इन्द्रियाणि समस्तानि नियम्य हृदये पुनः। होकर तप करते थे। इस प्रकार समस्त इन्द्रियोंको मनो विष्णौ समावेश्य मन्त्रं वै द्वादशाक्षरम् ॥ २८ मनमें निरुद्ध करके, मनको भगवान् विष्णुमें लीन कर द्वादशाक्षर-मन्त्रका जप करते और वायु पीकर रहते हुए जपतो वायुभक्ष्यस्य तस्य राज्ञो महात्मनः। उन महात्मा राजाके समक्ष लोक-पितामह भगवान् ब्रह्माजी आविर्बभूव भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः॥ २९ प्रकट हुए। उन चार मुखोंवाले पद्मयोनि ब्रह्माजीको आया देख राजाने उन्हें भक्तिभावसे प्रणाम एवं उनकी तमागतमथालोक्य पद्मयोनिं चतुर्मुखम्। स्तुति करके संतुष्ट किया ॥ २६-३०॥ प्रणम्य भक्तिभावेन स्तुत्या च पर्यतोषयत्॥ ३० ( राजा बोले— ) 'संसारकी सृष्टि करनेवाले तथा नमो हिरण्यगर्भाय जगत्स्रष्ट्रे महात्मने। वेद-शास्त्रोंके मर्मज्ञ, चार मुखोंवाले महात्मा हिरण्यगर्भ वेदशास्त्रार्थविदुषे चतुर्वक्त्राय ते नमः ॥ ३१ ब्रह्माजीको नमस्कार है।' इस प्रकार स्तुति की जानेपर जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीने राज्य त्यागकर तपस्यामें लगे हुए इति स्तुतो जगत्स्रष्टा ब्रह्मा प्राह नृपोत्तमम्। उन शान्त एवं महान् सुखी श्रेष्ठ नरेशसे कहा ॥ ३११/२ ॥ तपस्यभिरतं शान्तं त्यक्तराज्यं महासुखम्। ब्रह्माजी बोले— राजन् ! समस्त विश्वको प्रकाशित ब्रह्मोवाच करनेवाले तुम्हारे पितामह सूर्य तथा पिता मनु भी सदा लोकप्रकाशको राजन् सूर्यस्तव पितामहः॥ ३२ ही सभी मुनियोंके मान्य हैं। तुम्हारे पिता और पितामहने भी पूर्वकालमें तीव्र तपस्या की थी। (उन्हींके समान मुनीनामपि सर्वेषां सदा मान्यो मनुः पिता। आज तुम भी तप कर रहे हो।) महामते नृपश्रेष्ठ ! सारा कृतवन्तौ तपः पूर्वं तीव्रं पितृपितामहौ ॥ ३३ राज्य-भोग छोड़कर किसलिये यह घोर तप कर रहे हो ? इसका कारण बताओ ॥ ३२-३४॥ किमर्थं राज्यभोगं तु त्यक्त्वा सर्वं नृपोत्तम। तपः करोषि घोरं त्वं समाचक्ष्व महामते ॥ ३४ ब्रह्माजीके इस प्रकार पूछनेपर राजाने उनको प्रणाम करके कहा— 'ब्रह्मन्! मैं तपोबलसे शङ्ख, चक्र और इत्युक्तो ब्रह्मणा राजा तं प्रणम्याब्रवीद्वचः। गदा धारण करनेवाले भगवान् मधुसूदनका प्रत्यक्ष दर्शन द्रष्टुमिच्छंस्तपश्चर्याबलेन मधुसूदनम् ॥ ३५ करनेकी इच्छा लेकर ही ऐसा तप कर रहा हूँ।' राजाके यों कहनेपर कमलजन्मा ब्रह्माजीने हँसते हुए-से उनसे करोम्येवं तपो ब्रह्मन् शङ्खचक्रगदाधरम्। कहा ॥ ३५-३६ ॥ इत्युक्तः प्राह राजानं पद्मजन्मा हसन्निव ॥ ३६ "राजन् ! सर्वत्र व्यापक भगवान् नारायणका दर्शन न शक्यस्तपसा द्रष्टुं त्वया नारायणो विभुः। तुम केवल तपस्यासे नहीं कर सकोगे। (औरोंकी तो मादृशैरपि नो दृश्यः केशवः क्लेशनाशनः॥ ३७ बात ही क्या है,) हमारे-जैसे लोगोंको भी क्लेशनाशन भगवान् केशवका दर्शन नहीं हो पाता। महामते ! मैं तुम्हें पुरातनीं पुण्यकथां कथयामि निबोध मे। एक पुरातन पवित्र कथा सुनाता हूँ, सुनो— 'प्रलयकी निशान्ते प्रलये लोकान् निनीय कमलेक्षणः ॥ ३८ रातमें कमललोचन भगवान् विष्णुने समस्त लोकोंको In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth