भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 97, कुल 318 में से

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पृष्ठ 97

८६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २५ अनन्तभोगशयने योगनिद्रां गतो हरिः। अपनेमें लीन कर लिया और सनन्दन आदि मुनियोंसे सनन्दनाद्यैर्मुनिभिः स्तूयमानो महामते॥ ३९ अपनी स्तुति सुनते हुए वे 'अनन्त' नामक शेषनागकी शय्यापर योगनिद्राका आश्रय ले सो गये। राजन्! उन तस्य सुप्तस्य नाभौ तु महत्पद्ममजायत। सोये हुए भगवान्‌की नाभिसे प्रकाशमान एक बहुत बड़ा तस्मिन् पद्मे शुभे राजन् जातोऽहं वेदवित् पुरा॥ ४० कमल उत्पन्न हुआ। पूर्वकालमें उस प्रकाशमान कमलपर सर्वप्रथम मुझ वेदवेत्ता ब्रह्माका ही आविर्भाव हुआ। तत्पश्चात् ततो भूत्वा त्वधोदृष्टिर्दृष्टवान् कमलेक्षणम्। नीचेकी ओर दृष्टि करके मैंने खानसे काटकर निकाले हुए अनन्तभोगपर्यङ्के भिन्नाञ्जननिभं हरिम्॥ ४१ कोयलेके समान श्यामवर्णवाले भगवान् विष्णुको शेषनागकी शय्यापर सोते देखा। उनके श्रीअङ्गोंकी कान्ति अलसीके अतसीकुसुमाभासं शयानं पीतवाससम्। फूलकी भाँति सुन्दर जान पड़ती थी, दिव्य रत्नोंके आभरणोंसे दिव्यरत्नविचित्राङ्गं मुकुटेन विराजितम्॥ ४२ उनके श्रीविग्रहकी विचित्र शोभा हो रही थी और उनका मस्तक मुकुटसे शोभायमान था॥ ३७-४२॥ कुन्देन्दुसदृशाकारमनन्तं च महामते। 'महामते! उस समय मैंने उन अनन्तदेव शेषनागका सहस्रफणमध्यस्थैर्मणिभिर्दीप्तिमत्तरम् ॥४३ भी दर्शन किया, जिनका आकार कुन्द और चन्द्रमाके समान श्वेत था तथा जो हजारों फणोंकी मणियोंसे क्षणमात्रं तु तं दृष्ट्वा पुनस्तत्र न दृष्टवान्। अत्यन्त देदीप्यमान हो रहे थे। नृपश्रेष्ठ! क्षणभर ही वहाँ दुःखेन महताऽऽविष्टो बभूवाहं नृपोत्तम॥ ४४ उन्हें देखकर मैं फिर उनका दर्शन न पा सका, इससे अत्यन्त दुःखी हो गया। तब मैं कौतूहलवश निरामय ततो न्ववातरं तस्मात् पद्मनालं समाश्रितः। भगवान् नारायणका दर्शन करनेके लिये कमलनालका कौतूहलेन तं द्रष्टुं नारायणमनामयम्॥ ४५ सहारा ले वहाँसे नीचे उतरा; परंतु राजेन्द्र! उस समय जलके भीतर बहुत खोजनेपर भी मैं उन लक्ष्मीपतिका ततस्त्वन्विष्य राजेन्द्र सलिलान्ते न दृष्टवान्। पुन: दर्शन न पा सका। तब मैं फिर उसी कमलका श्रीशं पुनस्तमेवाहं पद्माश्चित्य चिन्तयन्॥ ४६ आश्रय ले वासुदेवके उसी रूपका चिन्तन करता हुआ उनके दर्शनके लिये बड़ी भारी तपस्या करने लगा। तद्रूपं वासुदेवस्य द्रष्टुं तेपे महत्तपः। तत्पश्चात् अन्तरिक्षके भीतरसे किसी अव्यक्त शरीरवाली ततो मामन्तरिक्षस्था वागुवाचाशरीरिणी॥ ४७ वाणीने मुझसे कहा॥ ४३-४७॥ वृथा किं क्लिश्यते ब्रह्मन् साम्प्रतं कुरु मे वचः। "ब्रह्मन्! क्यों व्यर्थ क्लेश उठा रहे हो? इस समय न दृश्यो भगवान् विष्णुस्तपसा महतापि ते॥ ४८ मेरी बात मानो। बहुत बड़ी तपस्यासे भी तुम्हें भगवान् विष्णुका दर्शन नहीं हो सकेगा। यदि यहाँ शुद्ध स्फटिक- सृष्टिं कुरु तदाज्ञप्तो यदि द्रष्टुमिहेच्छसि। मणिके समान श्वेत नाग-शय्यापर शयन करनेवाले भगवान् शुद्धस्फटिकसंकाशनागपर्यङ्कशायिनम् ॥४९ विष्णुका दर्शन करना चाहते हो तो उनके आज्ञानुसार सृष्टि करो। महामते! तुमने 'शार्ङ्ग' धनुष धारण करनेवाले उन यद्दृष्टं शार्ङ्गिणो रूपं भिन्नाञ्जनसमप्रभम्। भगवान्‌का, जो अञ्जन-पुञ्जके समान श्याम सुषमासे युक्त प्रतिभानियतं रूपं विमानस्थं महामते॥ ५० तथा स्वभावतः प्रतिभाशालीरूप विमान (शेषशय्या) - पर स्थित देखा है, उसीका आलस्यरहित होकर भजन-ध्यान भज नित्यमनालस्यस्ततो द्रक्ष्यसि माधवम्। करो, तब उन माधवको देख सकोगे॥ ४८-५०½ ॥ तयेत्थं चोदितो राजंस्त्यक्त्वा तममनुक्षणम्॥ ५१ "राजन्! उस आकाशवाणीद्वारा इस प्रकार प्रेरित हो मैंने निरन्तर की जानेवाली तीव्र तपस्याका अनुष्ठान In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth