संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 98, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २५ ] इक्ष्वाकुकी तपस्या और ब्रह्माजीद्वारा विष्णुपतिमाकी प्राप्ति ८७ सृष्टवान् लोकभूतानां सृष्टिं सृष्ट्वा स्थितस्य च। त्यागकर इस जगत्के प्राणियोंकी सृष्टि की। सृष्टि करके आविर्बभूव मनसि विश्वकर्मा प्रजापतिः॥५२ स्थित होनेपर मेरे हृदयमें प्रजापति विश्वकर्माका प्राकट्य हुआ। उन्होंने 'अनन्त' नामक शेषनाग और भगवान् अनन्तकृष्णयोस्तेन द्वे रूपे निर्मिते शुभे। विष्णुकी दो चमकीली प्रतिमाएँ बनायीं। नरेश्वर ! मैंने विमानस्थो यथापूर्वं मया दृष्टो जले नृप॥ ५३ पहले जलके भीतर शेष-शय्यापर जिस रूपमें देख चुका था, उसी रूपमें भगवान् श्रीहरिकी वह प्रतिमा बनायी तथैव तं ततो भक्त्या सम्पूज्याहं हरिं स्थितः। गयी थी। तब मैं उन श्रीहरिके उस श्रीविग्रहकी भक्तिपूर्वक तत्प्रसादात्तपः श्रेष्ठं मया ज्ञानमनुत्तमम् ॥ ५४ पूजा करके और उन्हींके प्रसादसे श्रेष्ठ तपरूप परम उत्तम ज्ञान प्राप्त करके विकाररहित नित्यानन्दमय मोक्ष- लब्ध्वा मुक्तिं च पश्यामि अविकारक्रियासुखम्। सुखका अनुभव करने लगा॥ ५१-५४ १/२ ॥ तदहं ते प्रवक्ष्यामि हितं नृपवरेश्वर ॥ ५५ "राजराजेश्वर ! इस समय मैं तुम्हारे हितकी बात बता रहा हूँ, सुनो-राजन् ! इस घोर तपस्याको छोड़कर अब विसृज्यैतत्तपो घोरं पुरीं व्रज निजां नृप। अपनी पुरीको लौट जाओ। प्रजाओंका पालन करना ही प्रजानां पालनं धर्मस्तपश्चैव महीभृताम् ॥ ५६ राजाओंका धर्म तथा तप है। मैं सिद्धों और ब्राह्मणोंसहित उस विमानको, जिसपर भगवान्की प्रतिमा है, तुम्हारे विमानं प्रेषयिष्यामि सिद्धद्विजगणान्वितम्। पास भेजूँगा। उसीमें तुम सुन्दर बाह्य उपचारोंद्वारा उन तत्राराध्य देवेशं बाह्यार्थैरखिलैः शुभैः ॥ ५७ देवेश्वरकी आराधना करो। नृपश्रेष्ठ ! तुम यज्ञोंद्वारा 'अनन्त' नामक शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले भगवान् नारायणमनन्ताख्ये शयानं क्रतुभिर्यजन्। नारायणका निष्कामभावसे यज्ञोंद्वारा आराधन करते हुए निष्कामो नृपशार्दूल प्रजा धर्मेण पालय ॥ ५८ धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करो। नृप ! भगवान् वासुदेवकी कृपासे अवश्य ही तुम्हारी मुक्ति हो जायगी।" राजासे प्रसादाद्वासुदेवस्य मुक्तिस्ते भविता नृप। यों कहकर लोकपितामह ब्रह्माजी अपने धामको चले इत्युक्त्वा तं जगामाथ ब्रह्मलोकं पितामहः ॥ ५९ गये॥ ५५-५९ ॥ द्विज ! ब्रह्माजीके चले जानेपर राजा इक्ष्वाकु उनकी इक्ष्वाकुश्चिन्तयन्नास्ते पद्मयोनिवचो द्विज। बातोंपर विचार ही कर रहे थे, तबतक उनके समक्ष आविर्बभूव पुरतो विमानं तन्महीभृतः ॥ ६० वह विष्णु और अनन्तकी प्रतिमाओंका शुभ विमान, जिसे ब्रह्माजीने दिया था, सिद्ध ब्राह्मणोंसहित प्रकट हो ब्रह्मदत्तं द्विजयुतं माधवानन्तयोः शुभम्। गया। उन भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन करके उन्होंने तं दृष्ट्वा परया भक्त्या नत्वा च पुरुषोत्तमम् ॥ ६१ बड़ी भक्तिके साथ उन्हें प्रणाम किया तथा साथमें आये हुए ऋषियों एवं ब्राह्मणोंको भी नमस्कार करके ऋषीन् प्रणम्य विप्रांश्च तदादा ययौ पुरीम्। वे उस विमानको लेकर अपनी पुरीको गये। वहाँ पौरैर्जनैश्च नारीभिर्दृष्टः शोभासमन्वितैः ॥ ६२ नगरके सभी शोभायमान स्त्री-पुरुषोंने राजाका दर्शन किया और लावा छींटते हुए वे उन्हें राजभवनमें ले लाजा विनिक्षिपद्भिश्च नीतो राजा स्वकं गृहम्। गये। राजाने अपने विशाल मन्दिरमें उस सुन्दर वैष्णव- स्वमन्दिरे विशाले तु विमानं वैष्णवं शुभम् ॥ ६३ विमानको स्थापित किया और साथ आये हुए उन In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth