संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 99, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें८८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २५ संस्थाप्याराधयामास तैर्द्विजैरर्चितं हरिम्। महिष्यः शोभना यास्तु पिष्ट्वा तु हरिचन्दनम् ॥ ६४ मालां कृत्वा सुगन्धाढ्यां प्रीतस्तस्य ववर्ध ह। पौराः कर्पूरश्रीखण्डं कुङ्कुमाद्यगुरुं तथा ॥ ६५ कृत्स्नं विशेषतो वस्त्रं महिषाख्यं च गुग्गुलम्। पुष्पाणि विष्णुयोग्यानि ददुरानीय भूपतेः ॥ ६६ विमानस्थं हरिं पूज्य गन्धपुष्पादिभिः क्रमात्। त्रिसन्ध्यं परया भक्त्या जपैः स्तोत्रैश्च वैष्णवैः ॥ ६७ गीतैः कोलाहलैः शब्दैः शङ्खवादित्रनादितैः। प्रेक्षणैरपि शास्त्रोक्तैः प्रीतैश्च निशिजागरैः ॥ ६८ कारयामास सुचिरमुत्सवं परमं हरेः। यागैश्च तोषयित्वा तं सर्वदेवमयं हरिम् ॥ ६९ निष्कामो दानधर्मैश्च परं ज्ञानमवाप्तवान्। यजन् यज्ञं महीं रक्षन् स कुर्वन् केशवर्चनम् ॥ ७० उत्पाद्य पुत्रान् पित्रर्थं ध्यानात्त्यक्त्वा कलेवरम्। ध्यायन् वै केवलं ब्रह्म प्राप्तवान् वैष्णवं पदम् ॥ ७१ अजं विशोकं विमलं विशुद्धं शान्तं सदानन्दचिदात्मकं ततः। विहाय संसारमनन्तदुःखं जगाम तद्विष्णुपदं हि राजा ॥ ७२ ब्राह्मणोंद्वारा पूजित भगवान् विष्णुकी वे आराधना करने लगे। उनकी सुन्दरी रानियाँ चन्दन घिसकर और सुगन्धित फूलोंका हार गूँथकर अर्पण करती थीं, इससे राजाको बड़ी प्रसन्नता होती थी। इसी प्रकार नगर- निवासी जन कपूर, श्रीखण्ड, कुङ्कुम, अगुरु आदि सभी उपचार और विशेषतः वस्त्र, गुग्गुल तथा श्रीविष्णुके योग्य पुष्प ला-लाकर राजाको अर्पित करते थे ॥ ६०-६६ ॥ राजा तीनों संध्याओंमें विमानपर विराजमान भगवान् श्रीहरिकी क्रमशः गन्ध-पुष्प आदि उपचारोंद्वारा बड़ी भक्तिसे पूजा करते थे। श्रीविष्णुके नामोंका जप, उनके स्तोत्रोंका पाठ, उनके गुणोंका गान और शङ्ख आदि वाद्योंका शब्द करते-कराते थे। शास्त्रोक्त विधिसे प्रेमपूर्वक सजायी हुई भगवान्की झाँकियों तथा रात्रिमें जागरण आदिके द्वारा वे सदा ही देरतक भगवत्सम्बन्धी उत्सव कराया करते थे। निष्कामभावसे किये गये यज्ञ, दान तथा धर्माचरणोंद्वारा उन सर्वदेवमय भगवान् विष्णुको सन्तुष्ट करके राजाने परम उत्तम ज्ञान प्राप्त कर लिया। यज्ञोंका अनुष्ठान, पृथ्वीका पालन और भगवान् केशवका पूजन करते हुए राजाने पितृगणोंकी तृप्तिके निमित्त श्राद्ध आदि कर्म करनेके लिये पुत्रोंको उत्पन्न किया और केवल ब्रह्मका चिन्तन करते हुए ध्यानके द्वारा ही शरीरका त्यागकर भगवान् विष्णुके धामको प्राप्त कर लिया। इस प्रकार राजा इक्ष्वाकु अनन्त दुःखोंसे पूर्ण संसारका त्याग करके अज, अशोक, अमल, विशुद्ध, शान्त एवं सच्चिदानन्दमय विष्णुपदको प्राप्त हो गये ॥ ६७-७२ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे इक्ष्वाकुचरिते पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणके अन्तर्गत 'इक्ष्वाकुचरित्र' विषयक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५ ॥ । In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth