संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 100, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २६ ] इक्ष्वाकुकी संततिका वर्णन ८९ छब्बीसवाँ अध्याय इक्ष्वाकुकी संततिका वर्णन श्रीसूत उवाच श्रीसूतजी बोले—इक्ष्वाकुके ज्येष्ठ पुत्रका नाम था विकुक्षि। वह अपने पिताके मुक्त हो जानेपर महर्षियोंद्वारा इक्ष्वाकोर्विकुक्षिनामपुत्रः। स तु सिद्धे पितरि राज्यपदपर अभिषिक्त हुआ और धर्मपूर्वक पृथ्वीका महर्षिभिरभिषिक्तो धर्मेण पृथिवीं पालयन् पालन करने लगा। राजा विकुक्षिने विमानपर विराजमान विमानस्थमनन्तभोगशायिनमच्युतमाराध्य यागैरपि शेषशायी भगवान् विष्णुकी आराधना करते हुए अनेक देवानिष्ट्वा स्वपुत्रं राज्ये सुबाहुमभिषिच्य दिवमारुरोह। यज्ञोंद्वारा देवताओंका भी यजन किया। अन्तमें वे अपने सुबाहोर्भ्राजमानादुद्योतोऽभिगीयते। स तु सप्तद्वीपां पुत्र सुबाहुको राज्यपर अभिषिक्तकर स्वयं स्वर्गगामी हो पृथ्वीं धर्मेण पालयित्वा भक्तिं परां नारायणे गये। अब तेजस्वी राजा सुबाहुके पुत्र उद्योतका यशोगान पितामहवत् कृत्वा ऋतुभिर्भूरिदक्षिणैर्यज्ञेश्वरं किया जाता है। उद्योतने सातों द्वीपोंवाली पृथ्वीका निष्कामेन मनसेष्ट्वा नित्यं निरञ्जनं निर्विकल्पं परं धर्मपूर्वक पालन किया। उन्होंने अपने पितामह राजा ज्योतिरमृताक्षरं परमात्मरूपं ध्यात्वा हरिमन्तं च इक्ष्वाकुकी ही भाँति भगवान् नारायणमें पराभक्ति करके परमाराध्य स्वर्गलोकं गतः ॥ १ ॥ प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा यज्ञपति विष्णुका निष्कामभावसे यजन किया तथा नित्य, निरञ्जन, निर्विकल्प, अमृत, अक्षर, परम, ज्योतिर्मय परमात्मरूपका चिन्तन करते हुए श्रीविष्णु और अनन्तकी आराधना करके वे परमधामको प्राप्त हुए ॥ १ ॥ तस्य युवनाश्वो युवनाश्वस्य च मांधाता उनके पुत्र युवनाश्व हुए, युवनाश्वके पुत्र मांधाता। पुत्रोऽभवत् । स चाभिषिक्तो महर्षिभिर्निसर्गादेव मांधाता स्वभावसे ही भगवान् विष्णुके भक्त थे। विष्णुभक्तोऽनन्तशयनमच्युतं भक्त्याऽऽराध्यन् महर्षियोंने जब उनका राज्याभिषेक कर दिया, तब यागैश्च विविधैरिष्ट्वा सप्तद्वीपवतीं पृथिवीं परिपाल्य शेषशायी भगवान् विष्णुकी भक्तिपूर्वक आराधना तथा दिवं गतः ॥ २ ॥ विविध यज्ञोंद्वारा यजन करते हुए उन्होंने सातों द्वीपोंसे युक्त पृथ्वीका पालन किया और अन्तमें उनका वैकुण्ठवास हुआ ॥ २ ॥ यस्यैष श्लोको गीयते। मांधाताके ही विषयमें यह श्लोक अबतक गाया जाता है— यावत्सूर्य उदेति स्म यावच्च प्रतितिष्ठति। 'जहाँसे सूर्य उदय होता और जहाँतक जाकर अस्त सर्वं तद्यौवनाश्वस्य मांधातुः क्षेत्रमुच्यते ॥ ३ ॥ होता है, वह सब युवनाश्वके पुत्र मांधाताका ही क्षेत्र कहलाता है' ॥ ३ ॥ मांधाताका पुत्र पुरुकुश्य (या पुरुकुत्स) हुआ, तस्य पुरुकुश्योऽभवद् येन देवा ब्राह्मणाश्च जिसने यज्ञ और दानके द्वारा देवताओं तथा यागदानैः संतुष्टाः ॥ ४ ॥ पुरुकुश्याद् दृषदो ब्राह्मणोंको संतुष्ट किया था। पुरुकुश्यसे दृषद और