भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 318 में से

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पृष्ठ 101

९० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २६ हृषददादभिशम्भुः। अभिशम्भोर्दारुणो दारुणात्सगरः ॥ ५ ॥ सगराद्धर्यश्वो हर्यश्वाद्धारीतो हारीताद्रोहिताश्वः। रोहिताश्वादंशुमान् ॥ ६ ॥ अंशुमतो भगीरथः। येन महता तपसा पुरा दिवो गङ्गा अशेषकल्मषनाशिनी चतुर्विधपुरुषार्थदायिनी भुवमानीता। अस्थिशर्कराभूताः कपिलमहर्षि- निर्दग्धाश्च गुरवः सगराख्या गङ्गातोयसंस्पृष्टा दिवमारोपिताः। भगीरथात् सौदासः सौदासात् सत्रसवः ॥ ७॥ सत्रसवा- दनरण्योऽनरण्यद्दीर्घबाहुः ॥ ८ ॥ दीर्घबाहो- रजोऽजाद्दशरथः। तस्य गृहे रावणविनाशार्थं साक्षान्नारायणोऽवतीर्णो रामः ॥ ९ ॥ स तु पितृवचनाद् भ्रातृभार्यासहितो दण्डकारण्यं प्राप्य तपश्चचार। वने रावणापहृतभार्यो भ्रात्रा सह दुःखितोऽनेककोटिवानरनायकसुग्रीवसहायो महोदधौ सेतुं निबध्य तैरंगत्वा लङ्कां रावणं देवकण्टकं सबान्धवं हत्वा सीतामादाय पुनरयोध्यां प्राप्य भरताभिषिक्तो विभीषणाय लङ्काराज्यं विमानं वा दत्त्वा तं प्रेषयामास। स तु परमेश्वरो विमानस्थो विभीषणेन नीयमानो लङ्कायामपि राक्षसपुर्यां वस्तुमनिच्छन् पुण्यारण्यं तत्र स्थापितवान् ॥ १० ॥ तन्निरीक्ष्य तत्रैव महाहिभोगशयने भगवान् शेते। सोऽपि विभीषणस्ततस्तद्विमानं नेतुमसमर्थः, तद्वचनात् स्वां पुरीं जगाम ॥ ११॥ नारायणसंनिधानान्महद्वैष्णवं क्षेत्रमभवदद्यापि दृश्यते। रामाल्लवो लवात्पद्मः पद्मादृतुपर्ण दृषदसे अभिशम्भु हुआ। अभिशम्भुसे दारुण और दारुणसे सगरका जन्म हुआ। सगरसे हर्यश्व, हर्यश्वसे हारीत, हारीतसे रोहिताश्व, रोहिताश्वसे अंशुमान् और अंशुमान्‌से भगीरथ हुए, जो पूर्वकालमें बहुत बड़ी तपस्या करके समस्त पापोंका नाश करनेवाली और चारों पुरुषार्थोंको देनेवाली गङ्गाको आकाशसे पृथ्वीपर ले आये। उन्होंने गङ्गाजलके स्पर्शसे अपने 'सगर' संज्ञक पितरोंको, जो महर्षि कपिलके शापसे दग्ध होकर अस्थि-भस्ममात्र शेष रह गये थे, स्वर्गलोकको पहुँचा दिया। भगीरथसे सौदास और सौदाससे सत्रसवका जन्म हुआ। सत्रसवसे अनरण्य और अनरण्यसे दीर्घबाहु हुआ। दीर्घबाहुसे अज तथा अजसे दशरथ हुए। इनके घरमें साक्षात् भगवान् नारायण रावणका नाश करनेके लिये 'राम' रूपमें अवतीर्ण हुए थे ॥ ४-९॥ राम अपने पिताके कहनेसे छोटे भाई लक्ष्मण तथा पत्नीसहित दण्डकारण्यमें जाकर तपस्या करने लगे। उस वनमें रावणने इनकी पत्नी सीताका अपहरण कर लिया। इससे दुःखी होकर वे अपने भाई लक्ष्मणको साथ लेकर अनेक करोड़ वानर-सेनाके अधिपति सुग्रीवको सहायक बनाकर चले और महासागरमें पुल बाँधकर उन सबके साथ लङ्कामें जा पहुँचे। वहाँ देवताओंके मार्गका काँटा बने हुए रावणको उसके बन्धु-बान्धवोंसहित मारकर सीताको साथ ले पुनः अयोध्यामें लौट आये। अयोध्यामें भरतजीने उनका 'राजा' के पदपर अभिषेक किया। श्रीरामने विभीषणको लङ्काका राज्य तथा (विष्णुप्रतिमायुक्त) विमान देकर अयोध्यासे विदा किया। विमानपर विराजमान परमेश्वर विष्णु विभीषणद्वारा ले जाये जानेपर भी राक्षसपुरी लङ्कामें निवास करना नहीं चाहते थे, अतः विभीषणने वहाँ जिस पवित्र वनकी स्थापना की थी, उसको देखकर वे उसीमें स्थित हो गये। वहाँ महान् सर्प-शरीरकी शय्यापर भगवान् शयन करते हैं। विभीषण भी जब वहाँसे उस विमानको ले जानेमें असमर्थ हो गये, तब भगवान्‌के ही कहनेसे वे उन्हें वहीं छोड़ अपनी पुरी लङ्काको चले गये ॥ १०-११॥ भगवान् नारायणकी उपस्थितिसे वह स्थान महान् वैष्णवतीर्थ हो गया, जो आज भी श्रीरङ्गक्षेत्रके नामसे प्रसिद्ध देखा जाता है। रामसे लव, लवसे पद्म, पद्मसे