संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 102, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २७ ] चन्द्रवंशका वर्णन ९१
ऋतुपर्णादस्त्रपाणिः। अस्त्रपाणेः शुद्धोदनः। ऋतुपर्ण, ऋतुपर्णसे अस्त्रपाणि, अस्त्रपाणिसे शुद्धोदन शुद्धोदनाद्बुधः। बुधाद्वंशो निवर्तते ॥ १२ ॥ और शुद्धोदनसे बुध (बुद्ध)-की उत्पत्ति हुई; बुधसे इस वंशकी समाप्ति हो जाती है ॥ १२ ॥ एते महीपा रविवंशजास्तव मैंने यहाँ आपके समक्ष पूर्ववर्ती उन प्रधान-प्रधान प्राधान्यतस्ते कथिता महाबलाः। महाबली सूर्यवंशी राजाओंका नामोल्लेख किया है, पुरातनैर्येर्वसुधा प्रपालिता जिन्होंने धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन और यज्ञ-क्रियाओंद्वारा यज्ञक्रियाभिश्च दिवौकसैर्नृपैः ॥ १३ ॥ देवताओंका भी पोषण किया था ॥ १३ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे सूर्यवंशानुचरितं नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'सूर्यवंशका अनुचरित' नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६ ॥ सत्ताईसवाँ अध्याय चन्द्रवंशका वर्णन सूत उवाच सूतजी बोले—अब संक्षेपसे चन्द्रवंशी राजाओंके अथ सोमवंशोद्गवानां भूभुजां संक्षेपेण चरित्रका वर्णन किया जाता है। कल्पके आदिकी बात चरितमुच्यते ॥ १ ॥ आदौ तावत् समस्तं त्रैलोक्यं है। ऋक्, यजुष्, साम और अथर्ववेदस्वरूप भगवान् कुक्षौ कृत्वा एकार्णवे महाम्भसि नारायण समस्त त्रिभुवनको अपने उदरमें लीन करके नागभोगशयने ॥ २ ॥ ऋङ्मयो यजुर्मयः एकार्णवकी अगाध जलराशिमें शेषनागकी शय्यापर योगनिद्राका साममयोऽथर्वमयो भगवान्नारायणो योगनिद्रां आश्रय ले सो रहे थे। सोये हुए उन भगवान्की नाभिसे समारेभे। तस्य सुप्तस्य नाभौ महापद्ममजायत। तस्मिन् एक महान् कमल प्रकट हुआ। उस कमलमें चतुर्मुख पद्मे चतुर्मुखो ब्रह्माभवत् ॥ ३ ॥ तस्य ब्रह्मणो मानसः ब्रह्माका आविर्भाव हुआ। उन ब्रह्माजीके मानसपुत्र अत्रि पुत्रोऽत्रिरभवत्। अत्रे्रनसूयायां सोमः। स तु हुए। अत्रिसे अनसूयाके गर्भसे चन्द्रमाका जन्म हुआ। प्रजापतेर्दक्षस्य त्रयस्त्रिंशत् कन्या रोहिण्याद्या भार्यार्थं उन्होंने दक्ष प्रजापतिकी रोहिणी आदि तैंतीस कन्याओंको गृहीत्वा प्रियायां ज्येष्ठायां विशेषात् प्रसन्नमनाः पत्नी बनानेके लिये ग्रहण किया और ज्येष्ठ भार्या रोहिणीसे रोहिण्यां बुधं पुत्रमुत्पादयामास ॥ ४ ॥ बुधोऽपि उसके प्रति अधिक प्रसन्न रहनेके कारण, 'बुध' नामक सर्वशास्त्रज्ञः प्रतिष्ठाने पुरेऽवसत्। इलायां पुरूरवसं पुत्र उत्पन्न किया। बुध भी समस्त शास्त्रोंके ज्ञाता होकर पुत्रमुत्पादयामास। तस्यातिशयरूपान्वितस्य प्रतिष्ठानपुरमें निवास करने लगे। उन्होंने इलाके गर्भसे स्वर्गभोगान् विहाय उर्वशी बहुकालं भार्या पुरूरवा नामक पुत्रको जन्म दिया। पुरूरवा बहुत ही सुन्दर बभूव ॥ ५ ॥ पुरूरवसः उर्वश्यामायुः पुत्रो जज्ञे। स थे, अतः उर्वशी नामक अप्सरा बहुत कालतक स्वर्गके तु राज्यं धर्मतः कृत्वा दिवमारुरोह ॥ ६ ॥ आयो भोगोंको त्यागकर इनकी भार्या बनी रही। पुरूरवाद्वारा रूपवत्यां नहुषः पुत्रोऽभवत्। येनेन्द्रत्वं प्राप्तम्। उर्वशीके गर्भसे आयु नामक पुत्रका जन्म हुआ। वह नहुषस्यापि पितृमत्यां ययातिः ॥ ७ ॥ यस्य वंशजा धर्मपूर्वक राज्य करके अन्तमें स्वर्गलोकको चला गया। आयुके रूपवतीसे नहुष नामक पुत्र हुआ, जिसने इन्द्रत्व प्राप्त किया था। नहुषके भी पितृमतीके गर्भसे ययाति In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth