संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 103, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें९२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २७ वृष्णयः। ययातेः शर्मिष्ठायां पूरुरभवत्॥८॥ हुए, जिनके वंशज वृष्णि कहलाते हैं। ययातिके पूरोर्वंशदायां संयातिः पुत्रोऽभवत्। यस्य पृथिव्यां शर्मिष्ठाके गर्भसे पूरु हुए। पूरुके वंशदासे संयाति नामक पुत्र हुआ, जिसको इस पृथिवीपर सभी तरहके सम्प्रन्नाः सर्वे कामाः॥९॥ मनोवाञ्छित भोग प्राप्त थे॥१-९॥ संयातेर्भानुदत्तायां सार्वभौमः। स तु सर्वां पृथिवीं संयातिसे भानुदत्ताके गर्भसे सार्वभौम नामक पुत्र हुआ। उसने सम्पूर्ण पृथिवीका धर्मपूर्वक पालन करते धर्मेण परिपालयन्नरसिंहं भगवन्तमाराध्य यागदानैः हुए यज्ञ-दान आदिके द्वारा भगवान् नृसिंहकी आराधना सिद्धिमप॥१०॥ तस्य सार्वभौमस्य वैदेह्यां भोजः। करके सिद्धि (मुक्ति) प्राप्त कर ली। उपर्युक्त सार्वभौमसे वैदेहीके गर्भसे भोज उत्पन्न हुआ, जिसके वंशमें कालनेमि यस्य वंशे पुरा देवासुरसंग्रामे विष्णुचक्रहतः नामक राक्षस, जो पहले देवासुर-संग्राममें भगवान् विष्णुके कालनेमिः कंसो भूत्वा वृष्णिवंशजेन वासुदेवेन चक्रसे मारा गया था, कंसके रूपमें उत्पन्न हुआ और वृष्णिवंशी वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके हाथसे मारा घातितो निधनं गतः॥११॥ जाकर मृत्युको प्राप्त हुआ॥१०-११॥ तस्य भोजस्य कलिङ्गायां दुष्षन्तः। स तु नरसिंहं भोजकी पत्नी कलिङ्गासे दुष्षन्तका जन्म हुआ। वह भगवन्तमाराध्य तत्प्रसादात्रिष्कण्टकं राज्यं धर्मेण भगवान् नृसिंहकी आराधना करके उनकी प्रसन्नतासे धर्मपूर्वक निष्कण्टक राज्य भोगकर जीवनके अन्तमें कृत्वा दिवं प्राप्तवान्। दुष्षन्तस्य शकुन्तलायां स्वर्गको प्राप्त हुआ। दुष्षन्तको शकुन्तलाके गर्भसे भरत भरतः। स तु धर्मेण राज्यं कुर्वन् ऋतुभिर्भूरि- नामक पुत्र प्राप्त हुआ। वह धर्मपूर्वक राज्य करता हुआ प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंसे सर्वदेवमय भगवान् विष्णुकी दक्षिणैः सर्वदेवतामयं भगवन्तमाराध्य आराधना करके कर्माधिकारसे निवृत्त एवं ब्रह्मध्यान- निवृत्ताधिकारो ब्रह्मध्यानपरो वैष्णवे परे ज्योतिषि परायण हो परम ज्योतिर्मय वैष्णवधाममें लीन हो गया॥१२॥ लयमवाप॥१२॥ भरतके उसकी पत्नी आनन्दाके गर्भसे अजमीढ भरतस्य आनन्दायामजमीढः। स च परमवैष्णवो नामक पुत्र हुआ। वह परम वैष्णव था। राजा अजमीढ नरसिंहमाराध्य जातपुत्रो धर्मेण कृतराज्यो भगवान् नृसिंहकी आराधनासे पुत्रवान् होकर धर्मपूर्वक राज्य करनेके पश्चात् श्रीविष्णुधामको प्राप्त हुए। अजमीढके विष्णुपुरमपारुरोह॥१३॥ अजमीढस्य सुदेव्यां वृष्णिः सुदेवीके गर्भसे वृष्णि नामक पुत्र हुआ। वह भी बहुत पुत्रोऽभवत्। सोऽपि बहुवर्षं धर्मेण राज्यं कुर्वन् वर्षोंतक धर्मपूर्वक राज्य करता रहा। दुष्टोंका दमन और सज्जनोंका पालन करते हुए उसने सातों द्वीपोंसे दुष्टनिग्रहं शिष्टपरिपालनं सप्तद्वीपां पृथ्वीं वशे चक्रे। युक्त पृथिवीको अपने वशमें कर लिया था। वृष्णिके वृष्णोरुग्रसेनायां प्रत्यङ्गः पुत्रो बभूव॥१४॥ सोऽपि उग्रसेनाके गर्भसे प्रत्यङ्ग नामक पुत्र हुआ। वह भी धर्मपूर्वक पृथिवीका पालन करता था। उसने प्रतिवर्ष धर्मेण मेदिनीं पालयन् प्रतिसंवत्सरं ज्योतिष्टोमं चकार। ज्योतिष्टोमयागका अनुष्ठान करते हुए आयुका अन्त निर्वाणमपि लब्धवान्। प्रत्यङ्गस्य बहुरूपायां होनेपर निर्वाणपद (मोक्ष) प्राप्त कर लिया। प्रत्यङ्गको In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth