संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 104, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २८ ] शांतनुका चरित्र ९३ शांतनुः ॥ १५ ॥ तस्य देवदत्तस्यन्दनारोहणमशक्यं बहुरूपके गर्भसे शांतनु नामक पुत्र प्राप्त हुआ, जिनमें बभूव पुरतः शक्यं च ॥ १६ ॥ देवताओंके दिये हुए रथपर चढ़नेकी पहले शक्ति नहीं थी, परंतु पीछे उसपर चढ़नेकी शक्ति हो गयी ॥ १३–१६ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे सोमवंशवर्णनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'सोमवंशवर्णन' नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥
अट्ठाईसवाँ अध्याय शांतनुका चरित्र भरद्वाज उवाच भरद्वाजजीने पूछा- शांतनुको पहले देवताओंके स्यन्दनारोहणे पूर्वमशक्तिः शांतनोः कथम्। रथपर चढ़नेकी शक्ति क्यों नहीं थी ? और फिर उनमें वह शक्ति कैसे आ गयी ? इसे आप हमें बतलायें ॥ १ ॥ पश्चाच्छक्तिः कथं चासीत् तस्य वै तद्वदस्व नः ॥ १ सूत उवाच सूतजी बोले - भरद्वाजजी ! यह पुराना इतिहास है; इसे मैं कहता हूँ, सुनिये। शांतनुका चरित्र मनुष्योंके भरद्वाज शृणुष्वैतत् पुरावृत्तं वदामि ते। समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। शांतनु पूर्वकालमें सर्वपापहरं तद्धि चरितं शांतनोर्नृणाम् ॥ २ नृसिंहरूपधारी भगवान् विष्णुके भक्त थे और नारदजीकी बतायी हुई विधिसे भगवान् लक्ष्मीपतिकी सदा पूजा बभूव शांतनुर्भक्तो नरसिंहतनौ पुरा। किया करते थे। विप्रवर ! एक बार राजा शांतनु भूलसे नारदोक्तविधानेन पूजयामास माधवम् ॥ ३ श्रीनृसिंहदेवके निर्माल्यको लाँघ गये, अतः वे उसी नरसिंहस्य देवस्य निर्माल्यं तेन लङ्घितम् । क्षण देवताओंके दिये हुए उत्तम रथपर चढ़नेमें असमर्थ हो गये। तब वे सोचने लगे - 'यह क्या बात है ? राज्ञा शांतनुना विप्र तस्मात् स्यन्दनमुत्तमम् ॥ ४ इस रथपर चढ़नेमें हमारी गति सहसा कुण्ठित क्यों देवदत्तं तदारोढुमशक्तस्तत्क्षणादभूत् । हो गयी ?' कहते हैं, इस प्रकार दुःखी होकर सोचते किमियं मे गतिर्भग्ना सहसा वै रथात्ततः ॥ ५ हुए उन राजाके पास नारदजी आये और उन्होंने राजा शांतनुसे पूछा- 'राजन् ! तुम क्यों विषादमें डूबे दुःखं चिन्तयतस्तस्य सम्प्राप्तो नारदः किल । हुए हो ?' ॥ २-६॥ किं विषण्णः स्थितो राजन्निति पृष्टः स शांतनुः ॥ ६ राजाने कहा - 'नारदजी ! मेरी गति कुण्ठित कैसे नारदैतन्न जानामि गतिभङ्गस्य कारणम् । हुई, इसका कारण मुझे ज्ञात नहीं हो रहा है, इसीसे मैं इत्युक्तो नारदो ध्यात्वा ज्ञात्वा तत्कारणं ततः ॥ ७ चिन्तित हूँ।' उनके यों कहनेपर नारदजीने ध्यान लगाया और उसका कारण जानकर राजा शांतनुसे, जो विनीतभावसे शांतनुं प्राह राजानं विनयेन यतः स्थितः । वहाँ खड़े थे, कहा- 'राजन् ! अवश्य ही तुमने कहीं- यत्र क्वापि त्वया राजन् नरसिंहस्य वै ध्रुवम् ॥ ८ न-कहीं भगवान् नृसिंहके निर्माल्यका लङ्घन किया है। निर्माल्यो लङ्घितस्तस्माद्रथारोहणकर्मणि । इसीसे रथपर चढ़नेमें तुम्हारी गति अवरुद्ध हो गयी है। गतिर्भग्ना महाराज श्रूयतामत्र कारणम् ॥ ९ महाराज ! इसका कारण सुनो ॥ ७-९ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth