संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 105, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें९४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २८
[संस्कृत श्लोक] अन्तर्वेद्यां पुरा राजन्नासीत् कश्चिन्महामतिः। मालाकारो रविर्नाम्ना तेन वृन्दावनं कृतम्॥ १० विविधानि च पुष्पार्थं वनानि सुकृतानि वै। मल्लिकामालतीजातिबकुलादीनि सर्वशः॥ ११ प्राकारमुच्छ्रितं तस्य स्वभूमौ चापि विस्तृतम्। अलङ्घ्यमप्रवेश्यं च कृत्वा चक्रे स्वकं गृहम्॥ १२ गृहं प्रविश्य तद्द्वारं भवेन्नान्यत्र सत्तम। एवं कृत्वा नु वसतो मालाकारस्य धीमतः॥ १३ पुष्पितं तद्वनं त्वासीद् गन्धामोदितदिङ्मुखम्। भार्यया सह पुष्पाणि समाहृत्य दिने दिने॥ १४ कृत्वा मालां यथान्यायं नरसिंहस्य नित्यशः। ददौ काश्चिद् द्विजेभ्यश्च काश्चिद्विक्रीय पोषणम्॥ १५ चक्रे समात् प्रजीवी च भार्यादेरात्मनस्तथा। अथ स्वर्गादुपागम्य इन्द्रपुत्रो रथेन वै॥ १६ अप्सरोगणसंयुक्तो निशि पुष्पाणि संहरेत्। तद्गन्धलिप्सुः सर्वाणि विचित्याहृत्य गच्छति॥ १७ दिने दिने हृते पुष्पे मालाकारोऽप्यचिन्तयत्। नान्यद् द्वारं वनस्यास्यालङ्घ्यप्राकारमुन्नतम्॥ १८ समस्तपुष्पजातस्य हरणे निशि वै नृणाम्। अहं शक्तिं न पश्यामि किमिदं नु परीक्षये॥ १९ इति संचिन्त्य मेधावी जाग्रद्रात्रौ वने स्थितः। तथैवागत्य पुष्पाणि संगृहीत्वा गतः पुमान्॥ २० तं दृष्ट्वा दुःखितोऽतीव माल्यजीवी वनेऽभवत्। ततो निद्रां गतः स्वप्ने दृष्टवांस्तं नृकेसरिम्॥ २१ तद्वाक्यं श्रुतवांश्चैवं निर्माल्यं मम पुत्रक। आनीय क्षिप्यतां क्षिप्रं पुष्पारामसमीपतः॥ २२
[हिन्दी अनुवाद] 'राजन्! पूर्वकालकी बात है, अन्तर्वेदीमें कोई बड़ा बुद्धिमान् माली रहता था। उसका नाम था रवि। उसने तुलसीका बगीचा लगाया था और उसका नाम 'वृन्दावन' रख दिया था। उसमें फूलोंके लिये सब ओर मल्लिका, मालती, जाती तथा बकुल (मौलसिरी) आदि नाना प्रकारके वृक्षोंके बाग सुंदर ढंगसे लगाये थे। उस वनकी चहारदीवारी बहुत ऊँची और चौड़ी बनवाकर, उसे अलङ्घनीय और दुर्गम करके भीतरकी भूमिपर उसने अपने रहनेके लिये घर बनाया था। साधुशिरोमणे! उसने ऐसा प्रबन्ध किया था कि घरमें प्रवेश करनेके बाद ही उस वाटिकाका द्वार प्राप्त हो सकता था, दूसरी ओरसे उसका मार्ग नहीं था॥ १०-१२½॥ 'ऐसी व्यवस्था करके निवास करते हुए उस मालीका वह वृन्दावन फूलोंसे भरा रहता था और उसकी सुगन्धसे सारी दिशाएँ सुवासित होती रहती थीं। वह प्रतिदिन अपनी पत्नीके साथ फूलोंका संग्रह करके यथोचित मालाएँ तैयार करता था। उनमेंसे कुछ मालाएँ तो वह भगवान् नृसिंहको अर्पण कर देता था, कुछ ब्राह्मणोंको दे डालता था और कुछको बेचकर उससे अपना तथा पत्नी आदिका पालन-पोषण करता था। मालासे जो कुछ प्राप्त होता, उसीके द्वारा वह अपनी जीविका चलाता था॥ १३-१५½॥ 'कुछ कालके बाद वहाँ इन्द्रका पुत्र जयन्त प्रतिदिन रातमें स्वर्गसे अप्सराओंके साथ रथपर चढ़कर आने और फूलोंकी चोरी करने लगा। उस वनके पुष्पोंकी सुगन्धके लोभसे वह सारे फूल तोड़ लेता और लेकर चल देता था। जब प्रतिदिन फूलोंकी चोरी होने लगी, तब मालीको बड़ी चिन्ता हुई। उसने मन-ही-मन सोचा—'इस वनका कोई दूसरा द्वार तो है नहीं। चहारदीवारी भी इतनी ऊँची है कि वह लाँघी नहीं जा सकती। मनुष्योंकी ऐसी शक्ति मैं नहीं देखता कि इसे लाँघकर वे सारे फूल चुरा ले जानेमें समर्थ हों। फिर इन फूलोंके लुप्त होनेका क्या कारण है, आज अवश्य ही इसका पता लगाऊँगा।' यह सोचकर वह बुद्धिमान् माली उस रातमें जागता हुआ बगीचेमें ही बैठा रहा। अन्य दिनोंकी भाँति उस दिन भी वह पुरुष आया और फूल लेकर चला गया॥ १६-२०॥ 'उसे देखकर मालाओंसे ही जीविका चलानेवाला वह माली उस उपवनमें बहुत ही दुःखी हुआ। तदनन्तर रातको नींद आनेपर उसने स्वप्नमें साक्षात् भगवान् नृसिंहको देखा तथा उन नृसिंहदेवका यह वचन भी सुना—'पुत्र! तुम शीघ्र ही फूलोंके बगीचेके समीप मेरा