संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 106, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २८ ] शांतनुका चरित्र ९५ इन्द्रपुत्रस्य दुष्टस्य नान्यदस्ति निवारणम्। निर्माल्य लाकर छींट दो। उस दुष्ट इन्द्रपुत्रको रोकनेका इति श्रुत्वा हरेर्वाक्यं नरसिंहस्य धीमतः॥ २३ कोई दूसरा उपाय नहीं है'॥ २१-२२१/२॥ 'बुद्धिमान् भगवान् नृसिंहका यह वचन सुनकर बुद्ध्वाऽऽनीय तु निर्माल्यं तथा चक्रे यथोदितम्। माली जाग उठा और उसने निर्माल्य लाकर उनके सोऽप्यागत्य यथापूर्वं रथेनालक्षितेन तु॥ २४ कथनानुसार वहाँ छींट दिया। जयन्त भी पहलेके ही रथादुत्तीर्य पुष्पाणि विचिन्वंस्तद्भुवि स्थितम्। समान अलक्षित रथसे आया और उससे उतरकर फूल निर्माल्यं लङ्घयामास इन्द्रसूनुरनिष्टकृत्॥ २५ तोड़ने लगा। उसी समय अपना अनिष्ट करनेवाला इन्द्रपुत्र वहाँ भूमिपर पड़े हुए निर्माल्यको लाँघ गया। ततस्तस्य न शक्तिः स्याद्रथारोहणकर्मणि। इससे उसमें रथपर चढ़नेकी शक्ति नहीं रह गयी। तब उक्तः सारथिना चैव रथस्यारोहणे तव॥ २६ सारथिने उससे कहा—'नृसिंहका निर्माल्य लाँघ जानेके नरसिंहस्य निर्माल्यलङ्घने नास्ति योग्यता। कारण अब तुममें इस रथपर चढ़नेकी योग्यता नहीं रह गच्छामि दिवमेवाहं त्वं भूम्यां वस माऽऽरुह॥ २७ गयी है। मैं तो स्वर्गलोकको लौटता हूँ, किंतु तुम यहाँ भूतलपर ही रहो; रथपर न चढ़ो'॥ २३—२७॥ तेनैवमुक्तो मतिमांस्तमाह हरिनन्दनः। 'सारथिके इस प्रकार कहनेपर मतिमान् इन्द्रकुमारने पापस्य नोदनं त्वत्र कर्मणा येन मे भवेत्॥ २८ उससे कहा—'सारथे! जिस कर्मसे यहाँ मेरे पापका तदुक्त्वा गच्छ नाकं त्वं कर्मास्मान् सारथे द्रुतम्। निवारण हो, उसे बताकर तुम शीघ्र स्वर्गलोकको जाओ'॥ २८१/२॥ सारथिरुवाच सारथि बोला—'कुरुक्षेत्रमें परशुरामजीका एक यज्ञ रामसत्रे कुरुक्षेत्रे द्वादशाब्दे तु नित्यशः॥ २९ हो रहा है, जो बारह वर्षोंमें समाप्त होनेवाला है। उसमें जाकर तुम प्रतिदिन ब्राह्मणोंका जूठा साफ करो; इससे द्विजोच्छिष्टापनयनं कृत्वा त्वं शुद्धिमेष्यसि। तुम्हारी शुद्धि होगी।' यों कहकर सारथि देवसेवित इत्युक्त्वासौ गतः स्वर्गं सारथिर्देवसेवितम्॥ ३० स्वर्गलोकको चला गया॥ २९-३०॥ इन्द्रसूनुः कुरुक्षेत्रं प्राप्तः सारस्वतं तटम्। 'इधर इन्द्रपुत्र जयन्त कुरुक्षेत्रमें सरस्वतीके तटपर रामसत्रे तथा कुर्याद्द्विजोच्छिष्टस्य मार्जनम्॥ ३१ आया और परशुरामजीके यज्ञमें ब्राह्मणोंकी जूठन साफ करने लगा। जब बारहवाँ वर्ष पूर्ण हुआ, तब ब्राह्मणोंने पूर्णे द्वादशमे वर्षे तमूचुः शङ्किता द्विजाः। शङ्कित होकर उससे पूछा—'महाभाग! तुम कौन हो? कस्त्वं ब्रूहि महाभाग नित्यमुच्छिष्टमार्जकः॥ ३२ जो नित्य जूठन साफ करते हुए भी हमारे यज्ञमें भोजन न भुङ्क्से च नः सत्रे शङ्का नो महती भवेत्। नहीं करते। इससे हमारे मनमें महान् संदेह हो रहा है।' इत्युक्तः कथयित्वा तु यथावृत्तमनुक्रमात्॥ ३३ उनके इस प्रकार पूछनेपर इन्द्रकुमार क्रमशः अपना सारा वृत्तान्त ठीक-ठीक बताकर तुरंत रथसे स्वर्गलोकको जगाम त्रिदिवं क्षिप्रं रथेन तनयो हरेः। चला गया॥ ३१-३३१/२॥ तस्मात् त्वमपि भूपाल ब्राह्मणोच्छिष्टमादरात्॥ ३४ 'इसलिये, हे भूपाल! तुम भी परशुरामजीके मार्जनं कुरु रामस्य सत्रे द्वादशवार्षिके। द्वादशवार्षिक यज्ञमें आदरपूर्वक ब्राह्मणोंकी जूठन साफ ब्राह्मणेभ्यः परं नास्ति सर्वपापहरं परम्॥ ३५ करो। ब्राह्मणोंसे बढ़कर दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो पापोंका अपहरण कर सके। महीपाल! इस प्रकार प्रायश्चित्त एवं कृते देवदत्तस्यन्दनारोहणे गतिः। कर लेनेपर तुम्हें देवताओंके दिये हुए रथपर चढ़नेकी भविष्यति महीपाल प्रायश्चित्ते कृते तव॥ ३६ शक्ति प्राप्त हो जायगी। महामते! आजसे तुम भी अत ऊर्ध्वं च निर्माल्यं मा लङ्घय महामते। श्रीनृसिंहदेवका तथा अन्य देवताओंके भी निर्माल्यका नरसिंहस्य देवस्य तथान्येषाम् दिवौकसाम्॥ ३७ उल्लंघन न करना'॥ ३४-३७॥