संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 107, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें९६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २९ इत्युक्तः शांतनुस्तेन ब्राह्मणोच्छिष्टमार्जनम्। नारदजीके ऐसा कहनेपर शांतनुने बारह वर्षोतक कृतवान् द्वादशाब्दं तु आरुरोह रथं च तम्॥ ३८ ब्राह्मणोंकी जूठन साफ की। इसके बाद वे शक्ति पाकर एवं पूर्वमशक्तिः स्याद् रथरारोहे महीक्षितः। उस रथपर चढ़नेमें समर्थ हुए। विप्रवर! इस प्रकार पश्चात् तस्यैव विप्रेन्द्र शक्तिरेवमजायत॥ ३९ पूर्व-कालमें राजाकी उस रथपर चढ़नेकी शक्ति जाती रही और फिर उक्त उपाय करनेसे उनमें पुनः वह शक्ति एवं ते कथितो विप्र दोषो निर्माल्यलङ्घने। आ गयी॥ ३८-३९॥ पुण्यं तथा द्विजानां तु प्रोक्तमुच्छिष्टमार्जने॥ ४० ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने निर्माल्य लाँघनेमें जो दोष है, वह बताया तथा ब्राह्मणोंका जूठा साफ करनेमें जो भक्त्या द्विजोच्छिष्टमिहापमार्जये- पुण्य है, उसका भी वर्णन किया। जो मनुष्य इस च्छुचिर्नरो यः सुसमाहितात्मा। लोकमें पवित्र होकर, अपने चित्तको एकाग्र करके, स पापबन्धं प्रविहाय भुङ्क्ते भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंका जूठा साफ करता है, वह पापबन्धनसे गवां प्रदानस्य फलं दिवि स्थितः॥ ४१ मुक्त हो स्वर्गमें निवास करता और गौओंके दानका फल भोगता है॥ ४०-४१॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे शांतनुचरितं नामाष्टाविंशोऽध्यायः॥ २८॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'शांतनुचरित्र' नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २८॥ उन्तीसवाँ अध्याय शांतनुकी संततिका वर्णन श्रीसूत उवाच श्रीसूतजी कहते हैं—शांतनुके योजनगन्धासे 'विचित्रवीर्य' नामक पुत्र हुआ। राजा विचित्रवीर्य शांतनोर्योजनगन्धायां विचित्रवीर्यः। स तु हस्तिनापुरमें रहकर धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते रहे हस्तिनापुरे स्थित्वा प्रजाः स्वधर्मेण पालयन् देवांश्च और यज्ञोंद्वारा देवताओंको तथा श्राद्धके द्वारा पितरोंको यागैः पितॄंश्च श्राद्धैः संतर्प्य संजातपुत्रो तृप्त करके पुत्र पैदा होनेपर स्वर्गलोकको प्राप्त हुए। विचित्रवीर्यके अम्बालिकाके गर्भसे 'पाण्डु' नामक पुत्र दिवमारुरोह॥ १॥ विचित्रवीर्यस्याम्बालिकायां उत्पन्न हुआ। पाण्डु भी धर्मपूर्वक राज्यपालन करके पाण्डुः पुत्रो जज्ञे। सोऽपि राज्यं धर्मतः कृत्वा मुनिके शापसे शरीर त्यागकर देवलोकको चले गये। उन राजा पाण्डुके कुन्तीदेवीके गर्भसे 'अर्जुन' नामक मुनिशापाच्छरीरं विहाय देवलोकमवाप। तस्य पुत्र हुआ। अर्जुनने बड़ी भारी तपस्या करके शंकरजीको पाण्डोः कुन्तिदेव्यामर्जुनः॥ २॥ स तु महता तपसा प्रसन्न किया, उनसे 'पाशुपत' नामक अस्त्र प्राप्त किया शंकरं तोषयित्वा पाशुपतमस्त्रमवाप्य त्रिविष्टपाधिपतेः और स्वर्गलोकके अधिपति इन्द्रके शत्रु 'निवातकवच' नामक दानवोंका वध करके अग्निदेवको उनकी रुचिके शत्रून् निवातकवचान् दानवान् हत्वा खाण्डववन- अनुसार खाण्डववन समर्पित किया। खाण्डववनको मग्नेर्यथारुचि निवेद्य तृप्ताग्नितो दिव्यान् वरानवाप्य जलाकर, तृप्त हुए अग्निदेवसे अनेक दिव्य वर प्राप्त कर, In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth