संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 108, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २९] शांतनुकी संततिका वर्णन ९७ सुयोधनेन हतराज्यॊ धर्मभीमनकुलसहदेव- दुर्योधनद्वारा अपना राज्य छिन जानेपर उन्होंने (अपने भाई) द्रौपदीसहितो विराटनगरेऽज्ञातवासं चरित्वा गोग्रहे धर्म (युधिष्ठिर), भीम, नकुल, सहदेव और (पत्नी) द्रौपदीके साथ विराटनगरमें अज्ञातवास किया। वहाँ जब च भीष्मद्रोणकृपदुर्योधनकर्णादीन् जित्वा शत्रुओंने आक्रमण करके विराटकी गौओंको अपने अधिकारमें कर लिया, तब अर्जुनने भीष्म, द्रोण, कृप, समस्तगोमण्डलं निवर्त्तयित्वा भ्रातृभिः सह दुर्योधन और कर्ण आदिको हराकर समस्त गौओंको वापस विराटराजकृतपूजो वासुदेवसहितः कुरुक्षेत्रे घुमाया। फिर विराटराजके द्वारा भाइयोंसहित सम्मानित होकर कुरुक्षेत्रमें भगवान् वासुदेवको साथ ले अत्यन्त धार्तराष्ट्रैर्बहुबलैर्युद्धं कुर्वन् भीष्मद्रोणकृपशल्य- बलशाली धृतराष्ट्रपुत्रोंके साथ युद्ध किया और भीष्म, कर्णादिभिर्भूरिपराक्रमैः क्षत्रियैर्नानादेशागतैरनेकैरपि द्रोण, कृप, शल्य, कर्ण आदि महापराक्रमी क्षत्रियों तथा नाना देशोंसे आये हुए अनेकों राजपुत्रोंसहित दुर्योधनादि राजपुत्रैः सह दुर्योधनादीन् धार्तराष्ट्रान् हत्वा स्वराज्यं धृतराष्ट्रपुत्रोंका उन्होंने भीम आदिके सहयोगसे वध करके प्राप्य धर्मेण राज्यं परिपाल्य भ्रातृभिः सह मुदितो अपना राज्य प्राप्त कर लिया। फिर भाइयोंसहित वे धर्मके अनुसार (अपने सबसे बड़े भाई धर्मराज युधिष्ठिरको दिवमारुरोह ॥ ३ ॥ राजाके पदपर अभिषेक करके) राज्यका पालन करके अन्तमें सबके साथ प्रसन्नतापूर्वक स्वर्गलोकमें चले गये ॥ १-३ ॥ अर्जुनस्य सुभद्रायामभिमन्युः। येन भारतयुद्धे अर्जुनको सुभद्राके गर्भसे 'अभिमन्यु' नामक पुत्र प्राप्त हुआ, जिसने महाभारत-युद्धमें चक्रव्यूहके भीतर चक्रव्यूहं प्रविश्यानेकभूभुजो निधनं प्रापिताः॥ ४॥ प्रवेश करके अनेक राजाओंको मृत्युके घाट उतारा था। अभिमन्योरुत्तरायां परीक्षितः। सोऽप्यभिषिक्तो वनं अभिमन्युके उत्तराके गर्भसे परीक्षित्का जन्म हुआ। धर्मनन्दन युधिष्ठिर जब वानप्रस्थ धर्मके अनुसार वनमें गच्छता धर्मपुत्रेण राज्यं कृत्वा राजपुत्रो नाकं सम्प्राप्य जाने लगे, तब उन्होंने परीक्षित्को राजाके पदपर अभिषिक्त रेमे ॥ ५॥ परीक्षितान्मातृवत्यां जनमेजयः। येन कर दिया। तब वे भी धर्मपूर्वक राज्यका पालन करके अन्तमें वैकुण्ठधाममें जाकर अक्षय सुखके भागी हुए। ब्रह्महत्यावारणार्थं महाभारतं व्यासशिष्या- परीक्षित्से मातृवतीके गर्भसे जनमेजयका जन्म हुआ, द्वैशम्पायनात् साद्यन्तं श्रुतम्॥ ६॥ राज्यं च धर्मतः जिन्होंने ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त होनेके लिये व्यासशिष्य वैशम्पायनके मुखसे सम्पूर्ण महाभारत आदिसे अन्ततक कृत्वा दिवमारुरोह। जनमेजयस्य पुष्पवत्यां सुना था। वे भी धर्मपूर्वक राज्यका पालन करके अन्तमें शतानीकः ॥७॥ स तु धर्मेण राज्यं कुर्वन् स्वर्गवासी हुए। जनमेजयको अपनी पत्नी पुष्पवतीके गर्भसे 'शतानीक' नामक पुत्र प्राप्त हुआ। उन्होंने धर्मपूर्वक संसारदुःखाद्विरक्तः शौनकोपदेशेन क्रियायोगेन राज्यका पालन करते हुए संसार-दुःखसे विरक्त हो, सकललोकनाथं विष्णुमाराध्य निष्कामो वैष्णवं शौनकके उपदेशसे यागादि कर्मोंके द्वारा समस्त लोकोंके अधीश्वर भगवान् विष्णुकी निष्कामभावसे आराधना पदमवाप। तस्य शतानीकस्य फलवत्यां की और अन्तमें वैष्णवधामको प्राप्त कर लिया। सहस्रानीकः ॥ ८ ॥ स तु बाल एवाभिषिक्तो शतानीकके फलवतीके गर्भसे सहस्रानीककी उत्पत्ति नरसिंहेऽत्यन्तं भक्तिमानभवत् । तस्य चरितमुपरिष्टाद् हुई। सहस्रानीक बाल्यावस्थामें ही राजाके पदपर अभिषिक्त हो भगवान् नृसिंहके प्रति अत्यन्त भक्तिभाव रखने भविष्यति ॥ ९॥ सहस्रानीकस्य मृगवत्यामुदयनः । लगे। उनके चरित्रका आगे वर्णन किया जायगा। सहस्रानीकके सोऽपि राज्यं कृत्वा धर्मतो नारायणमाराध्य मृगवतीसे उदयन हुए। वे कौशाम्बीमें धर्मपूर्वक राज्यका पालन करके नारायणकी आराधना करते हुए वैकुण्ठधामको तत्पुरमवाप ॥ १०॥ उदयनस्य वासवदत्तायां प्राप्त हुए। उदयनके वासवदत्ताके गर्भसे नरवाहन नामक नरवाहनः । स तु यथान्यायं राज्यं कृत्वा दिवमवाप। पुत्र हुआ। वह भी न्यायतः राज्यका पालन करके स्वर्गको 1113 Narsingpuran_Section_5_1_FrontIn Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth