संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय २८ ] शांतनुका चरित्र ९५
अध्याय २८ ] शांतनुका चरित्र ९५ इन्द्रपुत्रस्य दुष्टस्य नान्यदस्ति निवारणम्। निर्माल्य लाकर छींट दो। उस दुष्ट इन्द्रपुत्रको रोकनेका इति श्रुत्वा हरेर्वाक्यं नरसिंहस्य धीमतः॥ २३ कोई दूसरा उपाय नहीं है'॥ २१-२२१/२॥ 'बुद्धिमान् भगवान् नृसिंहका यह वचन सुनकर बुद्ध्वाऽऽनीय तु निर्माल्यं तथा चक्रे यथोदितम्। माली जाग उठा और उसने निर्माल्य लाकर उनके सोऽप्यागत्य यथापूर्वं रथेनालक्षितेन तु॥ २४ कथनानुसार वहाँ छींट दिया। जयन्त भी पहलेके ही रथादुत्तीर्य पुष्पाणि विचिन्वंस्तद्भुवि स्थितम्। समान अलक्षित रथसे आया और उससे उतरकर फूल निर्माल्यं लङ्घयामास इन्द्रसूनुरनिष्टकृत्॥ २५ तोड़ने लगा। उसी समय अपना अनिष्ट करनेवाला इन्द्रपुत्र वहाँ भूमिपर पड़े हुए निर्माल्यको लाँघ गया। ततस्तस्य न शक्तिः स्याद्रथारोहणकर्मणि। इससे उसमें रथपर चढ़नेकी शक्ति नहीं रह गयी। तब उक्तः सारथिना चैव रथस्यारोहणे तव॥ २६ सारथिने उससे कहा—'नृसिंहका निर्माल्य लाँघ जानेके नरसिंहस्य निर्माल्यलङ्घने नास्ति योग्यता। कारण अब तुममें इस रथपर चढ़नेकी योग्यता नहीं रह गच्छामि दिवमेवाहं त्वं भूम्यां वस माऽऽरुह॥ २७ गयी है। मैं तो स्वर्गलोकको लौटता हूँ, किंतु तुम यहाँ भूतलपर ही रहो; रथपर न चढ़ो'॥ २३—२७॥ तेनैवमुक्तो मतिमांस्तमाह हरिनन्दनः। 'सारथिके इस प्रकार कहनेपर मतिमान् इन्द्रकुमारने पापस्य नोदनं त्वत्र कर्मणा येन मे भवेत्॥ २८ उससे कहा—'सारथे! जिस कर्मसे यहाँ मेरे पापका तदुक्त्वा गच्छ नाकं त्वं कर्मास्मान् सारथे द्रुतम्। निवारण हो, उसे बताकर तुम शीघ्र स्वर्गलोकको जाओ'॥ २८१/२॥ सारथिरुवाच सारथि बोला—'कुरुक्षेत्रमें परशुरामजीका एक यज्ञ रामसत्रे कुरुक्षेत्रे द्वादशाब्दे तु नित्यशः॥ २९ हो रहा है, जो बारह वर्षोंमें समाप्त होनेवाला है। उसमें जाकर तुम प्रतिदिन ब्राह्मणोंका जूठा साफ करो; इससे द्विजोच्छिष्टापनयनं कृत्वा त्वं शुद्धिमेष्यसि। तुम्हारी शुद्धि होगी।' यों कहकर सारथि देवसेवित इत्युक्त्वासौ गतः स्वर्गं सारथिर्देवसेवितम्॥ ३० स्वर्गलोकको चला गया॥ २९-३०॥ इन्द्रसूनुः कुरुक्षेत्रं प्राप्तः सारस्वतं तटम्। 'इधर इन्द्रपुत्र जयन्त कुरुक्षेत्रमें सरस्वतीके तटपर रामसत्रे तथा कुर्याद्द्विजोच्छिष्टस्य मार्जनम्॥ ३१ आया और परशुरामजीके यज्ञमें ब्राह्मणोंकी जूठन साफ करने लगा। जब बारहवाँ वर्ष पूर्ण हुआ, तब ब्राह्मणोंने पूर्णे द्वादशमे वर्षे तमूचुः शङ्किता द्विजाः। शङ्कित होकर उससे पूछा—'महाभाग! तुम कौन हो? कस्त्वं ब्रूहि महाभाग नित्यमुच्छिष्टमार्जकः॥ ३२ जो नित्य जूठन साफ करते हुए भी हमारे यज्ञमें भोजन न भुङ्क्से च नः सत्रे शङ्का नो महती भवेत्। नहीं करते। इससे हमारे मनमें महान् संदेह हो रहा है।' इत्युक्तः कथयित्वा तु यथावृत्तमनुक्रमात्॥ ३३ उनके इस प्रकार पूछनेपर इन्द्रकुमार क्रमशः अपना सारा वृत्तान्त ठीक-ठीक बताकर तुरंत रथसे स्वर्गलोकको जगाम त्रिदिवं क्षिप्रं रथेन तनयो हरेः। चला गया॥ ३१-३३१/२॥ तस्मात् त्वमपि भूपाल ब्राह्मणोच्छिष्टमादरात्॥ ३४ 'इसलिये, हे भूपाल! तुम भी परशुरामजीके मार्जनं कुरु रामस्य सत्रे द्वादशवार्षिके। द्वादशवार्षिक यज्ञमें आदरपूर्वक ब्राह्मणोंकी जूठन साफ ब्राह्मणेभ्यः परं नास्ति सर्वपापहरं परम्॥ ३५ करो। ब्राह्मणोंसे बढ़कर दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो पापोंका अपहरण कर सके। महीपाल! इस प्रकार प्रायश्चित्त एवं कृते देवदत्तस्यन्दनारोहणे गतिः। कर लेनेपर तुम्हें देवताओंके दिये हुए रथपर चढ़नेकी भविष्यति महीपाल प्रायश्चित्ते कृते तव॥ ३६ शक्ति प्राप्त हो जायगी। महामते! आजसे तुम भी अत ऊर्ध्वं च निर्माल्यं मा लङ्घय महामते। श्रीनृसिंहदेवका तथा अन्य देवताओंके भी निर्माल्यका नरसिंहस्य देवस्य तथान्येषाम् दिवौकसाम्॥ ३७ उल्लंघन न करना'॥ ३४-३७॥
९६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २९
९६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २९ इत्युक्तः शांतनुस्तेन ब्राह्मणोच्छिष्टमार्जनम्। नारदजीके ऐसा कहनेपर शांतनुने बारह वर्षोतक कृतवान् द्वादशाब्दं तु आरुरोह रथं च तम्॥ ३८ ब्राह्मणोंकी जूठन साफ की। इसके बाद वे शक्ति पाकर एवं पूर्वमशक्तिः स्याद् रथरारोहे महीक्षितः। उस रथपर चढ़नेमें समर्थ हुए। विप्रवर! इस प्रकार पश्चात् तस्यैव विप्रेन्द्र शक्तिरेवमजायत॥ ३९ पूर्व-कालमें राजाकी उस रथपर चढ़नेकी शक्ति जाती रही और फिर उक्त उपाय करनेसे उनमें पुनः वह शक्ति एवं ते कथितो विप्र दोषो निर्माल्यलङ्घने। आ गयी॥ ३८-३९॥ पुण्यं तथा द्विजानां तु प्रोक्तमुच्छिष्टमार्जने॥ ४० ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने निर्माल्य लाँघनेमें जो दोष है, वह बताया तथा ब्राह्मणोंका जूठा साफ करनेमें जो भक्त्या द्विजोच्छिष्टमिहापमार्जये- पुण्य है, उसका भी वर्णन किया। जो मनुष्य इस च्छुचिर्नरो यः सुसमाहितात्मा। लोकमें पवित्र होकर, अपने चित्तको एकाग्र करके, स पापबन्धं प्रविहाय भुङ्क्ते भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंका जूठा साफ करता है, वह पापबन्धनसे गवां प्रदानस्य फलं दिवि स्थितः॥ ४१ मुक्त हो स्वर्गमें निवास करता और गौओंके दानका फल भोगता है॥ ४०-४१॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे शांतनुचरितं नामाष्टाविंशोऽध्यायः॥ २८॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'शांतनुचरित्र' नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २८॥ उन्तीसवाँ अध्याय शांतनुकी संततिका वर्णन श्रीसूत उवाच श्रीसूतजी कहते हैं—शांतनुके योजनगन्धासे 'विचित्रवीर्य' नामक पुत्र हुआ। राजा विचित्रवीर्य शांतनोर्योजनगन्धायां विचित्रवीर्यः। स तु हस्तिनापुरमें रहकर धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते रहे हस्तिनापुरे स्थित्वा प्रजाः स्वधर्मेण पालयन् देवांश्च और यज्ञोंद्वारा देवताओंको तथा श्राद्धके द्वारा पितरोंको यागैः पितॄंश्च श्राद्धैः संतर्प्य संजातपुत्रो तृप्त करके पुत्र पैदा होनेपर स्वर्गलोकको प्राप्त हुए। विचित्रवीर्यके अम्बालिकाके गर्भसे 'पाण्डु' नामक पुत्र दिवमारुरोह॥ १॥ विचित्रवीर्यस्याम्बालिकायां उत्पन्न हुआ। पाण्डु भी धर्मपूर्वक राज्यपालन करके पाण्डुः पुत्रो जज्ञे। सोऽपि राज्यं धर्मतः कृत्वा मुनिके शापसे शरीर त्यागकर देवलोकको चले गये। उन राजा पाण्डुके कुन्तीदेवीके गर्भसे 'अर्जुन' नामक मुनिशापाच्छरीरं विहाय देवलोकमवाप। तस्य पुत्र हुआ। अर्जुनने बड़ी भारी तपस्या करके शंकरजीको पाण्डोः कुन्तिदेव्यामर्जुनः॥ २॥ स तु महता तपसा प्रसन्न किया, उनसे 'पाशुपत' नामक अस्त्र प्राप्त किया शंकरं तोषयित्वा पाशुपतमस्त्रमवाप्य त्रिविष्टपाधिपतेः और स्वर्गलोकके अधिपति इन्द्रके शत्रु 'निवातकवच' नामक दानवोंका वध करके अग्निदेवको उनकी रुचिके शत्रून् निवातकवचान् दानवान् हत्वा खाण्डववन- अनुसार खाण्डववन समर्पित किया। खाण्डववनको मग्नेर्यथारुचि निवेद्य तृप्ताग्नितो दिव्यान् वरानवाप्य जलाकर, तृप्त हुए अग्निदेवसे अनेक दिव्य वर प्राप्त कर, In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय २९] शांतनुकी संततिका वर्णन ९७
अध्याय २९] शांतनुकी संततिका वर्णन ९७ सुयोधनेन हतराज्यॊ धर्मभीमनकुलसहदेव- दुर्योधनद्वारा अपना राज्य छिन जानेपर उन्होंने (अपने भाई) द्रौपदीसहितो विराटनगरेऽज्ञातवासं चरित्वा गोग्रहे धर्म (युधिष्ठिर), भीम, नकुल, सहदेव और (पत्नी) द्रौपदीके साथ विराटनगरमें अज्ञातवास किया। वहाँ जब च भीष्मद्रोणकृपदुर्योधनकर्णादीन् जित्वा शत्रुओंने आक्रमण करके विराटकी गौओंको अपने अधिकारमें कर लिया, तब अर्जुनने भीष्म, द्रोण, कृप, समस्तगोमण्डलं निवर्त्तयित्वा भ्रातृभिः सह दुर्योधन और कर्ण आदिको हराकर समस्त गौओंको वापस विराटराजकृतपूजो वासुदेवसहितः कुरुक्षेत्रे घुमाया। फिर विराटराजके द्वारा भाइयोंसहित सम्मानित होकर कुरुक्षेत्रमें भगवान् वासुदेवको साथ ले अत्यन्त धार्तराष्ट्रैर्बहुबलैर्युद्धं कुर्वन् भीष्मद्रोणकृपशल्य- बलशाली धृतराष्ट्रपुत्रोंके साथ युद्ध किया और भीष्म, कर्णादिभिर्भूरिपराक्रमैः क्षत्रियैर्नानादेशागतैरनेकैरपि द्रोण, कृप, शल्य, कर्ण आदि महापराक्रमी क्षत्रियों तथा नाना देशोंसे आये हुए अनेकों राजपुत्रोंसहित दुर्योधनादि राजपुत्रैः सह दुर्योधनादीन् धार्तराष्ट्रान् हत्वा स्वराज्यं धृतराष्ट्रपुत्रोंका उन्होंने भीम आदिके सहयोगसे वध करके प्राप्य धर्मेण राज्यं परिपाल्य भ्रातृभिः सह मुदितो अपना राज्य प्राप्त कर लिया। फिर भाइयोंसहित वे धर्मके अनुसार (अपने सबसे बड़े भाई धर्मराज युधिष्ठिरको दिवमारुरोह ॥ ३ ॥ राजाके पदपर अभिषेक करके) राज्यका पालन करके अन्तमें सबके साथ प्रसन्नतापूर्वक स्वर्गलोकमें चले गये ॥ १-३ ॥ अर्जुनस्य सुभद्रायामभिमन्युः। येन भारतयुद्धे अर्जुनको सुभद्राके गर्भसे 'अभिमन्यु' नामक पुत्र प्राप्त हुआ, जिसने महाभारत-युद्धमें चक्रव्यूहके भीतर चक्रव्यूहं प्रविश्यानेकभूभुजो निधनं प्रापिताः॥ ४॥ प्रवेश करके अनेक राजाओंको मृत्युके घाट उतारा था। अभिमन्योरुत्तरायां परीक्षितः। सोऽप्यभिषिक्तो वनं अभिमन्युके उत्तराके गर्भसे परीक्षित्का जन्म हुआ। धर्मनन्दन युधिष्ठिर जब वानप्रस्थ धर्मके अनुसार वनमें गच्छता धर्मपुत्रेण राज्यं कृत्वा राजपुत्रो नाकं सम्प्राप्य जाने लगे, तब उन्होंने परीक्षित्को राजाके पदपर अभिषिक्त रेमे ॥ ५॥ परीक्षितान्मातृवत्यां जनमेजयः। येन कर दिया। तब वे भी धर्मपूर्वक राज्यका पालन करके अन्तमें वैकुण्ठधाममें जाकर अक्षय सुखके भागी हुए। ब्रह्महत्यावारणार्थं महाभारतं व्यासशिष्या- परीक्षित्से मातृवतीके गर्भसे जनमेजयका जन्म हुआ, द्वैशम्पायनात् साद्यन्तं श्रुतम्॥ ६॥ राज्यं च धर्मतः जिन्होंने ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त होनेके लिये व्यासशिष्य वैशम्पायनके मुखसे सम्पूर्ण महाभारत आदिसे अन्ततक कृत्वा दिवमारुरोह। जनमेजयस्य पुष्पवत्यां सुना था। वे भी धर्मपूर्वक राज्यका पालन करके अन्तमें शतानीकः ॥७॥ स तु धर्मेण राज्यं कुर्वन् स्वर्गवासी हुए। जनमेजयको अपनी पत्नी पुष्पवतीके गर्भसे 'शतानीक' नामक पुत्र प्राप्त हुआ। उन्होंने धर्मपूर्वक संसारदुःखाद्विरक्तः शौनकोपदेशेन क्रियायोगेन राज्यका पालन करते हुए संसार-दुःखसे विरक्त हो, सकललोकनाथं विष्णुमाराध्य निष्कामो वैष्णवं शौनकके उपदेशसे यागादि कर्मोंके द्वारा समस्त लोकोंके अधीश्वर भगवान् विष्णुकी निष्कामभावसे आराधना पदमवाप। तस्य शतानीकस्य फलवत्यां की और अन्तमें वैष्णवधामको प्राप्त कर लिया। सहस्रानीकः ॥ ८ ॥ स तु बाल एवाभिषिक्तो शतानीकके फलवतीके गर्भसे सहस्रानीककी उत्पत्ति नरसिंहेऽत्यन्तं भक्तिमानभवत् । तस्य चरितमुपरिष्टाद् हुई। सहस्रानीक बाल्यावस्थामें ही राजाके पदपर अभिषिक्त हो भगवान् नृसिंहके प्रति अत्यन्त भक्तिभाव रखने भविष्यति ॥ ९॥ सहस्रानीकस्य मृगवत्यामुदयनः । लगे। उनके चरित्रका आगे वर्णन किया जायगा। सहस्रानीकके सोऽपि राज्यं कृत्वा धर्मतो नारायणमाराध्य मृगवतीसे उदयन हुए। वे कौशाम्बीमें धर्मपूर्वक राज्यका पालन करके नारायणकी आराधना करते हुए वैकुण्ठधामको तत्पुरमवाप ॥ १०॥ उदयनस्य वासवदत्तायां प्राप्त हुए। उदयनके वासवदत्ताके गर्भसे नरवाहन नामक नरवाहनः । स तु यथान्यायं राज्यं कृत्वा दिवमवाप। पुत्र हुआ। वह भी न्यायतः राज्यका पालन करके स्वर्गको 1113 Narsingpuran_Section_5_1_FrontIn Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
९८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३०
९८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३०
| नरवाहनस्याश्वमेधदत्तायां क्षेमकः ॥ ११॥ स च<br>राज्यस्थः प्रजाः परिपाल्य म्लेच्छाभिभूते जगति<br>ज्ञानबलात् कलापग्राममाश्रितः ॥ १२ ॥ | प्राप्त हुआ। नरवाहनके अश्वमेधदत्ताके गर्भसे क्षेमक नामक पुत्रका जन्म हुआ। क्षेमक राजाके पदपर प्रतिष्ठित होनेके पश्चात् प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करने लगे। उन्हीं दिनों म्लेच्छोंका आक्रमण हुआ और सम्पूर्ण जगत् उनके द्वारा पददलित होने लगा। तब वे ज्ञानके बलसे कलापग्राममें चले आये ॥ ४–१२ ॥ |
| यः श्रद्दधानः पठते शृणोति वा<br>हरौ च भक्तिं चरितं महीभृताम्।<br>स संततिं प्राप्य विशुद्धकर्मकृद्<br>दिवं समासाद्य वसेच्चिरं सुखी ॥ १३ ॥ | जो उपर्युक्त राजाओंकी हरिभक्ति तथा चरित्रका श्रद्धापूर्वक पाठ या श्रवण करता है, वह विशुद्ध कर्म करनेवाला पुरुष संतति प्राप्त करके अन्तमें स्वर्गलोकमें पहुँचकर वहाँ सुदीर्घ कालतक सुखी रहता है॥ १३॥ |
इति श्रीनरसिंहपुराणे शांतनुसंततिवर्णनं नाम एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'शांतनुकी संततिका वर्णन' नामक उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९ ॥
तीसवाँ अध्याय
भूगोल तथा स्वर्गलोकका वर्णन
| श्रीसूत उवाच<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि भूगोलं द्विजसत्तमाः ।<br>संक्षेपात् पर्वताकीर्णं नदीभिश्च समन्ततः ॥ १<br><br>जम्बुप्लक्षाल्मलकुशक्रौञ्चशाकपुष्करसंज्ञाः<br>सप्त द्वीपाः । लक्ष्योजनप्रमाणाज्जम्बुद्वीपादुत्तरोत्तर-<br>द्विगुणाः ॥ लवणेषुरससुरासर्पिर्दधिदुग्धस्वच्छोदक-<br>संज्ञैः परस्परं द्विगुणैः सप्तसमुद्रैर्वलयाकारैस्ते द्वीपाः<br>परिवेष्टिताः ॥ २ ॥ योऽसौ मनुपुत्रः प्रियव्रतो नाम<br>स सप्तद्वीपाधिपतिर्बभूव । तस्य अग्नीध्रादयो दश<br>पुत्रा बभूवुः ॥ ३ ॥ त्रयः प्रव्रजिताः । शिष्टानां सप्तानां<br>सप्तद्वीपाः पित्रा दत्ताः । तत्र जम्बुद्वीपाधिपतेरग्नीध्रस्य<br>नव पुत्रा जाताः ॥ ४ ॥<br><br>नाभिः किम्पुरुषश्चैव हरिवर्ष इलावृतः ।<br>रम्यो हिरण्मयश्चैव कुरुर्भद्रश्च केतुमान् ॥ ५ | **श्रीसूतजी बोले—**द्विजवरो! अब मैं सब ओर नदी तथा पर्वतोंसे व्याप्त भूगोल (भूमिमण्डल)-का संक्षेपसे वर्णन करूँगा ॥ १ ॥<br><br>इस पृथ्वीपर जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौञ्च, शाक और पुष्कर नामके सात द्वीप हैं। इनमें जम्बूद्वीप तो लाख योजन लंबा-चौड़ा है और प्लक्ष आदि जम्बूद्वीपसे उत्तरोत्तर दुगुने बड़े हैं। ये द्वीप क्रमशः अपनेसे दूने प्रमाणवाले लवण, इक्षुरस, सुरा, घृत, दधि, दुग्ध और शुद्धोदक नामसे विख्यात सात वलयाकार समुद्रोंसे घिरे हुए हैं। मनुके जो 'प्रियव्रत' नामक पुत्र थे, वे ही सात द्वीपोंके अधिपति हुए। उनके अग्नीध्र आदि दस पुत्र हुए। इनमेंसे तीन तो सर्वत्यागी संन्यासी हो गये और शेष सातोंको उनके पिताने एक-एक द्वीप बाँट दिया। इनमें जम्बूद्वीपके अधिपति 'अग्नीध्र'के नौ पुत्र हुए। उनके नाम ये हैं—नाभि, किम्पुरुष, हरिवर्ष, इलावृत, रम्य, हिरण्मय, कुरु, भद्र और केतुमान् ॥ २–५ ॥ |
अध्याय ३० ] भूगोल तथा स्वर्गलोकका वर्णन ९९
अध्याय ३० ] भूगोल तथा स्वर्गलोकका वर्णन ९९ नववर्षाः विभज्य पुत्रेभ्यः पित्रा दत्ता वनं राजा अग्नीध्र जब (घर त्यागकर) वनमें जाने लगे प्रविशता। अग्नीध्रीयं हिमाह्वयम्। यस्याधिपतिर्नाभः तब उन्होंने जम्बूद्वीपको उसके नौ खण्ड करके अपने ऋषभः पुत्रो बभूव ॥ ६ ॥ पुत्रोंको बाँट दिया। हिमालय पर्वतसे मिला हुआ वर्ष अग्नीध्र (नाभि)-को मिला था। इसके अधिपति राजा नाभिसे 'ऋषभ' नामक पुत्र हुआ ॥ ६ ॥ ऋषभाद् भरतो भरतेन चिरकालं धर्मेण पालितत्वादिदं भारतं वर्षमभूत् । इलावृतस्य मध्ये ऋषभसे भरतका जन्म हुआ, जिनके द्वारा चिरकालतक मेरुः सुवर्णमयश्चतुरशीतिसहस्राणि योजनानि धर्मपूर्वक पालित होनेके कारण इस देशका नाम 'भारतवर्ष' तस्योच्छ्रायः। षोडशसहस्रमप्यधस्तादवगाढः। पड़ा। इलावृत वर्षके बीचमें मेरु नामक सुवर्णमय पर्वत तद्विगुणो मूर्ध्नि विस्तारः ॥ ७ ॥ तन्मध्ये ब्रह्मणः है। उसकी ऊँचाई चौरासी हजार योजन है। वह सोलह पुरी। ऐन्द्रयामिन्द्रस्य चामरावती। आग्नेय्या- हजार योजनतक नीचे जमीनमें गड़ा है और इससे दूनी मग्नेस्तेजोवती। याम्यां यमस्य संयमनी। नैर्ऋत्यां (बत्तीस हजार योजन) इसकी चोटीकी चौड़ाई है। निर्ऋतेर्भयंकरी। वारुण्यां वरुणस्य विश्वावती। इसीके मध्यभागमें ब्रह्माजीकी पुरी है, पूर्वभागमें इन्द्रकी वायव्यां वायborder... वायोगन्धवती। उदीच्यां सोमस्य 'अमरावती' है, अग्निकोणमें अग्निकी 'तेजोवती' पुरी है, विभावरीति। नववर्षान्वितं जम्बूद्वीपं पुण्यपर्वतैः दक्षिणमें यमराजकी 'संयमनी' है, नैर्ऋत्यकोणमें निर्ऋतिकी पुण्यनदीभिरन्वितम् ॥ ८ ॥ किम्पुरुषादीन्यष्टवर्षाणि 'भयंकारी' नामक पुरी है, पश्चिममें वरुणकी 'विश्वावती' पुण्यवतां भोगस्थानानि साक्षाद् भारतवर्षमेकं है, वायव्यकोणमें वायुकी 'गन्धवती' नगरी है और कर्मभूमिश्चातुर्वर्ण्ययुतम् ॥ ९ ॥ उत्तरमें चन्द्रमाकी 'विभावरी' पुरी है। नौ खण्डोंसे युक्त यह जम्बूद्वीप पुण्य पर्वतों तथा पुण्य नदियोंसे युक्त है। तत्रैव कर्मभिः स्वर्गं कृतैः प्राप्स्यन्ति मानवाः। किम्पुरुष आदि आठ वर्ष पुण्यवानोंके भोगस्थान हैं; मुक्तिश्चात्रैव निष्कामैः प्राप्यते ज्ञानकर्मभिः। केवल एक भारतवर्ष ही चारों वर्णोंसे युक्त कर्मक्षेत्र है। अधोगतिमितो विप्र यान्ति वै पापकारिणः ॥ १० ॥ भारतवर्षमें ही कर्म करनेसे मनुष्य स्वर्ग प्राप्त करेंगे और वहाँ ही ज्ञान-साधकको निष्काम कर्मोंसे मुक्ति भी प्राप्त ये पापकारिणस्तान् विद्धि पातालतले नरके होती है। विप्रवर ! पाप करनेवाले पुरुष यहाँसे अधोगतिको कोटिसमन्वितान् ॥ ११ ॥ प्राप्त होते हैं। जो पापी हैं, उन करोड़ों मनुष्योंको पातालस्थ नरकमें पड़े हुए समझिये ॥ ७-११॥ अथ सप्त कुलपर्वताः कथ्यन्ते । महेन्द्रो मलयः अब सात कुलपर्वतोंका वर्णन किया जाता है— शुक्तिमान् ऋष्यमूकः सह्यपर्वतो विन्ध्यः पारियात्रः महेन्द्र, मलय, शुक्तिमान्, ऋष्यमूक, सह्य, विन्ध्य और इत्येते भारते कुलपर्वताः ॥ १२ ॥ नर्मदा सुरसा पारियात्र। ये ही भारतवर्षमें कुलपर्वत हैं। नर्मदा, सुरसा, ऋषिकुल्या भीमरथी कृष्णा वेणी चन्द्रभागा ऋषिकुल्या, भीमरथी, कृष्णावेणी, चन्द्रभागा तथा ताम्रपर्णी इत्येताः सप्त नद्यः । गङ्गा यमुना गोदावरी ताम्रपर्णी—ये सात नदियाँ हैं तथा गङ्गा, यमुना, गोदावरी, तुङ्गभद्रा कावेरी सरयूरित्येता महानद्यः तुङ्गभद्रा, कावेरी और सरयू—ये छः महानदियाँ सब पापघ्न्यः ॥ १३ ॥ पापोंको नष्ट करनेवाली हैं ॥ १२-१३ ॥ यह सुन्दर जम्बूद्वीप जम्बू (जामुन)-के नामसे जम्बुनाम्ना च विख्यातं जम्बूद्वीपमिदं शुभम्। विख्यात है। इसका विस्तार एक लाख योजन है। लक्षयोजनविस्तीर्णमिदं श्रेष्ठं तु भारतम् ॥ १४ ॥ इस द्वीपमें यह भारतवर्ष ही सबसे श्रेष्ठ स्थान है ॥ १४ ॥ 1113 Narsingpuran_Section_5_2_Front
१०० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३०
१०० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३० ऋक्षद्वीपादिपुण्या जनपदाः। निष्कामा ये | ऋक्षद्वीप आदि पुण्य देश हैं। जो लोग निष्कामभावसे स्वधर्मेण नरसिंहं यजन्ति ते तत्र निवसन्ति। | अपने-अपने वर्णधर्मका आचरण करते हुए भगवान् अधिकारक्षयान्मुक्तिं च प्राप्नुवन्ति॥ १५॥ | नृसिंहका यजन करते हैं, वे ही उन पुण्य देशोंमें निवास जम्ब्वाद्याः स्वादूदकान्ताः सप्त पयोधयः। ततः परा | करते हैं तथा कर्माधिकारका क्षय हो जानेपर मोक्ष भी हिरण्मयी भूमिः। ततो लोकालोकपर्वतः। एष | प्राप्त कर लेते हैं। जम्बूद्वीपसे लेकर 'शुद्धोदक' संज्ञक भूर्लोकः॥ १६॥ | समुद्रपर्यन्त सात द्वीप और सात समुद्र हैं। उसके बाद | स्वर्णमयी भूमि है। उसके आगे लोकालोक पर्वत है— | यह सब 'भूर्लोक' का वर्णन हुआ॥ १५-१६॥ अस्योपरि अन्तरिक्षलोकः। खेचराणां | इसके ऊपर अन्तरिक्षलोक है, जो अन्तरिक्षचारी रम्यस्तदूर्ध्वं स्वर्गलोकः॥ १७ | प्राणियोंके लिये परम रमणीय है। इसके ऊपर स्वर्गलोक स्वर्गस्थानं महापुण्यं प्रोच्यमानं निबोधत। | है। अब महापुण्यमय स्वर्गलोकका वर्णन किया जाता भारते कृतपुण्यानां देवानामपि चालयम्॥ १८ | है, उसे आपलोग मुझसे सुनें। जिन्होंने भारतवर्षमें | रहकर पुण्यकर्म किये हैं, उनका तथा देवताओंका वहाँ मध्ये पृथिव्यामद्रीन्द्रो भास्वान् मेरुर्हिरण्मयः। | निवास है। भूमण्डलके बीचमें पर्वतोंका राजा मेरु है, योजनानां सहस्राणि चतुराशीतिमुच्छ्रितः॥ १९ | जो सुवर्णमय होनेके कारण अपनी प्रभासे उद्भासित | होता रहता है। वह पर्वत चौरासी हजार योजन ऊँचा प्रविष्टः षोडशाधस्ताद्धरण्यां धरणीधरः। | है और सोलह हजार योजनतक पृथ्वीमें नीचेकी ओर | धँसा हुआ है। साथ ही उसके चारों ओर उतने ही तावत्प्रमाणा पृथिवी पर्वतस्य समन्ततः॥ २० | प्रमाणवाली पृथिवी है॥ १७-२०॥ तस्य शृङ्गतत्रयं मूर्ध्नि स्वर्गो यत्र प्रतिष्ठितः। | मेरुगिरिके ऊपरी भागमें तीन शिखर हैं, जहाँ स्वर्गलोक नानाद्रुमलताकीर्णं नानापुष्पोपशोभितम्॥ २१ | बसा हुआ है। मेरुके वे स्वर्गीय शिखर नाना प्रकारके मध्यमं पश्चिमं पूर्वं मेरोः शृङ्गाणि त्रीणि वै। | वृक्ष और लताओंसे आवृत्त तथा भाँति-भाँतिके पुष्पोंसे मध्यमं स्फटिकं शृङ्गं वैदूर्यमणिकामयम्॥ २२ | सुशोभित हैं। मध्यम, पश्चिम और पूर्व—ये ही तीन | मेरुके शिखर हैं। इनमें मध्यम शृङ्ग स्फटिक तथा इन्द्रनीलमयं पूर्वं माणिक्यं पश्चिमं स्मृतम्। | वैदूर्यमणिमय हैं, पूर्व शृङ्ग इन्द्रनीलमय और पश्चिम योजनानां सहस्राणि नियुतानि चतुर्दश॥ २३ | शिखर माणिक्यमय कहा जाता है। इनमेंसे मध्यम शृङ्ग | चौदह लाख चौदह हजार योजन ऊँचा है, जहाँ 'त्रिविष्टप' उच्छ्रितं मध्यमं शृङ्गं स्वर्गो यत्र त्रिविष्टपः। | नामका स्वर्गलोक प्रतिष्ठित है। पूर्व शृङ्ग मेरुके ऊपर अभ्रान्तरितं शृङ्गं मूर्ध्नि छात्राकृति स्थितम्॥ २४ | छत्राकार स्थित है। मध्यम शृङ्ग और उसके बीच अन्धकारका | व्यवधान है। वह मध्यम शृङ्ग और उसके बादवाले पूर्वमुत्तरशृङ्गाणामन्तरं मध्यमस्य च। | पश्चिम शिखरके बीचमें स्थित है। नाकपृष्ठ—त्रिविष्टपमें त्रिविष्टपे नाकपृष्ठे ह्यप्सराः सन्ति निर्वृताः॥ २५ | आनन्दमयी अप्सराएँ निवास करती हैं॥ २१-२५॥ | मेरुके मध्यवर्ती शिखरपर विराजमान स्वर्गमें आनन्दोऽथ प्रमोदश्च स्वर्गशृङ्गे तु मध्यमे। | आनन्द और प्रमोदका वास है। पश्चिम शिखरपर श्वेतश्च पौष्टिकश्चैव उपशोभनमन्मथौ॥ २६ | श्वेत, पौष्टिक, उपशोभन और काम एवं स्वर्गके In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth | 1113 Narsingpuran_Section_5_2_Back
अध्याय ३० ] भूगोल तथा स्वर्गलोकका वर्णन १०१
अध्याय ३० ] भूगोल तथा स्वर्गलोकका वर्णन १०१ आह्लादः स्वर्गराजा वै स्वर्गशृङ्गे तु पश्चिमे। निर्ममो निरहंकारः सौभाग्यश्चातिनिर्मलः ॥ २७ स्वर्गाश्चैव द्विजश्रेष्ठ पूर्वशृङ्गे समास्थिताः । एकविंशतिः स्वर्गा वै निविष्टा मेरुमूर्धनि ॥ २८ अहिंसादानकर्तारो यज्ञानां तपसां तथा। तत्तेषु निवसन्ति स्म जनाः क्रोधविवर्जिताः ॥ २९ जलप्रवेशे चानन्दं प्रमोदं वह्निसाहसे। भृगुप्रपाते सौख्यं च रणं चैवास्य निर्मलम् ॥ ३० अनाशके तु संन्यासे मृतो गच्छेत्रिविष्टपम्। क्रतुयाजी नाकपृष्ठमग्निहोत्री च निर्वृतिम् ॥ ३१ तडागकूपकर्ता च लभते पौष्टिकं द्विज। सुवर्णदायी सौभाग्यं लभन् स्वर्गं तपःफलम् ॥ ३२ शीतकाले महावह्निं प्रज्वालयति यो नरः। सर्वसत्त्वहितार्थाय स्वर्गं सोऽप्सरसं लभेत् ॥ ३३ हिरण्यगोप्रदाने हि निरहंकारमाप्नुयात्। भूमिदानेन शुद्धेन लभते शान्तिकं पदम् ॥ ३४ रौप्यदानेन स्वर्गं तु निर्मलं लभते नरः । अश्वदानेन पुण्याहं कन्यादानेन मङ्गलम् ॥ ३५ द्विजेभ्यस्तर्पणं कृत्वा दत्त्वा वस्त्राणि भक्तितः । श्वेतं तु लभते स्वर्गं यत्र गत्वा न शोचते ॥ ३६ कपिलागोप्रदानेन परमार्थे महीयते। गोवृषस्य प्रदानेन स्वर्गं मन्मथमाप्नुयात् ॥ ३७ माघमासे सरित्स्नायी तिलधेनुप्रदस्तथा। छत्रोपानहदाता च स्वर्गं यात्युपशोभनम् ॥ ३८
[अनुवाद / व्याख्या]
राजा आह्लाद निवास करते हैं। द्विजश्रेष्ठ ! पूर्व शिखरपर निर्मम, निरहंकार, सौभाग्य और अतिनिर्मल नामक स्वर्ग सुशोभित होते हैं। मेरु पर्वतकी चोटीपर कुल इक्कीस स्वर्ग बसे हुए हैं। जो अहिंसाधर्मका पालन करनेवाले और दानी हैं तथा जो यज्ञ और तपका अनुष्ठान करनेवाले हैं, वे क्रोधरहित मनुष्य इन स्वर्गोंमें निवास करते हैं॥ २६-२९॥ जो धर्मपालनके लिये जलमें प्रविष्ट होकर प्राण त्याग करते हैं, वे 'आनन्द' नामक स्वर्गको प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार जो धर्मरक्षाके ही लिये अग्निमें जलनेका साहस करते हैं, उन्हें 'प्रमोद' नामक स्वर्गकी प्राप्ति होती है और जो धर्मार्थ पर्वतशिखरसे कूदकर प्राण देते हैं, उन्हें 'सौख्य' संज्ञक स्वर्ग प्राप्त होता है। संग्रामकी मृत्युसे 'निर्मल' (या अतिनिर्मल) नामक स्वर्गकी उपलब्धि होती है। उपवास-व्रत एवं संन्यासावस्थामें मृत्युको प्राप्त होनेवाले लोग 'त्रिविष्टप' नामक स्वर्गमें जाते हैं। श्रौत यज्ञ करनेवाला 'नाकपृष्ठ'में और अग्निहोत्री 'निर्वृति' नामक स्वर्गमें जाते हैं। द्विज! पोखरा और कुआँ बनवानेवाला मनुष्य 'पौष्टिक' स्वर्गको पाता है, सोना दान करनेवाला पुरुष तपस्याके फलभूत 'सौभाग्य' नामक स्वर्गको जाता है। जो शीतकालमें सब प्राणियोंके हितके लिये लकड़ियोंके ढेरको जलाकर बड़ी भारी अग्निराशि प्रज्वलित करता और उन्हें गरमी पहुँचाता है, वह 'अप्सरा' संज्ञक स्वर्गको उपलब्ध करता है। सुवर्ण और गोदान करनेपर दाता 'निरहंकार' नामवाले स्वर्गको पाता है और शुद्धभावसे भूमिदान करके मनुष्य 'शान्तिक' नामसे प्रसिद्ध स्वर्गधामको उपलब्ध करता है। चाँदी दान करनेसे मनुष्यको 'निर्मल' नामक स्वर्गकी प्राप्ति होती है। अश्वदानसे दाता 'पुण्याह'का और कन्यादानसे 'मङ्गल'का लाभ करता है। ब्राह्मणोंको तृप्त करके उन्हें भक्तिपूर्वक वस्त्र दान करनेसे मनुष्य 'श्वेत' नामक स्वर्गको पाता है, जहाँ जाकर वह कभी शोकका भागी नहीं होता॥ ३०-३६॥ कपिला गौका दान करनेसे दाता 'परमार्थ' नामक स्वर्गमें पूजित होता है और उत्तम साँड़का दान करनेसे उसे 'मन्मथ' नामक स्वर्गकी प्राप्ति होती है। जो माघके महीनेमें नित्य नदीमें स्नान करता, तिलमयी धेनु देता
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सौरसिंहपुराण [ अध्याय ३०
सौरसिंहपुराण [ अध्याय ३० ....................................। और छत्र तथा जूतेका दान करता है, वह 'उपशोभन' .................... महीयते ॥ ३९ नामक स्वर्गमें जाता है। जिसने देवमन्दिर बनवाया है, जो द्विजोंकी सेवा करता है तथा सदा तीर्थयात्रा करता ........................ च नित्यशः । रहता है, वह 'स्वर्गराज' (आह्लाद)-में प्रतिष्ठित होता .................... स्वर्गं शुभं लभेत् ॥ ४० ॥ है। जो मनुष्य नित्य एक ही अन्न भोजन करता, जो प्रतिदिन केवल रातमें ही खाता तथा त्रिरात्र आदि व्रतोंके द्वारा उपवास किया करता है, वह 'शुभ' नामक स्वर्गको ............ जितेन्द्रियो ब्रह्मचारी दृढव्रतः । पाता है। नदीमें स्नान करनेवाला, क्रोधको जीतनेवाला ........ ज्योति यथा भूतहिते रतः। एवं दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाला ब्रह्मचारी सम्पूर्ण विद्यादानेन मेधावी निरहंकारमाप्नुयात् ॥ ४१ जीवोंके हितमें तत्पर रहनेवाले पुरुषके समान 'निर्मल' नामक स्वर्गको पाता है। मेधावी पुरुष विद्यादान करके येन येन हि भावेन यद्यद्दानं प्रयच्छति । 'निरहंकार' नामक स्वर्गको प्राप्त होता है ॥ ३७-४१ ॥ तत्तत्स्वर्गमवाप्नोति यद्यदिच्छति मानवः ॥ ४२ मनुष्य जिस-जिस भावनासे जो-जो दान देता है और उससे जो-जो फल चाहता है, तदनुसार ही विभिन्न चत्वारि अतिदानानि कन्या गौर्भूः सरस्वती । स्वर्गलोकोंको पाता है। कन्या, गौ, भूमि तथा विद्या- नरकादुद्धरन्त्येते जयवाहनदोहनात् ॥ ४३ इन चारोंके दानको 'अतिदान' कहा गया है। ये चार वस्तुएँ दान की जानेपर दाताका नरकसे उद्धार कर देती यस्तु सर्वाणि दानानि ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छति । हैं। इतना ही नहीं, बैलपर सवारी करने और गायको सम्प्राप्य न निवर्तेत स्वर्गं शान्तमनामयम् ॥ ४४ दुहनेसे जो दोष होता है, उससे भी मनुष्य मुक्त हो जाता है। जो ब्राह्मणोंको सब प्रकारके दान अर्पित करता है, वह शान्त एवं निरामय स्वर्गलोकको प्राप्त होकर फिर शृङ्गे तु पश्चिमे यत्र ब्रह्मा तत्र स्थितः स्वयम्। वहाँसे नहीं लौटता है। मेरुगिरिके पश्चिम शिखरपर, पूर्वशृङ्गे स्वयं विष्णुः मध्ये चैव शिवः स्थितः ॥ ४५ जहाँ स्वयं ब्रह्माजी विराजमान हैं, वहीं वह स्वयं भी वास करता है। पूर्वशृङ्गपर साक्षात् भगवान् विष्णु और अतः परं तु विप्रेन्द्र स्वर्गाध्वानमिमं शृणु। मध्यम शृङ्गपर शिवजी विराजमान हैं ॥ ४२-४५ ॥ विमलं विपुलं शुद्धमुपर्युपरि संस्थितम् ॥ ४६ विप्रेन्द्र ! इसके बाद आप स्वर्गके इन 'निर्मल' तथा 'विशाल' मार्गका वर्णन सुनें। स्वर्गलोकके दस मार्ग हैं। प्रथमे तु कुमारस्तु द्वितीये मातरः स्थिताः । ये सभी एकके ऊपर दूसरेके क्रमसे स्थित हैं। प्रथम मार्गपर तृतीये सिद्धगन्धर्वास्तुर्ये विद्याधरा द्विज ॥ ४७ कुमार कार्तिकेय और दूसरेपर मातृकाएँ रहती हैं। द्विज ! तीसरे मार्गपर सिद्ध-गन्धर्व, चौथेपर विद्याधर, पाँचवेंपर पञ्चमे नागराजश्च षष्ठे तु विनतासुतः । नागराज और छठेपर विनतानन्दन गरुडजी विराजमान हैं। सप्तमे दिव्यपितरो धर्मराजस्तथाष्टमे । सातवेंपर दिव्य पितृगण, आठवेंपर धर्मराज, नवेंपर दक्ष नवमे तु तथा दक्ष आदित्यो दशमे पथि ॥ ४८ और दसवें मार्गपर आदित्यकी स्थिति है ॥ ४६-४८ ॥ भूलोकसे एक लाख दो हजार योजनकी भूर्लोकाच्छतसाहस्रादूर्ध्वं चरति भास्करः । ऊँचाईपर सूर्यदेव विचरते हैं। उस ऊँचाईपर योजनानां सहस्रे द्वे विष्कम्भनं समन्ततः ॥ ४९ सब ओर उनके रुकनेके लिये आधार हैं In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ३१] ध्रुव-चरित्र तथा ग्रह, नक्षत्र एवं पातालका संक्षिप्त वर्णन १०३ त्रिगुणं परिणाहेन सूर्यबिम्बं प्रमाणतः। सोमपुर्यां विभावर्यां मध्याह्ने चार्यमा यदा। महेन्द्रस्यामरावत्यां तदा तिष्ठति भास्करः॥५० मध्याह्ने त्वमरावत्यां यदा भवति भास्करः। तदा संयमने याम्ये तत्रोद्यंस्तु प्रदृश्यते॥५१ मेरुं प्रदक्षिणं कुर्वन् भात्येव सविता सदा। ध्रुवाधारस्तथोत्निष्ठन् बालखिल्यादिभिः स्तुतः॥५२ तथा उस ऊँचाईसे तीन गुने प्रमाणमें सूर्यमण्डलका दीर्घ विस्तार है। जिस समय सूर्य चन्द्रमाकी विभावरीपुरीमें दोपहरके समय रहते हैं, उस समय इन्द्रकी अमरावतीमें उदय होते-से प्रतीत होते हैं। जिस समय अमरावतीपुरीमें मध्याह्नके समय सूर्य रहते हैं, उस समय यमकी संयमनी पुरीमें उदित होते दीख पड़ते हैं। भगवान् सूर्य सदा मेरुगिरिकी परिक्रमा करते हुए ही सुशोभित होते हैं। वे ध्रुवके आधारपर स्थित हैं। उनके उदय होते समय बालखिल्यादि ऋषि उनकी स्तुति करते हैं॥४९–५२॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे भूगोलकथने त्रिंशोऽध्यायः॥३०॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें ‘भूगोलवर्णन’ विषयक तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥३०॥ इकतीसवाँ अध्याय ध्रुव-चरित्र तथा ग्रह, नक्षत्र एवं पातालका संक्षिप्त वर्णन भरद्वाज उवाच कोऽसौ ध्रुवः कस्य सुतः सूर्याधारोऽभवत् कथम्। विचिन्त्य कथयाशु त्वं सूत जीव समाः शतम्॥ १ सूत उवाच मनोः स्वायम्भुवस्यासीदुत्तानचरणः सुतः। तस्य क्षितिपतेर्विप्र द्वौ सुतौ सम्बभूवतुः॥ २ सुरुच्यामुत्तमो ज्येष्ठः सुनीत्यां तु ध्रुवोऽपरः। मध्येसभं नरपतेरुपविष्टस्य चैकदा॥ ३ सुनीत्या राजसेवावै नियुक्तोऽलङ्कृतः सुतः। ध्रुवो धात्रेयिकापुत्रैः समं विनयतत्परः॥ ४ स गत्वोत्तानचरणं क्षोणीशं प्रणनाम ह। दृष्ट्वोत्तमं तदुत्सङ्गे निविष्टं जनकस्य वै॥ ५ प्राप्य सिंहासनस्थं च नृपतिं बालचापलात्। आरुरुक्षुमवेक्ष्यामुं सुरुचिर्ध्रुवमब्रवीत्॥ ६ भरद्वाजजीने पूछा—सूतजी! ध्रुव कौन हैं? किसके पुत्र हैं? तथा वे सूर्यके आधार कैसे हुए? ये सब बातें भलीभाँति सोच-विचारकर बताइये। हमारी यह कामना है कि आप हमें कथा सुनाते हुए सैकड़ों वर्षोंतक जीवित रहें॥१॥ सूतजी बोले—विप्रवर! स्वायम्भुव मनुके एक पुत्र थे राजा उत्तानपाद। उन भूपालके दो पुत्र हुए। एक तो सुरुचिके गर्भसे उत्पन्न हुआ था, जिसका नाम उत्तम था। वह ज्येष्ठ था और दूसरा पुत्र ‘ध्रुव’ था, जो सुनीतिके गर्भसे उत्पन्न हुआ था। एक दिन जब राजा राजसभामें बैठे हुए थे, सुनीतिने अपने पुत्र ध्रुवको वस्त्राभूषणसे विभूषित करके राजाकी सेवाके लिये भेजा। विनयशील ध्रुवने धायके पुत्रोंके साथ राजसभामें जाकर राजा उत्तानपादको प्रणाम किया। वहाँ उत्तमको पिताकी गोदमें बैठा देख ध्रुव सिंहासनपर आसीन राजाके पास जा पहुँचा और बालोचित चपलताके कारण राजाकी गोदमें चढ़नेकी इच्छा करने लगा। यह देख सुरुचिने ध्रुवसे कहा॥२–६॥
१०४ | श्रीनरसिंहपुराण | [ अध्याय ३१ ]
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१०४ | श्रीनरसिंहपुराण | [ अध्याय ३१ ]
[संस्कृत श्लोक]
सुरुचिरुवाच दौर्भागेय किमारोढुमिच्छेरङ्के महीपतेः। बाल बालिशबुद्धित्वादभाग्याजाठरोद्भवः॥ ७ अस्मिन् सिंहासने स्थातुं सुकृतं किं त्वया कृतम्॥ ८ यदि स्यात् सुकृतं तत्किं दुर्भाग्योदरगोऽभवः। अनेनैवानुमानेन बुध्यस्व स्वल्पपुण्यताम्॥ ९ भूत्वा राजकुमारोऽपि नालंकुर्या ममोदरम्। सुकुक्षिजममूं पश्य त्वमुत्तममनुत्तमम्॥ १० अधिजानु धरापान्वोर्मानेन परिबृंहितम्।
सूत उवाच मध्येराजसभां बालस्तयेति परिभर्त्सितः॥ ११ निपतन्नेत्रबाष्पाम्बुधैर्यात् किंचिन्न चोक्तवान्। उचितं नोचितं किंचिन्नोचिवान् सोऽपि पार्थिवः॥ १२ नियन्त्रितो महिष्याश्च तस्याः सौभाग्यगौरवात्। विसर्जितसभालोकं शोकं संहृत्य चेष्टितैः॥ १३ शैशवैः स शिशुर्नत्वा नृपं स्वसदनं ययौ। सुनीतिर्नीतिनिलयमवलोक्याथ बालकम्॥ १४ मुखलक्ष्म्यैव चाज्ञासीद् ध्रुवं राज्ञापमानितम्। अथ दृष्ट्वा सुनीतिं तु रहोऽन्तःपुरवासिनीम्॥ १५ आलिङ्ग्य दीर्घं निःश्वस्य मुक्तकण्ठं रुरोद ह। सान्त्वयित्वा सुनीतिस्तं वदनं परिमार्ज्य च॥ १६ दुकूलाञ्चलसम्पर्कैर्वीज्य तं मृदुपाणिना। पप्रच्छ तनयं माता वद रोदनकारणम्॥ १७ विद्यमाने नरपतौ शिशो केनापमानितः।
ध्रुव उवाच सम्पृच्छे जननि त्वाहं सम्यक् शंस ममाग्रतः॥ १८ भार्यात्वेऽपि च सामान्ये कथं सा सुरुचिः प्रिया। कथं न भवती माततः प्रिया क्षितिपतेरसि॥ १९
[हिन्दी अनुवाद]
सुरुचि बोली— अभागिनीके बच्चे! क्या तू भी महाराजकी गोदमें चढ़ना चाहता है? बालक! मूर्खतावश ही ऐसी चेष्टा कर रहा है। तू इसके योग्य कदापि नहीं है; क्योंकि तू एक भाग्यहीना स्त्रीके गर्भसे पैदा हुआ है। बता तो सही, तूने इस सिंहासनपर बैठनेके लिये कौन-सा पुण्यकर्म किया है? यदि पुण्य ही किया होता तो क्या अभागिनीके गर्भसे जन्म लेता? राजकुमार होनेपर भी तू मेरे उदरकी शोभा नहीं बढ़ा सका है। इसी बातसे जान ले कि तेरा पुण्य बहुत कम है। उत्तम कोखसे पैदा हुआ है—कुमार 'उत्तम' जो सर्वश्रेष्ठ है; देखो, वह कितने सम्मानके साथ पृथ्वीनाथ महाराजके दोनों घुटनोंपर बैठा है॥ ७—१० १/२॥
सूतजी कहते हैं— राजसभाके बीच सुरुचिके द्वारा इस प्रकार झिड़के जानेपर बालक ध्रुवकी आँखोंसे अश्रुबिन्दु झरने लगे; किंतु वह धैर्यपूर्वक कुछ भी न बोला। इधर राजा भी रानीके सौभाग्य-गौरवसे आबद्ध हो, उसका कार्य उचित था या अनुचित, कुछ भी न कह सके। जब सभासद्गण बिदा हुए, तब अपनी शैशवोचित चेष्टाओंसे शोकको दबाकर वह बालक राजाको प्रणाम करके अपने घरको गया॥ ११—१३ १/२॥
सुनीतिने अपने नीतिके खजाने बालकको देखकर उसके मुखकी कान्तिसे ही जान लिया कि ध्रुवका राजाके द्वारा अपमान किया गया है। माता सुनीतिको अन्तःपुरके एकान्त स्थानमें देखकर ध्रुव अपने दुःखके आवेगको न रोक सका। वह माताके गलेसे लगकर लम्बी साँस खींचता हुआ फूट-फूटकर रोने लगा। सुनीतिने उसे सान्त्वना देकर कोमल हाथसे उसका मुख पोंछा और साड़ीके अञ्चलसे हवा करती हुई माता अपने लालसे पूछने लगी—'बेटा! अपने रोनेका कारण बताओ। राजाके रहते हुए किसने तुम्हारा अपमान किया है?'॥ १४—१७ १/२॥
ध्रुव बोला— माँ! मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ, मेरे आगे तुम ठीक-ठीक बताओ। जैसे सुरुचि राजाकी धर्मपत्नी है, वैसे ही तुम भी हो; फिर उन्हें सुरुचि ही क्यों प्यारी है? माता, तुम उन नरेशको क्यों प्रिय नहीं [हो?]
अध्याय ३१ ] ध्रुव-चरित्र तथा ग्रह, नक्षत्र एवं पातालका संक्षिप्त वर्णन १०५ कथमुत्तमतां प्राप्त उत्तमः सुरुचेः सुतः। हो ? सुरुचिका पुत्र उत्तम क्यों श्रेष्ठ है ? राजकुमार होनेमें कुमारत्वेऽपि सामान्ये कथं चाहमनुत्तमः ॥ २० तो हम दोनों एक समान हैं। फिर क्या कारण है कि कथं त्वं मन्दभाग्यासि सुकुक्षिः सुरुचिः कथम्। मैं उत्तम नहीं हूँ ? तुम क्यों मन्दभागिनी हो और सुरुचि कथं नृपासनं योग्यमुत्तमस्य कथं न मे ॥ २१ क्यों उत्तम कोखवाली है ? राजसिंहासन क्यों उत्तमके कथं मे सुकृतं तुच्छमुत्तमस्योत्तमं कथम्। ही योग्य है ? मेरे योग्य क्यों नहीं है ? मेरा पुण्य तुच्छ इति श्रुत्वा वचस्तस्य सुनीतिर्नीतिमच्छिशोः ॥ २२ और उत्तमका पुण्य उत्तम कैसे है ? ॥ १८-२११/२ ॥ किंचिदुच्छ्वस्य शनकैः शिशुशोकोपशान्तये। सुनीति अपने पुत्रके इस नीतियुक्त वचनको स्वभावमधुरां वाणीं वक्तुं समुपचक्रमे ॥ २३ सुनकर धीरेसे थोड़ी लम्बी साँस खींच बालकका दुःख शान्त करनेके लिये स्वभावतः मधुर वाणीमें बोलने सुनीतिरुवाच लगी ॥ २२-२३ ॥ अयि तात महाबुद्धे विशुद्धेनान्तरात्मना । सुनीति बोली-तात! तुम बड़े बुद्धिमान् हो। निवेदयामि ते सर्वं मावमाने मतिं कृथाः ॥ २४ तुमने जो कुछ पूछा है, वह सब शुद्ध हृदयसे मैं निवेदन तया यदुक्तं तत्सर्वं तथ्यमेव न चान्यथा। करती हूँ; तुम अपमानकी बात मनमें न लाओ। सुरुचिने यदि सा महिषी राज्ञो राज्ञीनामतिवल्लभा ॥ २५ जो कुछ कहा है, वह सब ठीक ही है, अन्यथा नहीं महासुकृतसम्भारैरुत्तमश्चोत्तमोदरे । है। यदि वह पटरानी है तो सभी रानियोंसे बढ़कर उवास तस्याः पुण्याया नृपसिंहासनोचितः ॥ २६ राजाकी प्यारी है ही। राजकुमार उत्तमने बहुत बड़े आतपत्रं च चन्द्राभं शुभे चापि हि चामरे। पुण्योंका संग्रह करके उस पुण्यवती रानीके उत्तम गर्भमें भद्रासनं तथोच्चं च सिन्धुराश्च मदोत्कटाः ॥ २७ निवास किया था, अतः वही राजसिंहासनपर बैठनेके तुरंगमाश्च तुरगा अनाधिव्याधि जीवितम् । योग्य है। चन्द्रमाके समान निर्मल श्वेत छत्र, सुन्दर निःसपत्नं शुभं राज्यं प्राप्यं विष्णुप्रसादतः ॥ २८ युगल चँवर, उच्च सिंहासन, मदमत्त गजराज, शीघ्रगामी तुरग, आधि-व्याधियोंसे रहित जीवन, शत्रुरहित सुन्दर सूत उवाच राज्य-ये वस्तुएँ भगवान् विष्णुकी कृपासे प्राप्त होती इत्याकर्ण्य सुनीत्यास्तन्मातुर्वाक्यमनिन्दितम्। हैं ॥ २४-२८ ॥ सौनीतेयो ध्रुवो वाचमाददे वक्तुमुत्तरम् ॥ २९ सूतजी बोले-माता सुनीतिके इस उत्तम वचनको सुनकर सुनीतिकुमार ध्रुवने उन्हें उत्तर देनेके लिये ध्रुव उवाच बोलना आरम्भ किया ॥ २९ ॥ जनयित्रि सुनीते मे शृणु वाक्यमनाकुलम्। ध्रुव बोला-जन्मदायिनी माता सुनीते ! आज मेरे उत्तानचरणादन्यन्नास्तीति मे मतिः शुभे ॥ ३० शान्तिपूर्वक कहे हुए वचन सुनो। शुभे ! आजतक मैं यही सिद्धार्थोऽस्यम्ब यद्यस्ति कश्चिदाश्रितकामधुक्। समझता था कि पिता उत्तानपादसे बढ़कर और कुछ नहीं अद्यैव सकलाराध्यं तमाराध्य जगत्पतिम् ॥ ३१ है। परंतु अम्ब! यदि अपने आश्रितजनोंकी कामना पूर्ण तत्तदासादितं विद्धि पदमन्यैर्दुरासदम्। करनेवाला कोई और भी है तो यह जानकर आज मैं कृतार्थ एकमेव हि साहाय्यं मातर्मे कर्तुमर्हसि ॥ ३२ हो गया। माँ ! तुम ऐसा समझो कि उन सर्वाराध्य जगदीश्वरकी आराधना करके जो-जो स्थान दूसरोंके लिये दुर्लभ है, वह अनुज्ञां देहि मे विष्णुं यथा चाराधयाम्यहम्। सब मैंने आज ही प्राप्त कर लिया। माता ! तुम्हें मेरी एक ही सहायता करनी चाहिये। केवल आज्ञा दे दो, जिससे मैं भगवान् विष्णुकी आराधना करूँ ॥ ३०-३२१/२ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
१०६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३१
१०६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३१
सुनीतिरुवाच
अनुज्ञातुं न शक्नोमि त्वामुत्तानशयाङ्ग-ज ॥ ३३ सप्ताष्टवर्षदेशीयः क्रीडायोग्योऽसि पुत्रक । त्वदेकतनया तात त्वदाधारैकजीविता ॥ ३४ लब्धोऽसि कतिभिः कष्टैरिष्टाः सम्प्रार्थ्य देवताः । यदा यदा बहिर्यासि रन्तुं त्रिचतुरं पदम् । तदा तदा मम प्राणस्तात त्वामुपगच्छति ॥ ३५
सुनीति बोली—बेटा! उत्तानपादनन्दन! मैं तुम्हें आज्ञा नहीं दे सकती। मेरे बच्चे! इस समय तुम्हारी सात-आठ वर्षकी अवस्था है। अभी तो तुम खेलने-कूदनेके योग्य हो। तात! एकमात्र तुम्हीं मेरी संतान हो; मेरा जीवन एक तुम्हारे ही आधारपर टिका हुआ है। कितने ही कष्ट उठाकर, अनेक इष्ट देवी-देवताओंकी प्रार्थना करके मैंने तुम्हें पाया है। तात! तुम जब-जब खेलनेके लिये भी तीन-चार कदम बाहर जाते हो, तब-तब मेरे प्राण तुम्हारे पीछे-ही-पीछे लगे रहते हैं॥ ३३—३५॥
ध्रुव उवाच
अद्य यावत् पिता माता त्वं चोत्तानपदो विभुः । अद्य प्रभृति मे माता पिता विष्णुर्न संशयः ॥ ३६
ध्रुव बोला—माँ! अबतक तो तुम और राजा उत्तानपाद ही मेरे माता-पिता थे; परंतु आजसे मेरे माता और पिता दोनों भगवान् विष्णु ही हैं, इसमें संदेह नहीं है॥ ३६॥
सुनीतिरुवाच
विष्णोराराधने नाहं वारये त्वां सुपुत्रक । जिह्वा मे शतधा यातु यदि त्वां वारयामि भोः ॥ ३७
सुनीति बोली—मेरे सुयोग्य पुत्र! मैं भगवान् विष्णुकी आराधना करनेसे तुम्हें रोकती नहीं। यदि रोकूँ तो मेरी जिह्वाके सैकड़ों टुकड़े हो जायँ ॥ ३७॥
इत्यनुज्ञामिव प्राप्य जननीचरणाम्बुजौ । परिक्रम्य प्रणम्याथ तपसे च ध्रुवो ययौ ॥ ३८ तयापि धैर्यसूत्रेण सुनीत्या परिगुम्प्य च। तत्रेन्दीवरजा माला ध्रुवस्योपायनीकृता ॥ ३९ मात्रा तन्मार्गरक्षार्थं तदा तदनुगीकृताः । परैरवार्यप्रसराः स्वाशीर्वादाः परैश्शताः ॥ ४०
इस प्रकार आज्ञा-सी पाकर ध्रुव माताके चरणकमलोंकी परिक्रमा और उन्हें प्रणाम करके तपस्याके लिये प्रस्थित हुआ। सुनीतिने धैर्यपूर्वक सूत्रमें नील कमलकी माला गूँथकर पुत्रको उपहार दिया। मार्गमें पुत्रकी रक्षाके लिये माताने अपने शत-शत आशीर्वाद, जिनका प्रभाव शत्रु भी नहीं रोक सकते थे, उसके पीछे लगा दिये ॥ ३८—४०॥
सर्वत्रावतु ते पुत्र शङ्खचक्रगदाधरः । नारायणो जगद्व्यापी प्रभुः कारुण्यवारिधिः ॥ ४१
[वह बोली—] ‘पुत्र! शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले दयासागर जगद्व्यापी भगवान् नारायण सर्वत्र तुम्हारी रक्षा करें'॥ ४१॥
सूत उवाच
स्वसौधात् स विनिर्गत्य बालो बालपराक्रमः । अनुकूलेन मरुता दर्शिताध्वाविशद्वनम् ॥ ४२ स मातृदैवतोऽभिज्ञः केवलं राजवर्त्मनि । न वेद काननाध्वानं क्षणं दध्यौ नृपात्मजः ॥ ४३
सूतजी बोले—बालोचित पराक्रम करनेवाले बालक ध्रुवने अपने महलसे निकलकर अनुकूल वायुके द्वारा दिखायी हुई राह पकड़कर उपवनमें प्रवेश किया। माताको ही देवता माननेवाला और केवल राजमार्गको ही जाननेवाला वह राजकुमार वनके मार्गको नहीं जानता था, अतः एक क्षणतक आँखें बंद करके कुछ सोचने लगा॥ ४२-४३॥
पुरोपवनमासाद्य चिन्तयामास सोऽर्भकः । किं करोमि क्व गच्छामि को मे साहाय्यदो भवेत् ॥ ४४ एवमुन्मील्य नयने यावत् पश्यति स ध्रुवः । तावद्ददर्श सप्तर्षीन् अतर्कितगतीन् वने ॥ ४५ अथ दृष्ट्वा स सप्तर्षीन् समसप्ततितेजसः । भाग्यसूत्रैरिवाकृष्योपनीतान् प्रमुमोद ह ॥ ४६
नगरके उपवनमें आकर बालक ध्रुव इस प्रकार चिन्ता करने लगा—'क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? कौन मुझे सहायता देनेवाला होगा?' ऐसा विचार करते हुए उसने ज्यों ही आँखें खोलकर देखा, त्यों ही उस उपवनमें अप्रत्याशित गतिवाले सप्तर्षि उसे दिखायी दिये। उन सूर्यतुल्य तेजस्वी सप्तर्षियोंको, जो मानो भाग्यसूत्रसे ही खिंचकर ले आये गये थे, देखकर ध्रुव बहुत प्रसन्न
अध्याय ३१ ] ध्रुव-चरित्र तथा ग्रह, नक्षत्र एवं पातालका संक्षिप्त वर्णन १०७ तिलकाङ्कितसद्भालान् कुशोपग्रहिताङ्गुलीन् । हुआ। उनके सुन्दर ललाटमें तिलक लगे थे। उन्होंने कृष्णाजिनोपविष्टांश्च ब्रह्मसूत्रैरलंकृतान् ॥ ४७ अँगुुलियोंमें कुशकी पवित्री पहन रखी थी तथा यज्ञोपवीतोंसे विभूषित होकर वे काले मृगचर्मपर बैठे उपगम्य विनम्रांसः प्रबद्धकरसम्पुटः । हुए थे। उनके पास जाकर ध्रुवने गर्दन झुका दी, दोनों ध्रुवो विज्ञापयांचक्रे प्रणम्य ललितं वचः ॥ ४८ हाथ जोड़ लिये और प्रणाम करके मधुर वाणीमें उन्हें अपना अभिप्राय निवेदित किया॥ ४४-४८॥ ध्रुव उवाच ध्रुव बोला—मुनिवरो ! आप मुझे सुनीतिके गर्भसे अवैत मां मुनिवराः सुनीत्युदरसम्भवम्। उत्पन्न राजा उत्तानपादका पुत्र ध्रुव जानें। इस समय मेरा उत्तानपादतनयं ध्रुवं निर्विण्णमानसम् ॥ ४९ चित्त जगत्की ओरसे विरक्त है॥ ४९॥ सूत उवाच सूतजी कहते हैं—अमूल्य नीति ही जिसका भूषण तं दृष्ट्वौजस्वलं बालं स्वभावमधुराकृतिम्। है—ऐसे मधुर और गम्भीर भाषण करनेवाले एवं स्वभावतः अनर्घ्यनयनेपथ्यं मृदुगम्भीरभाषिणम् ॥ ५० मनोहर आकृतिवाले उस तेजस्वी बालकको देखकर ऋषियोंने अत्यन्त विस्मित हो उसे अपने पास बिठाया उपोपवेश्य शिशुकं प्रोचुस्ते विस्मिता भृशम् । और कहा—'वत्स ! अभीतक तुम्हारे वैराग्य या निर्वेदका तवाद्यापि न जानीमो वत्स निर्वेदकारणम् ॥ ५१ कारण हम नहीं जान सके। वैराग्य तो उन मनुष्योंको होता है, जिनकी मनःकामनाएँ पूर्ण नहीं हो पातीं। तुम अनवाप्ताभिलाषाणां वैराग्यं जायते नृणाम्। तो सातों द्वीपोंके अधीश्वर सम्राट्के पुत्र हो; तुम अपूर्णमनोरथ सप्तद्वीपपते राज्ञः कुमारस्त्वं तथा कथम् ॥ ५२ कैसे हो सकते हो? हमसे तुम्हें क्या काम है ? तुम्हारी किमस्माभिरहो कार्यं कस्तवास्ति मनोरथः। मनोवाञ्छा क्या है'॥ ५०-५२ १/२ ॥ ध्रुव उवाच ध्रुव बोला—'मुनिगण ! मेरे जो उत्तमोत्तम बन्धु मुनयो मम यो बन्धुरुत्तमश्चोत्तमोत्तमः ॥ ५३ उत्तमकुमार हैं—उनके ही लिये पिताका दिया हुआ शुभ सिंहासन रहे। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनीश्वरो ! पित्रा प्रदत्तं तस्यास्तु तद्भद्रासनमुत्तमम्। मैं आपलोगोंसे इतनी ही सहायता चाहता हूँ कि जिस भवत्कृतं हि साहाय्यं एतदिच्छामि सुव्रताः ॥ ५४ स्थानका किसी दूसरे राजाने उपभोग न किया हो, जो अन्य सभी स्थानोंसे उत्कृष्ट हो और इन्द्रादि देवताओंके अनन्यनृपभुक्तं यद् यदन्येभ्यः समुच्छ्रितम्। लिये भी दुर्लभ हो, वह स्थान मुझे किस उपायसे प्राप्त इन्द्रादिदुरवापं यत् कथं लभ्येत तत्पदम् ॥ ५५ हो सकता है, यह बता दें।' उस समय उस बालककी इति श्रुत्वा वचस्तस्य मुनयो बालकस्य तु। ये बातें सुनकर मरीचि आदि ऋषियोंने उसे यथार्थ ही यथार्थमेव प्रत्यूचुर्मरीच्याद्यास्तदा ध्रुवम् ॥ ५६ उत्तर दिया ॥ ५३–५६ ॥ मरीचिरुवाच मरीचि बोले—जिसने गोविन्द-चरणारविन्दोंके परागके रसका आस्वादन नहीं किया, वह मनोरथ- अनास्वादितगोविन्दपदाम्बुजरजोरसः । पथसे अतीत (ध्यानमें भी न आ सकनेवाले) पर्मोज्ज्वल मनोरथपथातीतं स्फीतं नाकलयोत् फलम् ॥ ५७ फलको नहीं प्राप्त कर सकता ॥ ५७॥
१०८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३१
१०८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३१ अत्रिरुवाच | अत्रि बोले—जिसने अच्युतके चरणोंकी अर्चना अनर्चिताच्युतपदः पदमासादयेत् कथम्। | नहीं की है, वह पुरुष उस पदको, जो इन्द्रादि देवताओंके इन्द्रादिदुरवापं यन्मानवैः सुदुरासदम्॥ ५८ | लिये भी दुर्लभ और मनुष्योंके लिये तो अत्यन्त | दुष्प्राप्य है, कैसे पा सकता है ? ॥ ५८ ॥ अङ्गिरा उवाच | अङ्गिरा बोले—जो भगवान् कमलाकान्तके कमनीय न हि दूरे पदं तस्य सर्वासां सम्पद्दामिह । | चरणकमलोंका अनुशीलन (चिन्तन) करता है, उसके कमलाकान्तकान्ताङ्घ्रिकमलं यः सुशीलयेत्॥ ५९ | लिये त्रिभुवनकी सारी सम्पदाओंका स्थान दूर (दुर्लभ) | नहीं है ॥ ५९ ॥ पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्य बोले—ध्रुव ! जिनके स्मरणमात्रसे यस्य स्मरणमात्रेण महापातकसंततिः। | महापातकोंकी परम्परा अत्यन्त नाशको प्राप्त हो जाती परमान्तकमाप्नोति स विष्णुः सर्वदो ध्रुव ॥ ६० | है, वे भगवान् विष्णु ही सब कुछ देनेवाले हैं ॥ ६० ॥ पुलह उवाच | पुलह बोले—जिन्हें प्रधान (प्रकृति) और पुरुष यदाहुः परमं ब्रह्म प्रधानपुरुषात् परम्। | (जीव)—से विलक्षण परब्रह्म कहते हैं, जिनकी मायासे यन्मायया कृतं सर्वं स विष्णुः कीर्तितोऽर्थदः ॥ ६१ | समस्त प्रपञ्च रचा गया है, उन भगवान् विष्णुका यदि | कीर्तन किया जाय तो वे अपने भक्तके अभीष्ट मनोरथको क्रतुरुवाच | पूर्ण कर देते हैं ॥ ६१ ॥ यो यज्ञपुरुषो विष्णुर्वेदवेद्यो जनार्दनः । | क्रतु बोले—जो यज्ञपुरुष भगवान् विष्णु वेदोंके अन्तरात्मास्य जगतः संतुष्टः किं न यच्छति ॥ ६२ | द्वारा जाननेयोग्य हैं तथा जो जनार्दन इस समस्त जगत्के | अन्तरात्मा हैं, वे प्रसन्न हों तो क्या नहीं दे सकते ? ॥ ६२ ॥ वसिष्ठ उवाच | वसिष्ठ बोले—राजकुमार ! जिनकी भौंहोंके नर्तनमात्रमें यद्भ्रूनर्तनवर्तिन्यः सिद्धयोऽष्टौ नृपात्मज। | आठों सिद्धियाँ वर्तमान हैं, उन भगवान् हृषीकेशकी तमाराध्य हृषीकेशं चतुर्वर्गो न दूरतः ॥ ६३ | आराधना करनेसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये चारों | पुरुषार्थ दूर नहीं रहते ॥ ६३ ॥ ध्रुव उवाच | ध्रुव बोले—द्विजवरो ! भगवान् विष्णुकी आराधनाके सत्यमुक्तं द्विजेन्द्रा वो विष्णोराराधनं प्रति। | सम्बन्धमें आपलोगोंने जो विचार प्रकट किया, वह कथं स भगवानिज्यः स विधिश्चोपदिश्यताम् ॥ ६४ | सत्य है। अब मुझे यह बताइये कि उन भगवान्की पूजा | कैसे करनी चाहिये ? उसकी विधिका मुझे उपदेश प्रभूतदो भवेद्यो वै दुराराध्यतमो भवेत्। | कीजिये। जो बहुत कुछ दे सकते हैं, उनकी आराधना बालोऽहं राजपुत्रोऽहं दुःखं नैव मया क्षमम्॥ ६५ | भी कठिन ही होगी। मैं राजकुमार हूँ और बालक हूँ; | मुझसे विशेष कष्ट नहीं सहा जा सकता ॥ ६४-६५ ॥ मुनय ऊचुः | मुनिगण बोले—खड़े होते, चलते, सोते-जागते, तिष्ठता गच्छता वापि स्वपता जाग्रता तथा। | लेटते और बैठते हुए प्रतिक्षण भगवान् नारायणका स्मरण शयानेनोपविष्टेन वेद्यो नारायणः सदा ॥ ६६ | करना चाहिये। भगवान् वासुदेवके नामका जप करनेवाला पुत्रान् कलत्रं मित्राणि राज्यं स्वर्गापवर्गकम्। | मनुष्य पुत्र, स्त्री, मित्र, राज्य, स्वर्ग तथा मोक्ष—सब कुछ वासुदेवं जपन् मर्त्यः सर्वं प्राप्नोत्यसंशयम् ॥ ६७ |
अध्याय ३१ ] ध्रुव-चरित्र तथा ग्रह, नक्षत्र एवं पातालका संक्षिप्त वर्णन १०९ द्वादशाक्षरमन्त्रेण वासुदेवात्मकेन च। पा लेता है—इसमें संशय नहीं है। वासुदेवस्वरूप द्वादशाक्षर ध्यायंश्चतुर्भुजं विष्णुं जप्त्वा सिद्धिं न को गतः ॥ ६८ मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ) -के द्वारा चार पितामहेन चाप्येष महामन्त्र उपासितः। भुजाधारी भगवान् विष्णुका ध्यान और जप करके किसने मनुना राज्यकामेन वैष्णवेन नृपात्मज ॥ ६९ सिद्धि नहीं प्राप्त कर ली ? राजकुमार ! पितामह (ब्रह्माजी) - त्वमप्येतेन मन्त्रेण वासुदेवपरो भव। ने भी इस महामन्त्रकी उपासना की थी। विष्णुभक्त मनुने यथाभिलषितामृद्धिं क्षिप्रं प्राप्स्यसि सत्तम ॥ ७० भी राज्यकी कामनासे इस मन्त्रद्वारा भगवान्की आराधना की थी। सत्पुरुषशिरोमणे ! तुम भी इस मन्त्रद्वारा भगवान् वासुदेवकी आराधनामें लग जाओ। इससे बहुत शीघ्र ही सूत उवाच अपनी मनोवाञ्छित समृद्धि प्राप्त कर लोगे ॥ ६६–७० ॥ इत्युक्त्वान्तर्हिताः सर्वे महात्मानो मुनीश्वराः। सूतजी कहते हैं—यों कहकर वे सभी महात्मा वासुदेवमना भूत्वा ध्रुवोऽपि तपसे ययौ ॥ ७१ मुनीश्वर वहीं अन्तर्हित हो गये और ध्रुव भी भगवान् ध्रुवः सर्वार्थदं मन्त्रं जपन् मधुवने तपः। वासुदेवमें मन लगाकर तपस्याके लिये चला गया। स चक्रे यमुनातीरे मुनिदिष्टेन वर्त्मना ॥ ७२ द्वादशाक्षर मन्त्र सम्पूर्ण मनोरथोंको देनेवाला है। ध्रुव श्रद्धान्वितेन जपता च तपःप्रभावात् मधुवनमें यमुनाके तटपर मुनियोंकी बतायी हुई पद्धतिसे साक्षाद्दिवाब्जनयनं ददृशे हृदीशम्। उस मन्त्रका जप करने लगा। श्रद्धापूर्वक उस मन्त्रका दिव्याकृतिं सपदि तेन ततः स एव जप करते हुए राजकुमार ध्रुवने तपके प्रभावसे तत्काल हर्षात् पुनः स प्रजजाप नृपात्मभूतः ॥ ७३ ही हृदयमें भगवान् कमलनयनको प्रकट प्रत्यक्षवत् देखा। क्षुत्तर्षवर्षघनवातमहोष्णतादि- उनकी आकृति बड़ी दिव्य थी। भगवान्के दर्शनसे उसका शारीरदुःखकुलमस्य न किंचनाभूत्। हर्ष बढ़ गया। अब तो वह राजपुत्र पुनः बड़े उत्साहसे मग्ने मनस्यनुपमेयसुखाम्बुराशौ उस मन्त्रका जप करने लगा। उस समय भूख, प्यास, राज्ञः शिशोर्न च विवेद शरीरवार्ताम् ॥ ७४ वर्षा, आँधी और अधिक गर्मी आदि दैहिक दुःखोंमेंसे विघ्नाश्च तस्य किल शङ्कितदेवसृष्टा कोई भी उसे नहीं व्यापा। उस राजकुमारका मन अनुपम बालस्य तीव्रतपसो विफला बभूवुः। आनन्द-महासागरमें गोता लगा रहा था। अतः उस समय शीतातपादिरिव विष्णुमयं मुनिं हि उसे अपने शरीरकी भी सुध नहीं रह गयी थी। कहते प्रादेशिका न खलु धर्षयितुं क्षमन्ते ॥ ७५ हैं, उसकी तपस्यासे शङ्कित हुए देवताओंने कितने ही विघ्न खड़े किये; परंतु उस तीव्र तपस्वी बालकके लिये अथ भक्तजनप्रियः प्रभुः वे सभी निष्फल ही सिद्ध हुए। शीत और धूप आदिकी शिशुना ध्यानबलेन तोषितः। ही तरह ये एकदेशीय विघ्न भी उस विष्णुस्वरूप मुनिको वरदः पतगेन्द्रवाहनो व्यथित नहीं कर पाते थे ॥ ७१–७५ ॥ हरिरागात् स्वजनं समीक्षितुम् ॥ ७६ कुछ समयके बाद भक्तजनोंके प्रियतम वरदाता मणिपिण्डकमौलिरोजितो भगवान् विष्णु बालक ध्रुवके ध्यान-बलसे संतुष्ट होकर विलसद्रत्नमहाघनच्छविः । पक्षिराज गरुडपर सवार हो, अपने उस भक्तको देखनेके स बभावुदयाद्रिमत्सरा- लिये आये। मणिसमूहद्वारा निर्मित मुकुटसे मण्डित और द्धृतबालार्क इवासिताचलः ॥ ७७ शोभाशाली कौस्तुभरत्नसे समलंकृत, महामेघके समान श्यामकन्तिवाले वे भगवान् श्रीहरि ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो उदयाचलके प्रति डाह रखनेके कारण अपने शृङ्गपर बालरविकों धारण किये साक्षात् कज्जलगिरि प्रकाशित हो In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
११० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३१
मूल संस्कृत श्लोक
स राजसूनुं तपसि स्थितं तं ध्रुवं ध्रुवस्निग्धदृगित्युवाच। दन्तांशुसङ्गैरमितप्रवाहैः प्रक्षालयन् रेणुमिवास्य गात्रे ॥ ७८
वरं वरं वत्स वृणीष्व यस्ते मनोगतस्त्वत्तपसास्मि तुष्टः। ध्यानेन ते चेन्द्रियनिग्रहेण मनोनिरोधेन च दुष्करेण ॥ ७९
शृण्वन् वचस्तत्सकलं गभीर- मुन्मीलिताक्षः सहसा ददर्श। स्वे चिन्त्यमानं त्विदमेव मूर्तं पुरःस्थितं ब्रह्म चतुर्भुजं सः ॥ ८०
दृष्ट्वा क्षणं राजसुतः सुपूज्यं पुरस्त्रयीशं किमिह ब्रवीमि। किं वा करोमीति ससम्भ्रमः स तु न चाब्रवीत् किंचन नो चकार ॥ ८१
हर्षाश्रुपूर्णः पुलकाञ्चिताङ्ग- स्त्रिलोकनाथेति वदन्नथोच्चैः। दण्डप्रणामाय पपात भूमौ प्रवेपमानभ्रु हरेः पुरः स हि ॥ ८२
दण्डवत् प्रणिपत्याथ परितः परिलुण्ठ्य च। रुरोद हर्षेण चिरं दृष्ट्वा तं जगतो गुरुम् ॥ ८३
नारदेन सनन्देन सनकेन च संश्रुतम्। अन्यैः सनत्कुमाराद्यैर्योगिभिर्योगिनां वरम् ॥ ८४
कारुण्यबाष्पनीरार्द्रं पुण्डरीकविलोचनम्। ध्रुवमुत्थापयांचक्रे चक्री धृत्वा करेण तम् ॥ ८५
हरिस्तु परिपस्पर्श तदङ्गं धूलिधूसरम्। कराभ्यां कोमलाभ्यां स परिष्वज्याह तं हरिः ॥ ८६
वरं वरय भो बाल यत्ते मनसि वर्तते। तद्ददामि न संदेहो नादेयं विद्यते तव ॥ ८७
हिन्दी अनुवाद
रहा हो। निश्चल और स्नेहपूर्ण दृष्टिवाले वे भगवान् अपने दाँतोंकी किरणरूप जलके अमित प्रवाहद्वारा तपस्यामें लगे हुए राजकुमार ध्रुवके शरीरकी धूलिको धोते हुए-से उससे इस प्रकार बोले ॥ ७६–७८॥
'वत्स! मैं तुम्हारी तपस्या, ध्यान, इन्द्रिय-निग्रह और दुस्साध्य मनःसंयमसे तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। अतः तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट हो, वह उत्तम वर मुझसे माँग लो' ॥ ७९ ॥
भगवान्की वह सम्पूर्ण गम्भीर वाणी सुनते ही ध्रुवने सहसा आँखें खोल दीं। उस समय उन्हीं चतुर्भुज ब्रह्मको, जिनका वह अपने हृदयमें चिन्तन कर रहा था, उसने सामने मूर्तिमान् होकर खड़ा देखा ॥ ८० ॥
उन परम पूजनीय त्रिभुवनपतिको सहसा सामने देख वह राजकुमार सकपका गया और 'मैं यहाँ इनसे क्या कहूँ? क्या करूँ?' इत्यादि बातें सोचता हुआ क्षणभर न तो कुछ बोला और न कुछ कर ही सका। उसके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू भरे थे, शरीरके रोएँ खड़े हो गये थे। वह भगवान्के सामने उच्चस्वरसे 'हे त्रिभुवननाथ!' यों कहता हुआ दण्डवत्-प्रणाम करनेके लिये पृथ्वीपर पड़ गया। उस समय उसकी भौंहें काँप रही थीं। दण्डकी भाँति प्रणाम करके जगद्गुरु भगवान्की ओर एकटक दृष्टि लगाये वह आनन्दातिरेकसे चारों ओर लोट-पोट होकर देरतक रोता रहा। नारद, सनन्दन, सनक और सनत्कुमार आदि तथा अन्य योगी जिन योगीश्वरका श्रवण-कीर्तन एवं स्तवन किया करते हैं और जिनके नेत्र करुणाके आँसुओंसे भीगे हुए थे, उन्हीं कमललोचन भगवान्को आज ध्रुवने प्रत्यक्ष देखा। उस समय चक्रधर भगवान्ने अपने हाथसे पकड़कर ध्रुवको उठा लिया। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने दोनों कोमल हाथोंसे उसके धूलिधूसरित शरीरको सब ओरसे पोंछा और उसे हृदयसे लगाकर कहा ॥ ८१–८६॥
'बच्चा! तुम्हारे मनमें जो भी इच्छा है, उसके अनुसार वर माँग लो। मैं निस्संदेह वह सब तुम्हें दे दूँगा। तुम्हारे लिये कोई भी वस्तु अदेय नहीं है' ॥ ८७ ॥
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अध्याय ३१ ] ध्रुव-चरित्र तथा ग्रह, नक्षत्र एवं पातालका संक्षिप्त वर्णन १११ ततो वरं राजशिशुर्ययाचे | तब राजकुमारने भगवान् विष्णुसे यही वर माँगा कि विष्णुं वरं ते स्तवशक्तमेव। | 'मुझे आपकी स्तुति करनेकी शक्ति प्राप्त हो।' यह सुनकर तं मूर्तविज्ञाननिभेन देवः | भगवान्ने मूर्तिमान् विज्ञानके समान निर्मल शङ्खसे ध्रुवके पस्पर्श शङ्खेन मुखेऽमलेन ॥ ८८ | मुखको छुआ दिया। मरीचि आदि देवर्षियोंके दिये हुए | ज्ञानरूपी चन्द्रमाकी किरणोंसे क्षालित होकर ध्रुवका चित्त अथ सुरमुनिदत्तज्ञानचन्द्रेण सम्यग् | पूर्णतया निर्मल हो गया था। फिर त्रिभुवनगुरु भगवान्के विमलितमिव चित्तं पूर्णमेव ध्रुवस्य। | शङ्ख-स्पर्शसे उसके अन्तःकरणमें ज्ञानरूपी सूर्यका उदय त्रिभुवनगुरुशङ्खस्पर्शजज्ञानभाना- | हो जानेपर उसमें पूर्ण प्रकाश हो गया। इससे वह आनन्दित नुदयति नितरान्तः साधु तुष्टाव हृष्टः ॥ ८९ | होकर भगवान्की सुन्दर स्तुति करने लगा ॥ ८८-८९ ॥ | ध्रुव बोला—समस्त मुनिगण जिनके चरणकमलोंकी ध्रुव उवाच | वन्दना करते हैं, जो खर राक्षस अथवा गर्दभरूपधारी | धेनुकासुरका संहार करनेवाले हैं, जिनकी बाललीलाएँ अखिलमुनिजननिवहनमितचरणः। खरकदन- | चपलतासे पूर्ण हैं, देवगण जिनके चरणोदक (गङ्गाजी)- करः। चपलचरितः। देवाराधितपादजलः। | की आराधना करते हैं, सजल मेघके समान जिनका | श्याम वर्ण है, सौभ विमानके अधिपति शाल्वके धाम सजलजलधरश्यामः शमितसौभपतिशाल्वधामा। | (तेज)-को जिन्होंने सदाके लिये शान्त कर दिया है, | जिन्होंने सुन्दर गोपवनिताओंके अत्यन्त विनयवश नूतन अभिरामरामातिविनयकृतनवरसरसापहतेन्द्रिय- | प्रेमरसमय रासलीलाको प्रकट किया और उससे मोहित सुररमणीविहितान्तःकरणानन्दः। अनादिनिधनः। | होनेवाली देववनिताओँके अन्तःकरणमें भी आनन्दका | संचार किया, जिनका आदि और अन्त नहीं है, जिन्होंने अधननिरजद्विजमित्रोद्धरणधीरः। अवधीरितसुरनाथ- | अपने निर्धन मित्र सुदामा नामक ब्राह्मणका धीरतापूर्वक | दैन्यदुःखसे उद्धार किया, देवराज इन्द्रकी प्रार्थनासे जिन्होंने नाथितविपक्षपक्षः। ऋक्षराजबिलप्रवेशापहृत- | उनके शत्रुपक्षको पराजित किया, ऋक्षराज जाम्बवान्की | गुहामें प्रवेश करके खोयी हुई स्यमन्तक मणिको लाकर स्यमन्तकापमार्जितनिजापवाददुरितहृतत्रैलोक्यभारः। | जिन्होंने अपने ऊपर लगे हुए कलङ्करूप दुरितको दूर | करके त्रिभुवनका भार हल्का किया है, जो द्वारकापुरीमें द्वारकावासनिरतः। स्वरितमधुरवेणुवादनश्रवणामृत- | नित्य निवास करते हैं, जो अपनी मधुर मुरली बजाकर | श्रुतिमधुर अतीन्द्रिय-ज्ञानको प्रकट करते तथा यमुनाटटपर प्रकटितातीन्द्रियज्ञानः। यमुनाटटचरः। द्विजधेनुभृङ्ग- | विचरते हैं, जिनके वंशीनादको सुननेके लिये पक्षी, गौ | और भृङ्गगण अपना-अपना आहार त्याग देते हैं, जिनके गणैस्त्यक्तनिजनिजाहारः। संसारदुस्तरपारावार- | चरणकमल दुस्तर संसार-सागरसे पार करनेके लिये समुत्तरणाङ्घ्रिपोतः। स्वप्रतापानलहुतकालयवनः। | जहाजरूप हैं, जिन्होंने अपनी प्रतापाग्निमें कालयवनको | होम दिया है, जो वनमालाधारी हैं, जिनके श्रवण वनमालाधरवरमणिकुण्डलालंकृतश्रवणः। नाना- | सुन्दर मणिमय कुण्डलोंसे अलंकृत हैं, जिनके अनेक प्रसिद्धाभिधानः। निगमविबुधमुनिजनवचन- | प्रसिद्ध नाम हैं, जो वेदवाणी तथा देवता और मुनियोंके | भी मन-वाणीके अगोचर हैं, जो भगवान् सुवर्णके समान मनोऽगोचरः। कनकपिशङ्गकौशेयवासोभगवान् | पीत रेशमी वस्त्र धारण करते हैं, जिनका वक्षःस्थल भृगुपदकौस्तुभविभूषितोरःस्थलः। स्वदयिता- | भृगुजीके चरण-चिह्न तथा कौस्तुभमणिसे अलंकृत है,
१९२ श्रीमन्नरसिंहपुराण [अध्याय ३१
१९२ श्रीमन्नरसिंहपुराण [अध्याय ३१ क्रूरनिजजननीगोकुलपालकचतुर्भुजशङ्खचक्र- | जो अपने प्रिय भक्त अक्रूर, माता देवकी और गोकुलके गदापद्मतुलसीनवदलदामहारकेयूरकटकमुकुटा- | पालक हैं तथा जो अपनी चारों भुजाओंमें शङ्ख, चक्र, लंकृतः । सुनन्दनादिभागवतोपासितविश्वरूपः । | गदा, पद्म धारण किये नूतन तुलसीदलकी माला, मुक्ताहार, पुराणपुरुषोत्तमः । उत्तमश्लोकः । लोकावासो | केयूर, कड़ा और मुकुट आदिसे विभूषित हैं, सुनन्दन वासुदेवः । श्रीदेवकीजठरसम्भूतः । भूतपतिविरञ्चि- | आदि भगवद्भक्त जिन विश्वरूप हरिकी उपासना करते नतचरणारविन्दः । वृन्दावनकृतकेलिगोपिकाजन- | हैं, जो पुराण-पुरुषोत्तम हैं, पुण्ययशवाले हैं तथा समस्त श्रमापहः । सततं सम्पादितसुजनकामः । कुन्दनिभ- | लोकोंके आवास-स्थान वासुदेव हैं, जो देवकीके उदरसे शङ्खधरमिन्दुनिभवक्त्रं सुन्दरसुदर्शनमुदारतरहासं | प्रकट हुए हैं, भूतनाथ शिव तथा ब्रह्माजीने जिनके विद्वज्जनवन्दितमिदं ते रूपमतिहृद्यमखिलेश्वरं | चरणारविन्दोंपर मस्तक झुकाया है, जो वृन्दावनमें की नतोऽस्मि । | गयी लीलासे थकी हुई गोपियोंके श्रमको दूर करनेवाले हैं, सज्जनोंके मनोरथोंको जो सर्वदा पूर्ण किया करते हैं, स्थानाभिकामी तपसि स्थितोऽहं | ऐसी महिमावाले हे सर्वेश्वर ! जो कुन्दके समान उज्ज्वल त्वां दृष्टवान् साधुमुनीन्द्रगुह्यम् । | शङ्ख धारण करते हैं, जिसका चन्द्रमाके समान सुन्दर काचं विचिन्वन्निव दिव्यरत्नं | मुख है, सुन्दर नेत्र हैं तथा अत्यन्त मनोहर मुसकान है, स्वामिन् कृतार्थोऽस्मि वरान्न याचे ॥ ९० | ऐसे अत्यन्त हृदयहारी आपके इस रूपको, जो ज्ञानियोंद्वारा वन्दित है, मैं प्रणाम करता हूँ। मैं उत्तम स्थान प्राप्त करनेकी इच्छासे तपस्यामें अपूर्वदृष्टे तव पादपद्मे | प्रवृत्त हुआ और बड़े-बड़े मुनीश्वरोंके लिये भी जिनका दृष्ट्वा दृढं नाथ नहि त्यजामि । | दर्शन पाना असम्भव है, उन्हीं आप परमेश्वरका दर्शन कामान् न याचे स हि कोऽपि मूढो | पा गया—ठीक उसी तरह, जैसे काँचकी खोज करनेवाला यः कल्पवृक्षात् तुषमात्रमिच्छेत् ॥ ९१ | कोई मनुष्य भाग्यवश दिव्य रत्न हस्तगत कर ले। स्वामिन् ! मैं कृतार्थ हो गया, अब मैं कोई वर नहीं माँगता। हे त्वां मोक्षबीजं शरणं प्रपन्नः | नाथ! जिनका दर्शन अपूर्व है—पहले कभी उपलब्ध शक्नोमि भोक्तुं न बहिःसुखानि । | नहीं हुआ है, उन आपके चरणकमलोंका दर्शन पाकर रत्नाकरे देव सति स्वनाथे | अब मैं इन्हें छोड़ नहीं सकता। मैं अब भोगोंकी याचना विभूषणं काचमयं न युक्तम् ॥ ९२ | नहीं करूँगा; ऐसा कोई मूर्ख ही होगा, जो कल्पवृक्षसे केवल भूसी पाना चाहेगा ? देव ! आज मैं मोक्षके कारणभूत आप परमेश्वरकी शरणमें आ पड़ा हूँ, अब बाह्य विषय- अतो न याचे वरमीश युष्मत्- | सुखोंको मैं नहीं भोग सकता। जब रत्नोंकी खान समुद्र पादाब्जभक्तिं सततं ममास्तु । | अपना मालिक हो जाय, तब काँचका भूषण पहनना इमं वरं देववर प्रयच्छ | कभी उचित नहीं हो सकता। अतः ईश ! अब मैं दूसरा पुनः पुनस्त्वामिदमेव याचे ॥ ९३ | कोई वर नहीं माँगता; आपके चरण-कमलोंमें मेरी सदा भक्ति बनी रहे, देववर ! मुझे यही वर दीजिये। मैं बारंबार आपसे यही प्रार्थना करता हूँ ॥ ९०-९३ ॥ श्रीसूत उवाच | श्रीसूतजी कहते हैं—इस प्रकार अपने दर्शनमात्रसे इत्यात्मसंदर्शनलब्धदिव्य- | दिव्य ज्ञान प्राप्त करके स्तुति करते हुए ध्रुवको देखकर ज्ञानं गदन्तं भगवाञ्जगाद ॥ ९४ | भगवान्ने उससे कहा ॥ ९४ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ३१ ] ध्रुव-चरित्र तथा ग्रह, नक्षत्र एवं पातालका संक्षिप्त वर्णन ११३ --- [संस्कृत श्लोक] --- श्रीभगवानुवाच आराध्य विष्णुं किमनेन लब्धं मा भूज्जनेऽपीत्थमसाधुवादः । स्थानं परं प्राप्नुहि यन्मतं ते कालेन मां प्राप्स्यसि शुद्धभावः ॥ ९५ आधारभूतः सकलग्रहाणां कल्पद्रुमः सर्वजनैश्च वन्द्यः । मम प्रसादात्तव सा च माता ममान्तिके या च सुनीतिरार्या ॥ ९६ श्रीसूत उवाच तं साधयित्वेति वरैर्मुकुन्दः स्वमालयं दृश्यवपुर्जगाम । त्यक्त्वा शनैर्दिव्यवपुः स्वभक्तं मुहुः परावृत्य समीक्षमाणः ॥ ९७ तावच्च सद्यः सुरसिद्धसंघः श्रीविष्णुत्तद्भक्तसमागमं तम् । दृष्ट्वाथ वर्षन् सुरपुष्पवृष्टिं तुष्टाव हर्षाद् ध्रुवमव्ययं च ॥ ९८ श्रियाभिमत्य च सुनीतिसूनु- र्विभाति देवैरपि वन्द्यमानः । योऽयं नृणां कीर्तनदर्शनाभ्या- मायुर्यशो वर्धयति श्रियं च ॥ ९९ इत्थं ध्रुवः प्राप पदं दुरापं हरेः प्रसादान्न च चित्रमेतत् । तस्मिन् प्रसन्ने द्विजराजपत्रे न दुर्लभं भक्तजनेषु किंचित् ॥ १०० सूर्यमण्डलमानात्तु द्विगुणं सोममण्डलम्। पूर्णे शतसहस्रे द्वे तस्मान्नक्षत्रमण्डलम् ॥ १०१ द्वे लक्षेऽपि बुधस्यापि स्थानं नक्षत्रमण्डलात् । तावत्प्रमाणभागे तु बुधस्याप्युशना स्थितः ॥ १०२ अङ्गारकोऽपि शुक्रस्य तावन्माने व्यवस्थितः । लक्षद्वयं तु भौमस्य स्थितो देवपुरोहितः ॥ १०३ सौरिर्बृहस्पतेश्चोर्ध्वं द्विलक्षे तु व्यवस्थितः । तस्माच्छनैश्चरादूर्ध्वं लक्षे सप्तर्षिमण्डलम् ॥ १०४ सप्तर्षिमण्डलादूर्ध्वमेकं लक्षं ध्रुवः स्थितः । मेढीभूतः समस्तस्य ज्योतिष्चक्रस्य सत्तम ॥ १०५ --- [हिन्दी अनुवाद] --- श्रीभगवान् बोले—'ध्रुवने विष्णुकी आराधना करके क्या पा लिया?' इस तरहका अपवाद लोगोंमें न फैल जाय। इसके लिये तुम अपने अभीष्ट सर्वोत्तम स्थानको ग्रहण करो, पुनः समय आनेपर शुद्धभाव हो तुम मुझे प्राप्त कर लोगे। मेरे प्रसादसे समस्त ग्रहोंके आधारभूत, कल्पवृक्ष और सब लोगोंके वन्दनीय होकर तुम और तुम्हारी माता आर्या सुनीति मेरे निकट निवास करोगे ॥ ९५-९६ ॥ श्रीसूतजी कहते हैं—इस प्रकार प्रत्यक्ष प्रकट हो, उपर्युक्त वरदानोंसे ध्रुवका मनोरथ पूर्ण करके, भगवान् मुकुन्द धीरेसे अपना वह दिव्य रूप छिपा, बारंबार घूमकर उस भक्तकी ओर देखते हुए अपने वैकुण्ठधामको चले गये। इसी बीचमें देवताओंका समुदाय भगवान् विष्णु और उनके भक्तके उस समागमको देख हर्षके मारे तत्काल दिव्य पुष्प बरसाने और उस अविनाशी ध्रुवका स्तवन भी करने लगा। सुनीतिकुमार ध्रुव आज श्री और सम्मान—दोनोंसे सम्पन्न होकर देवताओंका भी वन्दनीय हो, शोभा पा रहा है। यह अपने दर्शन तथा गुणकीर्तनसे मनुष्योंकी आयु, यश तथा लक्ष्मीकी भी वृद्धि करता रहेगा ॥ ९७–९९ ॥ इस प्रकार ध्रुव भगवान् विष्णुके प्रसादसे दुर्लभ पद पा गया—यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। उन गरुडवाहन भगवान्के प्रसन्न हो जानेपर भक्तोंके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता। सूर्यमण्डलका जितना मान है, उससे दूना चन्द्रमण्डलका मान है। चन्द्रमण्डलसे पूरे दो लाख योजन दूर ऊपर नक्षत्रमण्डल है, नक्षत्रमण्डलसे भी दो लाख योजन ऊँचे बुधका स्थान है और बुधके भी स्थानसे उतनी ही दूरीपर शुक्रकी स्थिति है। शुक्रसे भी दो लाख योजन दूर मङ्गल है और मङ्गलसे दो लाख योजनपर देवपुरोहित बृहस्पतिका निवास है। बृहस्पतिसे भी दो लाख योजन ऊपर शनैश्चरका स्थान है। उन शनैश्चरसे दो लाख योजन ऊपर सप्तर्षियोंका मण्डल है। सप्तर्षि-मण्डलसे एक लाख योजन ऊपर ध्रुव स्थित है। साधुशिरोमणे ! वह समस्त ज्योतिर्मण्डलका केन्द्र है ॥ १००–१०५ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
१९४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३१
१९४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३१
स्वभावात् तपति विप्रेन्द्र अधश्चोर्ध्वं च रश्मिभिः। | विप्रवर ! सूर्यदेव स्वभावतः अपनी किरणोंद्वारा नीचे कालसंख्यां त्रिलोकस्य स करोति युगे युगे ॥ १०६ | तथा ऊपरके लोकोंमें ताप पहुँचाते हैं। वे ही प्रत्येक युगमें जनस्तपस्तथा सत्यमेतांल्लोकान् द्विजोत्तम। | त्रिभुवनकी कालसंख्या निश्चित करते हैं। द्विजोत्तम ! ब्रह्मणा मुनिशार्दूल विष्णुभक्तिविवर्धितः ॥ १०७ | मुनिश्रेष्ठ ! ब्रह्माजीके द्वारा विष्णुभक्तिसे अभ्युदयको प्राप्त ऊर्ध्वगतैर्द्विजश्रेष्ठ रश्मिभिस्तपते रविः। | होकर सूर्य अपनी ऊर्ध्वगत किरणोंसे ऊपरके जन, तप अधोगतैश्च भूर्लोकं द्योतते दीर्घदीधितिः ॥ १०८ | तथा सत्य लोकोंमें गर्मी पहुँचाते हैं और अधोगत किरणोंसे सर्वपापहरः सूर्यः कर्ता त्रिभुवनस्य च। | भूलोकको प्रकाशित करते हैं ॥ १०६-१०८ ॥ छत्रवत् प्रतिपश्येत मण्डलान्मण्डलं परम् ॥ १०९ | समस्त पापोंको हरनेवाले सूर्यदेव त्रिभुवनकी सृष्टि आदित्यमण्डलाधस्ताद् भुवर्लोकं प्रतिष्ठितम्। | करते हैं। वे छत्रकी भाँति स्थित हो एक मण्डलसे दूसरे त्रैलोक्यस्येश्वरत्वं च विष्णुदत्तं शतक्रतोः ॥ ११० | मण्डलको दर्शन देते और प्रकाशित करते हैं। सूर्यमण्डलके लोकपालैः स सहितो लोकान् रक्षति धर्मतः। | नीचे भुवर्लोक प्रतिष्ठित है। तीनों भुवनोंका आधिपत्य वसेत् स्वर्गे महाभाग देवेन्द्रः स तु कीर्तिमान् ॥ १११ | भगवान् विष्णुने शतक्रतु इन्द्रको दे रखा है। वे समस्त ततोऽधस्तान्मुने चेदं पातालं विद्धि सप्रभम्। | लोकपालोंके साथ धर्मपूर्वक लोकोंकी रक्षा करते हैं। न तत्र तपते सूर्यो न रात्रिर्न निशाकरः ॥ ११२ | महाभाग ! वे यशस्वी देवेन्द्र स्वर्गलोकमें निवास करते हैं। दिव्यस्वरूपमास्थाय तपन्ति सततं जनाः। | मुने ! इन सात लोकोंसे नीचे यह प्रभापूर्ण पाताललोक स्थित पातालस्था द्विजश्रेष्ठ दीप्यमानाः स्वतेजसा ॥ ११३ | है, ऐसा आप जानें। वहाँ न सूर्यका ताप है, न चन्द्रमाका स्वर्लोकात्तु महर्लोकः कोटिमात्रे व्यवस्थितः। | प्रकाश, [न दिन है] न रात। द्विजश्रेष्ठ ! पातालवासी जन ततो योजनमात्रेण द्विगुणो मण्डलेन तु ॥ ११४ | दिव्यरूप धारण करके सदा अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए जनलोकः स्थितो विप्र पञ्चमो मुनिसेवितः। | तपते हैं। स्वर्गलोकसे करोड़ योजन ऊपर महर्लोक स्थित तत्रोपरि तपोलोकश्चतुर्भिः कोटिभिः स्थितः ॥ ११५ | है। हे विप्र ! उससे दूने दो करोड़ योजनपर मुनिसेवित सत्यलोकोऽष्टकोटीभिस्तपोलोकोपरिस्थितः। | जनलोक, जो पाँचवाँ लोक है, स्थित है। उससे चार करोड़ सर्वे छात्राकृतिज्ञेया भुवनोपरिसंस्थिताः ॥ ११६ | योजन ऊपर तपोलोककी स्थिति है। तपोलोकसे ऊपर ब्रह्मलोकाद्विगुलोको द्विगुणश्च व्यवस्थितः। | आठ करोड़ योजनपर सत्यलोक (ब्रह्मलोक) स्थित है। ये वाराहे तस्य माहात्म्यं कथितं लोकचिन्तकैः ॥ ११७ | सभी भुवन एक-दूसरेके ऊपर छत्रकी भाँति स्थित हैं। ततः परं द्विजश्रेष्ठ स्थितः परमपूरुषः। | ब्रह्मलोकसे सोलह करोड़ योजनपर विष्णुलोककी स्थिति ब्रह्माण्डात् परमः साक्षान्निर्लेपः पुरुषः स्थितः ॥ ११८ | है। लोकचिन्तकोंने वाराहपुराणमें उसके माहात्म्यका वर्णन पशुपाशैर्विमुच्येत तपोज्ञानसमन्वितः। | किया है। द्विजश्रेष्ठ ! इसके आगे परम पुरुषकी स्थिति है, इति ते संस्थितिः प्रोक्ता भूगोलस्य मयानघ। | जो ब्रह्माण्डसे विलक्षण साक्षात् परमात्मा हैं। इस प्रकार यस्तु सम्यगिमां वेत्ति स याति परमां गतिम् ॥ ११९ | जाननेवाला मनुष्य तप और ज्ञानसे युक्त होकर पशुपाश लोकस्य संस्थानकरोऽप्रमेयो | (अविद्या-बन्धन)-से मुक्त हो जाता है॥ १०९-११८१/२॥ विष्णुर्नृसिंहो नरदेवपूजितः। | अनघ ! इस प्रकार मैंने तुम्हें भूगोलकी स्थिति बतलायी। युगे युगे विष्णुरनादिमूर्तिमा- | जो पुरुष सम्यक् प्रकारसे इसका ज्ञान रखता है, वह परम नास्थाय विश्वं परिपाति दुष्टहा ॥ १२० | गतिको प्राप्त होता है। मनुष्यों और देवताओंसे पूजित | नृसिंहस्वरूप अप्रमेय भगवान् विष्णु लोककी रक्षा करनेवाले | हैं। वे अनादि मूर्तिमान् परमेश्वर प्रत्येक युगमें शरीर धारणकर | दुष्टोंका वध करके विश्वका पालन करते हैं॥ ११९-१२०॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे एकत्रिशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥
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