भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

अध्याय २२ ] चन्द्रवंशका वर्णन ७५


ददितेरादित्यः। आदित्यात् सुवर्चलायां मनुः ॥ ३ ॥ | मरीचिसे दाक्षायणीके गर्भसे कश्यपजी उत्पन्न हुए। कश्यपसे मनोः सुरूपायां सोमः। सोमाद्रोहिण्यां बुधः। | अदितिके गर्भसे सूर्यका जन्म हुआ। सूर्यसे सुवर्चला बुधादिलायां पुरूरवाः ॥ ४ ॥ पुरूरवस आयुः। | (संज्ञा)-के गर्भसे मनुकी उत्पत्ति हुई। मनुके द्वारा सुरूपामके आयो रूपवत्यां नहुषः ॥ ५ ॥ नहुषात् पितृवत्यां | गर्भसे सोम और सोमके द्वारा रोहिणीके गर्भसे बुधका ययातिः। ययातेः शर्मिष्ठायां पूरुः ॥ ६ ॥ पूरोर्वंशदायां | जन्म हुआ तथा बुधके द्वारा इलाके गर्भसे राजा पुरूरवा सम्पातिः। सम्पातेर्भानुदत्तायां सार्वभौमः। | उत्पन्न हुए। पुरूरवासे आयुका जन्म हुआ, आयुद्वारा सार्वभौमस्य वैदेह्यां भोजः ॥ ७ ॥ भोजस्य लिङ्गायां | रूपवतीके गर्भसे नहुष हुए। नहुषके द्वारा पितृवतीके दुष्यन्तः। दुष्यन्तस्य शकुन्तलायां भरतः ॥ ८ ॥ | गर्भसे ययाति हुए और ययातिसे शर्मिष्ठाके गर्भसे पूरुका भरतस्य नन्दायामजमीढः। अजमीढस्य सुदेव्यां | जन्म हुआ। पूरुके द्वारा वंशदाके गर्भसे सम्पाति और पृश्निः। पृश्नेरुग्रसेनायां प्रसरः। प्रसरस्य बहुरूपायां | उससे भानुदत्ताके गर्भसे सार्वभौम हुआ। सार्वभौमसे वैदेहीके शांतनुः। शांतनोर्योजनगन्धायां विचित्रवीर्यः। | गर्भसे भोजका जन्म हुआ। भोजके लिङ्गाके गर्भसे दुष्यन्त विचित्रवीर्यस्याम्बिकायां पाण्डुः ॥ ९ ॥ पाण्डोः | और दुष्यन्तके शकुन्तलासे भरत हुआ। भरतके नन्दासे कुन्तिदेव्यामर्जुनः। अर्जुनात् सुभद्राया- | अजमीढ नामक पुत्र हुआ, अजमीढके सुदेवीके गर्भसे मभिमन्युः ॥ १० ॥ अभिमन्योरुत्तरायां परीक्षित्। | पृश्नि हुआ तथा पृश्निके उग्रसेनाके गर्भसे प्रसरका आविर्भाव परीक्षितस्य मातृवत्यां जनमेजयः। जनमेजयस्य | हुआ। प्रसरके बहुरूपाके गर्भसे शांतनु हुए, शांतनुसे पुण्यवत्यां शतानीकः ॥ ११ ॥ शतानीकस्य पुष्पवत्यां | योजनगन्धाने विचित्रवीर्यको जन्म दिया। विचित्रवीर्यके सहस्रानीकः। सहस्रानीकस्य मृगवत्यामुदयनः। | अम्बिकाके गर्भसे पाण्डुका जन्म हुआ। पाण्डुसे तस्य वासवदत्तायां नरवाहनः ॥ १२ ॥ | कुन्तीदेवीके गर्भसे अर्जुन हुआ, अर्जुनसे सुभद्राने नरवाहनस्याश्वमेधायां क्षेमकः। क्षेमकान्ताः | अभिमन्युको उत्पन्न किया। अभिमन्युसे उत्तराके गर्भसे पाण्डवाः सोमवंशो निवर्तते ॥ १३ ॥ | परीक्षित् हुआ, परीक्षित्के मातृवतीसे जनमेजय उत्पन्न | हुआ और जनमेजयके पुण्यवतीके गर्भसे शतानीककी | उत्पत्ति हुई। शतानीकके पुष्पवतीसे सहस्रानीक हुआ, | सहस्रानीकसे मृगवतीसे उदयन उत्पन्न हुआ और उदयनके | वासवदत्ताके गर्भसे नरवाहन हुआ। नरवाहनके अश्वमेधासे | क्षेमक हुआ। यह क्षेमक ही पाण्डववंशका अन्तिम राजा | है, इसके बाद सोमवंश निवृत्त हो जाता है॥ २-१३॥ य इदं शृणुयान्नित्यं राजवंशमनुत्तमम्। | जो पुरुष इस उत्तम राजवंशका सदा श्रवण करता सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णुलोकं स गच्छति ॥ १४ | है, वह सब पापोंसे मुक्त एवं विशुद्धचित्त होकर विष्णु- यश्चेदं पठते नित्यं श्राद्धे वा श्रावयेत् पितॄन्। | लोकको प्राप्त होता है। जो इस पवित्र वंश-वर्णनको वंशानुकीर्तनं पुण्यं पितॄणां दत्तमक्षयम् ॥ १५ | प्रतिदिन स्वयं पढ़ता अथवा श्राद्धकालमें पितृगणोंको राज्ञां हि सोमस्य मया तवेरिता | सुनाता है उसके पितरोंको दिया हुआ दान अक्षय हो वंशानुकीर्तिर्द्विज पापनाशनी। | जाता है। द्विज! यह मैंने आपसे सोमवंशी राजाओंका शृणुष्व विप्रेन्द्र मयोच्यमानं | पाप-नाशक वंशानुकीर्तन सुनाया। विप्रवर! अब मेरे द्वारा मन्वन्तरं चापि चतुर्दशाख्यम् ॥ १६ ॥ | बताये जानेवाले चौदह मन्वन्तरोंको सुनिये ॥ १४-१६ ॥

इति श्रीनरसिंहपुराणे सोमवंशानुकीर्तनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'सोमवंशका वर्णन' नामक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२ ॥


In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

७६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २३

७६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २३ तेईसवाँ अध्याय चौदह मन्वन्तरोंका वर्णन सूत उवाच | सूतजी बोले—प्रथम 'स्वायम्भुव' मन्वन्तर है, उसका प्रथमं तावत् स्वायम्भुवं मन्वन्तरं तत्स्वरूपं | स्वरूप पहले बतलाया जा चुका है। सृष्टिके आदिकालमें कथितम्। सर्गादौ स्वारोचिषो नाम द्वितीयो | 'स्वारोचिष' नामक द्वितीय मनु हुए थे। उस स्वारोचिष मनुः ॥ १ ॥ तस्मिन् स्वारोचिषे मन्वन्तरे विपश्चिन्नाम | मन्वन्तरमें 'विपश्चित्' नामक देवराज इन्द्र थे। उस समयके देवेन्द्रः। पारावताः सतुषिता देवाः ॥ २॥ ऊर्जस्तम्बः | देवता 'पारावत' और 'तुषित' नामसे प्रसिद्ध थे। ऊर्जस्तम्ब, सुप्राणो दन्तो निर्ऋषभो वरीयानीश्वरः सोमः | सुप्राण, दन्त, निर्ऋषभ, वरीयान्, ईश्वर और सोम—ये सप्तर्षयश्चैवम् किम्पुरुषाद्याः स्वारोचिषस्य मनोः | उस मन्वन्तरमें सप्तर्षि थे। इसी प्रकार 'स्वारोचिष' पुत्रा राजानो भवन्ति ॥ ३ ॥ तृतीय उत्तमो नाम मनुः । | मनुके किम्पुरुष आदि पुत्र उन दिनों भूमण्डलके राजा सुधामानः सत्याः शिवाः प्रतर्दना वंशवर्तिनश्च देवाः । | थे। तृतीय मनु 'उत्तम' नामसे प्रसिद्ध हुए। उनके समयमें पञ्चैते द्वादशगणाः ॥ ४ ॥ तेषां सुशान्तिरिन्द्रः ॥ ५ ॥ | सुधामा, सत्य, शिव, प्रतर्दन और वंशवर्ती (अथवा वन्द्याः सप्तर्षयोऽभवन्। अत्र परशुचित्राद्या मनोः | वशवर्ती)—ये पाँच देवगण थे। इनमेंसे प्रत्येक गणमें सुताः ॥ ६ ॥ चतुर्थस्तामसो नाम मनुः । तत्र मन्वन्तरे | बारह-बारह व्यक्ति थे। इन देवताओंके इन्द्रका नाम सुराः पराः सत्याः सुधियश्च सप्तविंशतिका | था—'सुशान्ति'। उन दिनों जो सप्तर्षि थे, उनकी 'वन्द्य' गणाः ॥ ७॥ तत्र भृशुण्डी नाम देवेन्द्रः । हिरण्यरोमा | संज्ञा थी। इस मन्वन्तरमें 'परशु' और 'चित्र' आदि देवश्रीरूर्ध्वबाहुर्देवबाहुः सुधामा ह पर्जन्यो | मनुपुत्र राजा थे। चौथे मनुका नाम था—'तामस'। उनके मुनिरित्येते सप्तर्षयः ॥८॥ ज्योतिर्धामा पृथुः | मन्वन्तरमें देवताओंके पर, सत्य और सुधी नामवाले काश्योऽग्निर्षनक इत्येते तामसस्य मनोः पुत्रा | गण थे। इनमेंसे प्रत्येक गणमें सत्ताईस-सत्ताईस देवता राजानः ॥ ९॥ पञ्चमो नाम रैवतो मनुः । | थे। इन देवताओंके राजा इन्द्रका नाम था—'भृशुण्डी'। तस्यान्तरेऽमिता निरता वैकुण्ठाः सुमेधस इत्येते | उस समय हिरण्यरोमा, देवश्री, ऊर्ध्वबाहु, देवबाहु, सुधामा, देवगणाश्चतुर्दशका गणाः । असुरान्तको नाम देवेन्द्रः । | पर्जन्य और मुनि—ये सप्तर्षि थे। ज्योतिर्धाम, पृथु, काश्य, ससकाद्या मनोः सुता राजानो वै बभूवुः ॥ १० ॥ | अग्नि और धनक—ये तामस मनुके पुत्र इस भूमण्डलके शान्तः शान्तभयो विद्वांस्तपस्वी मेधावी सुतपाः | राजा थे। पाँचवें मनुका नाम था—'रैवत'। उनके सप्तर्षयोऽभवन् ॥ ११ ॥ षष्ठश्चाक्षुषो नाम मनुः । | मन्वन्तरमें अमित, निरत, वैकुण्ठ और सुमेधा—ये पुरुशतद्युम्नप्रमुखास्तस्य सुता राजानः। सुशान्ता | देवताओंके गण थे। इनमेंसे प्रत्येक गणमें चौदह-चौदह आप्याः प्रसूता भव्याः प्रथिताश्च महानुभावा | व्यक्ति थे। इन देवताओंके जो इन्द्र थे, उनका नाम लेखाद्याः पञ्चैते ह्यष्टका गणास्तत्र देवाः ॥ १२ ॥ | था—'असुरान्तक'। उस समय ससक आदि मनुपुत्र भूतलके तेषामिन्द्रो मनोजवः। मेधाः सुमेधा विरजा | राजा थे। शान्त, शान्तमय, विद्वान्, तपस्वी, मेधावी और हविष्मानुत्तमो मतिमान्नाम्ना सहिष्णुश्चैते | सुतपा—ये सप्तर्षि थे। छठे मनुका नाम 'चाक्षुष' था। सप्तर्षयः ॥ १३ ॥ सप्तमो वैवस्वतो मनुः साम्प्रतं वर्तते । | उनके समयमें पुरु और शतद्युम्न आदि मनुपुत्र राजा थे। तस्य पुत्रा इक्ष्वाकुप्रभृतयः क्षत्रिया भूभुजः ॥ १४ ॥ | उस समय अत्यन्त शान्त रहनेवाले लेख, आप्य, प्रसूत, | भव्य और प्रथित—ये पाँच महानुभाव देवगण थे। इन | पाँचों गणोंमें आठ-आठ व्यक्ति थे। इनके इन्द्रका नाम | 'मनोजव' था। उन दिनों मेधा, सुमेधा, विरजा, हविष्मान्, | उत्तम, मतिमान् और सहिष्णु—ये सप्तर्षि थे। सातवें | मनुको 'वैवस्वत' कहते हैं, जो इस समय वर्तमान | हैं। इनके इक्ष्वाकु आदि क्षत्रियजातीय पुत्र भूपाल हुए। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय २३ ] चौदह मन्वन्तरोंका वर्णन ७७

अध्याय २३ ] चौदह मन्वन्तरोंका वर्णन ७७ आदित्यविश्ववसुरुद्राद्या देवाः पुरंदरोऽत्र देवेन्द्रः ॥ १५ ॥ वसिष्ठः कश्यपोऽत्रिर्जमदग्निर्गौतम- विश्वामित्रभरद्वाजाः सप्तर्षयो भवन्ति ॥ १६ ॥ भविष्याणि मन्वन्तराणि कथ्यन्ते । तद्यथा आदित्यात् संज्ञायां जातो यो मनुः पूर्वोक्तश्छायायामुत्पन्नो मनुर्द्वितीयः स तु । पूर्वजस्य सावर्ण्यस्य मन्वन्तरं सावर्णिमकमष्टमं शृणु ॥ १७ ॥ मनुः सावर्णीऽष्टमो भविता तत्र सुतपाद्या देवगणास्तेषां बलिरिन्द्रो भविता ॥ १८ ॥ दीप्तिमान् गालवो नामा कृपद्रौणिर्व्यासऋष्यशृङ्गाश्च सप्तर्षयो भवितारः । विराजोर्वरीयनिर्मोकाद्याः सावर्ण्यस्य मनोः सुता राजानो भविष्यन्ति ॥ १९ ॥ नवमो दक्ष- सावर्णिर्मनुर्भविता । धृतिः कीर्तिर्दीप्तिः केतुः पञ्चहस्तो निरामयः पृथुश्रवाद्या दक्षसावर्णा राजानोऽस्य मनोः पुत्राः ॥ २० ॥ मरीचिगर्भाः सुधर्माणो हविष्मन्तस्तत्र देवताः । तेषामिन्द्रोऽद्भुतः ॥ २१ ॥ सवनः कृतिमान् हव्यो वसुमेधातिथिर्ज्योतिष्मानित्येते सप्तर्षयः ॥ २२ ॥ दशमो ब्रह्मसावर्णिर्मनुर्भविता । विरुद्धादयस्तत्र देवाः । तेषां शान्तिरिन्द्रः । हविष्मान् सुकृतिः सत्यस्तपोमूर्तिर्नाभागः प्रतिमोकः सप्तकेतुरित्येते सप्तर्षयः ॥ २३ ॥ सुक्षेत्र उत्तमो भूरिषेणादयो ब्रह्मसावर्णिपुत्रा राजानो भविष्यन्ति ॥ २४ ॥ एकादशे मन्वन्तरे धर्मसावर्णिको मनुः ॥ २५ ॥ सिंहसवनादयो देवगणाः । तेषां दिवस्पतिरिन्द्रः ॥ २६ ॥ निर्मोहस्तत्त्वदर्शी निकम्पो निरुत्साहो धृतिमान् रुच्य इत्येते सप्तर्षयः । चित्रसेनविचित्राद्या धर्मसावर्णिपुत्रा भूभृतो भविष्यन्ति ॥ २७ ॥ रुद्रसावर्णिर्भविता द्वादशो मनुः ॥ २८ ॥ कृतधामा तत्रेन्द्रो हरिता रोहिताः सुमनसः सुकर्माणः सुतपाश्च देवाः ॥ २९ ॥ तपस्वी चारुतपास्तपोमूर्तिस्तपोरतिस्तपोधृतिर्ज्योतिस्तप इत्येते सप्तर्षयः ॥ ३० ॥ देववान् देवश्रेष्ठाद्यास्तस्य मनोः सुता भूपाला भविष्यन्ति ॥ ३१ ॥ त्रयोदशो रुचिर्नाम मनुः । स्रग्वौ बाणः सुधर्मा प्रभृतयो देवगणाः ।


इस मन्वन्तरमें आदित्य, विश्ववसु और रुद्र आदि देवगण हैं और 'पुरंदर' इनके इन्द्र हैं। वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भरद्वाज—ये इस मन्वन्तरके सप्तर्षि हैं ॥ १—१६ ॥ अब भविष्य मन्वन्तरोंका वर्णन किया जाता है— आदित्यसे संज्ञाके गर्भसे उत्पन्न हुए जो 'मनु' हैं, उनकी चर्चा पहले हो चुकी है और छायाके गर्भसे उत्पन्न दूसरे 'मनु' हैं। इनमें प्रथम उत्पन्न हुए जो 'सावर्ण' मनु हैं, उनके ही 'सावर्णिक' नामक आठवें मन्वन्तरका वर्णन सुनिये। 'सावर्ण' ही आठवें मनु होंगे। उस समय सुतप आदि देवगण होंगे और 'बलि' उनके इन्द्र होंगे। दीप्तिमान्, गालव, नामा, कृप, अश्वत्थामा, व्यास और ऋष्यशृङ्ग— ये सप्तर्षि होंगे। विराज, उर्वरीय और निर्मोक आदि सावर्ण मनुके पुत्र राजा होंगे। नवें भावी मनु 'दक्षसावर्णि' हैं। धृति, कीर्ति, दीप्ति, केतु, पञ्चहस्त, निरामय तथा पृथुश्रवा आदि दक्षसावर्णि मनुके पुत्र उस समय राजा होंगे। उस मन्वन्तरमें मरीचिगर्भ, सुधर्मा और हविष्मान्— ये देवता होंगे और उनके इन्द्र 'अद्भुत' नामसे प्रसिद्ध होंगे। सवन, कृतिमान्, हव्य, वसु, मेधातिथि तथा ज्योतिष्मान् (और सत्य)—ये सप्तर्षि होंगे। दसवें मनु 'ब्रह्मसावर्णि' होंगे। उस समय विरुद्ध आदि देवता और उनके 'शान्ति' नामक इन्द्र होंगे। हविष्मान्, सुकृति, सत्य, तपोमूर्ति, नाभाग, प्रतिमोक और सप्तकेतु—ये सप्तर्षि होंगे। सुक्षेत्र, उत्तम, भूरिषेण आदि 'ब्रह्मसावर्णि' के पुत्र राजा होंगे। ग्यारहवें मन्वन्तरमें 'धर्मसावर्णि' नामक मनु होंगे। उस समय सिंह, सवन आदि देवगण और उनके 'दिवस्पति' नामक इन्द्र होंगे। निर्मोह, तत्त्वदर्शी, निकम्प, निरुत्साह, धृतिमान् और रुच्य—ये सप्तर्षि होंगे। चित्रसेन और विचित्र आदि धर्मसावर्णि मनुके पुत्र राजा होंगे। बारहवें मनु 'रुद्रसावर्णि' होंगे। उस मन्वन्तरमें 'कृतधामा' नामक इन्द्र और हरित, रोहित, सुमना, सुकर्मा तथा सुतपा नामक देवगण होंगे। तपस्वी, चारुतपा, तपोमूर्ति, तपोरति, तपोधृति, ज्योति और तप—ये सप्तर्षि होंगे। रुद्रसावर्णिके पुत्र देववान् और देवश्रेष्ठ आदि भूमण्डलके राजा होंगे। तेरहवें मनुका नाम 'रुचि' होगा। उस समय स्रग्वौ, बाण और सुधर्मा

७८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २३

७८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २३ तेषामिन्द्र ऋषभो नाम भविता ॥ ३२ ॥ नामक देवगण तथा उनके 'ऋषभ' नामक इन्द्र होंगे। निश्चितोऽग्नितेजा वपुष्मान् धृष्टो वारुणिर्हविष्मान् निश्चित, अग्नितेजा, वपुष्मान्, धृष्ट, वारुणि, हविष्मान् नहुषो भव्य इति सप्तर्षयः। सुधर्मा देवानीकादयस्तस्य और भव्यमूर्ति नहुष - ये सप्तर्षि होंगे। उस मनुके सुधर्मा मनोः पुत्राः पृथ्वीश्वरा भविष्यन्ति ॥ ३३ ॥ तथा देवानीक आदि पुत्र भूपाल होंगे। चौदहवें भावी भौमश्चतुर्दशो मनुर्भविता। सुरुचिस्तत्रेन्द्रः चक्षुष्मन्तः मनुका नाम 'भौम' होगा। उस समय 'सुरुचि' नामक पवित्राः कनिष्ठाभा देवगणाः ॥ ३४ ॥ इन्द्र और चक्षुष्मान्, पवित्र तथा कनिष्ठाभ नामक देवगण अग्निबाहुशुचिशुक्रमाधवशिवाभीमजितश्वासा इत्येते होंगे। अग्निबाहु, शुचि, शुक्र, माधव, शिव, अभीम और जितश्वास-ये सप्तर्षि होंगे तथा उस भौम मनुके पुत्र सप्तर्षयः। उरुगम्भीरब्रह्माद्यास्तस्य मनोः सुता उरु, गम्भीर और ब्रह्मा आदि भूतलके राजा होंगे। इस राजानः ॥ ३५ ॥ एवं ते चतुर्दश मन्वन्तराणि प्रकार मैंने आपसे चौदह मन्वन्तरोंका और उन-उन कथितानि । राजानश्च यैरियं वसुधा पाल्यते ॥ ३६ मनुके पुत्र तत्कालीन राजाओंका वर्णन किया, जिनके मनुः सप्तर्षयो देवा भूपालाश्च मनोः सुताः । द्वारा इस वसुधाका पालन होता है ॥ १७-३६ ॥ मन्वन्तरे भवन्त्येते शक्राश्चैवाधिकारिणः ॥ ३७ प्रत्येक मन्वन्तरमें मनु, सप्तर्षि, देवता और भूपाल चतुर्दशभिरेतैस्तु गतैर्मन्वन्तरैर्द्विज । मनुपुत्र तथा इन्द्र-ये अधिकारी होते हैं। ब्रह्मन् ! इन सहस्रयुगपर्यन्तः कालो गच्छति वासरः ॥ ३८ चौदह मन्वन्तरोंके व्यतीत हो जानेपर एक हजार चतुर्युगका समय बीत जाता है। यह (ब्रह्माजीका) एक दिन तावत्प्रमाणा च निशा ततो भवति सत्तम। कहलाता है। साधुशिरोमणे! फिर उतने ही प्रमाणकी ब्रह्मरूपधरः शेते सर्वात्मा नृहरिः स्वयम् ॥ ३९ उनकी रात्रि होती है। उस समय सब भूतोंके आत्मा त्रैलोक्यमखिलं ग्रस्ता भगवानादिकृद्विभुः। साक्षात् भगवान् नृसिंह ब्रह्मरूप धारण करके शयन स्वमायामास्थितो विप्र सर्वरूपी जनार्दन ॥ ४० करते हैं। विप्रवर! सर्वत्र व्यापक एवं आदिविधाता सर्वरूप भगवान् जनार्दन उस समय समस्त त्रिभुवनको अथ प्रबुद्धो भगवान् यथा पूर्वं तथा पुनः । अपनेमें लीन करके अपनी योगमायाका आश्रय ले युगव्यवस्थां कुरुते सृष्टिं च पुरुषोत्तमः ॥ ४१ शयन करते हैं। फिर जाग्रत् होनेपर वे भगवान् पुरुषोत्तम एते तवोक्ता मनवोऽमराश्च पूर्वकल्पके अनुसार पुनः युग-व्यवस्था तथा सृष्टि करते पुत्राश्च भूपा मुनयश्च सर्वे । हैं। ब्रह्मन् ! इस प्रकार मैंने मनु, देवगण, भूपाल, मनुपुत्र विभूतयस्तस्य स्थितौ स्थितस्य और ऋषि- इन सबका आपसे वर्णन किया। आप इन सबको पालनकर्ता भगवान् विष्णुकी विभूतियाँ ही तस्यैव सर्वं त्वमवेहि विप्र ॥ ४२ ॥ समझें ॥ ३७-४२ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'चौदह मन्वन्तरोंका वर्णन' नामक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

चौबीसवाँ अध्याय

अध्याय २४ ] सूर्यवंश—राजा इक्ष्वाकुका भगवत्प्रेम; उनका भगवद्दर्शनके हेतु तपस्याके लिये प्रस्थान ७९ चौबीसवाँ अध्याय सूर्यवंश—राजा इक्ष्वाकुका भगवत्प्रेम; उनका भगवद्दर्शनके हेतु तपस्याके लिये प्रस्थान


[बायाँ स्तम्भ - संस्कृत श्लोक]

श्रीसूत उवाच अतः परं प्रवक्ष्यामि वंशानुचरितं शुभम्। शृण्वतामपि पापघ्नं सूर्यसोमनृपात्मकम्॥ १ सूर्यवंशोद्भवो यो वै मनुपुत्रः पुरोदितः। इक्ष्वाकुर्नाम भूपालश्चरितं तस्य मे शृणु॥ २ आसीद् भूमौ महाभाग पुरी दिव्या सुशोभना। सरयूतीरमासाद्य अयोध्या नाम नामतः॥ ३ अमरावत्यतिशया त्रिंशद्योजनजालिनी। हस्त्यश्वरथपत्त्योधैर्द्रुमैः कल्पद्रुमप्रभैः॥ ४ प्राकाराट्टप्रतोलीभिस्तोरणैः काञ्चनप्रभैः। विराजमाना सर्वत्र सुविभक्तचतुष्पथा॥ ५ अनेकभूमिप्रासादा बहुभाण्डसुविक्रया। पद्मोत्पलशुभैस्तोयैर्वापीभिरुपशोभिता ॥ ६ देवतायतनैर्दिव्यैर्वेदघोषैश्च शोभिता। वीणावेणुमृदङ्गैश्च शब्दैरुत्कृष्टकैर्युता ॥ ७ शालैस्तालैर्नालिकेरैः पनसामलजम्बुकैः। तथैवाम्रकपित्थाद्यैरशोकैरुपशोभिता ॥ ८ आरामैर्विविधैर्युक्ता सर्वत्र फलपादपैः। मल्लिकामालतीजातिपाटलानागचम्पकैः ॥ ९ करवीरैः कर्णिकारैः केतकीभिरलङ्कृता। कदलीलवलीजातिमातुलुङ्गमहाफलैः । क्वचिच्चन्दनगन्धाद्यैर्नारङ्गैश्च सुशोभिता ॥ १० नित्योत्सवप्रमुदिता गीतवाद्यविचक्षणैः। नरनारीभिराढ्याभी रूपद्रविणप्रेक्षणैः॥ ११


[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद]

श्रीसूतजी कहते हैं—अब मैं सूर्यवंशी तथा चन्द्रवंशी राजाओंके 'वंशानुचरित' का वर्णन करूँगा, जो श्रोताओंका भी पाप नष्ट करनेवाला है। मुने ! मैंने पहले सूर्यवंशमें उत्पन्न हुए जिन मनुपुत्र 'इक्ष्वाकु' नामक भूपालकी चर्चा की थी, उनके चरित्रका वर्णन आप मुझसे सुनें॥ १-२॥ महाभाग ! इस पृथ्वीपर सरयू नदीके किनारे 'अयोध्या' नामसे प्रसिद्ध एक शोभायमान दिव्य पुरी है। वह अमरावतीसे भी बढ़कर सुन्दर और तीस योजन लंबी-चौड़ी थी। हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकोंके समूह तथा कल्पवृक्षके समान कान्तिमान् वृक्ष उस पुरीकी शोभा बढ़ाते थे। चहारदीवारी, अट्टालिका, प्रतोली (गली या राजमार्ग) और सुवर्णकी-सी कान्तिवाले फाटकोंसे वह बड़ी शोभा पा रही थी। अलग-अलग बने हुए उसके चौराहे बहुत सुन्दर लगते थे। वहाँके महल कई मंजिल ऊँचे थे। नाना प्रकारके भाण्डों (भाँति-भाँतिके सामानों)-का सुन्दर ढंगसे क्रय-विक्रय होता था। कमलों और उत्पलोंसे सुशोभित जलसे भरी हुई बावलियाँ उस पुरीकी शोभा बढ़ा रही थीं। दिव्य देवालय तथा वेदमन्त्रोंके घोष उस नगरीकी श्री-वृद्धि करते थे। वीणा, वेणु और मृदङ्ग आदिके उत्कृष्ट शब्दोंसे वह पुरी गूँजती रहती थी। शाल (साखू), ताल (ताड़), नारियल, कटहल, आँवला, जामुन, आम और कपित्थ (कैथ) आदिके वृक्षों तथा अशोक-पुष्पोंसे अयोध्यापुरीकी बड़ी शोभा होती थी॥ ३-८॥ वहाँ सब जगह नाना प्रकारके बगीचे और फलवाले वृक्ष पुरीकी शोभा बढ़ाते थे। मल्लिका (मोतिया या बेला), मालती, चमेली, पाड़र, नागकेसर, चम्पा, कनेर, कनकचम्पा और केतकी (केवड़ा) आदि पुष्पोंसे मानो उस पुरीका शृङ्गार किया गया था। केला, हरफा, रेवड़ी, जायफल और बिजौरा नीबू, चन्दनकी-सी गन्धवाले तथा दूसरे प्रकारके संतरे आदि बड़े-बड़े फल उसकी शोभा बढ़ाते थे। गीत और वाद्यमें कुशल पुरुष उस पुरीमें प्रतिदिन आनन्दोत्सव मचाये रहते थे। वहाँके स्त्री-पुरुष रूप-वैभव तथा सुन्दर नेत्रोंसे सम्पन्न थे ॥ ९-११॥


In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

८० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २४

८० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २४ नानाजनपदाकीर्णा पताकाध्वजशोभिता। वह पुरी नाना देशोंके मनुष्योंसे भरी-पूरी, ध्वजा- देवतुल्यप्रभायुक्तैर्नृपपुत्रैश्च संयुता ॥ १२ पताकाओंसे सुशोभित तथा अनेकानेक कान्तिमान् देवोपम राजकुमारोंसे युक्त थी। वहाँ देवाङ्गनाओंके समान श्रेष्ठ सुरूपाभिर्वरस्त्रीभिर्देवस्त्रीभिरिवावृता । एवं रूपवती वनिताएँ निवास करती थीं। बृहस्पतिके विप्रैः सत्कविभिर्युक्ता बृहस्पतिसमप्रभैः ॥ १३ समान तेजस्वी सत्कवि ब्राह्मण उस नगरीकी शोभा बढ़ाते थे। कल्पवृक्षसे भी बढ़कर उदार नागरिकों और वैश्यों, वणिग्जनैस्तथा पौरैः कल्पवृक्षवरैर्युता। उच्चैःश्रवाके समान श्रेष्ठ घोड़ों और दिग्गजोंके समान अश्वैरुच्चैःश्रवस्तुल्यैर्दन्तिभिर्दिग्गजैरिव ॥ १४ विशालकाय हाथियोंसे वह पुरी बड़ी शोभा पाती थी। इस प्रकार नाना वस्तुओंसे भरी-पूरी अयोध्यापुरी इन्द्रपुरी इति नानाविधैर्भावैरयोध्येन्द्रपुरीसमा । अमरावतीकी समता करती थी। पूर्वकालमें नारदजीने तां दृष्ट्वा नारदः श्लोकं सभामध्ये पुरोक्तवान् ॥ १५ उस पुरीको देखकर भरी सभामें यह श्लोक कहा था— 'स्वर्गकी सृष्टि करनेवाले विधाताका वह सारा प्रयत्न स्वर्गं वै सृजमानस्य व्यर्थं स्यात् पद्मजन्मनः । व्यर्थ हो गया; क्योंकि अयोध्यापुरी उससे भी बढ़कर जातायोध्याधिका स्वर्गात् कामभोगसमन्विता ॥ १६ मनोवाञ्छित भोगोंसे सम्पन्न हो गयी' ॥ १२–१६॥ तामावसदयोध्यां तु स्वाभिषिक्तो महीपतिः । इक्ष्वाकु इसी अयोध्यामें निवास करते थे। वे राजाके जितवान् सर्वभूपालान् धर्मेण स महाबलः ॥ १७ पदपर अभिषिक्त हो, पृथ्वीका पालन करने लगे। उन महान् बलशाली नरेशने धर्मयुद्धके द्वारा समस्त भूपालोंको माणिक्यमुकुटैर्युक्तै राजभिर्मण्डलाधिपैः । जीत लिया था। मानिकके बने मुकुटोंसे अलंकृत अनेक नमद्भिर्भक्तिभीतिभ्यां पादौ तस्य किणीकृतौ ॥ १८ छोटे-छोटे मण्डलोंके शासक राजाओंके भक्ति तथा भयपूर्वक प्रणाम करनेसे उनके दोनों चरणोंमें मुकुटोंकी इक्ष्वाकुरक्षतबलः सर्वशास्त्रविशारदः । रगड़से चिह्न बन गया था॥ १७-१८॥ तेजसेन्द्रेण सदृशो मनोः सूनुः प्रतापवान् ॥ १९ मनुपुत्र प्रतापी राजा इक्ष्वाकु अपने राजोचित तेजसे इन्द्रकी समानता करते थे। वे सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें धर्मतो न्यायतश्चैव वेदज्ञैर्ब्राह्मणैर्युतः । निपुण थे। उनका बल कभी क्षीण नहीं होता था। वे पालयामास धर्मात्मा आसमुद्रां महीमिमाम् ॥ २० धर्मात्मा भूपाल वेदवेत्ता ब्राह्मणोंके साथ धर्म और न्यायपूर्वक इस समुद्रपर्यन्त पृथिवीका पालन करते थे। अस्त्रैर्जिगाय सकलान् संयुगे भूपतीन् बली । उन बलशाली नरेशने संग्राममें अपने तीखे शस्त्रोंसे अवजित्य सुतीक्ष्णैस्तु तन्मण्डलमथाहरत् ॥ २१ समस्त भूपोंको जीतकर उनका मण्डल अपने अधिकारमें कर लिया था ॥ १९–२१ ॥ जितवान् परलोकांश्च क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । ब्रह्मन् ! प्रतापी राजा इक्ष्वाकुने प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञ दानैश्च विविधैर्ब्रह्मन् राजेक्ष्वाकुः प्रतापवान् ॥ २२ और नाना प्रकारके दान करके परलोकोंपर भी विजय प्राप्त कर ली थी। वे अपनी दोनों भुजाओंद्वारा पृथिवीका, बाहुद्वयेन वसुधां जिह्वाग्रेण सरस्वतीम् । जिह्वाके अग्रभागसे सरस्वतीका, वक्षःस्थलसे राजलक्ष्मीका बभार पद्मामुरसा भक्तिं चित्तेन माधवे ॥ २३ और हृदयसे भगवान् लक्ष्मीपतिकी भक्तिका भार वहन करते थे। एक वस्त्रपर खड़े हुए भगवान् हरिका, बैठे हुए संतिष्ठतो हरे रूपमुपविष्टं च माधवम् । शयानमप्यनन्तं तु कारयित्वा पटेऽमलम् ॥ २४

In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय २४] सूर्यवंश—राजा इक्ष्वाकुका भगवत्प्रेम; उनका भगवद्दर्शनके हेतु तपस्याके लिये प्रस्थान [पृष्ठ: ८१]


[मूल संस्कृत श्लोक एवं हिन्दी अनुवाद]

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
त्रिकालं त्रयमाराध्य रूपं विष्णोर्महात्मनः ।<br>गन्धपुष्पादिभिर्नित्यं रेमे दृष्ट्वा पटे हरिम् ॥ २५<br><br>कृष्णं तं कृष्णमेघाभं भुजगेन्द्रनिवासिनम् ।<br>पद्माक्षं पीतवासं च स्वप्नेष्वपि स दृष्टवान् ॥ २६<br><br>चकार मेघे तद्वर्णे बहुमानमतिं नृपः ।<br>पक्षपातं च तन्नाम्नि मृगे पद्मे च तादृशे ॥ २७लक्ष्मीपत्तिका और सोये हुए अनन्तदेवका निर्मल चित्र बनवाकर क्रमशः प्रातःकाल, मध्याह्नकाल और संध्याकालमें तीनों समय वे महात्मा भगवान् विष्णुके उन तीनों रूपोंका गन्ध तथा पुष्प आदिके द्वारा पूजन करते और उस पटपर प्रतिदिन भगवान् विष्णुका दर्शन करके प्रसन्न रहते थे। उन्हें स्वप्नमें भी नागराज अनन्तकी शय्यापर सोये हुए, काले मेघके समान श्यामवर्ण, कमललोचन, पीताम्बरधारी भगवान् श्रीकृष्ण (विष्णु)-का दर्शन हुआ करता था। राजाने भगवान्‌के समान श्यामवर्णवाले मेघमें अत्यन्त सम्मानपूर्ण बुद्धि कर ली थी। भगवान् श्रीकृष्णके नामसे युक्त कृष्णसार मृगमें और कृष्णवर्णवाले कमलमें वे पक्षपात रखते थे॥ २२—२७॥
दिव्याकृतिं हरेः साक्षाद् द्रष्टुं तस्य महीभृतः ।<br>अतीव तृष्णा संजाता अपूर्वैव हि सत्तम ॥ २८<br><br>तृष्णायां तु प्रवृद्धायां मनसैव हि पार्थिवः ।<br>चिन्तयामास मतिमान् राज्यभोगमसारवत् ॥ २९<br><br>वेश्मदारसुतक्षेत्रं संन्यस्तं येन दुःखदम् ।<br>वैराग्यज्ञानपूर्वेण लोकेऽस्मिन् नास्ति तत्समः ॥ ३०<br><br>इत्येवं चिन्तयित्वा तु तपस्यासक्तचेतनः ।<br>वसिष्ठं परिपप्रच्छ तत्रोपायं पुरोहितम् ॥ ३१<br><br>तपोबलेन देवेशं नारायणमजं मुने ।<br>द्रष्टुमिच्छाम्यहं तत्र उपायं तं वदस्व मे ॥ ३२साधुशिरोमणे! उस राजाके मनमें भगवान् विष्णुके दिव्य स्वरूपको प्रत्यक्ष देखनेकी अत्यन्त उत्कट अभिलाषा जागृत हुई; उनकी वह तृष्णा अपूर्व ही थी। जब उनकी तृष्णा बहुत बढ़ गयी, तब वे बुद्धिमान् भूपाल मन-ही-मन सारे राज्य-भोगको निस्सार-सा समझने लगे। उन्होंने सोचा—'जिस पुरुषने गेह, स्त्री, पुत्र और क्षेत्र आदि दुःखद भोगोंको वैराग्य और ज्ञानपूर्वक त्याग दिया है, उसके समान बड़भागी इस संसारमें कोई नहीं है।' इस प्रकार सोच-विचारकर, तपस्यामें आसक्तचित्त हो उन्होंने उसके लिये अपने पुरोहित वसिष्ठजीसे उपाय पूछा—'मुने! मैं तपस्याके बलसे देवेश्वर, अजन्मा भगवान् नारायणका दर्शन करना चाहता हूँ; इसके लिये आप मुझे कोई उत्तम उपाय बताइये'॥ २८—३२॥
इत्युक्तः प्राह राजानं तपस्यासक्तमानसम् ।<br>वसिष्ठः सर्वधर्मज्ञः सदा तस्य हिते रतः ॥ ३३<br><br>यदीच्छसि महाराज द्रष्टुं नारायणं परम् ।<br>तपसा सुकृतेनेह आराधय जनार्दनम् ॥ ३४<br><br>केनाप्यतमतपसा देवदेवो जनार्दनः ।<br>द्रष्टुं न शक्यते जातु तस्मात् तं तपसार्चय ॥ ३५<br><br>पूर्वदक्षिणदिग्भागे सरयूतीरगे नृप ।<br>गालवप्रमुखानां च ऋषीणामस्ति चाश्रमः ॥ ३६<br><br>पञ्चयोजनमध्वानं स्थानमस्मात्तु पावनम् ।<br>नानाद्रुमलताकीर्णं नानापुष्पसमाकुलम् ॥ ३७उनके इस प्रकार कहनेपर राजाके हितमें सदा लगे रहनेवाले सर्वधर्मज्ञ मुनिवर वसिष्ठजीने तपमें आसक्तचित्त उन नरेशसे कहा—'महाराज! यदि तुम परमात्मा नारायणका साक्षात्कार करना चाहते हो तो तपस्या और शुभकर्मोंके द्वारा उन भगवान् जनार्दनकी आराधना करो। कोई भी पुरुष तपस्या किये बिना देवदेव जनार्दनका दर्शन नहीं पा सकता। इसलिये तुम तपस्याके द्वारा उनका पूजन करो। यहाँसे पाँच योजन दूर सरयूके तटपर पूर्व और दक्षिण भागमें एक पवित्र स्थान है, जहाँ गालव आदि ऋषियोंका...

In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

८२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २५

८२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २५

स्वमन्त्रिणि महाप्राज्ञे नीतिमत्यर्जुने नृप। स्वराज्यभारं विन्यस्य कर्मकाण्डमपि द्विज ॥ ३८ स्तुत्वाऽऽराध्य गणाध्यक्षमितो व्रज विनायकम्। तपःसिद्ध्यर्थमन्विच्छंस्तस्मात् तत्र तपः कुरु॥ ३९ तापसं वेषमास्थाय शाकमूलफलाशनः। ध्यायन् नारायणं देवमिमं मन्त्रं सदा जप॥ ४० ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। एष सिद्धिकरो मन्त्रो द्वादशाक्षरसंज्ञितः। जप्त्वाैनं मुनयः सिद्धिं परां प्राप्ताः पुरातनाः ॥ ४१ गत्वा गत्वा निवर्तन्ते चन्द्रसूर्यादयो ग्रहाः। अद्यापि न निवर्तन्ते द्वादशाक्षरचिन्तकाः ॥ ४२ बाह्येन्द्रियं हृदि स्थाप्य मनः सूक्ष्मे परात्मनि। नृप संजप तन्मन्त्रं द्रष्टव्यो मधुसूदनः ॥ ४३ इति ते कथितोपायो हरिप्राप्तेस्तपःकृतौ। पृच्छतः साम्प्रतं भूयो यदीच्छसि कुरुष्व तत्॥ ४४

आश्रम है। वह स्थान नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे व्याप्त तथा विविध भाँतिके पुष्पोंसे परिपूर्ण है। राजन्! अपने बुद्धिमान् एवं नीतिज्ञ मन्त्री अर्जुनको राज्यका भार तथा सारा कार्य-कलाप सौंप, तत्पश्चात् गणनायक भगवान् विनायककी स्तुति एवं आराधना करके तपस्याकी सिद्धिरूप प्रयोजनकी इच्छा मनमें लेकर यहाँसे उस आश्रमकी यात्रा करो और वहाँ पहुँचकर तपस्यामें संलग्न हो जाओ। तपस्वीका वेष धारणकर, साग और फल-मूलका आहार करते हुए, भगवान् नारायणके ध्यानमें तत्पर रहकर सदा ही 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।'—इस मन्त्रका जप करो। यह 'द्वादशाक्षर'-संज्ञक मन्त्र अभीष्टको सिद्ध करनेवाला है। प्राचीन कालके ऋषियोंने इस मन्त्रका जप करके परम सिद्धि प्राप्त की है। चन्द्रमा और सूर्य आदि ग्रह जा-जाकर पुनः लौट आते हैं, परंतु द्वादशाक्षर-मन्त्रका चिन्तन करनेवाले पुरुष आजतक नहीं लौटे—भगवान्‌को पाकर आवागमनसे मुक्त हो गये। नरेश्वर! बाह्य इन्द्रियोंको हृदयमें स्थापितकर तथा मनको सूक्ष्म परात्मतत्त्वमें स्थिर करके इस मन्त्रका जप करो; इससे तुम्हें भगवान् मधुसूदनका दर्शन होगा। इस प्रकार इस समय तुम्हारे पूछनेपर मैंने तपरूप कर्मसे भगवान्‌की प्राप्तिका उपाय बतलाया; अब तुम्हारी जैसी इच्छा हो, करो'॥ ३३—४४॥


इत्येवमुक्तो मुनिना स राजा राज्यं भुवो मन्त्रिवरे समर्प्य। स्तुत्वा गणेशं सुमनोभिरर्च्य गतः पुरात् स्वात् तपसे धृतात्मा ॥ ४५ ॥

मुनिवर वसिष्ठके इस प्रकार कहनेपर वे राजा इक्ष्वाकु अपने श्रेष्ठ मन्त्रीको भूमण्डलके राज्यका भार सौंपकर, पुष्पोंद्वारा गणेशजीका पूजन तथा स्तवन करके, तपस्या करनेका दृढ़ निश्चय मनमें लेकर, अपने नगरसे चल दिये॥ ४५॥


इति श्रीनरसिंहपुराणे इक्ष्वाकुचरित्रे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'इक्ष्वाकुका चरित्र' विषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २४॥


पचीसवाँ अध्याय इक्ष्वाकुकी तपस्या और ब्रह्माजीद्वारा विष्णुप्रतिमाकी प्राप्ति

भरद्वाज उवाच कथं स्तुतो गणाध्यक्षस्तेन राज्ञा महात्मना। यथा तेन तपस्तप्तं तन्मे वद महामते ॥ १

भरद्वाजजीने पूछा— महामते! उन महात्मा राजाने किस प्रकार गणेशजीका स्तवन किया? तथा उन्होंने जिस प्रकार तपस्या की, उसका आप मुझसे वर्णन करें॥ १॥


In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय २५ ] इक्ष्वाकुकी तपस्या और ब्रह्माजीद्वारा विष्णुप्रतिमाकी प्राप्ति ८३

[सूत उवाच / श्लोक २-१३] सूत उवाच चतुर्थीदिवसे राजा स्नात्वा त्रिश्रवणं द्विज । रक्ताम्बरधरो भूत्वा रक्तगन्धानुलेपनः ॥ २ सुरक्तकुसुमैर्हृद्यैर्विनायकमथार्चयत् । रक्तचन्दनतोयेन स्नानपूर्वं यथाविधि ॥ ३ विलिप्य रक्तगन्धेन रक्तपुष्पैः प्रपूजयत् । ततोऽसौ दत्तवान् धूपमाज्ययुक्तं सचन्दनम् । नैवेद्यं चैव हारिद्रं गुडखण्डघृतप्लुतम् ॥ ४ एवं सुविधिना पूज्य विनायकमथास्तवीत् ।

इक्ष्वाकुरुवाच नमस्कृत्य महादेवं स्तोष्येऽहं तं विनायकम् ॥ ५ महागणापतिं शूरमजितं ज्ञानवर्धनम् । एकदन्तं द्विदन्तं च चतुर्दन्तं चतुर्भुजम् ॥ ६ त्र्यक्षं त्रिशूलहस्तं च रक्तनेत्रं वरप्रदम् । आम्बिकेयं शूर्पकर्णं प्रचण्डं च विनायकम् ॥ ७ आरक्तं दण्डिनं चैव वह्निवक्त्रं हुतप्रियम् । अनर्चितो विघ्नकरः सर्वकार्येषु यो नृणाम् ॥ ८ तं नमामि गणाध्यक्षं भीममुग्रमुमासुतम् । मदमत्तं विरूपाक्षं भक्तविघ्ननिवारकम् ॥ ९ सूर्यकोटिप्रतीकाशं भिन्नाञ्जनसमप्रभम् । बुद्धं सुनिर्मलं शान्तं नमस्यामि विनायकम् ॥ १० नमोऽस्तु गजवक्त्राय गणानां पतये नमः । मेरुमन्दररूपाय नमः कैलासवासिने ॥ ११ विरूपाय नमस्तेऽस्तु नमस्ते ब्रह्मचारिणे । भक्तस्तुताय देवाय नमस्तुभ्यं विनायक ॥ १२ त्वया पुराण पूर्वेषां देवानां कार्यसिद्धये । गजरूपं समास्थाय त्रासिताः सर्वदानवाः ॥ १३


[हिन्दी अनुवाद] सूतजी बोले— द्विज ! गणेश-चतुर्थीके दिन राजाने त्रिकाल स्नान करके रक्तवस्त्र धारण किया और लाल चन्दन लगाकर मनोहर लाल फूलों तथा रक्तचन्दनमिश्रित जलसे गणेशजीको स्नान कराके विधिवत् उनका पूजन किया। स्नान करानेके बाद उनके श्रीअङ्गोंमें लाल चन्दन लगाया। फिर रक्तपुष्पोंसे उनकी पूजा की। तदनन्तर उन्हें घृत और चन्दन मिला हुआ धूप निवेदन किया। अन्तमें हल्दी, घी और गुडखण्डके मेलसे तैयार किया हुआ मधुर नैवेद्य अर्पण किया। इस प्रकार सुन्दर विधिपूर्वक भगवान् विनायकका पूजन करके राजाने उनकी स्तुति आरम्भ की ॥ २—४½ ॥ इक्ष्वाकु बोले— मैं महान् देव गणेशजीको प्रणाम करके उन विघ्नराजका स्तवन करता हूँ, जो महान् देवता एवं गणोंके स्वामी हैं, शूरवीर तथा अपराजित हैं और ज्ञानवृद्धि करानेवाले हैं। जो एक, दो तथा चार दाँतोंवाले हैं, जिनकी चार भुजाएँ हैं, जो तीन नेत्रोंसे युक्त और हाथमें त्रिशूल धारण करते हैं, जिनके नेत्र रक्तवर्ण हैं, जो वर देनेवाले हैं, जो माता पार्वतीके पुत्र हैं, जिनके सूप-जैसे कान हैं, जिनका वर्ण कुछ-कुछ लाल है, जो दण्डधारी तथा अग्निमुख हैं एवं जिन्हें होम प्रिय है तथा जो प्रथम पूजित न होनेपर मनुष्योंके सभी कार्योंमें विघ्नकारी होते हैं, उन भीमकाय और उग्र स्वभाववाले पार्वतीनन्दन गणेशजीको मैं नमस्कार करता हूँ। जो मदसे मत्त रहते हैं, जिनके नेत्र भयंकर हैं और जो भक्तोंके विघ्न दूर करनेवाले हैं, करोड़ों सूर्यके समान जिनकी कान्ति है, खानसे काटकर निकाले हुए कोयलेकी भाँति जिनकी श्याम प्रभा है तथा जो विमल और शान्त हैं, उन भगवान् विनायकको मैं नमस्कार करता हूँ। मेरुगिरिके समान रूप और हाथीके मुख-सदृश मुखवाले, कैलासवासी गणपतिको नमस्कार है। विनायक देव ! आप विरूपधारी और ब्रह्मचारी हैं, भक्तजन आपकी स्तुति करते हैं, आपको बारंबार नमस्कार है ॥ ५—१२ ॥ पुराणपुरुष ! आपने पूर्ववर्ती देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये हाथीका स्वरूप धारण करके समस्त दानवोंको


In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

८४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २५

८४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २५

ऋषीणां देवतानां च नायकत्वं प्रकाशितम्। यतस्ततः सुरैरग्रे पूज्यसे त्वं भवात्मज ॥ १४

त्वामाराध्य गणाध्यक्षं सर्वज्ञं कामरूपिणम्। कार्यार्थं रक्तकुसुमै रक्तचन्दनवारिभिः ॥ १५

रक्ताम्बरधरो भूत्वा चतुर्थ्यामर्चयेज्जपेत्। त्रिकालमेककालं वा पूजयेन्नियताशनः ॥ १६

राजानं राजपुत्रं वा राजमन्त्रिणमेव वा। राज्यं च सर्वविघ्नेश वशं कुर्यात् सराष्ट्रकम् ॥ १७

अविघ्नं तपसो मह्यं कुरु नौमि विनायक। मयेत्थं संस्तुतो भक्त्या पूजितश्च विशेषतः ॥ १८

यत्फलं सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु यत्फलम्। तत्फलं पूर्णमाप्नोति स्तुत्वा देवं विनायकम् ॥ १९

विषमं न भवेत् तस्य न च गच्छेत् पराभवम्। न च विघ्नो भवेत् तस्य जातो जातिस्मरो भवेत् ॥ २०

य इदं पठते स्तोत्रं षड्भिर्मासैर्वरं लभेत्। संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः ॥ २१

भयभीत किया था। शिवपुत्र ! आपने ऋषि और देवताओंपर अपना स्वामित्व प्रकट कर दिया है, इसीसे देवगण आपकी प्रथम पूजा करते हैं। सर्वविघ्नेश्वर ! यदि मनुष्य रक्तवस्त्र धारणकर नियमित आहार करके अपने कार्यकी सिद्धिके लिये लाल पुष्पों और रक्तचन्दन-युक्त जलसे चतुर्थीके दिन तीनों काल या एक कालमें आप कामरूपी सर्वज्ञ गणपतिको पूजन करे तथा आपका नाम जपे तो वह पुरुष राजा, राजकुमार, राजमन्त्रीको राज्य अथवा समस्त राष्ट्रसहित अपने वशमें कर सकता है ॥ १३-१७ ॥

विनायक! मैं आपकी स्तुति करता हूँ। आप मेरे द्वारा भक्तिपूर्वक स्तवन एवं विशेषरूपसे पूजन किये जानेपर मेरी तपस्याके विघ्नको दूर कर दें। सम्पूर्ण तीर्थों और समस्त यज्ञोंमें जो फल प्राप्त होता है, उसी फलको मनुष्य भगवान् विनायकका स्तवन करके पूर्णरूपसे प्राप्त कर लेता है। उसपर कभी संकट नहीं आता, उसका कभी तिरस्कार नहीं होता और न उसके कार्यमें विघ्न ही पड़ता है; वह जन्म लेनेके बाद पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण करनेवाला होता है। जो प्रतिदिन इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह छः महीनोंतक निरन्तर पाठ करनेसे गणेशजीसे मनोवाञ्छित वर प्राप्त करता है और एक वर्षमें पूर्णतः सिद्धि प्राप्त कर लेता है—इसमें तनिक भी संशय नहीं है ॥ १८-२१ ॥

सूत उवाच

एवं स्तुत्वा पुरा राजा गणाध्यक्षं द्विजोत्तम। तापसं वेषमास्थाय तपश्चर्तुं गतो वनम् ॥ २२

उत्सृज्य वस्त्रं नागत्वक्सदृशं बहुमूल्यकम्। कठिनां तु त्वचं वार्क्षीं कट्यां धत्ते नृपोत्तमः ॥ २३

तथा रत्नानि दिव्यानि वलयानि निरस्य तु। अक्षसूत्रमलंकारं फलैः पद्मस्य शोभनम् ॥ २४

तथोत्तमाङ्गे मुकुटं रत्नहाटकशोभितम्। त्यक्त्वा जटाकलापं तु तपोऽर्थे बिभृयान्नृपः ॥ २५

कृत्वेत्थं स तपोवेषं वसिष्ठोक्तं तपोवनम्। प्रविश्य च तपस्तेपे शाकमूलफलाशनः ॥ २६

सूतजी बोले— द्विजोत्तमगण ! इस प्रकार राजा इक्ष्वाकु पहले गणेशजीका स्तवन करके, फिर तपस्वीका वेष धारणकर तप करनेके लिये वनमें चले गये। साँपकी त्वचाके समान मुलायम एवं बहुमूल्य वस्त्र त्यागकर वे श्रेष्ठ महाराज कमरमें वृक्षोंकी कठोर छाल पहनने लगे। दिव्य रत्नोंके हार और कड़े निकालकर हाथमें अक्षसूत्र तथा गलेमें कमलगट्टोंकी बनी हुई सुन्दर माला धारण करने लगे। इसी प्रकार वे नरेश मस्तकपरसे रत्न तथा सुवर्णसे सुशोभित मुकुट हटाकर वहाँ तपस्याके लिये जटाजूट रखने लगे ॥ २२-२५ ॥

इस प्रकार वसिष्ठजीके कथनानुसार तापस-वेष धारणकर तपोवनमें प्रविष्ट हो, वे शाक और फल-मूलका आहार करते हुए तपस्यामें प्रवृत्त हो गये।

अध्याय २५ ] इक्ष्वाकुकी तपस्या और ब्रह्माजीद्वारा विष्णुप्रतिमाकी प्राप्ति ८५ ग्रीष्मे पञ्चाग्निमध्यस्थोऽतपत्काले महातपाः। महातपस्वी राजा इक्ष्वाकु ग्रीष्म ऋतुमें पञ्चाग्निके बीच वर्षाकाले निरालम्बो हेमन्ते च सरोजले ॥ २७ स्थित होकर तपस्या करते थे, वर्षाके समय खुले मैदानमें रहते और शीतकालमें सरोवरके जलमें खड़े इन्द्रियाणि समस्तानि नियम्य हृदये पुनः। होकर तप करते थे। इस प्रकार समस्त इन्द्रियोंको मनो विष्णौ समावेश्य मन्त्रं वै द्वादशाक्षरम् ॥ २८ मनमें निरुद्ध करके, मनको भगवान् विष्णुमें लीन कर द्वादशाक्षर-मन्त्रका जप करते और वायु पीकर रहते हुए जपतो वायुभक्ष्यस्य तस्य राज्ञो महात्मनः। उन महात्मा राजाके समक्ष लोक-पितामह भगवान् ब्रह्माजी आविर्बभूव भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः॥ २९ प्रकट हुए। उन चार मुखोंवाले पद्मयोनि ब्रह्माजीको आया देख राजाने उन्हें भक्तिभावसे प्रणाम एवं उनकी तमागतमथालोक्य पद्मयोनिं चतुर्मुखम्। स्तुति करके संतुष्ट किया ॥ २६-३०॥ प्रणम्य भक्तिभावेन स्तुत्या च पर्यतोषयत्॥ ३० ( राजा बोले— ) 'संसारकी सृष्टि करनेवाले तथा नमो हिरण्यगर्भाय जगत्स्रष्ट्रे महात्मने। वेद-शास्त्रोंके मर्मज्ञ, चार मुखोंवाले महात्मा हिरण्यगर्भ वेदशास्त्रार्थविदुषे चतुर्वक्त्राय ते नमः ॥ ३१ ब्रह्माजीको नमस्कार है।' इस प्रकार स्तुति की जानेपर जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीने राज्य त्यागकर तपस्यामें लगे हुए इति स्तुतो जगत्स्रष्टा ब्रह्मा प्राह नृपोत्तमम्। उन शान्त एवं महान् सुखी श्रेष्ठ नरेशसे कहा ॥ ३११/२ ॥ तपस्यभिरतं शान्तं त्यक्तराज्यं महासुखम्। ब्रह्माजी बोले— राजन् ! समस्त विश्वको प्रकाशित ब्रह्मोवाच करनेवाले तुम्हारे पितामह सूर्य तथा पिता मनु भी सदा लोकप्रकाशको राजन् सूर्यस्तव पितामहः॥ ३२ ही सभी मुनियोंके मान्य हैं। तुम्हारे पिता और पितामहने भी पूर्वकालमें तीव्र तपस्या की थी। (उन्हींके समान मुनीनामपि सर्वेषां सदा मान्यो मनुः पिता। आज तुम भी तप कर रहे हो।) महामते नृपश्रेष्ठ ! सारा कृतवन्तौ तपः पूर्वं तीव्रं पितृपितामहौ ॥ ३३ राज्य-भोग छोड़कर किसलिये यह घोर तप कर रहे हो ? इसका कारण बताओ ॥ ३२-३४॥ किमर्थं राज्यभोगं तु त्यक्त्वा सर्वं नृपोत्तम। तपः करोषि घोरं त्वं समाचक्ष्व महामते ॥ ३४ ब्रह्माजीके इस प्रकार पूछनेपर राजाने उनको प्रणाम करके कहा— 'ब्रह्मन्! मैं तपोबलसे शङ्ख, चक्र और इत्युक्तो ब्रह्मणा राजा तं प्रणम्याब्रवीद्वचः। गदा धारण करनेवाले भगवान् मधुसूदनका प्रत्यक्ष दर्शन द्रष्टुमिच्छंस्तपश्चर्याबलेन मधुसूदनम् ॥ ३५ करनेकी इच्छा लेकर ही ऐसा तप कर रहा हूँ।' राजाके यों कहनेपर कमलजन्मा ब्रह्माजीने हँसते हुए-से उनसे करोम्येवं तपो ब्रह्मन् शङ्खचक्रगदाधरम्। कहा ॥ ३५-३६ ॥ इत्युक्तः प्राह राजानं पद्मजन्मा हसन्निव ॥ ३६ "राजन् ! सर्वत्र व्यापक भगवान् नारायणका दर्शन न शक्यस्तपसा द्रष्टुं त्वया नारायणो विभुः। तुम केवल तपस्यासे नहीं कर सकोगे। (औरोंकी तो मादृशैरपि नो दृश्यः केशवः क्लेशनाशनः॥ ३७ बात ही क्या है,) हमारे-जैसे लोगोंको भी क्लेशनाशन भगवान् केशवका दर्शन नहीं हो पाता। महामते ! मैं तुम्हें पुरातनीं पुण्यकथां कथयामि निबोध मे। एक पुरातन पवित्र कथा सुनाता हूँ, सुनो— 'प्रलयकी निशान्ते प्रलये लोकान् निनीय कमलेक्षणः ॥ ३८ रातमें कमललोचन भगवान् विष्णुने समस्त लोकोंको In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

८६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २५

८६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २५ अनन्तभोगशयने योगनिद्रां गतो हरिः। अपनेमें लीन कर लिया और सनन्दन आदि मुनियोंसे सनन्दनाद्यैर्मुनिभिः स्तूयमानो महामते॥ ३९ अपनी स्तुति सुनते हुए वे 'अनन्त' नामक शेषनागकी शय्यापर योगनिद्राका आश्रय ले सो गये। राजन्! उन तस्य सुप्तस्य नाभौ तु महत्पद्ममजायत। सोये हुए भगवान्‌की नाभिसे प्रकाशमान एक बहुत बड़ा तस्मिन् पद्मे शुभे राजन् जातोऽहं वेदवित् पुरा॥ ४० कमल उत्पन्न हुआ। पूर्वकालमें उस प्रकाशमान कमलपर सर्वप्रथम मुझ वेदवेत्ता ब्रह्माका ही आविर्भाव हुआ। तत्पश्चात् ततो भूत्वा त्वधोदृष्टिर्दृष्टवान् कमलेक्षणम्। नीचेकी ओर दृष्टि करके मैंने खानसे काटकर निकाले हुए अनन्तभोगपर्यङ्के भिन्नाञ्जननिभं हरिम्॥ ४१ कोयलेके समान श्यामवर्णवाले भगवान् विष्णुको शेषनागकी शय्यापर सोते देखा। उनके श्रीअङ्गोंकी कान्ति अलसीके अतसीकुसुमाभासं शयानं पीतवाससम्। फूलकी भाँति सुन्दर जान पड़ती थी, दिव्य रत्नोंके आभरणोंसे दिव्यरत्नविचित्राङ्गं मुकुटेन विराजितम्॥ ४२ उनके श्रीविग्रहकी विचित्र शोभा हो रही थी और उनका मस्तक मुकुटसे शोभायमान था॥ ३७-४२॥ कुन्देन्दुसदृशाकारमनन्तं च महामते। 'महामते! उस समय मैंने उन अनन्तदेव शेषनागका सहस्रफणमध्यस्थैर्मणिभिर्दीप्तिमत्तरम् ॥४३ भी दर्शन किया, जिनका आकार कुन्द और चन्द्रमाके समान श्वेत था तथा जो हजारों फणोंकी मणियोंसे क्षणमात्रं तु तं दृष्ट्वा पुनस्तत्र न दृष्टवान्। अत्यन्त देदीप्यमान हो रहे थे। नृपश्रेष्ठ! क्षणभर ही वहाँ दुःखेन महताऽऽविष्टो बभूवाहं नृपोत्तम॥ ४४ उन्हें देखकर मैं फिर उनका दर्शन न पा सका, इससे अत्यन्त दुःखी हो गया। तब मैं कौतूहलवश निरामय ततो न्ववातरं तस्मात् पद्मनालं समाश्रितः। भगवान् नारायणका दर्शन करनेके लिये कमलनालका कौतूहलेन तं द्रष्टुं नारायणमनामयम्॥ ४५ सहारा ले वहाँसे नीचे उतरा; परंतु राजेन्द्र! उस समय जलके भीतर बहुत खोजनेपर भी मैं उन लक्ष्मीपतिका ततस्त्वन्विष्य राजेन्द्र सलिलान्ते न दृष्टवान्। पुन: दर्शन न पा सका। तब मैं फिर उसी कमलका श्रीशं पुनस्तमेवाहं पद्माश्चित्य चिन्तयन्॥ ४६ आश्रय ले वासुदेवके उसी रूपका चिन्तन करता हुआ उनके दर्शनके लिये बड़ी भारी तपस्या करने लगा। तद्रूपं वासुदेवस्य द्रष्टुं तेपे महत्तपः। तत्पश्चात् अन्तरिक्षके भीतरसे किसी अव्यक्त शरीरवाली ततो मामन्तरिक्षस्था वागुवाचाशरीरिणी॥ ४७ वाणीने मुझसे कहा॥ ४३-४७॥ वृथा किं क्लिश्यते ब्रह्मन् साम्प्रतं कुरु मे वचः। "ब्रह्मन्! क्यों व्यर्थ क्लेश उठा रहे हो? इस समय न दृश्यो भगवान् विष्णुस्तपसा महतापि ते॥ ४८ मेरी बात मानो। बहुत बड़ी तपस्यासे भी तुम्हें भगवान् विष्णुका दर्शन नहीं हो सकेगा। यदि यहाँ शुद्ध स्फटिक- सृष्टिं कुरु तदाज्ञप्तो यदि द्रष्टुमिहेच्छसि। मणिके समान श्वेत नाग-शय्यापर शयन करनेवाले भगवान् शुद्धस्फटिकसंकाशनागपर्यङ्कशायिनम् ॥४९ विष्णुका दर्शन करना चाहते हो तो उनके आज्ञानुसार सृष्टि करो। महामते! तुमने 'शार्ङ्ग' धनुष धारण करनेवाले उन यद्दृष्टं शार्ङ्गिणो रूपं भिन्नाञ्जनसमप्रभम्। भगवान्‌का, जो अञ्जन-पुञ्जके समान श्याम सुषमासे युक्त प्रतिभानियतं रूपं विमानस्थं महामते॥ ५० तथा स्वभावतः प्रतिभाशालीरूप विमान (शेषशय्या) - पर स्थित देखा है, उसीका आलस्यरहित होकर भजन-ध्यान भज नित्यमनालस्यस्ततो द्रक्ष्यसि माधवम्। करो, तब उन माधवको देख सकोगे॥ ४८-५०½ ॥ तयेत्थं चोदितो राजंस्त्यक्त्वा तममनुक्षणम्॥ ५१ "राजन्! उस आकाशवाणीद्वारा इस प्रकार प्रेरित हो मैंने निरन्तर की जानेवाली तीव्र तपस्याका अनुष्ठान In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय २५ ] इक्ष्वाकुकी तपस्या और ब्रह्माजीद्वारा विष्णुपतिमाकी प्राप्ति ८७ सृष्टवान् लोकभूतानां सृष्टिं सृष्ट्वा स्थितस्य च। त्यागकर इस जगत्के प्राणियोंकी सृष्टि की। सृष्टि करके आविर्बभूव मनसि विश्वकर्मा प्रजापतिः॥५२ स्थित होनेपर मेरे हृदयमें प्रजापति विश्वकर्माका प्राकट्य हुआ। उन्होंने 'अनन्त' नामक शेषनाग और भगवान् अनन्तकृष्णयोस्तेन द्वे रूपे निर्मिते शुभे। विष्णुकी दो चमकीली प्रतिमाएँ बनायीं। नरेश्वर ! मैंने विमानस्थो यथापूर्वं मया दृष्टो जले नृप॥ ५३ पहले जलके भीतर शेष-शय्यापर जिस रूपमें देख चुका था, उसी रूपमें भगवान् श्रीहरिकी वह प्रतिमा बनायी तथैव तं ततो भक्त्या सम्पूज्याहं हरिं स्थितः। गयी थी। तब मैं उन श्रीहरिके उस श्रीविग्रहकी भक्तिपूर्वक तत्प्रसादात्तपः श्रेष्ठं मया ज्ञानमनुत्तमम् ॥ ५४ पूजा करके और उन्हींके प्रसादसे श्रेष्ठ तपरूप परम उत्तम ज्ञान प्राप्त करके विकाररहित नित्यानन्दमय मोक्ष- लब्ध्वा मुक्तिं च पश्यामि अविकारक्रियासुखम्। सुखका अनुभव करने लगा॥ ५१-५४ १/२ ॥ तदहं ते प्रवक्ष्यामि हितं नृपवरेश्वर ॥ ५५ "राजराजेश्वर ! इस समय मैं तुम्हारे हितकी बात बता रहा हूँ, सुनो-राजन् ! इस घोर तपस्याको छोड़कर अब विसृज्यैतत्तपो घोरं पुरीं व्रज निजां नृप। अपनी पुरीको लौट जाओ। प्रजाओंका पालन करना ही प्रजानां पालनं धर्मस्तपश्चैव महीभृताम् ॥ ५६ राजाओंका धर्म तथा तप है। मैं सिद्धों और ब्राह्मणोंसहित उस विमानको, जिसपर भगवान्की प्रतिमा है, तुम्हारे विमानं प्रेषयिष्यामि सिद्धद्विजगणान्वितम्। पास भेजूँगा। उसीमें तुम सुन्दर बाह्य उपचारोंद्वारा उन तत्राराध्य देवेशं बाह्यार्थैरखिलैः शुभैः ॥ ५७ देवेश्वरकी आराधना करो। नृपश्रेष्ठ ! तुम यज्ञोंद्वारा 'अनन्त' नामक शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले भगवान् नारायणमनन्ताख्ये शयानं क्रतुभिर्यजन्। नारायणका निष्कामभावसे यज्ञोंद्वारा आराधन करते हुए निष्कामो नृपशार्दूल प्रजा धर्मेण पालय ॥ ५८ धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करो। नृप ! भगवान् वासुदेवकी कृपासे अवश्य ही तुम्हारी मुक्ति हो जायगी।" राजासे प्रसादाद्वासुदेवस्य मुक्तिस्ते भविता नृप। यों कहकर लोकपितामह ब्रह्माजी अपने धामको चले इत्युक्त्वा तं जगामाथ ब्रह्मलोकं पितामहः ॥ ५९ गये॥ ५५-५९ ॥ द्विज ! ब्रह्माजीके चले जानेपर राजा इक्ष्वाकु उनकी इक्ष्वाकुश्चिन्तयन्नास्ते पद्मयोनिवचो द्विज। बातोंपर विचार ही कर रहे थे, तबतक उनके समक्ष आविर्बभूव पुरतो विमानं तन्महीभृतः ॥ ६० वह विष्णु और अनन्तकी प्रतिमाओंका शुभ विमान, जिसे ब्रह्माजीने दिया था, सिद्ध ब्राह्मणोंसहित प्रकट हो ब्रह्मदत्तं द्विजयुतं माधवानन्तयोः शुभम्। गया। उन भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन करके उन्होंने तं दृष्ट्वा परया भक्त्या नत्वा च पुरुषोत्तमम् ॥ ६१ बड़ी भक्तिके साथ उन्हें प्रणाम किया तथा साथमें आये हुए ऋषियों एवं ब्राह्मणोंको भी नमस्कार करके ऋषीन् प्रणम्य विप्रांश्च तदादा ययौ पुरीम्। वे उस विमानको लेकर अपनी पुरीको गये। वहाँ पौरैर्जनैश्च नारीभिर्दृष्टः शोभासमन्वितैः ॥ ६२ नगरके सभी शोभायमान स्त्री-पुरुषोंने राजाका दर्शन किया और लावा छींटते हुए वे उन्हें राजभवनमें ले लाजा विनिक्षिपद्भिश्च नीतो राजा स्वकं गृहम्। गये। राजाने अपने विशाल मन्दिरमें उस सुन्दर वैष्णव- स्वमन्दिरे विशाले तु विमानं वैष्णवं शुभम् ॥ ६३ विमानको स्थापित किया और साथ आये हुए उन In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

८८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २५

८८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २५ संस्थाप्याराधयामास तैर्द्विजैरर्चितं हरिम्। महिष्यः शोभना यास्तु पिष्ट्वा तु हरिचन्दनम् ॥ ६४ मालां कृत्वा सुगन्धाढ्यां प्रीतस्तस्य ववर्ध ह। पौराः कर्पूरश्रीखण्डं कुङ्कुमाद्यगुरुं तथा ॥ ६५ कृत्स्नं विशेषतो वस्त्रं महिषाख्यं च गुग्गुलम्। पुष्पाणि विष्णुयोग्यानि ददुरानीय भूपतेः ॥ ६६ विमानस्थं हरिं पूज्य गन्धपुष्पादिभिः क्रमात्। त्रिसन्ध्यं परया भक्त्या जपैः स्तोत्रैश्च वैष्णवैः ॥ ६७ गीतैः कोलाहलैः शब्दैः शङ्खवादित्रनादितैः। प्रेक्षणैरपि शास्त्रोक्तैः प्रीतैश्च निशिजागरैः ॥ ६८ कारयामास सुचिरमुत्सवं परमं हरेः। यागैश्च तोषयित्वा तं सर्वदेवमयं हरिम् ॥ ६९ निष्कामो दानधर्मैश्च परं ज्ञानमवाप्तवान्। यजन् यज्ञं महीं रक्षन् स कुर्वन् केशवर्चनम् ॥ ७० उत्पाद्य पुत्रान् पित्रर्थं ध्यानात्त्यक्त्वा कलेवरम्। ध्यायन् वै केवलं ब्रह्म प्राप्तवान् वैष्णवं पदम् ॥ ७१ अजं विशोकं विमलं विशुद्धं शान्तं सदानन्दचिदात्मकं ततः। विहाय संसारमनन्तदुःखं जगाम तद्विष्णुपदं हि राजा ॥ ७२ ब्राह्मणोंद्वारा पूजित भगवान् विष्णुकी वे आराधना करने लगे। उनकी सुन्दरी रानियाँ चन्दन घिसकर और सुगन्धित फूलोंका हार गूँथकर अर्पण करती थीं, इससे राजाको बड़ी प्रसन्नता होती थी। इसी प्रकार नगर- निवासी जन कपूर, श्रीखण्ड, कुङ्कुम, अगुरु आदि सभी उपचार और विशेषतः वस्त्र, गुग्गुल तथा श्रीविष्णुके योग्य पुष्प ला-लाकर राजाको अर्पित करते थे ॥ ६०-६६ ॥ राजा तीनों संध्याओंमें विमानपर विराजमान भगवान् श्रीहरिकी क्रमशः गन्ध-पुष्प आदि उपचारोंद्वारा बड़ी भक्तिसे पूजा करते थे। श्रीविष्णुके नामोंका जप, उनके स्तोत्रोंका पाठ, उनके गुणोंका गान और शङ्ख आदि वाद्योंका शब्द करते-कराते थे। शास्त्रोक्त विधिसे प्रेमपूर्वक सजायी हुई भगवान्‌की झाँकियों तथा रात्रिमें जागरण आदिके द्वारा वे सदा ही देरतक भगवत्सम्बन्धी उत्सव कराया करते थे। निष्कामभावसे किये गये यज्ञ, दान तथा धर्माचरणोंद्वारा उन सर्वदेवमय भगवान् विष्णुको सन्तुष्ट करके राजाने परम उत्तम ज्ञान प्राप्त कर लिया। यज्ञोंका अनुष्ठान, पृथ्वीका पालन और भगवान् केशवका पूजन करते हुए राजाने पितृगणोंकी तृप्तिके निमित्त श्राद्ध आदि कर्म करनेके लिये पुत्रोंको उत्पन्न किया और केवल ब्रह्मका चिन्तन करते हुए ध्यानके द्वारा ही शरीरका त्यागकर भगवान् विष्णुके धामको प्राप्त कर लिया। इस प्रकार राजा इक्ष्वाकु अनन्त दुःखोंसे पूर्ण संसारका त्याग करके अज, अशोक, अमल, विशुद्ध, शान्त एवं सच्चिदानन्दमय विष्णुपदको प्राप्त हो गये ॥ ६७-७२ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे इक्ष्वाकुचरिते पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणके अन्तर्गत 'इक्ष्वाकुचरित्र' विषयक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५ ॥ । In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

छब्बीसवाँ अध्याय

अध्याय २६ ] इक्ष्वाकुकी संततिका वर्णन ८९ छब्बीसवाँ अध्याय इक्ष्वाकुकी संततिका वर्णन श्रीसूत उवाच श्रीसूतजी बोले—इक्ष्वाकुके ज्येष्ठ पुत्रका नाम था विकुक्षि। वह अपने पिताके मुक्त हो जानेपर महर्षियोंद्वारा इक्ष्वाकोर्विकुक्षिनामपुत्रः। स तु सिद्धे पितरि राज्यपदपर अभिषिक्त हुआ और धर्मपूर्वक पृथ्वीका महर्षिभिरभिषिक्तो धर्मेण पृथिवीं पालयन् पालन करने लगा। राजा विकुक्षिने विमानपर विराजमान विमानस्थमनन्तभोगशायिनमच्युतमाराध्य यागैरपि शेषशायी भगवान् विष्णुकी आराधना करते हुए अनेक देवानिष्ट्वा स्वपुत्रं राज्ये सुबाहुमभिषिच्य दिवमारुरोह। यज्ञोंद्वारा देवताओंका भी यजन किया। अन्तमें वे अपने सुबाहोर्भ्राजमानादुद्योतोऽभिगीयते। स तु सप्तद्वीपां पुत्र सुबाहुको राज्यपर अभिषिक्तकर स्वयं स्वर्गगामी हो पृथ्वीं धर्मेण पालयित्वा भक्तिं परां नारायणे गये। अब तेजस्वी राजा सुबाहुके पुत्र उद्योतका यशोगान पितामहवत् कृत्वा ऋतुभिर्भूरिदक्षिणैर्यज्ञेश्वरं किया जाता है। उद्योतने सातों द्वीपोंवाली पृथ्वीका निष्कामेन मनसेष्ट्वा नित्यं निरञ्जनं निर्विकल्पं परं धर्मपूर्वक पालन किया। उन्होंने अपने पितामह राजा ज्योतिरमृताक्षरं परमात्मरूपं ध्यात्वा हरिमन्तं च इक्ष्वाकुकी ही भाँति भगवान् नारायणमें पराभक्ति करके परमाराध्य स्वर्गलोकं गतः ॥ १ ॥ प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा यज्ञपति विष्णुका निष्कामभावसे यजन किया तथा नित्य, निरञ्जन, निर्विकल्प, अमृत, अक्षर, परम, ज्योतिर्मय परमात्मरूपका चिन्तन करते हुए श्रीविष्णु और अनन्तकी आराधना करके वे परमधामको प्राप्त हुए ॥ १ ॥ तस्य युवनाश्वो युवनाश्वस्य च मांधाता उनके पुत्र युवनाश्व हुए, युवनाश्वके पुत्र मांधाता। पुत्रोऽभवत् । स चाभिषिक्तो महर्षिभिर्निसर्गादेव मांधाता स्वभावसे ही भगवान् विष्णुके भक्त थे। विष्णुभक्तोऽनन्तशयनमच्युतं भक्त्याऽऽराध्यन् महर्षियोंने जब उनका राज्याभिषेक कर दिया, तब यागैश्च विविधैरिष्ट्वा सप्तद्वीपवतीं पृथिवीं परिपाल्य शेषशायी भगवान् विष्णुकी भक्तिपूर्वक आराधना तथा दिवं गतः ॥ २ ॥ विविध यज्ञोंद्वारा यजन करते हुए उन्होंने सातों द्वीपोंसे युक्त पृथ्वीका पालन किया और अन्तमें उनका वैकुण्ठवास हुआ ॥ २ ॥ यस्यैष श्लोको गीयते। मांधाताके ही विषयमें यह श्लोक अबतक गाया जाता है— यावत्सूर्य उदेति स्म यावच्च प्रतितिष्ठति। 'जहाँसे सूर्य उदय होता और जहाँतक जाकर अस्त सर्वं तद्यौवनाश्वस्य मांधातुः क्षेत्रमुच्यते ॥ ३ ॥ होता है, वह सब युवनाश्वके पुत्र मांधाताका ही क्षेत्र कहलाता है' ॥ ३ ॥ मांधाताका पुत्र पुरुकुश्य (या पुरुकुत्स) हुआ, तस्य पुरुकुश्योऽभवद् येन देवा ब्राह्मणाश्च जिसने यज्ञ और दानके द्वारा देवताओं तथा यागदानैः संतुष्टाः ॥ ४ ॥ पुरुकुश्याद् दृषदो ब्राह्मणोंको संतुष्ट किया था। पुरुकुश्यसे दृषद और

९० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २६

९० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २६ हृषददादभिशम्भुः। अभिशम्भोर्दारुणो दारुणात्सगरः ॥ ५ ॥ सगराद्धर्यश्वो हर्यश्वाद्धारीतो हारीताद्रोहिताश्वः। रोहिताश्वादंशुमान् ॥ ६ ॥ अंशुमतो भगीरथः। येन महता तपसा पुरा दिवो गङ्गा अशेषकल्मषनाशिनी चतुर्विधपुरुषार्थदायिनी भुवमानीता। अस्थिशर्कराभूताः कपिलमहर्षि- निर्दग्धाश्च गुरवः सगराख्या गङ्गातोयसंस्पृष्टा दिवमारोपिताः। भगीरथात् सौदासः सौदासात् सत्रसवः ॥ ७॥ सत्रसवा- दनरण्योऽनरण्यद्दीर्घबाहुः ॥ ८ ॥ दीर्घबाहो- रजोऽजाद्दशरथः। तस्य गृहे रावणविनाशार्थं साक्षान्नारायणोऽवतीर्णो रामः ॥ ९ ॥ स तु पितृवचनाद् भ्रातृभार्यासहितो दण्डकारण्यं प्राप्य तपश्चचार। वने रावणापहृतभार्यो भ्रात्रा सह दुःखितोऽनेककोटिवानरनायकसुग्रीवसहायो महोदधौ सेतुं निबध्य तैरंगत्वा लङ्कां रावणं देवकण्टकं सबान्धवं हत्वा सीतामादाय पुनरयोध्यां प्राप्य भरताभिषिक्तो विभीषणाय लङ्काराज्यं विमानं वा दत्त्वा तं प्रेषयामास। स तु परमेश्वरो विमानस्थो विभीषणेन नीयमानो लङ्कायामपि राक्षसपुर्यां वस्तुमनिच्छन् पुण्यारण्यं तत्र स्थापितवान् ॥ १० ॥ तन्निरीक्ष्य तत्रैव महाहिभोगशयने भगवान् शेते। सोऽपि विभीषणस्ततस्तद्विमानं नेतुमसमर्थः, तद्वचनात् स्वां पुरीं जगाम ॥ ११॥ नारायणसंनिधानान्महद्वैष्णवं क्षेत्रमभवदद्यापि दृश्यते। रामाल्लवो लवात्पद्मः पद्मादृतुपर्ण दृषदसे अभिशम्भु हुआ। अभिशम्भुसे दारुण और दारुणसे सगरका जन्म हुआ। सगरसे हर्यश्व, हर्यश्वसे हारीत, हारीतसे रोहिताश्व, रोहिताश्वसे अंशुमान् और अंशुमान्‌से भगीरथ हुए, जो पूर्वकालमें बहुत बड़ी तपस्या करके समस्त पापोंका नाश करनेवाली और चारों पुरुषार्थोंको देनेवाली गङ्गाको आकाशसे पृथ्वीपर ले आये। उन्होंने गङ्गाजलके स्पर्शसे अपने 'सगर' संज्ञक पितरोंको, जो महर्षि कपिलके शापसे दग्ध होकर अस्थि-भस्ममात्र शेष रह गये थे, स्वर्गलोकको पहुँचा दिया। भगीरथसे सौदास और सौदाससे सत्रसवका जन्म हुआ। सत्रसवसे अनरण्य और अनरण्यसे दीर्घबाहु हुआ। दीर्घबाहुसे अज तथा अजसे दशरथ हुए। इनके घरमें साक्षात् भगवान् नारायण रावणका नाश करनेके लिये 'राम' रूपमें अवतीर्ण हुए थे ॥ ४-९॥ राम अपने पिताके कहनेसे छोटे भाई लक्ष्मण तथा पत्नीसहित दण्डकारण्यमें जाकर तपस्या करने लगे। उस वनमें रावणने इनकी पत्नी सीताका अपहरण कर लिया। इससे दुःखी होकर वे अपने भाई लक्ष्मणको साथ लेकर अनेक करोड़ वानर-सेनाके अधिपति सुग्रीवको सहायक बनाकर चले और महासागरमें पुल बाँधकर उन सबके साथ लङ्कामें जा पहुँचे। वहाँ देवताओंके मार्गका काँटा बने हुए रावणको उसके बन्धु-बान्धवोंसहित मारकर सीताको साथ ले पुनः अयोध्यामें लौट आये। अयोध्यामें भरतजीने उनका 'राजा' के पदपर अभिषेक किया। श्रीरामने विभीषणको लङ्काका राज्य तथा (विष्णुप्रतिमायुक्त) विमान देकर अयोध्यासे विदा किया। विमानपर विराजमान परमेश्वर विष्णु विभीषणद्वारा ले जाये जानेपर भी राक्षसपुरी लङ्कामें निवास करना नहीं चाहते थे, अतः विभीषणने वहाँ जिस पवित्र वनकी स्थापना की थी, उसको देखकर वे उसीमें स्थित हो गये। वहाँ महान् सर्प-शरीरकी शय्यापर भगवान् शयन करते हैं। विभीषण भी जब वहाँसे उस विमानको ले जानेमें असमर्थ हो गये, तब भगवान्‌के ही कहनेसे वे उन्हें वहीं छोड़ अपनी पुरी लङ्काको चले गये ॥ १०-११॥ भगवान् नारायणकी उपस्थितिसे वह स्थान महान् वैष्णवतीर्थ हो गया, जो आज भी श्रीरङ्गक्षेत्रके नामसे प्रसिद्ध देखा जाता है। रामसे लव, लवसे पद्म, पद्मसे

अध्याय २७ ] चन्द्रवंशका वर्णन ९१

ऋतुपर्णादस्त्रपाणिः। अस्त्रपाणेः शुद्धोदनः। ऋतुपर्ण, ऋतुपर्णसे अस्त्रपाणि, अस्त्रपाणिसे शुद्धोदन शुद्धोदनाद्बुधः। बुधाद्वंशो निवर्तते ॥ १२ ॥ और शुद्धोदनसे बुध (बुद्ध)-की उत्पत्ति हुई; बुधसे इस वंशकी समाप्ति हो जाती है ॥ १२ ॥ एते महीपा रविवंशजास्तव मैंने यहाँ आपके समक्ष पूर्ववर्ती उन प्रधान-प्रधान प्राधान्यतस्ते कथिता महाबलाः। महाबली सूर्यवंशी राजाओंका नामोल्लेख किया है, पुरातनैर्येर्वसुधा प्रपालिता जिन्होंने धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन और यज्ञ-क्रियाओंद्वारा यज्ञक्रियाभिश्च दिवौकसैर्नृपैः ॥ १३ ॥ देवताओंका भी पोषण किया था ॥ १३ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे सूर्यवंशानुचरितं नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'सूर्यवंशका अनुचरित' नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६ ॥ सत्ताईसवाँ अध्याय चन्द्रवंशका वर्णन सूत उवाच सूतजी बोले—अब संक्षेपसे चन्द्रवंशी राजाओंके अथ सोमवंशोद्गवानां भूभुजां संक्षेपेण चरित्रका वर्णन किया जाता है। कल्पके आदिकी बात चरितमुच्यते ॥ १ ॥ आदौ तावत् समस्तं त्रैलोक्यं है। ऋक्, यजुष्, साम और अथर्ववेदस्वरूप भगवान् कुक्षौ कृत्वा एकार्णवे महाम्भसि नारायण समस्त त्रिभुवनको अपने उदरमें लीन करके नागभोगशयने ॥ २ ॥ ऋङ्मयो यजुर्मयः एकार्णवकी अगाध जलराशिमें शेषनागकी शय्यापर योगनिद्राका साममयोऽथर्वमयो भगवान्नारायणो योगनिद्रां आश्रय ले सो रहे थे। सोये हुए उन भगवान्‌की नाभिसे समारेभे। तस्य सुप्तस्य नाभौ महापद्ममजायत। तस्मिन् एक महान् कमल प्रकट हुआ। उस कमलमें चतुर्मुख पद्मे चतुर्मुखो ब्रह्माभवत् ॥ ३ ॥ तस्य ब्रह्मणो मानसः ब्रह्माका आविर्भाव हुआ। उन ब्रह्माजीके मानसपुत्र अत्रि पुत्रोऽत्रिरभवत्। अत्रे्रनसूयायां सोमः। स तु हुए। अत्रिसे अनसूयाके गर्भसे चन्द्रमाका जन्म हुआ। प्रजापतेर्दक्षस्य त्रयस्त्रिंशत् कन्या रोहिण्याद्या भार्यार्थं उन्होंने दक्ष प्रजापतिकी रोहिणी आदि तैंतीस कन्याओंको गृहीत्वा प्रियायां ज्येष्ठायां विशेषात् प्रसन्नमनाः पत्नी बनानेके लिये ग्रहण किया और ज्येष्ठ भार्या रोहिणीसे रोहिण्यां बुधं पुत्रमुत्पादयामास ॥ ४ ॥ बुधोऽपि उसके प्रति अधिक प्रसन्न रहनेके कारण, 'बुध' नामक सर्वशास्त्रज्ञः प्रतिष्ठाने पुरेऽवसत्। इलायां पुरूरवसं पुत्र उत्पन्न किया। बुध भी समस्त शास्त्रोंके ज्ञाता होकर पुत्रमुत्पादयामास। तस्यातिशयरूपान्वितस्य प्रतिष्ठानपुरमें निवास करने लगे। उन्होंने इलाके गर्भसे स्वर्गभोगान् विहाय उर्वशी बहुकालं भार्या पुरूरवा नामक पुत्रको जन्म दिया। पुरूरवा बहुत ही सुन्दर बभूव ॥ ५ ॥ पुरूरवसः उर्वश्यामायुः पुत्रो जज्ञे। स थे, अतः उर्वशी नामक अप्सरा बहुत कालतक स्वर्गके तु राज्यं धर्मतः कृत्वा दिवमारुरोह ॥ ६ ॥ आयो भोगोंको त्यागकर इनकी भार्या बनी रही। पुरूरवाद्वारा रूपवत्यां नहुषः पुत्रोऽभवत्। येनेन्द्रत्वं प्राप्तम्। उर्वशीके गर्भसे आयु नामक पुत्रका जन्म हुआ। वह नहुषस्यापि पितृमत्यां ययातिः ॥ ७ ॥ यस्य वंशजा धर्मपूर्वक राज्य करके अन्तमें स्वर्गलोकको चला गया। आयुके रूपवतीसे नहुष नामक पुत्र हुआ, जिसने इन्द्रत्व प्राप्त किया था। नहुषके भी पितृमतीके गर्भसे ययाति In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

९२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २७

९२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २७ वृष्णयः। ययातेः शर्मिष्ठायां पूरुरभवत्॥८॥ हुए, जिनके वंशज वृष्णि कहलाते हैं। ययातिके पूरोर्वंशदायां संयातिः पुत्रोऽभवत्। यस्य पृथिव्यां शर्मिष्ठाके गर्भसे पूरु हुए। पूरुके वंशदासे संयाति नामक पुत्र हुआ, जिसको इस पृथिवीपर सभी तरहके सम्प्रन्नाः सर्वे कामाः॥९॥ मनोवाञ्छित भोग प्राप्त थे॥१-९॥ संयातेर्भानुदत्तायां सार्वभौमः। स तु सर्वां पृथिवीं संयातिसे भानुदत्ताके गर्भसे सार्वभौम नामक पुत्र हुआ। उसने सम्पूर्ण पृथिवीका धर्मपूर्वक पालन करते धर्मेण परिपालयन्नरसिंहं भगवन्तमाराध्य यागदानैः हुए यज्ञ-दान आदिके द्वारा भगवान् नृसिंहकी आराधना सिद्धिमप॥१०॥ तस्य सार्वभौमस्य वैदेह्यां भोजः। करके सिद्धि (मुक्ति) प्राप्त कर ली। उपर्युक्त सार्वभौमसे वैदेहीके गर्भसे भोज उत्पन्न हुआ, जिसके वंशमें कालनेमि यस्य वंशे पुरा देवासुरसंग्रामे विष्णुचक्रहतः नामक राक्षस, जो पहले देवासुर-संग्राममें भगवान् विष्णुके कालनेमिः कंसो भूत्वा वृष्णिवंशजेन वासुदेवेन चक्रसे मारा गया था, कंसके रूपमें उत्पन्न हुआ और वृष्णिवंशी वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके हाथसे मारा घातितो निधनं गतः॥११॥ जाकर मृत्युको प्राप्त हुआ॥१०-११॥ तस्य भोजस्य कलिङ्गायां दुष्षन्तः। स तु नरसिंहं भोजकी पत्नी कलिङ्गासे दुष्षन्तका जन्म हुआ। वह भगवन्तमाराध्य तत्प्रसादात्रिष्कण्टकं राज्यं धर्मेण भगवान् नृसिंहकी आराधना करके उनकी प्रसन्नतासे धर्मपूर्वक निष्कण्टक राज्य भोगकर जीवनके अन्तमें कृत्वा दिवं प्राप्तवान्। दुष्षन्तस्य शकुन्तलायां स्वर्गको प्राप्त हुआ। दुष्षन्तको शकुन्तलाके गर्भसे भरत भरतः। स तु धर्मेण राज्यं कुर्वन् ऋतुभिर्भूरि- नामक पुत्र प्राप्त हुआ। वह धर्मपूर्वक राज्य करता हुआ प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंसे सर्वदेवमय भगवान् विष्णुकी दक्षिणैः सर्वदेवतामयं भगवन्तमाराध्य आराधना करके कर्माधिकारसे निवृत्त एवं ब्रह्मध्यान- निवृत्ताधिकारो ब्रह्मध्यानपरो वैष्णवे परे ज्योतिषि परायण हो परम ज्योतिर्मय वैष्णवधाममें लीन हो गया॥१२॥ लयमवाप॥१२॥ भरतके उसकी पत्नी आनन्दाके गर्भसे अजमीढ भरतस्य आनन्दायामजमीढः। स च परमवैष्णवो नामक पुत्र हुआ। वह परम वैष्णव था। राजा अजमीढ नरसिंहमाराध्य जातपुत्रो धर्मेण कृतराज्यो भगवान् नृसिंहकी आराधनासे पुत्रवान् होकर धर्मपूर्वक राज्य करनेके पश्चात् श्रीविष्णुधामको प्राप्त हुए। अजमीढके विष्णुपुरमपारुरोह॥१३॥ अजमीढस्य सुदेव्यां वृष्णिः सुदेवीके गर्भसे वृष्णि नामक पुत्र हुआ। वह भी बहुत पुत्रोऽभवत्। सोऽपि बहुवर्षं धर्मेण राज्यं कुर्वन् वर्षोंतक धर्मपूर्वक राज्य करता रहा। दुष्टोंका दमन और सज्जनोंका पालन करते हुए उसने सातों द्वीपोंसे दुष्टनिग्रहं शिष्टपरिपालनं सप्तद्वीपां पृथ्वीं वशे चक्रे। युक्त पृथिवीको अपने वशमें कर लिया था। वृष्णिके वृष्णोरुग्रसेनायां प्रत्यङ्गः पुत्रो बभूव॥१४॥ सोऽपि उग्रसेनाके गर्भसे प्रत्यङ्ग नामक पुत्र हुआ। वह भी धर्मपूर्वक पृथिवीका पालन करता था। उसने प्रतिवर्ष धर्मेण मेदिनीं पालयन् प्रतिसंवत्सरं ज्योतिष्टोमं चकार। ज्योतिष्टोमयागका अनुष्ठान करते हुए आयुका अन्त निर्वाणमपि लब्धवान्। प्रत्यङ्गस्य बहुरूपायां होनेपर निर्वाणपद (मोक्ष) प्राप्त कर लिया। प्रत्यङ्गको In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय २८ ] शांतनुका चरित्र ९३

अध्याय २८ ] शांतनुका चरित्र ९३ शांतनुः ॥ १५ ॥ तस्य देवदत्तस्यन्दनारोहणमशक्यं बहुरूपके गर्भसे शांतनु नामक पुत्र प्राप्त हुआ, जिनमें बभूव पुरतः शक्यं च ॥ १६ ॥ देवताओंके दिये हुए रथपर चढ़नेकी पहले शक्ति नहीं थी, परंतु पीछे उसपर चढ़नेकी शक्ति हो गयी ॥ १३–१६ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे सोमवंशवर्णनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'सोमवंशवर्णन' नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥

अट्ठाईसवाँ अध्याय शांतनुका चरित्र भरद्वाज उवाच भरद्वाजजीने पूछा- शांतनुको पहले देवताओंके स्यन्दनारोहणे पूर्वमशक्तिः शांतनोः कथम्। रथपर चढ़नेकी शक्ति क्यों नहीं थी ? और फिर उनमें वह शक्ति कैसे आ गयी ? इसे आप हमें बतलायें ॥ १ ॥ पश्चाच्छक्तिः कथं चासीत् तस्य वै तद्वदस्व नः ॥ १ सूत उवाच सूतजी बोले - भरद्वाजजी ! यह पुराना इतिहास है; इसे मैं कहता हूँ, सुनिये। शांतनुका चरित्र मनुष्योंके भरद्वाज शृणुष्वैतत् पुरावृत्तं वदामि ते। समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। शांतनु पूर्वकालमें सर्वपापहरं तद्धि चरितं शांतनोर्नृणाम् ॥ २ नृसिंहरूपधारी भगवान् विष्णुके भक्त थे और नारदजीकी बतायी हुई विधिसे भगवान् लक्ष्मीपतिकी सदा पूजा बभूव शांतनुर्भक्तो नरसिंहतनौ पुरा। किया करते थे। विप्रवर ! एक बार राजा शांतनु भूलसे नारदोक्तविधानेन पूजयामास माधवम् ॥ ३ श्रीनृसिंहदेवके निर्माल्यको लाँघ गये, अतः वे उसी नरसिंहस्य देवस्य निर्माल्यं तेन लङ्घितम् । क्षण देवताओंके दिये हुए उत्तम रथपर चढ़नेमें असमर्थ हो गये। तब वे सोचने लगे - 'यह क्या बात है ? राज्ञा शांतनुना विप्र तस्मात् स्यन्दनमुत्तमम् ॥ ४ इस रथपर चढ़नेमें हमारी गति सहसा कुण्ठित क्यों देवदत्तं तदारोढुमशक्तस्तत्क्षणादभूत् । हो गयी ?' कहते हैं, इस प्रकार दुःखी होकर सोचते किमियं मे गतिर्भग्ना सहसा वै रथात्ततः ॥ ५ हुए उन राजाके पास नारदजी आये और उन्होंने राजा शांतनुसे पूछा- 'राजन् ! तुम क्यों विषादमें डूबे दुःखं चिन्तयतस्तस्य सम्प्राप्तो नारदः किल । हुए हो ?' ॥ २-६॥ किं विषण्णः स्थितो राजन्निति पृष्टः स शांतनुः ॥ ६ राजाने कहा - 'नारदजी ! मेरी गति कुण्ठित कैसे नारदैतन्न जानामि गतिभङ्गस्य कारणम् । हुई, इसका कारण मुझे ज्ञात नहीं हो रहा है, इसीसे मैं इत्युक्तो नारदो ध्यात्वा ज्ञात्वा तत्कारणं ततः ॥ ७ चिन्तित हूँ।' उनके यों कहनेपर नारदजीने ध्यान लगाया और उसका कारण जानकर राजा शांतनुसे, जो विनीतभावसे शांतनुं प्राह राजानं विनयेन यतः स्थितः । वहाँ खड़े थे, कहा- 'राजन् ! अवश्य ही तुमने कहीं- यत्र क्वापि त्वया राजन् नरसिंहस्य वै ध्रुवम् ॥ ८ न-कहीं भगवान् नृसिंहके निर्माल्यका लङ्घन किया है। निर्माल्यो लङ्घितस्तस्माद्रथारोहणकर्मणि । इसीसे रथपर चढ़नेमें तुम्हारी गति अवरुद्ध हो गयी है। गतिर्भग्ना महाराज श्रूयतामत्र कारणम् ॥ ९ महाराज ! इसका कारण सुनो ॥ ७-९ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

९४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २८

९४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २८

[संस्कृत श्लोक] अन्तर्वेद्यां पुरा राजन्नासीत् कश्चिन्महामतिः। मालाकारो रविर्नाम्ना तेन वृन्दावनं कृतम्॥ १० विविधानि च पुष्पार्थं वनानि सुकृतानि वै। मल्लिकामालतीजातिबकुलादीनि सर्वशः॥ ११ प्राकारमुच्छ्रितं तस्य स्वभूमौ चापि विस्तृतम्। अलङ्घ्यमप्रवेश्यं च कृत्वा चक्रे स्वकं गृहम्॥ १२ गृहं प्रविश्य तद्द्वारं भवेन्नान्यत्र सत्तम। एवं कृत्वा नु वसतो मालाकारस्य धीमतः॥ १३ पुष्पितं तद्वनं त्वासीद् गन्धामोदितदिङ्मुखम्। भार्यया सह पुष्पाणि समाहृत्य दिने दिने॥ १४ कृत्वा मालां यथान्यायं नरसिंहस्य नित्यशः। ददौ काश्चिद् द्विजेभ्यश्च काश्चिद्विक्रीय पोषणम्॥ १५ चक्रे समात् प्रजीवी च भार्यादेरात्मनस्तथा। अथ स्वर्गादुपागम्य इन्द्रपुत्रो रथेन वै॥ १६ अप्सरोगणसंयुक्तो निशि पुष्पाणि संहरेत्। तद्गन्धलिप्सुः सर्वाणि विचित्याहृत्य गच्छति॥ १७ दिने दिने हृते पुष्पे मालाकारोऽप्यचिन्तयत्। नान्यद् द्वारं वनस्यास्यालङ्घ्यप्राकारमुन्नतम्॥ १८ समस्तपुष्पजातस्य हरणे निशि वै नृणाम्। अहं शक्तिं न पश्यामि किमिदं नु परीक्षये॥ १९ इति संचिन्त्य मेधावी जाग्रद्रात्रौ वने स्थितः। तथैवागत्य पुष्पाणि संगृहीत्वा गतः पुमान्॥ २० तं दृष्ट्वा दुःखितोऽतीव माल्यजीवी वनेऽभवत्। ततो निद्रां गतः स्वप्ने दृष्टवांस्तं नृकेसरिम्॥ २१ तद्वाक्यं श्रुतवांश्चैवं निर्माल्यं मम पुत्रक। आनीय क्षिप्यतां क्षिप्रं पुष्पारामसमीपतः॥ २२


[हिन्दी अनुवाद] 'राजन्! पूर्वकालकी बात है, अन्तर्वेदीमें कोई बड़ा बुद्धिमान् माली रहता था। उसका नाम था रवि। उसने तुलसीका बगीचा लगाया था और उसका नाम 'वृन्दावन' रख दिया था। उसमें फूलोंके लिये सब ओर मल्लिका, मालती, जाती तथा बकुल (मौलसिरी) आदि नाना प्रकारके वृक्षोंके बाग सुंदर ढंगसे लगाये थे। उस वनकी चहारदीवारी बहुत ऊँची और चौड़ी बनवाकर, उसे अलङ्घनीय और दुर्गम करके भीतरकी भूमिपर उसने अपने रहनेके लिये घर बनाया था। साधुशिरोमणे! उसने ऐसा प्रबन्ध किया था कि घरमें प्रवेश करनेके बाद ही उस वाटिकाका द्वार प्राप्त हो सकता था, दूसरी ओरसे उसका मार्ग नहीं था॥ १०-१२½॥ 'ऐसी व्यवस्था करके निवास करते हुए उस मालीका वह वृन्दावन फूलोंसे भरा रहता था और उसकी सुगन्धसे सारी दिशाएँ सुवासित होती रहती थीं। वह प्रतिदिन अपनी पत्नीके साथ फूलोंका संग्रह करके यथोचित मालाएँ तैयार करता था। उनमेंसे कुछ मालाएँ तो वह भगवान् नृसिंहको अर्पण कर देता था, कुछ ब्राह्मणोंको दे डालता था और कुछको बेचकर उससे अपना तथा पत्नी आदिका पालन-पोषण करता था। मालासे जो कुछ प्राप्त होता, उसीके द्वारा वह अपनी जीविका चलाता था॥ १३-१५½॥ 'कुछ कालके बाद वहाँ इन्द्रका पुत्र जयन्त प्रतिदिन रातमें स्वर्गसे अप्सराओंके साथ रथपर चढ़कर आने और फूलोंकी चोरी करने लगा। उस वनके पुष्पोंकी सुगन्धके लोभसे वह सारे फूल तोड़ लेता और लेकर चल देता था। जब प्रतिदिन फूलोंकी चोरी होने लगी, तब मालीको बड़ी चिन्ता हुई। उसने मन-ही-मन सोचा—'इस वनका कोई दूसरा द्वार तो है नहीं। चहारदीवारी भी इतनी ऊँची है कि वह लाँघी नहीं जा सकती। मनुष्योंकी ऐसी शक्ति मैं नहीं देखता कि इसे लाँघकर वे सारे फूल चुरा ले जानेमें समर्थ हों। फिर इन फूलोंके लुप्त होनेका क्या कारण है, आज अवश्य ही इसका पता लगाऊँगा।' यह सोचकर वह बुद्धिमान् माली उस रातमें जागता हुआ बगीचेमें ही बैठा रहा। अन्य दिनोंकी भाँति उस दिन भी वह पुरुष आया और फूल लेकर चला गया॥ १६-२०॥ 'उसे देखकर मालाओंसे ही जीविका चलानेवाला वह माली उस उपवनमें बहुत ही दुःखी हुआ। तदनन्तर रातको नींद आनेपर उसने स्वप्नमें साक्षात् भगवान् नृसिंहको देखा तथा उन नृसिंहदेवका यह वचन भी सुना—'पुत्र! तुम शीघ्र ही फूलोंके बगीचेके समीप मेरा