संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 91, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें८० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २४ नानाजनपदाकीर्णा पताकाध्वजशोभिता। वह पुरी नाना देशोंके मनुष्योंसे भरी-पूरी, ध्वजा- देवतुल्यप्रभायुक्तैर्नृपपुत्रैश्च संयुता ॥ १२ पताकाओंसे सुशोभित तथा अनेकानेक कान्तिमान् देवोपम राजकुमारोंसे युक्त थी। वहाँ देवाङ्गनाओंके समान श्रेष्ठ सुरूपाभिर्वरस्त्रीभिर्देवस्त्रीभिरिवावृता । एवं रूपवती वनिताएँ निवास करती थीं। बृहस्पतिके विप्रैः सत्कविभिर्युक्ता बृहस्पतिसमप्रभैः ॥ १३ समान तेजस्वी सत्कवि ब्राह्मण उस नगरीकी शोभा बढ़ाते थे। कल्पवृक्षसे भी बढ़कर उदार नागरिकों और वैश्यों, वणिग्जनैस्तथा पौरैः कल्पवृक्षवरैर्युता। उच्चैःश्रवाके समान श्रेष्ठ घोड़ों और दिग्गजोंके समान अश्वैरुच्चैःश्रवस्तुल्यैर्दन्तिभिर्दिग्गजैरिव ॥ १४ विशालकाय हाथियोंसे वह पुरी बड़ी शोभा पाती थी। इस प्रकार नाना वस्तुओंसे भरी-पूरी अयोध्यापुरी इन्द्रपुरी इति नानाविधैर्भावैरयोध्येन्द्रपुरीसमा । अमरावतीकी समता करती थी। पूर्वकालमें नारदजीने तां दृष्ट्वा नारदः श्लोकं सभामध्ये पुरोक्तवान् ॥ १५ उस पुरीको देखकर भरी सभामें यह श्लोक कहा था— 'स्वर्गकी सृष्टि करनेवाले विधाताका वह सारा प्रयत्न स्वर्गं वै सृजमानस्य व्यर्थं स्यात् पद्मजन्मनः । व्यर्थ हो गया; क्योंकि अयोध्यापुरी उससे भी बढ़कर जातायोध्याधिका स्वर्गात् कामभोगसमन्विता ॥ १६ मनोवाञ्छित भोगोंसे सम्पन्न हो गयी' ॥ १२–१६॥ तामावसदयोध्यां तु स्वाभिषिक्तो महीपतिः । इक्ष्वाकु इसी अयोध्यामें निवास करते थे। वे राजाके जितवान् सर्वभूपालान् धर्मेण स महाबलः ॥ १७ पदपर अभिषिक्त हो, पृथ्वीका पालन करने लगे। उन महान् बलशाली नरेशने धर्मयुद्धके द्वारा समस्त भूपालोंको माणिक्यमुकुटैर्युक्तै राजभिर्मण्डलाधिपैः । जीत लिया था। मानिकके बने मुकुटोंसे अलंकृत अनेक नमद्भिर्भक्तिभीतिभ्यां पादौ तस्य किणीकृतौ ॥ १८ छोटे-छोटे मण्डलोंके शासक राजाओंके भक्ति तथा भयपूर्वक प्रणाम करनेसे उनके दोनों चरणोंमें मुकुटोंकी इक्ष्वाकुरक्षतबलः सर्वशास्त्रविशारदः । रगड़से चिह्न बन गया था॥ १७-१८॥ तेजसेन्द्रेण सदृशो मनोः सूनुः प्रतापवान् ॥ १९ मनुपुत्र प्रतापी राजा इक्ष्वाकु अपने राजोचित तेजसे इन्द्रकी समानता करते थे। वे सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें धर्मतो न्यायतश्चैव वेदज्ञैर्ब्राह्मणैर्युतः । निपुण थे। उनका बल कभी क्षीण नहीं होता था। वे पालयामास धर्मात्मा आसमुद्रां महीमिमाम् ॥ २० धर्मात्मा भूपाल वेदवेत्ता ब्राह्मणोंके साथ धर्म और न्यायपूर्वक इस समुद्रपर्यन्त पृथिवीका पालन करते थे। अस्त्रैर्जिगाय सकलान् संयुगे भूपतीन् बली । उन बलशाली नरेशने संग्राममें अपने तीखे शस्त्रोंसे अवजित्य सुतीक्ष्णैस्तु तन्मण्डलमथाहरत् ॥ २१ समस्त भूपोंको जीतकर उनका मण्डल अपने अधिकारमें कर लिया था ॥ १९–२१ ॥ जितवान् परलोकांश्च क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । ब्रह्मन् ! प्रतापी राजा इक्ष्वाकुने प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञ दानैश्च विविधैर्ब्रह्मन् राजेक्ष्वाकुः प्रतापवान् ॥ २२ और नाना प्रकारके दान करके परलोकोंपर भी विजय प्राप्त कर ली थी। वे अपनी दोनों भुजाओंद्वारा पृथिवीका, बाहुद्वयेन वसुधां जिह्वाग्रेण सरस्वतीम् । जिह्वाके अग्रभागसे सरस्वतीका, वक्षःस्थलसे राजलक्ष्मीका बभार पद्मामुरसा भक्तिं चित्तेन माधवे ॥ २३ और हृदयसे भगवान् लक्ष्मीपतिकी भक्तिका भार वहन करते थे। एक वस्त्रपर खड़े हुए भगवान् हरिका, बैठे हुए संतिष्ठतो हरे रूपमुपविष्टं च माधवम् । शयानमप्यनन्तं तु कारयित्वा पटेऽमलम् ॥ २४
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