संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 90, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २४ ] सूर्यवंश—राजा इक्ष्वाकुका भगवत्प्रेम; उनका भगवद्दर्शनके हेतु तपस्याके लिये प्रस्थान ७९ चौबीसवाँ अध्याय सूर्यवंश—राजा इक्ष्वाकुका भगवत्प्रेम; उनका भगवद्दर्शनके हेतु तपस्याके लिये प्रस्थान
[बायाँ स्तम्भ - संस्कृत श्लोक]
श्रीसूत उवाच अतः परं प्रवक्ष्यामि वंशानुचरितं शुभम्। शृण्वतामपि पापघ्नं सूर्यसोमनृपात्मकम्॥ १ सूर्यवंशोद्भवो यो वै मनुपुत्रः पुरोदितः। इक्ष्वाकुर्नाम भूपालश्चरितं तस्य मे शृणु॥ २ आसीद् भूमौ महाभाग पुरी दिव्या सुशोभना। सरयूतीरमासाद्य अयोध्या नाम नामतः॥ ३ अमरावत्यतिशया त्रिंशद्योजनजालिनी। हस्त्यश्वरथपत्त्योधैर्द्रुमैः कल्पद्रुमप्रभैः॥ ४ प्राकाराट्टप्रतोलीभिस्तोरणैः काञ्चनप्रभैः। विराजमाना सर्वत्र सुविभक्तचतुष्पथा॥ ५ अनेकभूमिप्रासादा बहुभाण्डसुविक्रया। पद्मोत्पलशुभैस्तोयैर्वापीभिरुपशोभिता ॥ ६ देवतायतनैर्दिव्यैर्वेदघोषैश्च शोभिता। वीणावेणुमृदङ्गैश्च शब्दैरुत्कृष्टकैर्युता ॥ ७ शालैस्तालैर्नालिकेरैः पनसामलजम्बुकैः। तथैवाम्रकपित्थाद्यैरशोकैरुपशोभिता ॥ ८ आरामैर्विविधैर्युक्ता सर्वत्र फलपादपैः। मल्लिकामालतीजातिपाटलानागचम्पकैः ॥ ९ करवीरैः कर्णिकारैः केतकीभिरलङ्कृता। कदलीलवलीजातिमातुलुङ्गमहाफलैः । क्वचिच्चन्दनगन्धाद्यैर्नारङ्गैश्च सुशोभिता ॥ १० नित्योत्सवप्रमुदिता गीतवाद्यविचक्षणैः। नरनारीभिराढ्याभी रूपद्रविणप्रेक्षणैः॥ ११
[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद]
श्रीसूतजी कहते हैं—अब मैं सूर्यवंशी तथा चन्द्रवंशी राजाओंके 'वंशानुचरित' का वर्णन करूँगा, जो श्रोताओंका भी पाप नष्ट करनेवाला है। मुने ! मैंने पहले सूर्यवंशमें उत्पन्न हुए जिन मनुपुत्र 'इक्ष्वाकु' नामक भूपालकी चर्चा की थी, उनके चरित्रका वर्णन आप मुझसे सुनें॥ १-२॥ महाभाग ! इस पृथ्वीपर सरयू नदीके किनारे 'अयोध्या' नामसे प्रसिद्ध एक शोभायमान दिव्य पुरी है। वह अमरावतीसे भी बढ़कर सुन्दर और तीस योजन लंबी-चौड़ी थी। हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकोंके समूह तथा कल्पवृक्षके समान कान्तिमान् वृक्ष उस पुरीकी शोभा बढ़ाते थे। चहारदीवारी, अट्टालिका, प्रतोली (गली या राजमार्ग) और सुवर्णकी-सी कान्तिवाले फाटकोंसे वह बड़ी शोभा पा रही थी। अलग-अलग बने हुए उसके चौराहे बहुत सुन्दर लगते थे। वहाँके महल कई मंजिल ऊँचे थे। नाना प्रकारके भाण्डों (भाँति-भाँतिके सामानों)-का सुन्दर ढंगसे क्रय-विक्रय होता था। कमलों और उत्पलोंसे सुशोभित जलसे भरी हुई बावलियाँ उस पुरीकी शोभा बढ़ा रही थीं। दिव्य देवालय तथा वेदमन्त्रोंके घोष उस नगरीकी श्री-वृद्धि करते थे। वीणा, वेणु और मृदङ्ग आदिके उत्कृष्ट शब्दोंसे वह पुरी गूँजती रहती थी। शाल (साखू), ताल (ताड़), नारियल, कटहल, आँवला, जामुन, आम और कपित्थ (कैथ) आदिके वृक्षों तथा अशोक-पुष्पोंसे अयोध्यापुरीकी बड़ी शोभा होती थी॥ ३-८॥ वहाँ सब जगह नाना प्रकारके बगीचे और फलवाले वृक्ष पुरीकी शोभा बढ़ाते थे। मल्लिका (मोतिया या बेला), मालती, चमेली, पाड़र, नागकेसर, चम्पा, कनेर, कनकचम्पा और केतकी (केवड़ा) आदि पुष्पोंसे मानो उस पुरीका शृङ्गार किया गया था। केला, हरफा, रेवड़ी, जायफल और बिजौरा नीबू, चन्दनकी-सी गन्धवाले तथा दूसरे प्रकारके संतरे आदि बड़े-बड़े फल उसकी शोभा बढ़ाते थे। गीत और वाद्यमें कुशल पुरुष उस पुरीमें प्रतिदिन आनन्दोत्सव मचाये रहते थे। वहाँके स्त्री-पुरुष रूप-वैभव तथा सुन्दर नेत्रोंसे सम्पन्न थे ॥ ९-११॥
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