भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 89

७८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २३ तेषामिन्द्र ऋषभो नाम भविता ॥ ३२ ॥ नामक देवगण तथा उनके 'ऋषभ' नामक इन्द्र होंगे। निश्चितोऽग्नितेजा वपुष्मान् धृष्टो वारुणिर्हविष्मान् निश्चित, अग्नितेजा, वपुष्मान्, धृष्ट, वारुणि, हविष्मान् नहुषो भव्य इति सप्तर्षयः। सुधर्मा देवानीकादयस्तस्य और भव्यमूर्ति नहुष - ये सप्तर्षि होंगे। उस मनुके सुधर्मा मनोः पुत्राः पृथ्वीश्वरा भविष्यन्ति ॥ ३३ ॥ तथा देवानीक आदि पुत्र भूपाल होंगे। चौदहवें भावी भौमश्चतुर्दशो मनुर्भविता। सुरुचिस्तत्रेन्द्रः चक्षुष्मन्तः मनुका नाम 'भौम' होगा। उस समय 'सुरुचि' नामक पवित्राः कनिष्ठाभा देवगणाः ॥ ३४ ॥ इन्द्र और चक्षुष्मान्, पवित्र तथा कनिष्ठाभ नामक देवगण अग्निबाहुशुचिशुक्रमाधवशिवाभीमजितश्वासा इत्येते होंगे। अग्निबाहु, शुचि, शुक्र, माधव, शिव, अभीम और जितश्वास-ये सप्तर्षि होंगे तथा उस भौम मनुके पुत्र सप्तर्षयः। उरुगम्भीरब्रह्माद्यास्तस्य मनोः सुता उरु, गम्भीर और ब्रह्मा आदि भूतलके राजा होंगे। इस राजानः ॥ ३५ ॥ एवं ते चतुर्दश मन्वन्तराणि प्रकार मैंने आपसे चौदह मन्वन्तरोंका और उन-उन कथितानि । राजानश्च यैरियं वसुधा पाल्यते ॥ ३६ मनुके पुत्र तत्कालीन राजाओंका वर्णन किया, जिनके मनुः सप्तर्षयो देवा भूपालाश्च मनोः सुताः । द्वारा इस वसुधाका पालन होता है ॥ १७-३६ ॥ मन्वन्तरे भवन्त्येते शक्राश्चैवाधिकारिणः ॥ ३७ प्रत्येक मन्वन्तरमें मनु, सप्तर्षि, देवता और भूपाल चतुर्दशभिरेतैस्तु गतैर्मन्वन्तरैर्द्विज । मनुपुत्र तथा इन्द्र-ये अधिकारी होते हैं। ब्रह्मन् ! इन सहस्रयुगपर्यन्तः कालो गच्छति वासरः ॥ ३८ चौदह मन्वन्तरोंके व्यतीत हो जानेपर एक हजार चतुर्युगका समय बीत जाता है। यह (ब्रह्माजीका) एक दिन तावत्प्रमाणा च निशा ततो भवति सत्तम। कहलाता है। साधुशिरोमणे! फिर उतने ही प्रमाणकी ब्रह्मरूपधरः शेते सर्वात्मा नृहरिः स्वयम् ॥ ३९ उनकी रात्रि होती है। उस समय सब भूतोंके आत्मा त्रैलोक्यमखिलं ग्रस्ता भगवानादिकृद्विभुः। साक्षात् भगवान् नृसिंह ब्रह्मरूप धारण करके शयन स्वमायामास्थितो विप्र सर्वरूपी जनार्दन ॥ ४० करते हैं। विप्रवर! सर्वत्र व्यापक एवं आदिविधाता सर्वरूप भगवान् जनार्दन उस समय समस्त त्रिभुवनको अथ प्रबुद्धो भगवान् यथा पूर्वं तथा पुनः । अपनेमें लीन करके अपनी योगमायाका आश्रय ले युगव्यवस्थां कुरुते सृष्टिं च पुरुषोत्तमः ॥ ४१ शयन करते हैं। फिर जाग्रत् होनेपर वे भगवान् पुरुषोत्तम एते तवोक्ता मनवोऽमराश्च पूर्वकल्पके अनुसार पुनः युग-व्यवस्था तथा सृष्टि करते पुत्राश्च भूपा मुनयश्च सर्वे । हैं। ब्रह्मन् ! इस प्रकार मैंने मनु, देवगण, भूपाल, मनुपुत्र विभूतयस्तस्य स्थितौ स्थितस्य और ऋषि- इन सबका आपसे वर्णन किया। आप इन सबको पालनकर्ता भगवान् विष्णुकी विभूतियाँ ही तस्यैव सर्वं त्वमवेहि विप्र ॥ ४२ ॥ समझें ॥ ३७-४२ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'चौदह मन्वन्तरोंका वर्णन' नामक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth