संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ
पृष्ठ 92, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 92
अध्याय २४] सूर्यवंश—राजा इक्ष्वाकुका भगवत्प्रेम; उनका भगवद्दर्शनके हेतु तपस्याके लिये प्रस्थान [पृष्ठ: ८१]
[मूल संस्कृत श्लोक एवं हिन्दी अनुवाद]
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| त्रिकालं त्रयमाराध्य रूपं विष्णोर्महात्मनः ।<br>गन्धपुष्पादिभिर्नित्यं रेमे दृष्ट्वा पटे हरिम् ॥ २५<br><br>कृष्णं तं कृष्णमेघाभं भुजगेन्द्रनिवासिनम् ।<br>पद्माक्षं पीतवासं च स्वप्नेष्वपि स दृष्टवान् ॥ २६<br><br>चकार मेघे तद्वर्णे बहुमानमतिं नृपः ।<br>पक्षपातं च तन्नाम्नि मृगे पद्मे च तादृशे ॥ २७ | लक्ष्मीपत्तिका और सोये हुए अनन्तदेवका निर्मल चित्र बनवाकर क्रमशः प्रातःकाल, मध्याह्नकाल और संध्याकालमें तीनों समय वे महात्मा भगवान् विष्णुके उन तीनों रूपोंका गन्ध तथा पुष्प आदिके द्वारा पूजन करते और उस पटपर प्रतिदिन भगवान् विष्णुका दर्शन करके प्रसन्न रहते थे। उन्हें स्वप्नमें भी नागराज अनन्तकी शय्यापर सोये हुए, काले मेघके समान श्यामवर्ण, कमललोचन, पीताम्बरधारी भगवान् श्रीकृष्ण (विष्णु)-का दर्शन हुआ करता था। राजाने भगवान्के समान श्यामवर्णवाले मेघमें अत्यन्त सम्मानपूर्ण बुद्धि कर ली थी। भगवान् श्रीकृष्णके नामसे युक्त कृष्णसार मृगमें और कृष्णवर्णवाले कमलमें वे पक्षपात रखते थे॥ २२—२७॥ |
| दिव्याकृतिं हरेः साक्षाद् द्रष्टुं तस्य महीभृतः ।<br>अतीव तृष्णा संजाता अपूर्वैव हि सत्तम ॥ २८<br><br>तृष्णायां तु प्रवृद्धायां मनसैव हि पार्थिवः ।<br>चिन्तयामास मतिमान् राज्यभोगमसारवत् ॥ २९<br><br>वेश्मदारसुतक्षेत्रं संन्यस्तं येन दुःखदम् ।<br>वैराग्यज्ञानपूर्वेण लोकेऽस्मिन् नास्ति तत्समः ॥ ३०<br><br>इत्येवं चिन्तयित्वा तु तपस्यासक्तचेतनः ।<br>वसिष्ठं परिपप्रच्छ तत्रोपायं पुरोहितम् ॥ ३१<br><br>तपोबलेन देवेशं नारायणमजं मुने ।<br>द्रष्टुमिच्छाम्यहं तत्र उपायं तं वदस्व मे ॥ ३२ | साधुशिरोमणे! उस राजाके मनमें भगवान् विष्णुके दिव्य स्वरूपको प्रत्यक्ष देखनेकी अत्यन्त उत्कट अभिलाषा जागृत हुई; उनकी वह तृष्णा अपूर्व ही थी। जब उनकी तृष्णा बहुत बढ़ गयी, तब वे बुद्धिमान् भूपाल मन-ही-मन सारे राज्य-भोगको निस्सार-सा समझने लगे। उन्होंने सोचा—'जिस पुरुषने गेह, स्त्री, पुत्र और क्षेत्र आदि दुःखद भोगोंको वैराग्य और ज्ञानपूर्वक त्याग दिया है, उसके समान बड़भागी इस संसारमें कोई नहीं है।' इस प्रकार सोच-विचारकर, तपस्यामें आसक्तचित्त हो उन्होंने उसके लिये अपने पुरोहित वसिष्ठजीसे उपाय पूछा—'मुने! मैं तपस्याके बलसे देवेश्वर, अजन्मा भगवान् नारायणका दर्शन करना चाहता हूँ; इसके लिये आप मुझे कोई उत्तम उपाय बताइये'॥ २८—३२॥ |
| इत्युक्तः प्राह राजानं तपस्यासक्तमानसम् ।<br>वसिष्ठः सर्वधर्मज्ञः सदा तस्य हिते रतः ॥ ३३<br><br>यदीच्छसि महाराज द्रष्टुं नारायणं परम् ।<br>तपसा सुकृतेनेह आराधय जनार्दनम् ॥ ३४<br><br>केनाप्यतमतपसा देवदेवो जनार्दनः ।<br>द्रष्टुं न शक्यते जातु तस्मात् तं तपसार्चय ॥ ३५<br><br>पूर्वदक्षिणदिग्भागे सरयूतीरगे नृप ।<br>गालवप्रमुखानां च ऋषीणामस्ति चाश्रमः ॥ ३६<br><br>पञ्चयोजनमध्वानं स्थानमस्मात्तु पावनम् ।<br>नानाद्रुमलताकीर्णं नानापुष्पसमाकुलम् ॥ ३७ | उनके इस प्रकार कहनेपर राजाके हितमें सदा लगे रहनेवाले सर्वधर्मज्ञ मुनिवर वसिष्ठजीने तपमें आसक्तचित्त उन नरेशसे कहा—'महाराज! यदि तुम परमात्मा नारायणका साक्षात्कार करना चाहते हो तो तपस्या और शुभकर्मोंके द्वारा उन भगवान् जनार्दनकी आराधना करो। कोई भी पुरुष तपस्या किये बिना देवदेव जनार्दनका दर्शन नहीं पा सकता। इसलिये तुम तपस्याके द्वारा उनका पूजन करो। यहाँसे पाँच योजन दूर सरयूके तटपर पूर्व और दक्षिण भागमें एक पवित्र स्थान है, जहाँ गालव आदि ऋषियोंका... |
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