संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 93, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें८२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २५
स्वमन्त्रिणि महाप्राज्ञे नीतिमत्यर्जुने नृप। स्वराज्यभारं विन्यस्य कर्मकाण्डमपि द्विज ॥ ३८ स्तुत्वाऽऽराध्य गणाध्यक्षमितो व्रज विनायकम्। तपःसिद्ध्यर्थमन्विच्छंस्तस्मात् तत्र तपः कुरु॥ ३९ तापसं वेषमास्थाय शाकमूलफलाशनः। ध्यायन् नारायणं देवमिमं मन्त्रं सदा जप॥ ४० ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। एष सिद्धिकरो मन्त्रो द्वादशाक्षरसंज्ञितः। जप्त्वाैनं मुनयः सिद्धिं परां प्राप्ताः पुरातनाः ॥ ४१ गत्वा गत्वा निवर्तन्ते चन्द्रसूर्यादयो ग्रहाः। अद्यापि न निवर्तन्ते द्वादशाक्षरचिन्तकाः ॥ ४२ बाह्येन्द्रियं हृदि स्थाप्य मनः सूक्ष्मे परात्मनि। नृप संजप तन्मन्त्रं द्रष्टव्यो मधुसूदनः ॥ ४३ इति ते कथितोपायो हरिप्राप्तेस्तपःकृतौ। पृच्छतः साम्प्रतं भूयो यदीच्छसि कुरुष्व तत्॥ ४४
आश्रम है। वह स्थान नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे व्याप्त तथा विविध भाँतिके पुष्पोंसे परिपूर्ण है। राजन्! अपने बुद्धिमान् एवं नीतिज्ञ मन्त्री अर्जुनको राज्यका भार तथा सारा कार्य-कलाप सौंप, तत्पश्चात् गणनायक भगवान् विनायककी स्तुति एवं आराधना करके तपस्याकी सिद्धिरूप प्रयोजनकी इच्छा मनमें लेकर यहाँसे उस आश्रमकी यात्रा करो और वहाँ पहुँचकर तपस्यामें संलग्न हो जाओ। तपस्वीका वेष धारणकर, साग और फल-मूलका आहार करते हुए, भगवान् नारायणके ध्यानमें तत्पर रहकर सदा ही 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।'—इस मन्त्रका जप करो। यह 'द्वादशाक्षर'-संज्ञक मन्त्र अभीष्टको सिद्ध करनेवाला है। प्राचीन कालके ऋषियोंने इस मन्त्रका जप करके परम सिद्धि प्राप्त की है। चन्द्रमा और सूर्य आदि ग्रह जा-जाकर पुनः लौट आते हैं, परंतु द्वादशाक्षर-मन्त्रका चिन्तन करनेवाले पुरुष आजतक नहीं लौटे—भगवान्को पाकर आवागमनसे मुक्त हो गये। नरेश्वर! बाह्य इन्द्रियोंको हृदयमें स्थापितकर तथा मनको सूक्ष्म परात्मतत्त्वमें स्थिर करके इस मन्त्रका जप करो; इससे तुम्हें भगवान् मधुसूदनका दर्शन होगा। इस प्रकार इस समय तुम्हारे पूछनेपर मैंने तपरूप कर्मसे भगवान्की प्राप्तिका उपाय बतलाया; अब तुम्हारी जैसी इच्छा हो, करो'॥ ३३—४४॥
इत्येवमुक्तो मुनिना स राजा राज्यं भुवो मन्त्रिवरे समर्प्य। स्तुत्वा गणेशं सुमनोभिरर्च्य गतः पुरात् स्वात् तपसे धृतात्मा ॥ ४५ ॥
मुनिवर वसिष्ठके इस प्रकार कहनेपर वे राजा इक्ष्वाकु अपने श्रेष्ठ मन्त्रीको भूमण्डलके राज्यका भार सौंपकर, पुष्पोंद्वारा गणेशजीका पूजन तथा स्तवन करके, तपस्या करनेका दृढ़ निश्चय मनमें लेकर, अपने नगरसे चल दिये॥ ४५॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे इक्ष्वाकुचरित्रे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'इक्ष्वाकुका चरित्र' विषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २४॥
पचीसवाँ अध्याय इक्ष्वाकुकी तपस्या और ब्रह्माजीद्वारा विष्णुप्रतिमाकी प्राप्ति
भरद्वाज उवाच कथं स्तुतो गणाध्यक्षस्तेन राज्ञा महात्मना। यथा तेन तपस्तप्तं तन्मे वद महामते ॥ १
भरद्वाजजीने पूछा— महामते! उन महात्मा राजाने किस प्रकार गणेशजीका स्तवन किया? तथा उन्होंने जिस प्रकार तपस्या की, उसका आप मुझसे वर्णन करें॥ १॥
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