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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

८२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २५

८२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २५

स्वमन्त्रिणि महाप्राज्ञे नीतिमत्यर्जुने नृप। स्वराज्यभारं विन्यस्य कर्मकाण्डमपि द्विज ॥ ३८ स्तुत्वाऽऽराध्य गणाध्यक्षमितो व्रज विनायकम्। तपःसिद्ध्यर्थमन्विच्छंस्तस्मात् तत्र तपः कुरु॥ ३९ तापसं वेषमास्थाय शाकमूलफलाशनः। ध्यायन् नारायणं देवमिमं मन्त्रं सदा जप॥ ४० ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। एष सिद्धिकरो मन्त्रो द्वादशाक्षरसंज्ञितः। जप्त्वाैनं मुनयः सिद्धिं परां प्राप्ताः पुरातनाः ॥ ४१ गत्वा गत्वा निवर्तन्ते चन्द्रसूर्यादयो ग्रहाः। अद्यापि न निवर्तन्ते द्वादशाक्षरचिन्तकाः ॥ ४२ बाह्येन्द्रियं हृदि स्थाप्य मनः सूक्ष्मे परात्मनि। नृप संजप तन्मन्त्रं द्रष्टव्यो मधुसूदनः ॥ ४३ इति ते कथितोपायो हरिप्राप्तेस्तपःकृतौ। पृच्छतः साम्प्रतं भूयो यदीच्छसि कुरुष्व तत्॥ ४४

आश्रम है। वह स्थान नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे व्याप्त तथा विविध भाँतिके पुष्पोंसे परिपूर्ण है। राजन्! अपने बुद्धिमान् एवं नीतिज्ञ मन्त्री अर्जुनको राज्यका भार तथा सारा कार्य-कलाप सौंप, तत्पश्चात् गणनायक भगवान् विनायककी स्तुति एवं आराधना करके तपस्याकी सिद्धिरूप प्रयोजनकी इच्छा मनमें लेकर यहाँसे उस आश्रमकी यात्रा करो और वहाँ पहुँचकर तपस्यामें संलग्न हो जाओ। तपस्वीका वेष धारणकर, साग और फल-मूलका आहार करते हुए, भगवान् नारायणके ध्यानमें तत्पर रहकर सदा ही 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।'—इस मन्त्रका जप करो। यह 'द्वादशाक्षर'-संज्ञक मन्त्र अभीष्टको सिद्ध करनेवाला है। प्राचीन कालके ऋषियोंने इस मन्त्रका जप करके परम सिद्धि प्राप्त की है। चन्द्रमा और सूर्य आदि ग्रह जा-जाकर पुनः लौट आते हैं, परंतु द्वादशाक्षर-मन्त्रका चिन्तन करनेवाले पुरुष आजतक नहीं लौटे—भगवान्‌को पाकर आवागमनसे मुक्त हो गये। नरेश्वर! बाह्य इन्द्रियोंको हृदयमें स्थापितकर तथा मनको सूक्ष्म परात्मतत्त्वमें स्थिर करके इस मन्त्रका जप करो; इससे तुम्हें भगवान् मधुसूदनका दर्शन होगा। इस प्रकार इस समय तुम्हारे पूछनेपर मैंने तपरूप कर्मसे भगवान्‌की प्राप्तिका उपाय बतलाया; अब तुम्हारी जैसी इच्छा हो, करो'॥ ३३—४४॥


इत्येवमुक्तो मुनिना स राजा राज्यं भुवो मन्त्रिवरे समर्प्य। स्तुत्वा गणेशं सुमनोभिरर्च्य गतः पुरात् स्वात् तपसे धृतात्मा ॥ ४५ ॥

मुनिवर वसिष्ठके इस प्रकार कहनेपर वे राजा इक्ष्वाकु अपने श्रेष्ठ मन्त्रीको भूमण्डलके राज्यका भार सौंपकर, पुष्पोंद्वारा गणेशजीका पूजन तथा स्तवन करके, तपस्या करनेका दृढ़ निश्चय मनमें लेकर, अपने नगरसे चल दिये॥ ४५॥


इति श्रीनरसिंहपुराणे इक्ष्वाकुचरित्रे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'इक्ष्वाकुका चरित्र' विषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २४॥


पचीसवाँ अध्याय इक्ष्वाकुकी तपस्या और ब्रह्माजीद्वारा विष्णुप्रतिमाकी प्राप्ति

भरद्वाज उवाच कथं स्तुतो गणाध्यक्षस्तेन राज्ञा महात्मना। यथा तेन तपस्तप्तं तन्मे वद महामते ॥ १

भरद्वाजजीने पूछा— महामते! उन महात्मा राजाने किस प्रकार गणेशजीका स्तवन किया? तथा उन्होंने जिस प्रकार तपस्या की, उसका आप मुझसे वर्णन करें॥ १॥


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अध्याय २५ ] इक्ष्वाकुकी तपस्या और ब्रह्माजीद्वारा विष्णुप्रतिमाकी प्राप्ति ८३

[सूत उवाच / श्लोक २-१३] सूत उवाच चतुर्थीदिवसे राजा स्नात्वा त्रिश्रवणं द्विज । रक्ताम्बरधरो भूत्वा रक्तगन्धानुलेपनः ॥ २ सुरक्तकुसुमैर्हृद्यैर्विनायकमथार्चयत् । रक्तचन्दनतोयेन स्नानपूर्वं यथाविधि ॥ ३ विलिप्य रक्तगन्धेन रक्तपुष्पैः प्रपूजयत् । ततोऽसौ दत्तवान् धूपमाज्ययुक्तं सचन्दनम् । नैवेद्यं चैव हारिद्रं गुडखण्डघृतप्लुतम् ॥ ४ एवं सुविधिना पूज्य विनायकमथास्तवीत् ।

इक्ष्वाकुरुवाच नमस्कृत्य महादेवं स्तोष्येऽहं तं विनायकम् ॥ ५ महागणापतिं शूरमजितं ज्ञानवर्धनम् । एकदन्तं द्विदन्तं च चतुर्दन्तं चतुर्भुजम् ॥ ६ त्र्यक्षं त्रिशूलहस्तं च रक्तनेत्रं वरप्रदम् । आम्बिकेयं शूर्पकर्णं प्रचण्डं च विनायकम् ॥ ७ आरक्तं दण्डिनं चैव वह्निवक्त्रं हुतप्रियम् । अनर्चितो विघ्नकरः सर्वकार्येषु यो नृणाम् ॥ ८ तं नमामि गणाध्यक्षं भीममुग्रमुमासुतम् । मदमत्तं विरूपाक्षं भक्तविघ्ननिवारकम् ॥ ९ सूर्यकोटिप्रतीकाशं भिन्नाञ्जनसमप्रभम् । बुद्धं सुनिर्मलं शान्तं नमस्यामि विनायकम् ॥ १० नमोऽस्तु गजवक्त्राय गणानां पतये नमः । मेरुमन्दररूपाय नमः कैलासवासिने ॥ ११ विरूपाय नमस्तेऽस्तु नमस्ते ब्रह्मचारिणे । भक्तस्तुताय देवाय नमस्तुभ्यं विनायक ॥ १२ त्वया पुराण पूर्वेषां देवानां कार्यसिद्धये । गजरूपं समास्थाय त्रासिताः सर्वदानवाः ॥ १३


[हिन्दी अनुवाद] सूतजी बोले— द्विज ! गणेश-चतुर्थीके दिन राजाने त्रिकाल स्नान करके रक्तवस्त्र धारण किया और लाल चन्दन लगाकर मनोहर लाल फूलों तथा रक्तचन्दनमिश्रित जलसे गणेशजीको स्नान कराके विधिवत् उनका पूजन किया। स्नान करानेके बाद उनके श्रीअङ्गोंमें लाल चन्दन लगाया। फिर रक्तपुष्पोंसे उनकी पूजा की। तदनन्तर उन्हें घृत और चन्दन मिला हुआ धूप निवेदन किया। अन्तमें हल्दी, घी और गुडखण्डके मेलसे तैयार किया हुआ मधुर नैवेद्य अर्पण किया। इस प्रकार सुन्दर विधिपूर्वक भगवान् विनायकका पूजन करके राजाने उनकी स्तुति आरम्भ की ॥ २—४½ ॥ इक्ष्वाकु बोले— मैं महान् देव गणेशजीको प्रणाम करके उन विघ्नराजका स्तवन करता हूँ, जो महान् देवता एवं गणोंके स्वामी हैं, शूरवीर तथा अपराजित हैं और ज्ञानवृद्धि करानेवाले हैं। जो एक, दो तथा चार दाँतोंवाले हैं, जिनकी चार भुजाएँ हैं, जो तीन नेत्रोंसे युक्त और हाथमें त्रिशूल धारण करते हैं, जिनके नेत्र रक्तवर्ण हैं, जो वर देनेवाले हैं, जो माता पार्वतीके पुत्र हैं, जिनके सूप-जैसे कान हैं, जिनका वर्ण कुछ-कुछ लाल है, जो दण्डधारी तथा अग्निमुख हैं एवं जिन्हें होम प्रिय है तथा जो प्रथम पूजित न होनेपर मनुष्योंके सभी कार्योंमें विघ्नकारी होते हैं, उन भीमकाय और उग्र स्वभाववाले पार्वतीनन्दन गणेशजीको मैं नमस्कार करता हूँ। जो मदसे मत्त रहते हैं, जिनके नेत्र भयंकर हैं और जो भक्तोंके विघ्न दूर करनेवाले हैं, करोड़ों सूर्यके समान जिनकी कान्ति है, खानसे काटकर निकाले हुए कोयलेकी भाँति जिनकी श्याम प्रभा है तथा जो विमल और शान्त हैं, उन भगवान् विनायकको मैं नमस्कार करता हूँ। मेरुगिरिके समान रूप और हाथीके मुख-सदृश मुखवाले, कैलासवासी गणपतिको नमस्कार है। विनायक देव ! आप विरूपधारी और ब्रह्मचारी हैं, भक्तजन आपकी स्तुति करते हैं, आपको बारंबार नमस्कार है ॥ ५—१२ ॥ पुराणपुरुष ! आपने पूर्ववर्ती देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये हाथीका स्वरूप धारण करके समस्त दानवोंको


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८४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २५

८४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २५

ऋषीणां देवतानां च नायकत्वं प्रकाशितम्। यतस्ततः सुरैरग्रे पूज्यसे त्वं भवात्मज ॥ १४

त्वामाराध्य गणाध्यक्षं सर्वज्ञं कामरूपिणम्। कार्यार्थं रक्तकुसुमै रक्तचन्दनवारिभिः ॥ १५

रक्ताम्बरधरो भूत्वा चतुर्थ्यामर्चयेज्जपेत्। त्रिकालमेककालं वा पूजयेन्नियताशनः ॥ १६

राजानं राजपुत्रं वा राजमन्त्रिणमेव वा। राज्यं च सर्वविघ्नेश वशं कुर्यात् सराष्ट्रकम् ॥ १७

अविघ्नं तपसो मह्यं कुरु नौमि विनायक। मयेत्थं संस्तुतो भक्त्या पूजितश्च विशेषतः ॥ १८

यत्फलं सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु यत्फलम्। तत्फलं पूर्णमाप्नोति स्तुत्वा देवं विनायकम् ॥ १९

विषमं न भवेत् तस्य न च गच्छेत् पराभवम्। न च विघ्नो भवेत् तस्य जातो जातिस्मरो भवेत् ॥ २०

य इदं पठते स्तोत्रं षड्भिर्मासैर्वरं लभेत्। संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः ॥ २१

भयभीत किया था। शिवपुत्र ! आपने ऋषि और देवताओंपर अपना स्वामित्व प्रकट कर दिया है, इसीसे देवगण आपकी प्रथम पूजा करते हैं। सर्वविघ्नेश्वर ! यदि मनुष्य रक्तवस्त्र धारणकर नियमित आहार करके अपने कार्यकी सिद्धिके लिये लाल पुष्पों और रक्तचन्दन-युक्त जलसे चतुर्थीके दिन तीनों काल या एक कालमें आप कामरूपी सर्वज्ञ गणपतिको पूजन करे तथा आपका नाम जपे तो वह पुरुष राजा, राजकुमार, राजमन्त्रीको राज्य अथवा समस्त राष्ट्रसहित अपने वशमें कर सकता है ॥ १३-१७ ॥

विनायक! मैं आपकी स्तुति करता हूँ। आप मेरे द्वारा भक्तिपूर्वक स्तवन एवं विशेषरूपसे पूजन किये जानेपर मेरी तपस्याके विघ्नको दूर कर दें। सम्पूर्ण तीर्थों और समस्त यज्ञोंमें जो फल प्राप्त होता है, उसी फलको मनुष्य भगवान् विनायकका स्तवन करके पूर्णरूपसे प्राप्त कर लेता है। उसपर कभी संकट नहीं आता, उसका कभी तिरस्कार नहीं होता और न उसके कार्यमें विघ्न ही पड़ता है; वह जन्म लेनेके बाद पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण करनेवाला होता है। जो प्रतिदिन इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह छः महीनोंतक निरन्तर पाठ करनेसे गणेशजीसे मनोवाञ्छित वर प्राप्त करता है और एक वर्षमें पूर्णतः सिद्धि प्राप्त कर लेता है—इसमें तनिक भी संशय नहीं है ॥ १८-२१ ॥

सूत उवाच

एवं स्तुत्वा पुरा राजा गणाध्यक्षं द्विजोत्तम। तापसं वेषमास्थाय तपश्चर्तुं गतो वनम् ॥ २२

उत्सृज्य वस्त्रं नागत्वक्सदृशं बहुमूल्यकम्। कठिनां तु त्वचं वार्क्षीं कट्यां धत्ते नृपोत्तमः ॥ २३

तथा रत्नानि दिव्यानि वलयानि निरस्य तु। अक्षसूत्रमलंकारं फलैः पद्मस्य शोभनम् ॥ २४

तथोत्तमाङ्गे मुकुटं रत्नहाटकशोभितम्। त्यक्त्वा जटाकलापं तु तपोऽर्थे बिभृयान्नृपः ॥ २५

कृत्वेत्थं स तपोवेषं वसिष्ठोक्तं तपोवनम्। प्रविश्य च तपस्तेपे शाकमूलफलाशनः ॥ २६

सूतजी बोले— द्विजोत्तमगण ! इस प्रकार राजा इक्ष्वाकु पहले गणेशजीका स्तवन करके, फिर तपस्वीका वेष धारणकर तप करनेके लिये वनमें चले गये। साँपकी त्वचाके समान मुलायम एवं बहुमूल्य वस्त्र त्यागकर वे श्रेष्ठ महाराज कमरमें वृक्षोंकी कठोर छाल पहनने लगे। दिव्य रत्नोंके हार और कड़े निकालकर हाथमें अक्षसूत्र तथा गलेमें कमलगट्टोंकी बनी हुई सुन्दर माला धारण करने लगे। इसी प्रकार वे नरेश मस्तकपरसे रत्न तथा सुवर्णसे सुशोभित मुकुट हटाकर वहाँ तपस्याके लिये जटाजूट रखने लगे ॥ २२-२५ ॥

इस प्रकार वसिष्ठजीके कथनानुसार तापस-वेष धारणकर तपोवनमें प्रविष्ट हो, वे शाक और फल-मूलका आहार करते हुए तपस्यामें प्रवृत्त हो गये।

अध्याय २५ ] इक्ष्वाकुकी तपस्या और ब्रह्माजीद्वारा विष्णुप्रतिमाकी प्राप्ति ८५ ग्रीष्मे पञ्चाग्निमध्यस्थोऽतपत्काले महातपाः। महातपस्वी राजा इक्ष्वाकु ग्रीष्म ऋतुमें पञ्चाग्निके बीच वर्षाकाले निरालम्बो हेमन्ते च सरोजले ॥ २७ स्थित होकर तपस्या करते थे, वर्षाके समय खुले मैदानमें रहते और शीतकालमें सरोवरके जलमें खड़े इन्द्रियाणि समस्तानि नियम्य हृदये पुनः। होकर तप करते थे। इस प्रकार समस्त इन्द्रियोंको मनो विष्णौ समावेश्य मन्त्रं वै द्वादशाक्षरम् ॥ २८ मनमें निरुद्ध करके, मनको भगवान् विष्णुमें लीन कर द्वादशाक्षर-मन्त्रका जप करते और वायु पीकर रहते हुए जपतो वायुभक्ष्यस्य तस्य राज्ञो महात्मनः। उन महात्मा राजाके समक्ष लोक-पितामह भगवान् ब्रह्माजी आविर्बभूव भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः॥ २९ प्रकट हुए। उन चार मुखोंवाले पद्मयोनि ब्रह्माजीको आया देख राजाने उन्हें भक्तिभावसे प्रणाम एवं उनकी तमागतमथालोक्य पद्मयोनिं चतुर्मुखम्। स्तुति करके संतुष्ट किया ॥ २६-३०॥ प्रणम्य भक्तिभावेन स्तुत्या च पर्यतोषयत्॥ ३० ( राजा बोले— ) 'संसारकी सृष्टि करनेवाले तथा नमो हिरण्यगर्भाय जगत्स्रष्ट्रे महात्मने। वेद-शास्त्रोंके मर्मज्ञ, चार मुखोंवाले महात्मा हिरण्यगर्भ वेदशास्त्रार्थविदुषे चतुर्वक्त्राय ते नमः ॥ ३१ ब्रह्माजीको नमस्कार है।' इस प्रकार स्तुति की जानेपर जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीने राज्य त्यागकर तपस्यामें लगे हुए इति स्तुतो जगत्स्रष्टा ब्रह्मा प्राह नृपोत्तमम्। उन शान्त एवं महान् सुखी श्रेष्ठ नरेशसे कहा ॥ ३११/२ ॥ तपस्यभिरतं शान्तं त्यक्तराज्यं महासुखम्। ब्रह्माजी बोले— राजन् ! समस्त विश्वको प्रकाशित ब्रह्मोवाच करनेवाले तुम्हारे पितामह सूर्य तथा पिता मनु भी सदा लोकप्रकाशको राजन् सूर्यस्तव पितामहः॥ ३२ ही सभी मुनियोंके मान्य हैं। तुम्हारे पिता और पितामहने भी पूर्वकालमें तीव्र तपस्या की थी। (उन्हींके समान मुनीनामपि सर्वेषां सदा मान्यो मनुः पिता। आज तुम भी तप कर रहे हो।) महामते नृपश्रेष्ठ ! सारा कृतवन्तौ तपः पूर्वं तीव्रं पितृपितामहौ ॥ ३३ राज्य-भोग छोड़कर किसलिये यह घोर तप कर रहे हो ? इसका कारण बताओ ॥ ३२-३४॥ किमर्थं राज्यभोगं तु त्यक्त्वा सर्वं नृपोत्तम। तपः करोषि घोरं त्वं समाचक्ष्व महामते ॥ ३४ ब्रह्माजीके इस प्रकार पूछनेपर राजाने उनको प्रणाम करके कहा— 'ब्रह्मन्! मैं तपोबलसे शङ्ख, चक्र और इत्युक्तो ब्रह्मणा राजा तं प्रणम्याब्रवीद्वचः। गदा धारण करनेवाले भगवान् मधुसूदनका प्रत्यक्ष दर्शन द्रष्टुमिच्छंस्तपश्चर्याबलेन मधुसूदनम् ॥ ३५ करनेकी इच्छा लेकर ही ऐसा तप कर रहा हूँ।' राजाके यों कहनेपर कमलजन्मा ब्रह्माजीने हँसते हुए-से उनसे करोम्येवं तपो ब्रह्मन् शङ्खचक्रगदाधरम्। कहा ॥ ३५-३६ ॥ इत्युक्तः प्राह राजानं पद्मजन्मा हसन्निव ॥ ३६ "राजन् ! सर्वत्र व्यापक भगवान् नारायणका दर्शन न शक्यस्तपसा द्रष्टुं त्वया नारायणो विभुः। तुम केवल तपस्यासे नहीं कर सकोगे। (औरोंकी तो मादृशैरपि नो दृश्यः केशवः क्लेशनाशनः॥ ३७ बात ही क्या है,) हमारे-जैसे लोगोंको भी क्लेशनाशन भगवान् केशवका दर्शन नहीं हो पाता। महामते ! मैं तुम्हें पुरातनीं पुण्यकथां कथयामि निबोध मे। एक पुरातन पवित्र कथा सुनाता हूँ, सुनो— 'प्रलयकी निशान्ते प्रलये लोकान् निनीय कमलेक्षणः ॥ ३८ रातमें कमललोचन भगवान् विष्णुने समस्त लोकोंको In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

८६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २५

८६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २५ अनन्तभोगशयने योगनिद्रां गतो हरिः। अपनेमें लीन कर लिया और सनन्दन आदि मुनियोंसे सनन्दनाद्यैर्मुनिभिः स्तूयमानो महामते॥ ३९ अपनी स्तुति सुनते हुए वे 'अनन्त' नामक शेषनागकी शय्यापर योगनिद्राका आश्रय ले सो गये। राजन्! उन तस्य सुप्तस्य नाभौ तु महत्पद्ममजायत। सोये हुए भगवान्‌की नाभिसे प्रकाशमान एक बहुत बड़ा तस्मिन् पद्मे शुभे राजन् जातोऽहं वेदवित् पुरा॥ ४० कमल उत्पन्न हुआ। पूर्वकालमें उस प्रकाशमान कमलपर सर्वप्रथम मुझ वेदवेत्ता ब्रह्माका ही आविर्भाव हुआ। तत्पश्चात् ततो भूत्वा त्वधोदृष्टिर्दृष्टवान् कमलेक्षणम्। नीचेकी ओर दृष्टि करके मैंने खानसे काटकर निकाले हुए अनन्तभोगपर्यङ्के भिन्नाञ्जननिभं हरिम्॥ ४१ कोयलेके समान श्यामवर्णवाले भगवान् विष्णुको शेषनागकी शय्यापर सोते देखा। उनके श्रीअङ्गोंकी कान्ति अलसीके अतसीकुसुमाभासं शयानं पीतवाससम्। फूलकी भाँति सुन्दर जान पड़ती थी, दिव्य रत्नोंके आभरणोंसे दिव्यरत्नविचित्राङ्गं मुकुटेन विराजितम्॥ ४२ उनके श्रीविग्रहकी विचित्र शोभा हो रही थी और उनका मस्तक मुकुटसे शोभायमान था॥ ३७-४२॥ कुन्देन्दुसदृशाकारमनन्तं च महामते। 'महामते! उस समय मैंने उन अनन्तदेव शेषनागका सहस्रफणमध्यस्थैर्मणिभिर्दीप्तिमत्तरम् ॥४३ भी दर्शन किया, जिनका आकार कुन्द और चन्द्रमाके समान श्वेत था तथा जो हजारों फणोंकी मणियोंसे क्षणमात्रं तु तं दृष्ट्वा पुनस्तत्र न दृष्टवान्। अत्यन्त देदीप्यमान हो रहे थे। नृपश्रेष्ठ! क्षणभर ही वहाँ दुःखेन महताऽऽविष्टो बभूवाहं नृपोत्तम॥ ४४ उन्हें देखकर मैं फिर उनका दर्शन न पा सका, इससे अत्यन्त दुःखी हो गया। तब मैं कौतूहलवश निरामय ततो न्ववातरं तस्मात् पद्मनालं समाश्रितः। भगवान् नारायणका दर्शन करनेके लिये कमलनालका कौतूहलेन तं द्रष्टुं नारायणमनामयम्॥ ४५ सहारा ले वहाँसे नीचे उतरा; परंतु राजेन्द्र! उस समय जलके भीतर बहुत खोजनेपर भी मैं उन लक्ष्मीपतिका ततस्त्वन्विष्य राजेन्द्र सलिलान्ते न दृष्टवान्। पुन: दर्शन न पा सका। तब मैं फिर उसी कमलका श्रीशं पुनस्तमेवाहं पद्माश्चित्य चिन्तयन्॥ ४६ आश्रय ले वासुदेवके उसी रूपका चिन्तन करता हुआ उनके दर्शनके लिये बड़ी भारी तपस्या करने लगा। तद्रूपं वासुदेवस्य द्रष्टुं तेपे महत्तपः। तत्पश्चात् अन्तरिक्षके भीतरसे किसी अव्यक्त शरीरवाली ततो मामन्तरिक्षस्था वागुवाचाशरीरिणी॥ ४७ वाणीने मुझसे कहा॥ ४३-४७॥ वृथा किं क्लिश्यते ब्रह्मन् साम्प्रतं कुरु मे वचः। "ब्रह्मन्! क्यों व्यर्थ क्लेश उठा रहे हो? इस समय न दृश्यो भगवान् विष्णुस्तपसा महतापि ते॥ ४८ मेरी बात मानो। बहुत बड़ी तपस्यासे भी तुम्हें भगवान् विष्णुका दर्शन नहीं हो सकेगा। यदि यहाँ शुद्ध स्फटिक- सृष्टिं कुरु तदाज्ञप्तो यदि द्रष्टुमिहेच्छसि। मणिके समान श्वेत नाग-शय्यापर शयन करनेवाले भगवान् शुद्धस्फटिकसंकाशनागपर्यङ्कशायिनम् ॥४९ विष्णुका दर्शन करना चाहते हो तो उनके आज्ञानुसार सृष्टि करो। महामते! तुमने 'शार्ङ्ग' धनुष धारण करनेवाले उन यद्दृष्टं शार्ङ्गिणो रूपं भिन्नाञ्जनसमप्रभम्। भगवान्‌का, जो अञ्जन-पुञ्जके समान श्याम सुषमासे युक्त प्रतिभानियतं रूपं विमानस्थं महामते॥ ५० तथा स्वभावतः प्रतिभाशालीरूप विमान (शेषशय्या) - पर स्थित देखा है, उसीका आलस्यरहित होकर भजन-ध्यान भज नित्यमनालस्यस्ततो द्रक्ष्यसि माधवम्। करो, तब उन माधवको देख सकोगे॥ ४८-५०½ ॥ तयेत्थं चोदितो राजंस्त्यक्त्वा तममनुक्षणम्॥ ५१ "राजन्! उस आकाशवाणीद्वारा इस प्रकार प्रेरित हो मैंने निरन्तर की जानेवाली तीव्र तपस्याका अनुष्ठान In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय २५ ] इक्ष्वाकुकी तपस्या और ब्रह्माजीद्वारा विष्णुपतिमाकी प्राप्ति ८७ सृष्टवान् लोकभूतानां सृष्टिं सृष्ट्वा स्थितस्य च। त्यागकर इस जगत्के प्राणियोंकी सृष्टि की। सृष्टि करके आविर्बभूव मनसि विश्वकर्मा प्रजापतिः॥५२ स्थित होनेपर मेरे हृदयमें प्रजापति विश्वकर्माका प्राकट्य हुआ। उन्होंने 'अनन्त' नामक शेषनाग और भगवान् अनन्तकृष्णयोस्तेन द्वे रूपे निर्मिते शुभे। विष्णुकी दो चमकीली प्रतिमाएँ बनायीं। नरेश्वर ! मैंने विमानस्थो यथापूर्वं मया दृष्टो जले नृप॥ ५३ पहले जलके भीतर शेष-शय्यापर जिस रूपमें देख चुका था, उसी रूपमें भगवान् श्रीहरिकी वह प्रतिमा बनायी तथैव तं ततो भक्त्या सम्पूज्याहं हरिं स्थितः। गयी थी। तब मैं उन श्रीहरिके उस श्रीविग्रहकी भक्तिपूर्वक तत्प्रसादात्तपः श्रेष्ठं मया ज्ञानमनुत्तमम् ॥ ५४ पूजा करके और उन्हींके प्रसादसे श्रेष्ठ तपरूप परम उत्तम ज्ञान प्राप्त करके विकाररहित नित्यानन्दमय मोक्ष- लब्ध्वा मुक्तिं च पश्यामि अविकारक्रियासुखम्। सुखका अनुभव करने लगा॥ ५१-५४ १/२ ॥ तदहं ते प्रवक्ष्यामि हितं नृपवरेश्वर ॥ ५५ "राजराजेश्वर ! इस समय मैं तुम्हारे हितकी बात बता रहा हूँ, सुनो-राजन् ! इस घोर तपस्याको छोड़कर अब विसृज्यैतत्तपो घोरं पुरीं व्रज निजां नृप। अपनी पुरीको लौट जाओ। प्रजाओंका पालन करना ही प्रजानां पालनं धर्मस्तपश्चैव महीभृताम् ॥ ५६ राजाओंका धर्म तथा तप है। मैं सिद्धों और ब्राह्मणोंसहित उस विमानको, जिसपर भगवान्की प्रतिमा है, तुम्हारे विमानं प्रेषयिष्यामि सिद्धद्विजगणान्वितम्। पास भेजूँगा। उसीमें तुम सुन्दर बाह्य उपचारोंद्वारा उन तत्राराध्य देवेशं बाह्यार्थैरखिलैः शुभैः ॥ ५७ देवेश्वरकी आराधना करो। नृपश्रेष्ठ ! तुम यज्ञोंद्वारा 'अनन्त' नामक शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले भगवान् नारायणमनन्ताख्ये शयानं क्रतुभिर्यजन्। नारायणका निष्कामभावसे यज्ञोंद्वारा आराधन करते हुए निष्कामो नृपशार्दूल प्रजा धर्मेण पालय ॥ ५८ धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करो। नृप ! भगवान् वासुदेवकी कृपासे अवश्य ही तुम्हारी मुक्ति हो जायगी।" राजासे प्रसादाद्वासुदेवस्य मुक्तिस्ते भविता नृप। यों कहकर लोकपितामह ब्रह्माजी अपने धामको चले इत्युक्त्वा तं जगामाथ ब्रह्मलोकं पितामहः ॥ ५९ गये॥ ५५-५९ ॥ द्विज ! ब्रह्माजीके चले जानेपर राजा इक्ष्वाकु उनकी इक्ष्वाकुश्चिन्तयन्नास्ते पद्मयोनिवचो द्विज। बातोंपर विचार ही कर रहे थे, तबतक उनके समक्ष आविर्बभूव पुरतो विमानं तन्महीभृतः ॥ ६० वह विष्णु और अनन्तकी प्रतिमाओंका शुभ विमान, जिसे ब्रह्माजीने दिया था, सिद्ध ब्राह्मणोंसहित प्रकट हो ब्रह्मदत्तं द्विजयुतं माधवानन्तयोः शुभम्। गया। उन भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन करके उन्होंने तं दृष्ट्वा परया भक्त्या नत्वा च पुरुषोत्तमम् ॥ ६१ बड़ी भक्तिके साथ उन्हें प्रणाम किया तथा साथमें आये हुए ऋषियों एवं ब्राह्मणोंको भी नमस्कार करके ऋषीन् प्रणम्य विप्रांश्च तदादा ययौ पुरीम्। वे उस विमानको लेकर अपनी पुरीको गये। वहाँ पौरैर्जनैश्च नारीभिर्दृष्टः शोभासमन्वितैः ॥ ६२ नगरके सभी शोभायमान स्त्री-पुरुषोंने राजाका दर्शन किया और लावा छींटते हुए वे उन्हें राजभवनमें ले लाजा विनिक्षिपद्भिश्च नीतो राजा स्वकं गृहम्। गये। राजाने अपने विशाल मन्दिरमें उस सुन्दर वैष्णव- स्वमन्दिरे विशाले तु विमानं वैष्णवं शुभम् ॥ ६३ विमानको स्थापित किया और साथ आये हुए उन In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

८८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २५

८८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २५ संस्थाप्याराधयामास तैर्द्विजैरर्चितं हरिम्। महिष्यः शोभना यास्तु पिष्ट्वा तु हरिचन्दनम् ॥ ६४ मालां कृत्वा सुगन्धाढ्यां प्रीतस्तस्य ववर्ध ह। पौराः कर्पूरश्रीखण्डं कुङ्कुमाद्यगुरुं तथा ॥ ६५ कृत्स्नं विशेषतो वस्त्रं महिषाख्यं च गुग्गुलम्। पुष्पाणि विष्णुयोग्यानि ददुरानीय भूपतेः ॥ ६६ विमानस्थं हरिं पूज्य गन्धपुष्पादिभिः क्रमात्। त्रिसन्ध्यं परया भक्त्या जपैः स्तोत्रैश्च वैष्णवैः ॥ ६७ गीतैः कोलाहलैः शब्दैः शङ्खवादित्रनादितैः। प्रेक्षणैरपि शास्त्रोक्तैः प्रीतैश्च निशिजागरैः ॥ ६८ कारयामास सुचिरमुत्सवं परमं हरेः। यागैश्च तोषयित्वा तं सर्वदेवमयं हरिम् ॥ ६९ निष्कामो दानधर्मैश्च परं ज्ञानमवाप्तवान्। यजन् यज्ञं महीं रक्षन् स कुर्वन् केशवर्चनम् ॥ ७० उत्पाद्य पुत्रान् पित्रर्थं ध्यानात्त्यक्त्वा कलेवरम्। ध्यायन् वै केवलं ब्रह्म प्राप्तवान् वैष्णवं पदम् ॥ ७१ अजं विशोकं विमलं विशुद्धं शान्तं सदानन्दचिदात्मकं ततः। विहाय संसारमनन्तदुःखं जगाम तद्विष्णुपदं हि राजा ॥ ७२ ब्राह्मणोंद्वारा पूजित भगवान् विष्णुकी वे आराधना करने लगे। उनकी सुन्दरी रानियाँ चन्दन घिसकर और सुगन्धित फूलोंका हार गूँथकर अर्पण करती थीं, इससे राजाको बड़ी प्रसन्नता होती थी। इसी प्रकार नगर- निवासी जन कपूर, श्रीखण्ड, कुङ्कुम, अगुरु आदि सभी उपचार और विशेषतः वस्त्र, गुग्गुल तथा श्रीविष्णुके योग्य पुष्प ला-लाकर राजाको अर्पित करते थे ॥ ६०-६६ ॥ राजा तीनों संध्याओंमें विमानपर विराजमान भगवान् श्रीहरिकी क्रमशः गन्ध-पुष्प आदि उपचारोंद्वारा बड़ी भक्तिसे पूजा करते थे। श्रीविष्णुके नामोंका जप, उनके स्तोत्रोंका पाठ, उनके गुणोंका गान और शङ्ख आदि वाद्योंका शब्द करते-कराते थे। शास्त्रोक्त विधिसे प्रेमपूर्वक सजायी हुई भगवान्‌की झाँकियों तथा रात्रिमें जागरण आदिके द्वारा वे सदा ही देरतक भगवत्सम्बन्धी उत्सव कराया करते थे। निष्कामभावसे किये गये यज्ञ, दान तथा धर्माचरणोंद्वारा उन सर्वदेवमय भगवान् विष्णुको सन्तुष्ट करके राजाने परम उत्तम ज्ञान प्राप्त कर लिया। यज्ञोंका अनुष्ठान, पृथ्वीका पालन और भगवान् केशवका पूजन करते हुए राजाने पितृगणोंकी तृप्तिके निमित्त श्राद्ध आदि कर्म करनेके लिये पुत्रोंको उत्पन्न किया और केवल ब्रह्मका चिन्तन करते हुए ध्यानके द्वारा ही शरीरका त्यागकर भगवान् विष्णुके धामको प्राप्त कर लिया। इस प्रकार राजा इक्ष्वाकु अनन्त दुःखोंसे पूर्ण संसारका त्याग करके अज, अशोक, अमल, विशुद्ध, शान्त एवं सच्चिदानन्दमय विष्णुपदको प्राप्त हो गये ॥ ६७-७२ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे इक्ष्वाकुचरिते पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणके अन्तर्गत 'इक्ष्वाकुचरित्र' विषयक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५ ॥ । In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

छब्बीसवाँ अध्याय

अध्याय २६ ] इक्ष्वाकुकी संततिका वर्णन ८९ छब्बीसवाँ अध्याय इक्ष्वाकुकी संततिका वर्णन श्रीसूत उवाच श्रीसूतजी बोले—इक्ष्वाकुके ज्येष्ठ पुत्रका नाम था विकुक्षि। वह अपने पिताके मुक्त हो जानेपर महर्षियोंद्वारा इक्ष्वाकोर्विकुक्षिनामपुत्रः। स तु सिद्धे पितरि राज्यपदपर अभिषिक्त हुआ और धर्मपूर्वक पृथ्वीका महर्षिभिरभिषिक्तो धर्मेण पृथिवीं पालयन् पालन करने लगा। राजा विकुक्षिने विमानपर विराजमान विमानस्थमनन्तभोगशायिनमच्युतमाराध्य यागैरपि शेषशायी भगवान् विष्णुकी आराधना करते हुए अनेक देवानिष्ट्वा स्वपुत्रं राज्ये सुबाहुमभिषिच्य दिवमारुरोह। यज्ञोंद्वारा देवताओंका भी यजन किया। अन्तमें वे अपने सुबाहोर्भ्राजमानादुद्योतोऽभिगीयते। स तु सप्तद्वीपां पुत्र सुबाहुको राज्यपर अभिषिक्तकर स्वयं स्वर्गगामी हो पृथ्वीं धर्मेण पालयित्वा भक्तिं परां नारायणे गये। अब तेजस्वी राजा सुबाहुके पुत्र उद्योतका यशोगान पितामहवत् कृत्वा ऋतुभिर्भूरिदक्षिणैर्यज्ञेश्वरं किया जाता है। उद्योतने सातों द्वीपोंवाली पृथ्वीका निष्कामेन मनसेष्ट्वा नित्यं निरञ्जनं निर्विकल्पं परं धर्मपूर्वक पालन किया। उन्होंने अपने पितामह राजा ज्योतिरमृताक्षरं परमात्मरूपं ध्यात्वा हरिमन्तं च इक्ष्वाकुकी ही भाँति भगवान् नारायणमें पराभक्ति करके परमाराध्य स्वर्गलोकं गतः ॥ १ ॥ प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा यज्ञपति विष्णुका निष्कामभावसे यजन किया तथा नित्य, निरञ्जन, निर्विकल्प, अमृत, अक्षर, परम, ज्योतिर्मय परमात्मरूपका चिन्तन करते हुए श्रीविष्णु और अनन्तकी आराधना करके वे परमधामको प्राप्त हुए ॥ १ ॥ तस्य युवनाश्वो युवनाश्वस्य च मांधाता उनके पुत्र युवनाश्व हुए, युवनाश्वके पुत्र मांधाता। पुत्रोऽभवत् । स चाभिषिक्तो महर्षिभिर्निसर्गादेव मांधाता स्वभावसे ही भगवान् विष्णुके भक्त थे। विष्णुभक्तोऽनन्तशयनमच्युतं भक्त्याऽऽराध्यन् महर्षियोंने जब उनका राज्याभिषेक कर दिया, तब यागैश्च विविधैरिष्ट्वा सप्तद्वीपवतीं पृथिवीं परिपाल्य शेषशायी भगवान् विष्णुकी भक्तिपूर्वक आराधना तथा दिवं गतः ॥ २ ॥ विविध यज्ञोंद्वारा यजन करते हुए उन्होंने सातों द्वीपोंसे युक्त पृथ्वीका पालन किया और अन्तमें उनका वैकुण्ठवास हुआ ॥ २ ॥ यस्यैष श्लोको गीयते। मांधाताके ही विषयमें यह श्लोक अबतक गाया जाता है— यावत्सूर्य उदेति स्म यावच्च प्रतितिष्ठति। 'जहाँसे सूर्य उदय होता और जहाँतक जाकर अस्त सर्वं तद्यौवनाश्वस्य मांधातुः क्षेत्रमुच्यते ॥ ३ ॥ होता है, वह सब युवनाश्वके पुत्र मांधाताका ही क्षेत्र कहलाता है' ॥ ३ ॥ मांधाताका पुत्र पुरुकुश्य (या पुरुकुत्स) हुआ, तस्य पुरुकुश्योऽभवद् येन देवा ब्राह्मणाश्च जिसने यज्ञ और दानके द्वारा देवताओं तथा यागदानैः संतुष्टाः ॥ ४ ॥ पुरुकुश्याद् दृषदो ब्राह्मणोंको संतुष्ट किया था। पुरुकुश्यसे दृषद और

९० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २६

९० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २६ हृषददादभिशम्भुः। अभिशम्भोर्दारुणो दारुणात्सगरः ॥ ५ ॥ सगराद्धर्यश्वो हर्यश्वाद्धारीतो हारीताद्रोहिताश्वः। रोहिताश्वादंशुमान् ॥ ६ ॥ अंशुमतो भगीरथः। येन महता तपसा पुरा दिवो गङ्गा अशेषकल्मषनाशिनी चतुर्विधपुरुषार्थदायिनी भुवमानीता। अस्थिशर्कराभूताः कपिलमहर्षि- निर्दग्धाश्च गुरवः सगराख्या गङ्गातोयसंस्पृष्टा दिवमारोपिताः। भगीरथात् सौदासः सौदासात् सत्रसवः ॥ ७॥ सत्रसवा- दनरण्योऽनरण्यद्दीर्घबाहुः ॥ ८ ॥ दीर्घबाहो- रजोऽजाद्दशरथः। तस्य गृहे रावणविनाशार्थं साक्षान्नारायणोऽवतीर्णो रामः ॥ ९ ॥ स तु पितृवचनाद् भ्रातृभार्यासहितो दण्डकारण्यं प्राप्य तपश्चचार। वने रावणापहृतभार्यो भ्रात्रा सह दुःखितोऽनेककोटिवानरनायकसुग्रीवसहायो महोदधौ सेतुं निबध्य तैरंगत्वा लङ्कां रावणं देवकण्टकं सबान्धवं हत्वा सीतामादाय पुनरयोध्यां प्राप्य भरताभिषिक्तो विभीषणाय लङ्काराज्यं विमानं वा दत्त्वा तं प्रेषयामास। स तु परमेश्वरो विमानस्थो विभीषणेन नीयमानो लङ्कायामपि राक्षसपुर्यां वस्तुमनिच्छन् पुण्यारण्यं तत्र स्थापितवान् ॥ १० ॥ तन्निरीक्ष्य तत्रैव महाहिभोगशयने भगवान् शेते। सोऽपि विभीषणस्ततस्तद्विमानं नेतुमसमर्थः, तद्वचनात् स्वां पुरीं जगाम ॥ ११॥ नारायणसंनिधानान्महद्वैष्णवं क्षेत्रमभवदद्यापि दृश्यते। रामाल्लवो लवात्पद्मः पद्मादृतुपर्ण दृषदसे अभिशम्भु हुआ। अभिशम्भुसे दारुण और दारुणसे सगरका जन्म हुआ। सगरसे हर्यश्व, हर्यश्वसे हारीत, हारीतसे रोहिताश्व, रोहिताश्वसे अंशुमान् और अंशुमान्‌से भगीरथ हुए, जो पूर्वकालमें बहुत बड़ी तपस्या करके समस्त पापोंका नाश करनेवाली और चारों पुरुषार्थोंको देनेवाली गङ्गाको आकाशसे पृथ्वीपर ले आये। उन्होंने गङ्गाजलके स्पर्शसे अपने 'सगर' संज्ञक पितरोंको, जो महर्षि कपिलके शापसे दग्ध होकर अस्थि-भस्ममात्र शेष रह गये थे, स्वर्गलोकको पहुँचा दिया। भगीरथसे सौदास और सौदाससे सत्रसवका जन्म हुआ। सत्रसवसे अनरण्य और अनरण्यसे दीर्घबाहु हुआ। दीर्घबाहुसे अज तथा अजसे दशरथ हुए। इनके घरमें साक्षात् भगवान् नारायण रावणका नाश करनेके लिये 'राम' रूपमें अवतीर्ण हुए थे ॥ ४-९॥ राम अपने पिताके कहनेसे छोटे भाई लक्ष्मण तथा पत्नीसहित दण्डकारण्यमें जाकर तपस्या करने लगे। उस वनमें रावणने इनकी पत्नी सीताका अपहरण कर लिया। इससे दुःखी होकर वे अपने भाई लक्ष्मणको साथ लेकर अनेक करोड़ वानर-सेनाके अधिपति सुग्रीवको सहायक बनाकर चले और महासागरमें पुल बाँधकर उन सबके साथ लङ्कामें जा पहुँचे। वहाँ देवताओंके मार्गका काँटा बने हुए रावणको उसके बन्धु-बान्धवोंसहित मारकर सीताको साथ ले पुनः अयोध्यामें लौट आये। अयोध्यामें भरतजीने उनका 'राजा' के पदपर अभिषेक किया। श्रीरामने विभीषणको लङ्काका राज्य तथा (विष्णुप्रतिमायुक्त) विमान देकर अयोध्यासे विदा किया। विमानपर विराजमान परमेश्वर विष्णु विभीषणद्वारा ले जाये जानेपर भी राक्षसपुरी लङ्कामें निवास करना नहीं चाहते थे, अतः विभीषणने वहाँ जिस पवित्र वनकी स्थापना की थी, उसको देखकर वे उसीमें स्थित हो गये। वहाँ महान् सर्प-शरीरकी शय्यापर भगवान् शयन करते हैं। विभीषण भी जब वहाँसे उस विमानको ले जानेमें असमर्थ हो गये, तब भगवान्‌के ही कहनेसे वे उन्हें वहीं छोड़ अपनी पुरी लङ्काको चले गये ॥ १०-११॥ भगवान् नारायणकी उपस्थितिसे वह स्थान महान् वैष्णवतीर्थ हो गया, जो आज भी श्रीरङ्गक्षेत्रके नामसे प्रसिद्ध देखा जाता है। रामसे लव, लवसे पद्म, पद्मसे

अध्याय २७ ] चन्द्रवंशका वर्णन ९१

ऋतुपर्णादस्त्रपाणिः। अस्त्रपाणेः शुद्धोदनः। ऋतुपर्ण, ऋतुपर्णसे अस्त्रपाणि, अस्त्रपाणिसे शुद्धोदन शुद्धोदनाद्बुधः। बुधाद्वंशो निवर्तते ॥ १२ ॥ और शुद्धोदनसे बुध (बुद्ध)-की उत्पत्ति हुई; बुधसे इस वंशकी समाप्ति हो जाती है ॥ १२ ॥ एते महीपा रविवंशजास्तव मैंने यहाँ आपके समक्ष पूर्ववर्ती उन प्रधान-प्रधान प्राधान्यतस्ते कथिता महाबलाः। महाबली सूर्यवंशी राजाओंका नामोल्लेख किया है, पुरातनैर्येर्वसुधा प्रपालिता जिन्होंने धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन और यज्ञ-क्रियाओंद्वारा यज्ञक्रियाभिश्च दिवौकसैर्नृपैः ॥ १३ ॥ देवताओंका भी पोषण किया था ॥ १३ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे सूर्यवंशानुचरितं नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'सूर्यवंशका अनुचरित' नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६ ॥ सत्ताईसवाँ अध्याय चन्द्रवंशका वर्णन सूत उवाच सूतजी बोले—अब संक्षेपसे चन्द्रवंशी राजाओंके अथ सोमवंशोद्गवानां भूभुजां संक्षेपेण चरित्रका वर्णन किया जाता है। कल्पके आदिकी बात चरितमुच्यते ॥ १ ॥ आदौ तावत् समस्तं त्रैलोक्यं है। ऋक्, यजुष्, साम और अथर्ववेदस्वरूप भगवान् कुक्षौ कृत्वा एकार्णवे महाम्भसि नारायण समस्त त्रिभुवनको अपने उदरमें लीन करके नागभोगशयने ॥ २ ॥ ऋङ्मयो यजुर्मयः एकार्णवकी अगाध जलराशिमें शेषनागकी शय्यापर योगनिद्राका साममयोऽथर्वमयो भगवान्नारायणो योगनिद्रां आश्रय ले सो रहे थे। सोये हुए उन भगवान्‌की नाभिसे समारेभे। तस्य सुप्तस्य नाभौ महापद्ममजायत। तस्मिन् एक महान् कमल प्रकट हुआ। उस कमलमें चतुर्मुख पद्मे चतुर्मुखो ब्रह्माभवत् ॥ ३ ॥ तस्य ब्रह्मणो मानसः ब्रह्माका आविर्भाव हुआ। उन ब्रह्माजीके मानसपुत्र अत्रि पुत्रोऽत्रिरभवत्। अत्रे्रनसूयायां सोमः। स तु हुए। अत्रिसे अनसूयाके गर्भसे चन्द्रमाका जन्म हुआ। प्रजापतेर्दक्षस्य त्रयस्त्रिंशत् कन्या रोहिण्याद्या भार्यार्थं उन्होंने दक्ष प्रजापतिकी रोहिणी आदि तैंतीस कन्याओंको गृहीत्वा प्रियायां ज्येष्ठायां विशेषात् प्रसन्नमनाः पत्नी बनानेके लिये ग्रहण किया और ज्येष्ठ भार्या रोहिणीसे रोहिण्यां बुधं पुत्रमुत्पादयामास ॥ ४ ॥ बुधोऽपि उसके प्रति अधिक प्रसन्न रहनेके कारण, 'बुध' नामक सर्वशास्त्रज्ञः प्रतिष्ठाने पुरेऽवसत्। इलायां पुरूरवसं पुत्र उत्पन्न किया। बुध भी समस्त शास्त्रोंके ज्ञाता होकर पुत्रमुत्पादयामास। तस्यातिशयरूपान्वितस्य प्रतिष्ठानपुरमें निवास करने लगे। उन्होंने इलाके गर्भसे स्वर्गभोगान् विहाय उर्वशी बहुकालं भार्या पुरूरवा नामक पुत्रको जन्म दिया। पुरूरवा बहुत ही सुन्दर बभूव ॥ ५ ॥ पुरूरवसः उर्वश्यामायुः पुत्रो जज्ञे। स थे, अतः उर्वशी नामक अप्सरा बहुत कालतक स्वर्गके तु राज्यं धर्मतः कृत्वा दिवमारुरोह ॥ ६ ॥ आयो भोगोंको त्यागकर इनकी भार्या बनी रही। पुरूरवाद्वारा रूपवत्यां नहुषः पुत्रोऽभवत्। येनेन्द्रत्वं प्राप्तम्। उर्वशीके गर्भसे आयु नामक पुत्रका जन्म हुआ। वह नहुषस्यापि पितृमत्यां ययातिः ॥ ७ ॥ यस्य वंशजा धर्मपूर्वक राज्य करके अन्तमें स्वर्गलोकको चला गया। आयुके रूपवतीसे नहुष नामक पुत्र हुआ, जिसने इन्द्रत्व प्राप्त किया था। नहुषके भी पितृमतीके गर्भसे ययाति In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

९२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २७

९२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २७ वृष्णयः। ययातेः शर्मिष्ठायां पूरुरभवत्॥८॥ हुए, जिनके वंशज वृष्णि कहलाते हैं। ययातिके पूरोर्वंशदायां संयातिः पुत्रोऽभवत्। यस्य पृथिव्यां शर्मिष्ठाके गर्भसे पूरु हुए। पूरुके वंशदासे संयाति नामक पुत्र हुआ, जिसको इस पृथिवीपर सभी तरहके सम्प्रन्नाः सर्वे कामाः॥९॥ मनोवाञ्छित भोग प्राप्त थे॥१-९॥ संयातेर्भानुदत्तायां सार्वभौमः। स तु सर्वां पृथिवीं संयातिसे भानुदत्ताके गर्भसे सार्वभौम नामक पुत्र हुआ। उसने सम्पूर्ण पृथिवीका धर्मपूर्वक पालन करते धर्मेण परिपालयन्नरसिंहं भगवन्तमाराध्य यागदानैः हुए यज्ञ-दान आदिके द्वारा भगवान् नृसिंहकी आराधना सिद्धिमप॥१०॥ तस्य सार्वभौमस्य वैदेह्यां भोजः। करके सिद्धि (मुक्ति) प्राप्त कर ली। उपर्युक्त सार्वभौमसे वैदेहीके गर्भसे भोज उत्पन्न हुआ, जिसके वंशमें कालनेमि यस्य वंशे पुरा देवासुरसंग्रामे विष्णुचक्रहतः नामक राक्षस, जो पहले देवासुर-संग्राममें भगवान् विष्णुके कालनेमिः कंसो भूत्वा वृष्णिवंशजेन वासुदेवेन चक्रसे मारा गया था, कंसके रूपमें उत्पन्न हुआ और वृष्णिवंशी वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके हाथसे मारा घातितो निधनं गतः॥११॥ जाकर मृत्युको प्राप्त हुआ॥१०-११॥ तस्य भोजस्य कलिङ्गायां दुष्षन्तः। स तु नरसिंहं भोजकी पत्नी कलिङ्गासे दुष्षन्तका जन्म हुआ। वह भगवन्तमाराध्य तत्प्रसादात्रिष्कण्टकं राज्यं धर्मेण भगवान् नृसिंहकी आराधना करके उनकी प्रसन्नतासे धर्मपूर्वक निष्कण्टक राज्य भोगकर जीवनके अन्तमें कृत्वा दिवं प्राप्तवान्। दुष्षन्तस्य शकुन्तलायां स्वर्गको प्राप्त हुआ। दुष्षन्तको शकुन्तलाके गर्भसे भरत भरतः। स तु धर्मेण राज्यं कुर्वन् ऋतुभिर्भूरि- नामक पुत्र प्राप्त हुआ। वह धर्मपूर्वक राज्य करता हुआ प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंसे सर्वदेवमय भगवान् विष्णुकी दक्षिणैः सर्वदेवतामयं भगवन्तमाराध्य आराधना करके कर्माधिकारसे निवृत्त एवं ब्रह्मध्यान- निवृत्ताधिकारो ब्रह्मध्यानपरो वैष्णवे परे ज्योतिषि परायण हो परम ज्योतिर्मय वैष्णवधाममें लीन हो गया॥१२॥ लयमवाप॥१२॥ भरतके उसकी पत्नी आनन्दाके गर्भसे अजमीढ भरतस्य आनन्दायामजमीढः। स च परमवैष्णवो नामक पुत्र हुआ। वह परम वैष्णव था। राजा अजमीढ नरसिंहमाराध्य जातपुत्रो धर्मेण कृतराज्यो भगवान् नृसिंहकी आराधनासे पुत्रवान् होकर धर्मपूर्वक राज्य करनेके पश्चात् श्रीविष्णुधामको प्राप्त हुए। अजमीढके विष्णुपुरमपारुरोह॥१३॥ अजमीढस्य सुदेव्यां वृष्णिः सुदेवीके गर्भसे वृष्णि नामक पुत्र हुआ। वह भी बहुत पुत्रोऽभवत्। सोऽपि बहुवर्षं धर्मेण राज्यं कुर्वन् वर्षोंतक धर्मपूर्वक राज्य करता रहा। दुष्टोंका दमन और सज्जनोंका पालन करते हुए उसने सातों द्वीपोंसे दुष्टनिग्रहं शिष्टपरिपालनं सप्तद्वीपां पृथ्वीं वशे चक्रे। युक्त पृथिवीको अपने वशमें कर लिया था। वृष्णिके वृष्णोरुग्रसेनायां प्रत्यङ्गः पुत्रो बभूव॥१४॥ सोऽपि उग्रसेनाके गर्भसे प्रत्यङ्ग नामक पुत्र हुआ। वह भी धर्मपूर्वक पृथिवीका पालन करता था। उसने प्रतिवर्ष धर्मेण मेदिनीं पालयन् प्रतिसंवत्सरं ज्योतिष्टोमं चकार। ज्योतिष्टोमयागका अनुष्ठान करते हुए आयुका अन्त निर्वाणमपि लब्धवान्। प्रत्यङ्गस्य बहुरूपायां होनेपर निर्वाणपद (मोक्ष) प्राप्त कर लिया। प्रत्यङ्गको In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय २८ ] शांतनुका चरित्र ९३

अध्याय २८ ] शांतनुका चरित्र ९३ शांतनुः ॥ १५ ॥ तस्य देवदत्तस्यन्दनारोहणमशक्यं बहुरूपके गर्भसे शांतनु नामक पुत्र प्राप्त हुआ, जिनमें बभूव पुरतः शक्यं च ॥ १६ ॥ देवताओंके दिये हुए रथपर चढ़नेकी पहले शक्ति नहीं थी, परंतु पीछे उसपर चढ़नेकी शक्ति हो गयी ॥ १३–१६ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे सोमवंशवर्णनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'सोमवंशवर्णन' नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥

अट्ठाईसवाँ अध्याय शांतनुका चरित्र भरद्वाज उवाच भरद्वाजजीने पूछा- शांतनुको पहले देवताओंके स्यन्दनारोहणे पूर्वमशक्तिः शांतनोः कथम्। रथपर चढ़नेकी शक्ति क्यों नहीं थी ? और फिर उनमें वह शक्ति कैसे आ गयी ? इसे आप हमें बतलायें ॥ १ ॥ पश्चाच्छक्तिः कथं चासीत् तस्य वै तद्वदस्व नः ॥ १ सूत उवाच सूतजी बोले - भरद्वाजजी ! यह पुराना इतिहास है; इसे मैं कहता हूँ, सुनिये। शांतनुका चरित्र मनुष्योंके भरद्वाज शृणुष्वैतत् पुरावृत्तं वदामि ते। समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। शांतनु पूर्वकालमें सर्वपापहरं तद्धि चरितं शांतनोर्नृणाम् ॥ २ नृसिंहरूपधारी भगवान् विष्णुके भक्त थे और नारदजीकी बतायी हुई विधिसे भगवान् लक्ष्मीपतिकी सदा पूजा बभूव शांतनुर्भक्तो नरसिंहतनौ पुरा। किया करते थे। विप्रवर ! एक बार राजा शांतनु भूलसे नारदोक्तविधानेन पूजयामास माधवम् ॥ ३ श्रीनृसिंहदेवके निर्माल्यको लाँघ गये, अतः वे उसी नरसिंहस्य देवस्य निर्माल्यं तेन लङ्घितम् । क्षण देवताओंके दिये हुए उत्तम रथपर चढ़नेमें असमर्थ हो गये। तब वे सोचने लगे - 'यह क्या बात है ? राज्ञा शांतनुना विप्र तस्मात् स्यन्दनमुत्तमम् ॥ ४ इस रथपर चढ़नेमें हमारी गति सहसा कुण्ठित क्यों देवदत्तं तदारोढुमशक्तस्तत्क्षणादभूत् । हो गयी ?' कहते हैं, इस प्रकार दुःखी होकर सोचते किमियं मे गतिर्भग्ना सहसा वै रथात्ततः ॥ ५ हुए उन राजाके पास नारदजी आये और उन्होंने राजा शांतनुसे पूछा- 'राजन् ! तुम क्यों विषादमें डूबे दुःखं चिन्तयतस्तस्य सम्प्राप्तो नारदः किल । हुए हो ?' ॥ २-६॥ किं विषण्णः स्थितो राजन्निति पृष्टः स शांतनुः ॥ ६ राजाने कहा - 'नारदजी ! मेरी गति कुण्ठित कैसे नारदैतन्न जानामि गतिभङ्गस्य कारणम् । हुई, इसका कारण मुझे ज्ञात नहीं हो रहा है, इसीसे मैं इत्युक्तो नारदो ध्यात्वा ज्ञात्वा तत्कारणं ततः ॥ ७ चिन्तित हूँ।' उनके यों कहनेपर नारदजीने ध्यान लगाया और उसका कारण जानकर राजा शांतनुसे, जो विनीतभावसे शांतनुं प्राह राजानं विनयेन यतः स्थितः । वहाँ खड़े थे, कहा- 'राजन् ! अवश्य ही तुमने कहीं- यत्र क्वापि त्वया राजन् नरसिंहस्य वै ध्रुवम् ॥ ८ न-कहीं भगवान् नृसिंहके निर्माल्यका लङ्घन किया है। निर्माल्यो लङ्घितस्तस्माद्रथारोहणकर्मणि । इसीसे रथपर चढ़नेमें तुम्हारी गति अवरुद्ध हो गयी है। गतिर्भग्ना महाराज श्रूयतामत्र कारणम् ॥ ९ महाराज ! इसका कारण सुनो ॥ ७-९ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

९४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २८

९४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २८

[संस्कृत श्लोक] अन्तर्वेद्यां पुरा राजन्नासीत् कश्चिन्महामतिः। मालाकारो रविर्नाम्ना तेन वृन्दावनं कृतम्॥ १० विविधानि च पुष्पार्थं वनानि सुकृतानि वै। मल्लिकामालतीजातिबकुलादीनि सर्वशः॥ ११ प्राकारमुच्छ्रितं तस्य स्वभूमौ चापि विस्तृतम्। अलङ्घ्यमप्रवेश्यं च कृत्वा चक्रे स्वकं गृहम्॥ १२ गृहं प्रविश्य तद्द्वारं भवेन्नान्यत्र सत्तम। एवं कृत्वा नु वसतो मालाकारस्य धीमतः॥ १३ पुष्पितं तद्वनं त्वासीद् गन्धामोदितदिङ्मुखम्। भार्यया सह पुष्पाणि समाहृत्य दिने दिने॥ १४ कृत्वा मालां यथान्यायं नरसिंहस्य नित्यशः। ददौ काश्चिद् द्विजेभ्यश्च काश्चिद्विक्रीय पोषणम्॥ १५ चक्रे समात् प्रजीवी च भार्यादेरात्मनस्तथा। अथ स्वर्गादुपागम्य इन्द्रपुत्रो रथेन वै॥ १६ अप्सरोगणसंयुक्तो निशि पुष्पाणि संहरेत्। तद्गन्धलिप्सुः सर्वाणि विचित्याहृत्य गच्छति॥ १७ दिने दिने हृते पुष्पे मालाकारोऽप्यचिन्तयत्। नान्यद् द्वारं वनस्यास्यालङ्घ्यप्राकारमुन्नतम्॥ १८ समस्तपुष्पजातस्य हरणे निशि वै नृणाम्। अहं शक्तिं न पश्यामि किमिदं नु परीक्षये॥ १९ इति संचिन्त्य मेधावी जाग्रद्रात्रौ वने स्थितः। तथैवागत्य पुष्पाणि संगृहीत्वा गतः पुमान्॥ २० तं दृष्ट्वा दुःखितोऽतीव माल्यजीवी वनेऽभवत्। ततो निद्रां गतः स्वप्ने दृष्टवांस्तं नृकेसरिम्॥ २१ तद्वाक्यं श्रुतवांश्चैवं निर्माल्यं मम पुत्रक। आनीय क्षिप्यतां क्षिप्रं पुष्पारामसमीपतः॥ २२


[हिन्दी अनुवाद] 'राजन्! पूर्वकालकी बात है, अन्तर्वेदीमें कोई बड़ा बुद्धिमान् माली रहता था। उसका नाम था रवि। उसने तुलसीका बगीचा लगाया था और उसका नाम 'वृन्दावन' रख दिया था। उसमें फूलोंके लिये सब ओर मल्लिका, मालती, जाती तथा बकुल (मौलसिरी) आदि नाना प्रकारके वृक्षोंके बाग सुंदर ढंगसे लगाये थे। उस वनकी चहारदीवारी बहुत ऊँची और चौड़ी बनवाकर, उसे अलङ्घनीय और दुर्गम करके भीतरकी भूमिपर उसने अपने रहनेके लिये घर बनाया था। साधुशिरोमणे! उसने ऐसा प्रबन्ध किया था कि घरमें प्रवेश करनेके बाद ही उस वाटिकाका द्वार प्राप्त हो सकता था, दूसरी ओरसे उसका मार्ग नहीं था॥ १०-१२½॥ 'ऐसी व्यवस्था करके निवास करते हुए उस मालीका वह वृन्दावन फूलोंसे भरा रहता था और उसकी सुगन्धसे सारी दिशाएँ सुवासित होती रहती थीं। वह प्रतिदिन अपनी पत्नीके साथ फूलोंका संग्रह करके यथोचित मालाएँ तैयार करता था। उनमेंसे कुछ मालाएँ तो वह भगवान् नृसिंहको अर्पण कर देता था, कुछ ब्राह्मणोंको दे डालता था और कुछको बेचकर उससे अपना तथा पत्नी आदिका पालन-पोषण करता था। मालासे जो कुछ प्राप्त होता, उसीके द्वारा वह अपनी जीविका चलाता था॥ १३-१५½॥ 'कुछ कालके बाद वहाँ इन्द्रका पुत्र जयन्त प्रतिदिन रातमें स्वर्गसे अप्सराओंके साथ रथपर चढ़कर आने और फूलोंकी चोरी करने लगा। उस वनके पुष्पोंकी सुगन्धके लोभसे वह सारे फूल तोड़ लेता और लेकर चल देता था। जब प्रतिदिन फूलोंकी चोरी होने लगी, तब मालीको बड़ी चिन्ता हुई। उसने मन-ही-मन सोचा—'इस वनका कोई दूसरा द्वार तो है नहीं। चहारदीवारी भी इतनी ऊँची है कि वह लाँघी नहीं जा सकती। मनुष्योंकी ऐसी शक्ति मैं नहीं देखता कि इसे लाँघकर वे सारे फूल चुरा ले जानेमें समर्थ हों। फिर इन फूलोंके लुप्त होनेका क्या कारण है, आज अवश्य ही इसका पता लगाऊँगा।' यह सोचकर वह बुद्धिमान् माली उस रातमें जागता हुआ बगीचेमें ही बैठा रहा। अन्य दिनोंकी भाँति उस दिन भी वह पुरुष आया और फूल लेकर चला गया॥ १६-२०॥ 'उसे देखकर मालाओंसे ही जीविका चलानेवाला वह माली उस उपवनमें बहुत ही दुःखी हुआ। तदनन्तर रातको नींद आनेपर उसने स्वप्नमें साक्षात् भगवान् नृसिंहको देखा तथा उन नृसिंहदेवका यह वचन भी सुना—'पुत्र! तुम शीघ्र ही फूलोंके बगीचेके समीप मेरा

अध्याय २८ ] शांतनुका चरित्र ९५

अध्याय २८ ] शांतनुका चरित्र ९५ इन्द्रपुत्रस्य दुष्टस्य नान्यदस्ति निवारणम्। निर्माल्य लाकर छींट दो। उस दुष्ट इन्द्रपुत्रको रोकनेका इति श्रुत्वा हरेर्वाक्यं नरसिंहस्य धीमतः॥ २३ कोई दूसरा उपाय नहीं है'॥ २१-२२१/२॥ 'बुद्धिमान् भगवान् नृसिंहका यह वचन सुनकर बुद्ध्वाऽऽनीय तु निर्माल्यं तथा चक्रे यथोदितम्। माली जाग उठा और उसने निर्माल्य लाकर उनके सोऽप्यागत्य यथापूर्वं रथेनालक्षितेन तु॥ २४ कथनानुसार वहाँ छींट दिया। जयन्त भी पहलेके ही रथादुत्तीर्य पुष्पाणि विचिन्वंस्तद्भुवि स्थितम्। समान अलक्षित रथसे आया और उससे उतरकर फूल निर्माल्यं लङ्घयामास इन्द्रसूनुरनिष्टकृत्॥ २५ तोड़ने लगा। उसी समय अपना अनिष्ट करनेवाला इन्द्रपुत्र वहाँ भूमिपर पड़े हुए निर्माल्यको लाँघ गया। ततस्तस्य न शक्तिः स्याद्रथारोहणकर्मणि। इससे उसमें रथपर चढ़नेकी शक्ति नहीं रह गयी। तब उक्तः सारथिना चैव रथस्यारोहणे तव॥ २६ सारथिने उससे कहा—'नृसिंहका निर्माल्य लाँघ जानेके नरसिंहस्य निर्माल्यलङ्घने नास्ति योग्यता। कारण अब तुममें इस रथपर चढ़नेकी योग्यता नहीं रह गच्छामि दिवमेवाहं त्वं भूम्यां वस माऽऽरुह॥ २७ गयी है। मैं तो स्वर्गलोकको लौटता हूँ, किंतु तुम यहाँ भूतलपर ही रहो; रथपर न चढ़ो'॥ २३—२७॥ तेनैवमुक्तो मतिमांस्तमाह हरिनन्दनः। 'सारथिके इस प्रकार कहनेपर मतिमान् इन्द्रकुमारने पापस्य नोदनं त्वत्र कर्मणा येन मे भवेत्॥ २८ उससे कहा—'सारथे! जिस कर्मसे यहाँ मेरे पापका तदुक्त्वा गच्छ नाकं त्वं कर्मास्मान् सारथे द्रुतम्। निवारण हो, उसे बताकर तुम शीघ्र स्वर्गलोकको जाओ'॥ २८१/२॥ सारथिरुवाच सारथि बोला—'कुरुक्षेत्रमें परशुरामजीका एक यज्ञ रामसत्रे कुरुक्षेत्रे द्वादशाब्दे तु नित्यशः॥ २९ हो रहा है, जो बारह वर्षोंमें समाप्त होनेवाला है। उसमें जाकर तुम प्रतिदिन ब्राह्मणोंका जूठा साफ करो; इससे द्विजोच्छिष्टापनयनं कृत्वा त्वं शुद्धिमेष्यसि। तुम्हारी शुद्धि होगी।' यों कहकर सारथि देवसेवित इत्युक्त्वासौ गतः स्वर्गं सारथिर्देवसेवितम्॥ ३० स्वर्गलोकको चला गया॥ २९-३०॥ इन्द्रसूनुः कुरुक्षेत्रं प्राप्तः सारस्वतं तटम्। 'इधर इन्द्रपुत्र जयन्त कुरुक्षेत्रमें सरस्वतीके तटपर रामसत्रे तथा कुर्याद्द्विजोच्छिष्टस्य मार्जनम्॥ ३१ आया और परशुरामजीके यज्ञमें ब्राह्मणोंकी जूठन साफ करने लगा। जब बारहवाँ वर्ष पूर्ण हुआ, तब ब्राह्मणोंने पूर्णे द्वादशमे वर्षे तमूचुः शङ्किता द्विजाः। शङ्कित होकर उससे पूछा—'महाभाग! तुम कौन हो? कस्त्वं ब्रूहि महाभाग नित्यमुच्छिष्टमार्जकः॥ ३२ जो नित्य जूठन साफ करते हुए भी हमारे यज्ञमें भोजन न भुङ्क्से च नः सत्रे शङ्का नो महती भवेत्। नहीं करते। इससे हमारे मनमें महान् संदेह हो रहा है।' इत्युक्तः कथयित्वा तु यथावृत्तमनुक्रमात्॥ ३३ उनके इस प्रकार पूछनेपर इन्द्रकुमार क्रमशः अपना सारा वृत्तान्त ठीक-ठीक बताकर तुरंत रथसे स्वर्गलोकको जगाम त्रिदिवं क्षिप्रं रथेन तनयो हरेः। चला गया॥ ३१-३३१/२॥ तस्मात् त्वमपि भूपाल ब्राह्मणोच्छिष्टमादरात्॥ ३४ 'इसलिये, हे भूपाल! तुम भी परशुरामजीके मार्जनं कुरु रामस्य सत्रे द्वादशवार्षिके। द्वादशवार्षिक यज्ञमें आदरपूर्वक ब्राह्मणोंकी जूठन साफ ब्राह्मणेभ्यः परं नास्ति सर्वपापहरं परम्॥ ३५ करो। ब्राह्मणोंसे बढ़कर दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो पापोंका अपहरण कर सके। महीपाल! इस प्रकार प्रायश्चित्त एवं कृते देवदत्तस्यन्दनारोहणे गतिः। कर लेनेपर तुम्हें देवताओंके दिये हुए रथपर चढ़नेकी भविष्यति महीपाल प्रायश्चित्ते कृते तव॥ ३६ शक्ति प्राप्त हो जायगी। महामते! आजसे तुम भी अत ऊर्ध्वं च निर्माल्यं मा लङ्घय महामते। श्रीनृसिंहदेवका तथा अन्य देवताओंके भी निर्माल्यका नरसिंहस्य देवस्य तथान्येषाम् दिवौकसाम्॥ ३७ उल्लंघन न करना'॥ ३४-३७॥

९६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २९

९६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २९ इत्युक्तः शांतनुस्तेन ब्राह्मणोच्छिष्टमार्जनम्। नारदजीके ऐसा कहनेपर शांतनुने बारह वर्षोतक कृतवान् द्वादशाब्दं तु आरुरोह रथं च तम्॥ ३८ ब्राह्मणोंकी जूठन साफ की। इसके बाद वे शक्ति पाकर एवं पूर्वमशक्तिः स्याद् रथरारोहे महीक्षितः। उस रथपर चढ़नेमें समर्थ हुए। विप्रवर! इस प्रकार पश्चात् तस्यैव विप्रेन्द्र शक्तिरेवमजायत॥ ३९ पूर्व-कालमें राजाकी उस रथपर चढ़नेकी शक्ति जाती रही और फिर उक्त उपाय करनेसे उनमें पुनः वह शक्ति एवं ते कथितो विप्र दोषो निर्माल्यलङ्घने। आ गयी॥ ३८-३९॥ पुण्यं तथा द्विजानां तु प्रोक्तमुच्छिष्टमार्जने॥ ४० ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने निर्माल्य लाँघनेमें जो दोष है, वह बताया तथा ब्राह्मणोंका जूठा साफ करनेमें जो भक्त्या द्विजोच्छिष्टमिहापमार्जये- पुण्य है, उसका भी वर्णन किया। जो मनुष्य इस च्छुचिर्नरो यः सुसमाहितात्मा। लोकमें पवित्र होकर, अपने चित्तको एकाग्र करके, स पापबन्धं प्रविहाय भुङ्क्ते भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंका जूठा साफ करता है, वह पापबन्धनसे गवां प्रदानस्य फलं दिवि स्थितः॥ ४१ मुक्त हो स्वर्गमें निवास करता और गौओंके दानका फल भोगता है॥ ४०-४१॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे शांतनुचरितं नामाष्टाविंशोऽध्यायः॥ २८॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'शांतनुचरित्र' नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २८॥ उन्तीसवाँ अध्याय शांतनुकी संततिका वर्णन श्रीसूत उवाच श्रीसूतजी कहते हैं—शांतनुके योजनगन्धासे 'विचित्रवीर्य' नामक पुत्र हुआ। राजा विचित्रवीर्य शांतनोर्योजनगन्धायां विचित्रवीर्यः। स तु हस्तिनापुरमें रहकर धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते रहे हस्तिनापुरे स्थित्वा प्रजाः स्वधर्मेण पालयन् देवांश्च और यज्ञोंद्वारा देवताओंको तथा श्राद्धके द्वारा पितरोंको यागैः पितॄंश्च श्राद्धैः संतर्प्य संजातपुत्रो तृप्त करके पुत्र पैदा होनेपर स्वर्गलोकको प्राप्त हुए। विचित्रवीर्यके अम्बालिकाके गर्भसे 'पाण्डु' नामक पुत्र दिवमारुरोह॥ १॥ विचित्रवीर्यस्याम्बालिकायां उत्पन्न हुआ। पाण्डु भी धर्मपूर्वक राज्यपालन करके पाण्डुः पुत्रो जज्ञे। सोऽपि राज्यं धर्मतः कृत्वा मुनिके शापसे शरीर त्यागकर देवलोकको चले गये। उन राजा पाण्डुके कुन्तीदेवीके गर्भसे 'अर्जुन' नामक मुनिशापाच्छरीरं विहाय देवलोकमवाप। तस्य पुत्र हुआ। अर्जुनने बड़ी भारी तपस्या करके शंकरजीको पाण्डोः कुन्तिदेव्यामर्जुनः॥ २॥ स तु महता तपसा प्रसन्न किया, उनसे 'पाशुपत' नामक अस्त्र प्राप्त किया शंकरं तोषयित्वा पाशुपतमस्त्रमवाप्य त्रिविष्टपाधिपतेः और स्वर्गलोकके अधिपति इन्द्रके शत्रु 'निवातकवच' नामक दानवोंका वध करके अग्निदेवको उनकी रुचिके शत्रून् निवातकवचान् दानवान् हत्वा खाण्डववन- अनुसार खाण्डववन समर्पित किया। खाण्डववनको मग्नेर्यथारुचि निवेद्य तृप्ताग्नितो दिव्यान् वरानवाप्य जलाकर, तृप्त हुए अग्निदेवसे अनेक दिव्य वर प्राप्त कर, In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय २९] शांतनुकी संततिका वर्णन ९७

अध्याय २९] शांतनुकी संततिका वर्णन ९७ सुयोधनेन हतराज्यॊ धर्मभीमनकुलसहदेव- दुर्योधनद्वारा अपना राज्य छिन जानेपर उन्होंने (अपने भाई) द्रौपदीसहितो विराटनगरेऽज्ञातवासं चरित्वा गोग्रहे धर्म (युधिष्ठिर), भीम, नकुल, सहदेव और (पत्नी) द्रौपदीके साथ विराटनगरमें अज्ञातवास किया। वहाँ जब च भीष्मद्रोणकृपदुर्योधनकर्णादीन् जित्वा शत्रुओंने आक्रमण करके विराटकी गौओंको अपने अधिकारमें कर लिया, तब अर्जुनने भीष्म, द्रोण, कृप, समस्तगोमण्डलं निवर्त्तयित्वा भ्रातृभिः सह दुर्योधन और कर्ण आदिको हराकर समस्त गौओंको वापस विराटराजकृतपूजो वासुदेवसहितः कुरुक्षेत्रे घुमाया। फिर विराटराजके द्वारा भाइयोंसहित सम्मानित होकर कुरुक्षेत्रमें भगवान् वासुदेवको साथ ले अत्यन्त धार्तराष्ट्रैर्बहुबलैर्युद्धं कुर्वन् भीष्मद्रोणकृपशल्य- बलशाली धृतराष्ट्रपुत्रोंके साथ युद्ध किया और भीष्म, कर्णादिभिर्भूरिपराक्रमैः क्षत्रियैर्नानादेशागतैरनेकैरपि द्रोण, कृप, शल्य, कर्ण आदि महापराक्रमी क्षत्रियों तथा नाना देशोंसे आये हुए अनेकों राजपुत्रोंसहित दुर्योधनादि राजपुत्रैः सह दुर्योधनादीन् धार्तराष्ट्रान् हत्वा स्वराज्यं धृतराष्ट्रपुत्रोंका उन्होंने भीम आदिके सहयोगसे वध करके प्राप्य धर्मेण राज्यं परिपाल्य भ्रातृभिः सह मुदितो अपना राज्य प्राप्त कर लिया। फिर भाइयोंसहित वे धर्मके अनुसार (अपने सबसे बड़े भाई धर्मराज युधिष्ठिरको दिवमारुरोह ॥ ३ ॥ राजाके पदपर अभिषेक करके) राज्यका पालन करके अन्तमें सबके साथ प्रसन्नतापूर्वक स्वर्गलोकमें चले गये ॥ १-३ ॥ अर्जुनस्य सुभद्रायामभिमन्युः। येन भारतयुद्धे अर्जुनको सुभद्राके गर्भसे 'अभिमन्यु' नामक पुत्र प्राप्त हुआ, जिसने महाभारत-युद्धमें चक्रव्यूहके भीतर चक्रव्यूहं प्रविश्यानेकभूभुजो निधनं प्रापिताः॥ ४॥ प्रवेश करके अनेक राजाओंको मृत्युके घाट उतारा था। अभिमन्योरुत्तरायां परीक्षितः। सोऽप्यभिषिक्तो वनं अभिमन्युके उत्तराके गर्भसे परीक्षित्का जन्म हुआ। धर्मनन्दन युधिष्ठिर जब वानप्रस्थ धर्मके अनुसार वनमें गच्छता धर्मपुत्रेण राज्यं कृत्वा राजपुत्रो नाकं सम्प्राप्य जाने लगे, तब उन्होंने परीक्षित्को राजाके पदपर अभिषिक्त रेमे ॥ ५॥ परीक्षितान्मातृवत्यां जनमेजयः। येन कर दिया। तब वे भी धर्मपूर्वक राज्यका पालन करके अन्तमें वैकुण्ठधाममें जाकर अक्षय सुखके भागी हुए। ब्रह्महत्यावारणार्थं महाभारतं व्यासशिष्या- परीक्षित्से मातृवतीके गर्भसे जनमेजयका जन्म हुआ, द्वैशम्पायनात् साद्यन्तं श्रुतम्॥ ६॥ राज्यं च धर्मतः जिन्होंने ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त होनेके लिये व्यासशिष्य वैशम्पायनके मुखसे सम्पूर्ण महाभारत आदिसे अन्ततक कृत्वा दिवमारुरोह। जनमेजयस्य पुष्पवत्यां सुना था। वे भी धर्मपूर्वक राज्यका पालन करके अन्तमें शतानीकः ॥७॥ स तु धर्मेण राज्यं कुर्वन् स्वर्गवासी हुए। जनमेजयको अपनी पत्नी पुष्पवतीके गर्भसे 'शतानीक' नामक पुत्र प्राप्त हुआ। उन्होंने धर्मपूर्वक संसारदुःखाद्विरक्तः शौनकोपदेशेन क्रियायोगेन राज्यका पालन करते हुए संसार-दुःखसे विरक्त हो, सकललोकनाथं विष्णुमाराध्य निष्कामो वैष्णवं शौनकके उपदेशसे यागादि कर्मोंके द्वारा समस्त लोकोंके अधीश्वर भगवान् विष्णुकी निष्कामभावसे आराधना पदमवाप। तस्य शतानीकस्य फलवत्यां की और अन्तमें वैष्णवधामको प्राप्त कर लिया। सहस्रानीकः ॥ ८ ॥ स तु बाल एवाभिषिक्तो शतानीकके फलवतीके गर्भसे सहस्रानीककी उत्पत्ति नरसिंहेऽत्यन्तं भक्तिमानभवत् । तस्य चरितमुपरिष्टाद् हुई। सहस्रानीक बाल्यावस्थामें ही राजाके पदपर अभिषिक्त हो भगवान् नृसिंहके प्रति अत्यन्त भक्तिभाव रखने भविष्यति ॥ ९॥ सहस्रानीकस्य मृगवत्यामुदयनः । लगे। उनके चरित्रका आगे वर्णन किया जायगा। सहस्रानीकके सोऽपि राज्यं कृत्वा धर्मतो नारायणमाराध्य मृगवतीसे उदयन हुए। वे कौशाम्बीमें धर्मपूर्वक राज्यका पालन करके नारायणकी आराधना करते हुए वैकुण्ठधामको तत्पुरमवाप ॥ १०॥ उदयनस्य वासवदत्तायां प्राप्त हुए। उदयनके वासवदत्ताके गर्भसे नरवाहन नामक नरवाहनः । स तु यथान्यायं राज्यं कृत्वा दिवमवाप। पुत्र हुआ। वह भी न्यायतः राज्यका पालन करके स्वर्गको 1113 Narsingpuran_Section_5_1_FrontIn Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

९८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३०

९८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३०


नरवाहनस्याश्वमेधदत्तायां क्षेमकः ॥ ११॥ स च<br>राज्यस्थः प्रजाः परिपाल्य म्लेच्छाभिभूते जगति<br>ज्ञानबलात् कलापग्राममाश्रितः ॥ १२ ॥प्राप्त हुआ। नरवाहनके अश्वमेधदत्ताके गर्भसे क्षेमक नामक पुत्रका जन्म हुआ। क्षेमक राजाके पदपर प्रतिष्ठित होनेके पश्चात् प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करने लगे। उन्हीं दिनों म्लेच्छोंका आक्रमण हुआ और सम्पूर्ण जगत् उनके द्वारा पददलित होने लगा। तब वे ज्ञानके बलसे कलापग्राममें चले आये ॥ ४–१२ ॥
यः श्रद्दधानः पठते शृणोति वा<br>हरौ च भक्तिं चरितं महीभृताम्।<br>स संततिं प्राप्य विशुद्धकर्मकृद्<br>दिवं समासाद्य वसेच्चिरं सुखी ॥ १३ ॥जो उपर्युक्त राजाओंकी हरिभक्ति तथा चरित्रका श्रद्धापूर्वक पाठ या श्रवण करता है, वह विशुद्ध कर्म करनेवाला पुरुष संतति प्राप्त करके अन्तमें स्वर्गलोकमें पहुँचकर वहाँ सुदीर्घ कालतक सुखी रहता है॥ १३॥

इति श्रीनरसिंहपुराणे शांतनुसंततिवर्णनं नाम एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'शांतनुकी संततिका वर्णन' नामक उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९ ॥


तीसवाँ अध्याय

भूगोल तथा स्वर्गलोकका वर्णन

श्रीसूत उवाच<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि भूगोलं द्विजसत्तमाः ।<br>संक्षेपात् पर्वताकीर्णं नदीभिश्च समन्ततः ॥ १<br><br>जम्बुप्लक्षाल्मलकुशक्रौञ्चशाकपुष्करसंज्ञाः<br>सप्त द्वीपाः । लक्ष्योजनप्रमाणाज्जम्बुद्वीपादुत्तरोत्तर-<br>द्विगुणाः ॥ लवणेषुरससुरासर्पिर्दधिदुग्धस्वच्छोदक-<br>संज्ञैः परस्परं द्विगुणैः सप्तसमुद्रैर्वलयाकारैस्ते द्वीपाः<br>परिवेष्टिताः ॥ २ ॥ योऽसौ मनुपुत्रः प्रियव्रतो नाम<br>स सप्तद्वीपाधिपतिर्बभूव । तस्य अग्नीध्रादयो दश<br>पुत्रा बभूवुः ॥ ३ ॥ त्रयः प्रव्रजिताः । शिष्टानां सप्तानां<br>सप्तद्वीपाः पित्रा दत्ताः । तत्र जम्बुद्वीपाधिपतेरग्नीध्रस्य<br>नव पुत्रा जाताः ॥ ४ ॥<br><br>नाभिः किम्पुरुषश्चैव हरिवर्ष इलावृतः ।<br>रम्यो हिरण्मयश्चैव कुरुर्भद्रश्च केतुमान् ॥ ५**श्रीसूतजी बोले—**द्विजवरो! अब मैं सब ओर नदी तथा पर्वतोंसे व्याप्त भूगोल (भूमिमण्डल)-का संक्षेपसे वर्णन करूँगा ॥ १ ॥<br><br>इस पृथ्वीपर जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौञ्च, शाक और पुष्कर नामके सात द्वीप हैं। इनमें जम्बूद्वीप तो लाख योजन लंबा-चौड़ा है और प्लक्ष आदि जम्बूद्वीपसे उत्तरोत्तर दुगुने बड़े हैं। ये द्वीप क्रमशः अपनेसे दूने प्रमाणवाले लवण, इक्षुरस, सुरा, घृत, दधि, दुग्ध और शुद्धोदक नामसे विख्यात सात वलयाकार समुद्रोंसे घिरे हुए हैं। मनुके जो 'प्रियव्रत' नामक पुत्र थे, वे ही सात द्वीपोंके अधिपति हुए। उनके अग्नीध्र आदि दस पुत्र हुए। इनमेंसे तीन तो सर्वत्यागी संन्यासी हो गये और शेष सातोंको उनके पिताने एक-एक द्वीप बाँट दिया। इनमें जम्बूद्वीपके अधिपति 'अग्नीध्र'के नौ पुत्र हुए। उनके नाम ये हैं—नाभि, किम्पुरुष, हरिवर्ष, इलावृत, रम्य, हिरण्मय, कुरु, भद्र और केतुमान् ॥ २–५ ॥

अध्याय ३० ] भूगोल तथा स्वर्गलोकका वर्णन ९९

अध्याय ३० ] भूगोल तथा स्वर्गलोकका वर्णन ९९ नववर्षाः विभज्य पुत्रेभ्यः पित्रा दत्ता वनं राजा अग्नीध्र जब (घर त्यागकर) वनमें जाने लगे प्रविशता। अग्नीध्रीयं हिमाह्वयम्। यस्याधिपतिर्नाभः तब उन्होंने जम्बूद्वीपको उसके नौ खण्ड करके अपने ऋषभः पुत्रो बभूव ॥ ६ ॥ पुत्रोंको बाँट दिया। हिमालय पर्वतसे मिला हुआ वर्ष अग्नीध्र (नाभि)-को मिला था। इसके अधिपति राजा नाभिसे 'ऋषभ' नामक पुत्र हुआ ॥ ६ ॥ ऋषभाद् भरतो भरतेन चिरकालं धर्मेण पालितत्वादिदं भारतं वर्षमभूत् । इलावृतस्य मध्ये ऋषभसे भरतका जन्म हुआ, जिनके द्वारा चिरकालतक मेरुः सुवर्णमयश्चतुरशीतिसहस्राणि योजनानि धर्मपूर्वक पालित होनेके कारण इस देशका नाम 'भारतवर्ष' तस्योच्छ्रायः। षोडशसहस्रमप्यधस्तादवगाढः। पड़ा। इलावृत वर्षके बीचमें मेरु नामक सुवर्णमय पर्वत तद्विगुणो मूर्ध्नि विस्तारः ॥ ७ ॥ तन्मध्ये ब्रह्मणः है। उसकी ऊँचाई चौरासी हजार योजन है। वह सोलह पुरी। ऐन्द्रयामिन्द्रस्य चामरावती। आग्नेय्या- हजार योजनतक नीचे जमीनमें गड़ा है और इससे दूनी मग्नेस्तेजोवती। याम्यां यमस्य संयमनी। नैर्ऋत्यां (बत्तीस हजार योजन) इसकी चोटीकी चौड़ाई है। निर्ऋतेर्भयंकरी। वारुण्यां वरुणस्य विश्वावती। इसीके मध्यभागमें ब्रह्माजीकी पुरी है, पूर्वभागमें इन्द्रकी वायव्यां वायborder... वायोगन्धवती। उदीच्यां सोमस्य 'अमरावती' है, अग्निकोणमें अग्निकी 'तेजोवती' पुरी है, विभावरीति। नववर्षान्वितं जम्बूद्वीपं पुण्यपर्वतैः दक्षिणमें यमराजकी 'संयमनी' है, नैर्ऋत्यकोणमें निर्ऋतिकी पुण्यनदीभिरन्वितम् ॥ ८ ॥ किम्पुरुषादीन्यष्टवर्षाणि 'भयंकारी' नामक पुरी है, पश्चिममें वरुणकी 'विश्वावती' पुण्यवतां भोगस्थानानि साक्षाद् भारतवर्षमेकं है, वायव्यकोणमें वायुकी 'गन्धवती' नगरी है और कर्मभूमिश्चातुर्वर्ण्ययुतम् ॥ ९ ॥ उत्तरमें चन्द्रमाकी 'विभावरी' पुरी है। नौ खण्डोंसे युक्त यह जम्बूद्वीप पुण्य पर्वतों तथा पुण्य नदियोंसे युक्त है। तत्रैव कर्मभिः स्वर्गं कृतैः प्राप्स्यन्ति मानवाः। किम्पुरुष आदि आठ वर्ष पुण्यवानोंके भोगस्थान हैं; मुक्तिश्चात्रैव निष्कामैः प्राप्यते ज्ञानकर्मभिः। केवल एक भारतवर्ष ही चारों वर्णोंसे युक्त कर्मक्षेत्र है। अधोगतिमितो विप्र यान्ति वै पापकारिणः ॥ १० ॥ भारतवर्षमें ही कर्म करनेसे मनुष्य स्वर्ग प्राप्त करेंगे और वहाँ ही ज्ञान-साधकको निष्काम कर्मोंसे मुक्ति भी प्राप्त ये पापकारिणस्तान् विद्धि पातालतले नरके होती है। विप्रवर ! पाप करनेवाले पुरुष यहाँसे अधोगतिको कोटिसमन्वितान् ॥ ११ ॥ प्राप्त होते हैं। जो पापी हैं, उन करोड़ों मनुष्योंको पातालस्थ नरकमें पड़े हुए समझिये ॥ ७-११॥ अथ सप्त कुलपर्वताः कथ्यन्ते । महेन्द्रो मलयः अब सात कुलपर्वतोंका वर्णन किया जाता है— शुक्तिमान् ऋष्यमूकः सह्यपर्वतो विन्ध्यः पारियात्रः महेन्द्र, मलय, शुक्तिमान्, ऋष्यमूक, सह्य, विन्ध्य और इत्येते भारते कुलपर्वताः ॥ १२ ॥ नर्मदा सुरसा पारियात्र। ये ही भारतवर्षमें कुलपर्वत हैं। नर्मदा, सुरसा, ऋषिकुल्या भीमरथी कृष्णा वेणी चन्द्रभागा ऋषिकुल्या, भीमरथी, कृष्णावेणी, चन्द्रभागा तथा ताम्रपर्णी इत्येताः सप्त नद्यः । गङ्गा यमुना गोदावरी ताम्रपर्णी—ये सात नदियाँ हैं तथा गङ्गा, यमुना, गोदावरी, तुङ्गभद्रा कावेरी सरयूरित्येता महानद्यः तुङ्गभद्रा, कावेरी और सरयू—ये छः महानदियाँ सब पापघ्न्यः ॥ १३ ॥ पापोंको नष्ट करनेवाली हैं ॥ १२-१३ ॥ यह सुन्दर जम्बूद्वीप जम्बू (जामुन)-के नामसे जम्बुनाम्ना च विख्यातं जम्बूद्वीपमिदं शुभम्। विख्यात है। इसका विस्तार एक लाख योजन है। लक्षयोजनविस्तीर्णमिदं श्रेष्ठं तु भारतम् ॥ १४ ॥ इस द्वीपमें यह भारतवर्ष ही सबसे श्रेष्ठ स्थान है ॥ १४ ॥ 1113 Narsingpuran_Section_5_2_Front

१०० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३०

१०० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३० ऋक्षद्वीपादिपुण्या जनपदाः। निष्कामा ये | ऋक्षद्वीप आदि पुण्य देश हैं। जो लोग निष्कामभावसे स्वधर्मेण नरसिंहं यजन्ति ते तत्र निवसन्ति। | अपने-अपने वर्णधर्मका आचरण करते हुए भगवान् अधिकारक्षयान्मुक्तिं च प्राप्नुवन्ति॥ १५॥ | नृसिंहका यजन करते हैं, वे ही उन पुण्य देशोंमें निवास जम्ब्वाद्याः स्वादूदकान्ताः सप्त पयोधयः। ततः परा | करते हैं तथा कर्माधिकारका क्षय हो जानेपर मोक्ष भी हिरण्मयी भूमिः। ततो लोकालोकपर्वतः। एष | प्राप्त कर लेते हैं। जम्बूद्वीपसे लेकर 'शुद्धोदक' संज्ञक भूर्लोकः॥ १६॥ | समुद्रपर्यन्त सात द्वीप और सात समुद्र हैं। उसके बाद | स्वर्णमयी भूमि है। उसके आगे लोकालोक पर्वत है— | यह सब 'भूर्लोक' का वर्णन हुआ॥ १५-१६॥ अस्योपरि अन्तरिक्षलोकः। खेचराणां | इसके ऊपर अन्तरिक्षलोक है, जो अन्तरिक्षचारी रम्यस्तदूर्ध्वं स्वर्गलोकः॥ १७ | प्राणियोंके लिये परम रमणीय है। इसके ऊपर स्वर्गलोक स्वर्गस्थानं महापुण्यं प्रोच्यमानं निबोधत। | है। अब महापुण्यमय स्वर्गलोकका वर्णन किया जाता भारते कृतपुण्यानां देवानामपि चालयम्॥ १८ | है, उसे आपलोग मुझसे सुनें। जिन्होंने भारतवर्षमें | रहकर पुण्यकर्म किये हैं, उनका तथा देवताओंका वहाँ मध्ये पृथिव्यामद्रीन्द्रो भास्वान् मेरुर्हिरण्मयः। | निवास है। भूमण्डलके बीचमें पर्वतोंका राजा मेरु है, योजनानां सहस्राणि चतुराशीतिमुच्छ्रितः॥ १९ | जो सुवर्णमय होनेके कारण अपनी प्रभासे उद्भासित | होता रहता है। वह पर्वत चौरासी हजार योजन ऊँचा प्रविष्टः षोडशाधस्ताद्धरण्यां धरणीधरः। | है और सोलह हजार योजनतक पृथ्वीमें नीचेकी ओर | धँसा हुआ है। साथ ही उसके चारों ओर उतने ही तावत्प्रमाणा पृथिवी पर्वतस्य समन्ततः॥ २० | प्रमाणवाली पृथिवी है॥ १७-२०॥ तस्य शृङ्गतत्रयं मूर्ध्नि स्वर्गो यत्र प्रतिष्ठितः। | मेरुगिरिके ऊपरी भागमें तीन शिखर हैं, जहाँ स्वर्गलोक नानाद्रुमलताकीर्णं नानापुष्पोपशोभितम्॥ २१ | बसा हुआ है। मेरुके वे स्वर्गीय शिखर नाना प्रकारके मध्यमं पश्चिमं पूर्वं मेरोः शृङ्गाणि त्रीणि वै। | वृक्ष और लताओंसे आवृत्त तथा भाँति-भाँतिके पुष्पोंसे मध्यमं स्फटिकं शृङ्गं वैदूर्यमणिकामयम्॥ २२ | सुशोभित हैं। मध्यम, पश्चिम और पूर्व—ये ही तीन | मेरुके शिखर हैं। इनमें मध्यम शृङ्ग स्फटिक तथा इन्द्रनीलमयं पूर्वं माणिक्यं पश्चिमं स्मृतम्। | वैदूर्यमणिमय हैं, पूर्व शृङ्ग इन्द्रनीलमय और पश्चिम योजनानां सहस्राणि नियुतानि चतुर्दश॥ २३ | शिखर माणिक्यमय कहा जाता है। इनमेंसे मध्यम शृङ्ग | चौदह लाख चौदह हजार योजन ऊँचा है, जहाँ 'त्रिविष्टप' उच्छ्रितं मध्यमं शृङ्गं स्वर्गो यत्र त्रिविष्टपः। | नामका स्वर्गलोक प्रतिष्ठित है। पूर्व शृङ्ग मेरुके ऊपर अभ्रान्तरितं शृङ्गं मूर्ध्नि छात्राकृति स्थितम्॥ २४ | छत्राकार स्थित है। मध्यम शृङ्ग और उसके बीच अन्धकारका | व्यवधान है। वह मध्यम शृङ्ग और उसके बादवाले पूर्वमुत्तरशृङ्गाणामन्तरं मध्यमस्य च। | पश्चिम शिखरके बीचमें स्थित है। नाकपृष्ठ—त्रिविष्टपमें त्रिविष्टपे नाकपृष्ठे ह्यप्सराः सन्ति निर्वृताः॥ २५ | आनन्दमयी अप्सराएँ निवास करती हैं॥ २१-२५॥ | मेरुके मध्यवर्ती शिखरपर विराजमान स्वर्गमें आनन्दोऽथ प्रमोदश्च स्वर्गशृङ्गे तु मध्यमे। | आनन्द और प्रमोदका वास है। पश्चिम शिखरपर श्वेतश्च पौष्टिकश्चैव उपशोभनमन्मथौ॥ २६ | श्वेत, पौष्टिक, उपशोभन और काम एवं स्वर्गके In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth | 1113 Narsingpuran_Section_5_2_Back

अध्याय ३० ] भूगोल तथा स्वर्गलोकका वर्णन १०१

अध्याय ३० ] भूगोल तथा स्वर्गलोकका वर्णन १०१ आह्लादः स्वर्गराजा वै स्वर्गशृङ्गे तु पश्चिमे। निर्ममो निरहंकारः सौभाग्यश्चातिनिर्मलः ॥ २७ स्वर्गाश्चैव द्विजश्रेष्ठ पूर्वशृङ्गे समास्थिताः । एकविंशतिः स्वर्गा वै निविष्टा मेरुमूर्धनि ॥ २८ अहिंसादानकर्तारो यज्ञानां तपसां तथा। तत्तेषु निवसन्ति स्म जनाः क्रोधविवर्जिताः ॥ २९ जलप्रवेशे चानन्दं प्रमोदं वह्निसाहसे। भृगुप्रपाते सौख्यं च रणं चैवास्य निर्मलम् ॥ ३० अनाशके तु संन्यासे मृतो गच्छेत्रिविष्टपम्। क्रतुयाजी नाकपृष्ठमग्निहोत्री च निर्वृतिम् ॥ ३१ तडागकूपकर्ता च लभते पौष्टिकं द्विज। सुवर्णदायी सौभाग्यं लभन् स्वर्गं तपःफलम् ॥ ३२ शीतकाले महावह्निं प्रज्वालयति यो नरः। सर्वसत्त्वहितार्थाय स्वर्गं सोऽप्सरसं लभेत् ॥ ३३ हिरण्यगोप्रदाने हि निरहंकारमाप्नुयात्। भूमिदानेन शुद्धेन लभते शान्तिकं पदम् ॥ ३४ रौप्यदानेन स्वर्गं तु निर्मलं लभते नरः । अश्वदानेन पुण्याहं कन्यादानेन मङ्गलम् ॥ ३५ द्विजेभ्यस्तर्पणं कृत्वा दत्त्वा वस्त्राणि भक्तितः । श्वेतं तु लभते स्वर्गं यत्र गत्वा न शोचते ॥ ३६ कपिलागोप्रदानेन परमार्थे महीयते। गोवृषस्य प्रदानेन स्वर्गं मन्मथमाप्नुयात् ॥ ३७ माघमासे सरित्स्नायी तिलधेनुप्रदस्तथा। छत्रोपानहदाता च स्वर्गं यात्युपशोभनम् ॥ ३८


[अनुवाद / व्याख्या]

राजा आह्लाद निवास करते हैं। द्विजश्रेष्ठ ! पूर्व शिखरपर निर्मम, निरहंकार, सौभाग्य और अतिनिर्मल नामक स्वर्ग सुशोभित होते हैं। मेरु पर्वतकी चोटीपर कुल इक्कीस स्वर्ग बसे हुए हैं। जो अहिंसाधर्मका पालन करनेवाले और दानी हैं तथा जो यज्ञ और तपका अनुष्ठान करनेवाले हैं, वे क्रोधरहित मनुष्य इन स्वर्गोंमें निवास करते हैं॥ २६-२९॥ जो धर्मपालनके लिये जलमें प्रविष्ट होकर प्राण त्याग करते हैं, वे 'आनन्द' नामक स्वर्गको प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार जो धर्मरक्षाके ही लिये अग्निमें जलनेका साहस करते हैं, उन्हें 'प्रमोद' नामक स्वर्गकी प्राप्ति होती है और जो धर्मार्थ पर्वतशिखरसे कूदकर प्राण देते हैं, उन्हें 'सौख्य' संज्ञक स्वर्ग प्राप्त होता है। संग्रामकी मृत्युसे 'निर्मल' (या अतिनिर्मल) नामक स्वर्गकी उपलब्धि होती है। उपवास-व्रत एवं संन्यासावस्थामें मृत्युको प्राप्त होनेवाले लोग 'त्रिविष्टप' नामक स्वर्गमें जाते हैं। श्रौत यज्ञ करनेवाला 'नाकपृष्ठ'में और अग्निहोत्री 'निर्वृति' नामक स्वर्गमें जाते हैं। द्विज! पोखरा और कुआँ बनवानेवाला मनुष्य 'पौष्टिक' स्वर्गको पाता है, सोना दान करनेवाला पुरुष तपस्याके फलभूत 'सौभाग्य' नामक स्वर्गको जाता है। जो शीतकालमें सब प्राणियोंके हितके लिये लकड़ियोंके ढेरको जलाकर बड़ी भारी अग्निराशि प्रज्वलित करता और उन्हें गरमी पहुँचाता है, वह 'अप्सरा' संज्ञक स्वर्गको उपलब्ध करता है। सुवर्ण और गोदान करनेपर दाता 'निरहंकार' नामवाले स्वर्गको पाता है और शुद्धभावसे भूमिदान करके मनुष्य 'शान्तिक' नामसे प्रसिद्ध स्वर्गधामको उपलब्ध करता है। चाँदी दान करनेसे मनुष्यको 'निर्मल' नामक स्वर्गकी प्राप्ति होती है। अश्वदानसे दाता 'पुण्याह'का और कन्यादानसे 'मङ्गल'का लाभ करता है। ब्राह्मणोंको तृप्त करके उन्हें भक्तिपूर्वक वस्त्र दान करनेसे मनुष्य 'श्वेत' नामक स्वर्गको पाता है, जहाँ जाकर वह कभी शोकका भागी नहीं होता॥ ३०-३६॥ कपिला गौका दान करनेसे दाता 'परमार्थ' नामक स्वर्गमें पूजित होता है और उत्तम साँड़का दान करनेसे उसे 'मन्मथ' नामक स्वर्गकी प्राप्ति होती है। जो माघके महीनेमें नित्य नदीमें स्नान करता, तिलमयी धेनु देता


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