संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 86, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २२ ] चन्द्रवंशका वर्णन ७५
ददितेरादित्यः। आदित्यात् सुवर्चलायां मनुः ॥ ३ ॥ | मरीचिसे दाक्षायणीके गर्भसे कश्यपजी उत्पन्न हुए। कश्यपसे मनोः सुरूपायां सोमः। सोमाद्रोहिण्यां बुधः। | अदितिके गर्भसे सूर्यका जन्म हुआ। सूर्यसे सुवर्चला बुधादिलायां पुरूरवाः ॥ ४ ॥ पुरूरवस आयुः। | (संज्ञा)-के गर्भसे मनुकी उत्पत्ति हुई। मनुके द्वारा सुरूपामके आयो रूपवत्यां नहुषः ॥ ५ ॥ नहुषात् पितृवत्यां | गर्भसे सोम और सोमके द्वारा रोहिणीके गर्भसे बुधका ययातिः। ययातेः शर्मिष्ठायां पूरुः ॥ ६ ॥ पूरोर्वंशदायां | जन्म हुआ तथा बुधके द्वारा इलाके गर्भसे राजा पुरूरवा सम्पातिः। सम्पातेर्भानुदत्तायां सार्वभौमः। | उत्पन्न हुए। पुरूरवासे आयुका जन्म हुआ, आयुद्वारा सार्वभौमस्य वैदेह्यां भोजः ॥ ७ ॥ भोजस्य लिङ्गायां | रूपवतीके गर्भसे नहुष हुए। नहुषके द्वारा पितृवतीके दुष्यन्तः। दुष्यन्तस्य शकुन्तलायां भरतः ॥ ८ ॥ | गर्भसे ययाति हुए और ययातिसे शर्मिष्ठाके गर्भसे पूरुका भरतस्य नन्दायामजमीढः। अजमीढस्य सुदेव्यां | जन्म हुआ। पूरुके द्वारा वंशदाके गर्भसे सम्पाति और पृश्निः। पृश्नेरुग्रसेनायां प्रसरः। प्रसरस्य बहुरूपायां | उससे भानुदत्ताके गर्भसे सार्वभौम हुआ। सार्वभौमसे वैदेहीके शांतनुः। शांतनोर्योजनगन्धायां विचित्रवीर्यः। | गर्भसे भोजका जन्म हुआ। भोजके लिङ्गाके गर्भसे दुष्यन्त विचित्रवीर्यस्याम्बिकायां पाण्डुः ॥ ९ ॥ पाण्डोः | और दुष्यन्तके शकुन्तलासे भरत हुआ। भरतके नन्दासे कुन्तिदेव्यामर्जुनः। अर्जुनात् सुभद्राया- | अजमीढ नामक पुत्र हुआ, अजमीढके सुदेवीके गर्भसे मभिमन्युः ॥ १० ॥ अभिमन्योरुत्तरायां परीक्षित्। | पृश्नि हुआ तथा पृश्निके उग्रसेनाके गर्भसे प्रसरका आविर्भाव परीक्षितस्य मातृवत्यां जनमेजयः। जनमेजयस्य | हुआ। प्रसरके बहुरूपाके गर्भसे शांतनु हुए, शांतनुसे पुण्यवत्यां शतानीकः ॥ ११ ॥ शतानीकस्य पुष्पवत्यां | योजनगन्धाने विचित्रवीर्यको जन्म दिया। विचित्रवीर्यके सहस्रानीकः। सहस्रानीकस्य मृगवत्यामुदयनः। | अम्बिकाके गर्भसे पाण्डुका जन्म हुआ। पाण्डुसे तस्य वासवदत्तायां नरवाहनः ॥ १२ ॥ | कुन्तीदेवीके गर्भसे अर्जुन हुआ, अर्जुनसे सुभद्राने नरवाहनस्याश्वमेधायां क्षेमकः। क्षेमकान्ताः | अभिमन्युको उत्पन्न किया। अभिमन्युसे उत्तराके गर्भसे पाण्डवाः सोमवंशो निवर्तते ॥ १३ ॥ | परीक्षित् हुआ, परीक्षित्के मातृवतीसे जनमेजय उत्पन्न | हुआ और जनमेजयके पुण्यवतीके गर्भसे शतानीककी | उत्पत्ति हुई। शतानीकके पुष्पवतीसे सहस्रानीक हुआ, | सहस्रानीकसे मृगवतीसे उदयन उत्पन्न हुआ और उदयनके | वासवदत्ताके गर्भसे नरवाहन हुआ। नरवाहनके अश्वमेधासे | क्षेमक हुआ। यह क्षेमक ही पाण्डववंशका अन्तिम राजा | है, इसके बाद सोमवंश निवृत्त हो जाता है॥ २-१३॥ य इदं शृणुयान्नित्यं राजवंशमनुत्तमम्। | जो पुरुष इस उत्तम राजवंशका सदा श्रवण करता सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णुलोकं स गच्छति ॥ १४ | है, वह सब पापोंसे मुक्त एवं विशुद्धचित्त होकर विष्णु- यश्चेदं पठते नित्यं श्राद्धे वा श्रावयेत् पितॄन्। | लोकको प्राप्त होता है। जो इस पवित्र वंश-वर्णनको वंशानुकीर्तनं पुण्यं पितॄणां दत्तमक्षयम् ॥ १५ | प्रतिदिन स्वयं पढ़ता अथवा श्राद्धकालमें पितृगणोंको राज्ञां हि सोमस्य मया तवेरिता | सुनाता है उसके पितरोंको दिया हुआ दान अक्षय हो वंशानुकीर्तिर्द्विज पापनाशनी। | जाता है। द्विज! यह मैंने आपसे सोमवंशी राजाओंका शृणुष्व विप्रेन्द्र मयोच्यमानं | पाप-नाशक वंशानुकीर्तन सुनाया। विप्रवर! अब मेरे द्वारा मन्वन्तरं चापि चतुर्दशाख्यम् ॥ १६ ॥ | बताये जानेवाले चौदह मन्वन्तरोंको सुनिये ॥ १४-१६ ॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे सोमवंशानुकीर्तनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'सोमवंशका वर्णन' नामक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२ ॥
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