भारतकोश
संग्रह पर लौटें

निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

साहिब बन्दगी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (उद्गम)

DevanagariHindipublished112 पृष्ठ

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नहीं करते। जब आश्रम में भीड़ होती है, तब वे सामने नहीं आते हैं, पर जब सभी अपने-अपने घरों को लौट जाते हैं तो वे सामने आ जाते हैं। कभी-कभी वे आपको बंदगी करने आते हैं और आपकी इच्छा से वे आपको बंदगी करके फिर अपने-अपने स्थान को लौट जाते हैं।

अखनूर आश्रम की नींव रखनी थी। पहली बार आपने वहाँ चरण रखे तो एक साँप सामने की ओर से, दो साँप एक सॉइड से और दो साँप दूसरी सॉइड से आपकी तरफ बढ़े और पास आकर आपके चरणों में सिर टिका दिया; बंदगी की और चले गये। आज बहुत समय हो गया है। वे बहुत बड़े हो गये हैं। आज भी वे चुपके से कभी-कभी आपको बंदगी करने आते हैं और प्रेम सहित आपको बंदगी करके लौट जाते हैं।

यह एक रहस्यमय सत्य है, पर दुनिया इन बातों पर आसानी से विश्वास नहीं कर पाती है।

पशु पक्षी नर नाग सभी जीव,
करते हैं साहिब आपको,
बारंबार परनाम।
कर बंदगी वे बारंबार,
सुरति के अमृत को पीकर,
पाते हैं विश्राम।
जानत वे मानुष आप नाहीं,
देखते सबमें आत्म का रूप,
नहीं चाम से काम।
हो साहिब आप अमर लोक के,
आए हो लेने
आत्म को निज धाम॥

बिल्ली बोली-मेरे बच्चे कहां हैं

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बिल्ली बोली-मेरे बच्चे कहाँ हैं

सब जीव आपसे बातें करते रहते हैं। आप सब जीवों का कष्ट समझते हैं। सब आपको अपने-अपने कष्ट सुनाते हैं। एक समय राँजड़ी आश्रम में एक बिल्ली ने कुछ बच्चे दिये। वे बड़ी शरारत करते थे। कभी वे खाना बनाने वाली जगह पहुँच जाते थे, कभी कहीं। आपने विचार किया कि यह तो ठीक नहीं हो रहा है। संगत को इनका झूठा भोजन खिलाने वाली बात है। यह विचारकर आपने उन्हें राँजड़ी से बड़ी दूर बाड़ी ब्राह्मणा में पहुँचा दिया।

रात को बिल्ली आपके कमरे में आई। ऐसे वो कभी आपके कुल्ले में नहीं आई थी। पर उस रात वो आपके कुल्ले में आई। जैसे आदमी घुटनों के बल बैठकर बात करते हैं, ऐसे ही वो बैठ गयी और आपसे प्रश्न करने लगी। वो कहने लगी कि मेरे बच्चे कहाँ हैं? तुमने उन्हें कहाँ भेज दिया है? वो आपसे बड़ी करुणामयी वाणी में अपना दर्द कहने लगी।

यह बातें कोई कहानियाँ नहीं हैं। इन सबमें सच्चाई है। पर सच है कि कलयुग की दुनिया पाखण्डियों पर ही विश्वास करती है। संतों के खेल को वो पाखण्ड ही समझती है।

साँच कहे जग मारन धाये, झूठे जग पतियाना।
कहो साहिब किसे समझायें, कहा कोई न माना॥

ऐसे निपटते हैं आप

कुछ समय पहले जब हमला हुआ तो 11 आश्रम जलाए गये। एक मंदिर जला दिया जाए तो पूरी दुनिया में हड़कंप मच जाएगा, हड़तालें हो जायेंगी। अगर किसी मस्जिद में आग लगा दी जाए तो हड़कंप मच जायेगा। अगर एक चर्च में आग लगा दें तो कैसा होगा! पूरी दुनिया में हड़कंप मच जायेगा। 'साहिब बंदगी' के 11 आश्रम जला दिए गये। यह कितना बड़ा ज़ुल्म है! सरकार ने भी साथ नहीं दिया, पुलिस ने भी नहीं। यह धार्मिक अपराध है, ईश्वरीय अपराध भी है। आपने

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किसी धर्म स्थान को नुक़सान नहीं पहुँचाया। यह सब आपकी प्लॉनिंग में नहीं है। जब आश्रमों को जलाकर भी जी नहीं भरा तो गुण्डों ने मिनिस्टर गुण्डों के साथ मिलकर रखबंधु आश्रम को तुड़वाने की प्लॉनिंग बना ली। रातों-रात आश्रम तोड़ने की योजना बन गयी, आर्डर भी पास करवा दिया। उस आश्रम की ज़मीन योगियों ने दान में दी थी। उसकी रिजिस्ट्री नहीं हुई थी। बस, पाखण्डियों को तो मौका ही चाहिए था। अब सवाल है कि किस मंदिर की रजिस्ट्री है! पहले वहाँ कारंवाही होनी चाहिए। दूसरे पंथों पर कारंवाही होनी चाहिए। साहिब बंदगी का तो 108 आश्रमों में से केवल वही आश्रम है, जिसकी रिजिस्ट्री नहीं है, बाकी की है। वो भी आपको दान में मिली है। कोई सरकारी भी नहीं है। बाकी पंथों की ज़मीनें तो सरकारी हैं, पर वहाँ कोई हाथ नहीं डालता है, क्योंकि वे राजनीति में हैं, मिनिस्टरों से मिली हुई हैं, उनसे जान-पहचान है। आप राजनीति में नहीं हैं। यही कारण है कि पाखण्डी सोचते हैं कि ये कुछ नहीं कर सकते हैं। पर उन्हें आपके सोटे का पता नहीं है। उन्हें नहीं मालूम है कि आपका अपराधी चाहे कहीं भी चला जाए, वो बच नहीं सकता है। तो आपने रात को आश्रम टूटने नहीं दिया, अंदर से ही उन्हें रोक दिया। आपने कहा कि सुबह तोड़ दें तो कोई बात नहीं है, फिर हम कानूनी कारंवाही कर लेंगे। तब तक आपने जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री, उपआयुक्त (डेप्यूटी कमिश्नर)आदि तक लिखित संदेश भिजवा दिया कि हमारे साथ ऐसा-ऐसा होने जा रहा है। अब कुछ भी हो जाए, बिना किसी रोक के आप कानूनी कारंवाही के लिए तैयार हो गये। पाखण्डी कितनी भी घिनौनी हरकतें करते रहें, पर आपके काम शिष्ट ही रहे हैं। अब अखनूर हमले की बात क्या थी? मास्टर जी का वो दोहा था। आपने कहा भी था कि नहीं लिखो। पर दोहा ख़राब नहीं था। लोगों ने उसका अर्थ गलत लगाया। दोहा था-

निगुरा ब्राह्मण नहीं भला, गुरुमुख भला चमार।
देवतन से कुत्ता भला, नित उठ भूँके द्वार॥

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इसका अर्थ तो यह है कि ब्राह्मण होकर निगुरा नहीं रहना चाहिए। जो ब्राह्मण होकर निगुरा रहता है, वो अच्छा नहीं है। फिर बीच में अल्प विराम है और उसके बाद कहा है कि यदि कोई चमार है और वो गुरुमुख है, तो वो अच्छा है। फिर दूसरी पंक्ति का अर्थ है कि देवतन यानी जो मिट्टी, पत्थर आदि के मोहरे हैं, उनसे तो कुत्ता अच्छा है। यदि कोई चोर घर आ जाए तो वो भौंकता तो है न, पर वो तो कोई रक्षा नहीं कर सकते हैं। देवतन कोई ब्रह्मा, विष्णु, महेश को नहीं बोला है। वो तो देवता हैं। लोगों को पता ही नहीं है। अर्थ नहीं समझा। फिर आपने हाई कोर्ट में हरिद्वार से छपी किताब भी दिखाई, जिसमें यह दोहा लिखा था। आबे-बाबाओं ने दोहे को तो बहाना बनाया। इससे पता चलता है कि हमारे धर्म में कितना पाखण्ड छिपा है। यह कितना खतरनाक काम किया और 5 हज़ार लोग झगड़ा करने आ गये। अगर एक इशारा आप कर देते तो सबकी बुरी हालत हो जाती। वो तो 10-20 लड़के जोश में आकर भागे। आपने तो मना किया। अगर नहीं करते तो कुछ और ही कहानी होती। पर आपके काम गुण्डों वाले नहीं हैं, संतों वाले हैं। सरकार ने भी किसी को नहीं पकड़ा, कोई कदम नहीं उठाया। आप निपटते तो हैं ऐसे लोगों से, पर अंदाज बड़ा प्यारा है आपका।

आपके ऐसे व्यवहार को देखते हुए ही तो आपको सन् 2002 के गाँधी पीस पुरस्कार से सम्मानित किया गया। आपने हिंसा का जबाब हिंसा से नहीं दिया। किसी भी गुरु पर कोई उँगली उठाए तो संगत का दिल तार-तार हो जाता है; वो भड़क उठती है, कहीं रोड़ जाम तो कहीं खूनी खेल खेला जाता है। एक निंदा का शब्द भी कोई अपने गुरु के लिए सहन नहीं कर पाता है। आपकी इतनी निंदा हुई; लोगों ने जगह-जगह पुतले फूँके, हमले किये गये, मारने का प्रयास किया गया, पर कहीं भी आपने अपनी संगत को न तो रोड़ जाम करने दिये, न ही कोई हिंसात्मक कार्य करने दिया। संतों ने ये काम किये ही नहीं। संतों में सहनशीलता

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होती है। यदि हिंसा का जबाब वे हिंसा से दें तो फिर उनमें और दूसरों में अंतर क्या रहेगा! जो सहनशीलता आपकी संगत ने दिखाई, उसका उदाहरण कहीं नहीं मिल सकता है। जहाँ कहीं वो परेशान हुई, जोश में आई, आपने उसे रोक लिया। आपने बार-बार समझाया कि यह मत सोचो कि तुम ही मेरे हो और वे कोई बेगाने हैं। वे भी मेरे ही हैं, मेरे पास ही आयेंगे। और ऐसा हुआ भी। 1-2 नहीं, 10-20 नहीं, 100-200 भी नहीं, हज़ारों कट्टर विरोधी आपके शिष्य हो गये और कइयों ने पछताकर आपसे क्षमा माँगी, आपको सच्चा महात्मा कहा। यह कोई मामूली बात नहीं है। ऐसा उदाहरण कलयुग में कहीं नहीं मिलेगा। आप जैसा व्यवहार कहीं मिल पाना संभव ही नहीं है।

चौकीचौरा में सत्संग था; कुछ बदमाश आए, कहा-सत्संग नहीं होने देंगे। आपने कहा कि यात्रा से आना है, चाय-पानी पीना है। कहा- यहाँ नहीं होने देना है। आपने कहा कि लड़ाई करना ठीक नहीं है, इसलिए आप खुद पास के थाने में गये, वहाँ कहा कि ऐसी-ऐसी बात है। उन्होंने कहा कि यहाँ के सरपंच ने ऐसा कहा है। आपने कहा कि लिख कर दो कि नहीं होने देना है सत्संग। उसने लिख दिया। आपने कहा कि यह आपने अच्छा किया। आपने बाद में केस कर दिया कोर्ट में। सालों से वो चक्कर काट रहे हैं कोर्ट के। यदि कोर्ट छोड़ दे तो आप हाई कोर्ट में अपील कर देंगे। यदि वहाँ भी छूट गये तो सुर्प्रीम कोर्ट में करेंगे। बाल सफेद कर देते हैं, पर छोड़ते नहीं और आख़िर जीतते ही हैं। ऐसे लोगों से पहले आप कानून से निपटते हैं। आप तो हारकर भी जीतते ही हैं। क्योंकि केवल कानून से ही नहीं निपटते, कुछ अंदर की बात भी होती है। रातों की नींद, दिन का चैन भी छिन जाता है ऐसे लोगों का। यदि कानून भी इंसाफ़ नहीं करे तो आपके सोटे को वो सज़ा देनी पड़ती है।

एक वकील ने कुछ गुण्डों को लेकर आश्रम की पाइप तोड़ी। आपने केस दर्ज करवाने को कहा तो केस रजिस्टर न करें वो। फिर

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आपने कोर्ट में अपील की। 10 साल हो गये; उनकी नानी की भी तौबा कर दी। 9 लोग थे। कुछ समय बाद उनमें से 3 लोग मर गये। जज रोने लगा, कहा कि तीन तो मर गये, बाकी को माफ़ करो। आपने कहा- नहीं, आप बरी करो, मैं हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट में ले चलूँगा। दौड़ाऊँगा खूब, कुतुबमीनार, लाल किला सब दिखाना चाहता हूँ इनको।

पर आप मुकद्दमे लड़ने नहीं आए। किसी से झगड़ा करने नहीं आए। मुकद्दमा एक तरीका है, एक मजबूरी है, क्योंकि आप हिंसात्मक कार्यों से दूर रहते हैं। आसानी से आप मुकद्दमा नहीं करते, पर जब एक बार कर देते हैं तो फिर पीछे नहीं हटते, समझौता नहीं करते। हार जाना ठीक है, पर समझौता नहीं मंजूर है आपको। जिनपर आपने केस किये हैं, वे संदेश भिजवाते हैं, पर आप समझौता नहीं करते।

आप किसी को सताने नहीं आए। आपके लिए तो सब समान हैं; सब आपके हैं। आपकी लड़ाई झूठ के ख़िलाफ़ है, और बड़ी तगड़ी है। आपकी हर बात सच्ची है। ऐसे ही सत्य नहीं लिख रखा है।

पर आप एक तरीके से निपटते हैं। जब हमला हुआ था तो बाद में एक माई ने आपसे कहा-साहिब जी! कुछ करिए न। वो माई शायद चाहती थी कि आप अपना असली रूप दिखाएँ और हनुमान जी की तरह सब पाखण्डी रूपी राक्षसों को उठा-उठा कर फेंक दें.....कहीं दूर। यदि ऐसा काम किया तो राक्षसों वाला काम हुआ। पर आप संतों वाला काम करना चाहते हैं।

पाखण्डी तो लीडर बनने के लिए साहिब-बंदगी की ख़िलाफ़त करते हैं। एक नामी था, उसे लगा कि वो अब जाने वाला है। उसने घर वालों को कह दिया कि उसका अंतिम संस्कार साहिब-बंदगी के अनुसार करना। उसने गाँव वालों से भी कह दिया। जब उसका शरीर छूट गया तो कुछ लोगों ने बदमाशों से कह दिया कि इसका अंतिम संस्कार साहिब बंदगी के अनुसार नहीं होने देना है। बदमाशों ने आकर घर वालों

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को धमकाया और जबरन उसका संस्कार करवाया, कहीं पिण्ड दान करवाया, कहीं कुछ। जब आपको पता चला तो आपने अपने लोग भेजे, कहा कि कार्यवाही करनी है, क्योंकि इन्होंने एक पार्थिव शरीर के साथ बदतमीजी की है। आपने माई को कहा कि यदि तू केस नहीं करेगी तो मैं तेरी लड़कियों की तरफ से दावा करूँगा।

आप कानून का सहारा लेते हैं। यदि पुलिस भी कार्यवाही नहीं करती है तो आप न्यायालय में अपील करते हैं। आप नागरिक अधिकारों को जानते हैं।

एक शास्त्री जी अपने सत्संग में आपके ख़िलाफ़ बोल रहे थे, बड़ी निंदा कर रहे थे। वहाँ आपका एक नामी भी बैठा था, उसने कहा कि ऐसा तो नहीं है। शास्त्री जी ने कहा कि इधर आ, तू उनका शिष्य है क्या? कहा-हाँ। वो उधर ही उसे मारना शुरू कर दिया। यह गुण्डापन नहीं था तो और क्या था ! फिर 50-60 बंदे भेजकर उसपर हमला किया। आपको पता चला तो आपने पुलिस से संपर्क किया, पर कोई कार्यवाही नहीं की पुलिस ने।

आप सब काम तरीके से करते हैं, कानून का सहारा लेकर करते हैं, पर जब कहीं से कोई कार्यवाही नहीं होती तो फिर आपका सोटा वो काम पूरा करता है। मोल्हू, पलाँवाला के लोग कारगिल की लड़ाई के बाद अपने घर नहीं जा सके। बाकी छः महीने में चले गये, पर जो हमले वाले थे, वे दो साल वहीं रहे। उनकी लड़कियाँ ख़राब हो गयीं, पशु मर गये। यह था आपका सोटा। पर कुछ मूर्खों को तब भी होश नहीं आई।

यह सब इसलिए हुआ कि आपके नामियों को भी उन लोगों ने मारा था, घरों में नहीं जाने दिया था, तब अपने भक्तों के कष्टों को देख आपके मुँह से निकला था कि चिंता मत करो, ये भी अपने घर नहीं जा पायेंगे।

10-11 साल पहले की बात है, राँजड़ी में एक लड़का था, वो आपका बड़ा विरोध करता था, यदि कोई ग़रीब नामी होता तो उसका

आपको सबकी ख़बर रहती है

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अपमान भी कर देता था, क्योंकि तगड़ा था। एक दिन चक्की चल रही थी तो उसका बाजू उसमें आकर कट गया। उस जमाने में गाड़ियाँ भी कम चलती थीं। सुबह 4-5 बजे एक आदमी आपके पास आया, कहा कि ऐसे-2 उस लड़के की बाजू कट गयी है, कोई गाड़ी नहीं है, उसे अस्पताल ले जाना है। उस समय आपके पास ही थी गाड़ी। आपने ड्राइवर को कहा कि उसे अस्पताल ले जाओ। डॉ० ने कहा कि यदि 10-12 मिनट लेट हो जाते तो यह मर जाता, क्योंकि खून इतना बह रहा था।

उसके बाद वो कहीं भी मिलता तो आपको कटी हुई बाजू ऊपर करके प्रणाम करता। पर ‘अब पछताए क्या होत, जब चिड़ियाँ चुग गयीं खेत॥’

यह पक्की बात है कि आपके बंदे को कोई कुछ करेगा तो उसकी खिचड़ी निकल जायेगी।

कहँ कबीर ऐसे उजाड़ूँ, जस मूली को खेत॥

सुँगल पिंड की तरफ सरपंच था; वो आपकी निंदा करता था; वो हमले में भी शामिल था। एक दिन जब वो जा रहा था, एक और आदमी ने आश्रम की तरफ देखकर निंदा के शब्द कहे। सरपंच ने कहा कि मेरे सामने निंदा मत करो। उसने कहा कि आप भी नामी हो गये हैं क्या? सरपंच ने कहा कि मैं नामी नहीं हूँ, पर मैं भी तुम्हारी तरह साहिब की निंदा करता था, मुझे नींद आनी बंद हो गयी, मैं पागल हो गया। तब मुझे समझ आया कि यह क्यों हुआ। इसलिए तुझे भी समझा रहा हूँ कि ऐसा मत कर।


आपको सबकी ख़बर रहती है

नाना पंथों से लोग जुड़े हैं, जो दीक्षा लेने के बाद भी वे छल-कपट नहीं छोड़ रहे, पाप नहीं छोड़ रहे। यह भक्ति है क्या? नहीं। समुद्र के किनारे जहाँ तक लहरें पहुँचती हैं, वहाँ केवल रेत होती है। वहाँ कोई

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पेड़ नहीं होता है। नमक का पानी ज़मीन को ऊसर बना देता है। जब तूफान चले तो दो फर्लांग दूर तक लहरें पहुँचती हैं। वहाँ तक कोई घास तक नहीं होती है।

नमकीन पानी ने ज़मीन को ऊसर बना दिया। नमक खाने में स्वादिष्ट है, पर उसमें बड़े दोष हैं। राँज़ड़ी में दो अमरूद के पेड़ थे। उनपर इतने अमरूद आते थे कि इतने पत्ते भी नहीं होते थे। कुछ समय बाद दोनों पेड़ कुम्हला गये, रंग मटमैला हो गया, फल खारा हो गया। आपने लोगों से पूछा कि कैसे हुआ, पर किसी को जानकारी नहीं थी। बात यह थी कि कुल्फियाँ जमाते हैं तो उसमें बर्फ और नमक दोनों डालते हैं। बेचने के बाद लड़कों ने वो बचा हुआ पानी पेड़ों में फेंक दिया। दोनों दूषित हो गये। वो पेड़ आज भी हैं। बाद में आपने वो वाली मिट्टी निकलवाकर दूसरी नयी मिट्टी डलवायी। .... इस तरह भक्ति को दोष दूषित कर देते हैं। यदि दूषित हो जायेगी भक्ति तो फिर कोई फल नहीं देगी।

70 यात्री एक बार समुद्र में प्यासे मर गये। अचरज वाली बात है। पहले कुछ दिन पिया, पर उससे लीवर ख़राब हुआ। फिर बाद में पानी नहीं पी रहे थे, प्यासे रहे। समुद्र में एक जहाज़ में 70 आदमी प्यासे मरे।

वर्तमान में हम देख रहे हैं, लोग भक्ति करना चाह रहे हैं, पर पाबन्द नहीं रहना चाहते हैं, चारसौबीसी, छल-कपट, पाप सब करना चाहते हैं। जहाँ अधर्म है, वहाँ भक्ति नहीं पनपेगी। गुरु लोग भी पाप, छल-कपट छोड़ने को नहीं कह रहे हैं। वो जानते हैं कि ऐसे में कोई नहीं आयेगा। इसलिए बाकी पंथों में लोग दौड़कर पहुँचते हैं, पर आपके पास आसानी से नहीं आते हैं। पहले हज़ार बार सोचते हैं। सिद्धांत सुनने के बाद आदमी की चुटिया खड़ी हो जाती है। हालांकि वो अंदर से जानते हैं कि इनकी भक्ति अच्छी है।

बड़े जिम्मेदार हैं आप

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आदमी तो चाहता है कि पाप भी करे और भक्ति भी। आप कहते हैं कि अगर पाप कर रहे हो तो भक्ति कभी फलित नहीं हो सकती है। गुरु लोग ज़ोर देकर नहीं बोल रहे हैं। उनके शिष्य कुछ भी करें, उन्हें पता भी नहीं चलता है। आपको पता चल जाता है कि आपका फलाना शिष्य क्या कर रहा है। क्योंकि आप सबको करीब से जानते हैं, सबसे बात कर लेते हैं।

कोई दारू पीता है तो दूसरा आकर आपको ख़बर दे देता है कि फलाने ने दारू पी है। फिर आप उसे भगा देते हैं। इसलिए डर भी है। बाकी गुरुओं को पता नहीं चलता है कि उनका शिष्य क्या कर रहा है।

फिर आपके पास अपना कम्प्यूटर भी है। वो पर्दे (स्क्रीन) पर सब दिखाता है। इसलिए सब पता होता है आपको। आपको पूरी जानकारी रहती है।

जैसे फैक्टरियों में, स्कूलों में कैमरे हैं, 5-6 खण्डों में बंटे होते हैं। कहीं हर कमरे में कैमरा है। एक बटन दबाओ तो सारी पिक्चर सामने आ जाती है, सब दिखने लगता है। काम करने वालों को भी पता है कि एक कैमरा हमपर नज़र रखे है। इस तरह एक कैमरा है, जिससे आप सबको देखते रहते हैं। जो लोग आपको अपना दुखड़ा सुनाते हैं, आप वे सब भी सुनते हैं। जब आपके पास समय होता है, आप अपना अन्दर का मेसेज बॉक्स खोलकर देखते हैं और उनपर विचार करते हैं कि किसका क्या करना है। यदि किसी को ठीक करना है तो आप इच्छा कर लेते हैं, या किसी शक्ति को उसकी सुरक्षा के लिए भेज देते हैं।

बड़े जिम्मेदार हैं आप

जीवन के हर क्षेत्र में आप बड़े जिम्मेदार हैं। एक आदमी आपकी बटालियन का था; वो एक पागल को आपके पास लाया। आपने उसे कहा कि इसका ध्यान रखो। तब राँजड़ी में तीन दिन का भण्डारा था।

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वो उसे किसी दूसरे को सौंप अपनी ड्यूटी पर चला गया, उसे कह गया कि इसका ध्यान रखना। वो भी ऐसे ही वहाँ आया था भण्डारे पर। वो भी चला गया। तीसरे दिन वो पागल उठा और चल पड़ा। जाते-जाते सड़क पार करते हुए वो गाड़ी के नीचे आ गया। वो मर गया। अब कोई पहचान नहीं पा रहा था कि यह कौन है। पुलिस ने लावारिस समझ मेडिकल हॉस्पिटल में भेज दिया।

एक आदमी ने कहा कि मुझे लगता है कि यह आश्रम से गया है। आपको ध्यान आया कि फौजी के साथ एक पागल आया था, दो दिन रुका था वो। आपने गाड़ी भेजी, कहा-उनसे पूछो कि जो लाश उठाई थी, वो कहाँ है? पुलिस वालों ने कहा कि वो मेडिकल हॉस्पिटल में भेजी है। आपने एक नामी डॉ० को फ़ोन किया और सारी बात बतायी। उन्होंने लाश दे दी। अब उसका पता न चले कि कहाँ का है। आपको वो लाश उसके घर पहुँचानी थी। आपने इसे अपनी ड्यूटी समझा, जिम्मेदारी समझा। दूसरा कोई होता तो इतनी मुसीबत न लेता।

आपको याद आया और फौजी का पता ढूँढ़ने लगे। पुरानी डायरी में लिखा था। आपने चरणसिंह के घर फ़ोन किया तो उसकी पत्नी ने उठाया, कहा कि वो तो ड्यूटी पर है। वहाँ का पता पूछा और उससे बात की; कहा कि जो पागल भेजा था, कहाँ का है? उसने कहा कि मुकेरियाँ का। पर पूरा पता नहीं था उसे। फिर जैसे-तैसे करके पता किया और आपने गाड़ी में भेजकर लाश वहाँ पहुँचाई। जब फौजी आया तो उसका बड़ा अपमान किया, कहा कि इसकी मौत का जिम्मेदार तू है; यदि मैं जज होता तो तुझे फाँसी चढ़ाना था। यदि तूने जाना था तो मुझे कह जाता, मैं किसी जिम्मेदार के हवाले कर देता इसे।

ऐसे ही एक आदमी चूड़ी बेचता था। उसके तीन-चार बच्चे थे। साइकिल पर गाँव-गाँव जाकर चूड़ी बेचता था। वो बंदा गुरुमुख था। सुलतानपुर में एक नामी के घर में रहता था। वो स्वभाव से बड़ा अच्छा

धुन के पक्के हैं आप

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था। इसलिए नामी कहता कि चूड़ियाँ बेचकर आते हो तो यहाँ रुक लिया करो। कभी आश्रम में तो कभी उसके घर में रहता। एक दिन उसने अपने सामान सहित साइकिल वहाँ रखी और जम्मू आ गया।

राँजड़ी आकर उसने देखा कि पशुओं की देखभाल ठीक नहीं हो रही है। वो जानकार था, आपसे कहा-गुरुजी, कुछ देर यहाँ रहकर इनकी सेवा कर लेता हूँ। वो 5-6 महीने रहा। वो हार्ट का मरीज़ था, पर यह बात कभी उसने आपको नहीं बताई। एक दिन वो नहाकर ध्यान में बैठा तो उसका शरीर छूट गया। आपको ख़बर हुई।

आप इतना तेज़ दिमाग़ रखते हैं कि किसी भी समस्या को मिनटों में हल कर देते हैं, दुखी भी नहीं होते। अगर इंसानी तौर पर भी देखें तो जो गुण आपमें मिलते हैं, कहीं नहीं मिल सकते।

तो आपने कहा कि इसका पार्थिव शरीर इसके घर पहुँचाता हूँ। आपने सुल्तानपुर में फ़ोन किया; आश्रम वालों से पूछा कि जो एक आदमी चूड़ी बेचता था, किसके घर रुकता था। उन्होंने कहा कि शायद गोरखपुर का है। आपने पूछा कि घर का पता है कि नहीं? उन्होंने कहा- नहीं। आपने फिर रिजिस्टर में देखने को कहा, जिसमें नाम दान के बाद नाम लिखा जाता है। वहाँ पता भी लिखा जाता है। उसका गाँव मिल गया। आपने गाड़ी भेजी और बर्फ से साथ लाश भेज दी, कहा कि कहना-हार्ट का मरीज़ था, ऐसे-ऐसे चला गया। गाँव के लोग इकट्ठा हुए, कहा-वाह! क्या गुरुजी हैं, इतनी दूर पार्थिव शरीर भेजा है। कोई भाई भी नहीं पहुँचाता है। आप हमेशा बड़ी जिम्मेदारी से अपना काम करते हैं। पर छल-कपटों से भरे संसारी हृदयों में ये चीज़ें समाती नहीं हैं। वहाँ तो बस पाखण्डी ही डेरा डालकर बैठे रहते हैं।

धुन के पक्के हैं आप

आप अपनी धुन के पक्के हैं। लखनऊ में एक जगह सत्संग में बहुत ऊँचा आसन था। हवा के झोंकों से टैंट गिर गया। अब सूर्य की धूप

500 कहानियाँ रोज़ सुननी पड़ती हैं आपको

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सीधा आप पर पड़ रही थी, पर आप लगे रहे, हाथ आगे रखकर सत्संग करते रहे। एक आपके लिए छाता लेकर आया, पर आपको किसी की सेवा भी पसंद नहीं आती है, क्योंकि कन्संट्रेट नहीं होने से गलती कर देते हैं। तो उसने भी दो बार छाता आपके सिर पर लगा दिया। इतने में दूसरा आया, सोचा कि मैं ज़्यादा समझदार हूँ। उसने 10-15 मिनट में ही तीन बार छाता आपके सिर पर लगा दिया। आपने कहा कि दोनो बैठ जाओ अपनी जगह, मैं खुद निपट लूँगा, रहने दो ऐसे ही। तो आप कड़कती धूप में भी लगे रहे।

आपकी एक ही धुन है कि सत्संग द्वारा लोगों को समझाकर सत्य भक्ति में लगाना। चाहे कैसा भी ख़राब मौसम क्यों न हो, आप सत्संग स्थल पर पहुँचते-ही-पहुँचते हैं।


500 कहानियाँ रोज़ सुननी पड़ती हैं आपको

सुबह होते ही लोगों की भीड़ से आप घिर जाते हैं। लगभग 400-500 लोगों से निपटना पड़ता है। दर्शन करने कोई दो ही होते हैं, बाकी अपनी-अपनी समस्याएँ लेकर ही आए होते हैं। फिर कोई आपको ब्रश भी नहीं करने देता, वहाँ भी आकर आपको अपनी-अपनी फरियाद सुनाने लगते हैं। फिर सभी के पास कहानियाँ होती हैं; वो सुना-सुनाकर आपका समय नष्ट करते हैं। पर आप सबकी समस्याओं को शांत होकर सुनते हैं। कुछ डॉ० की रिपोर्ट लेकर आ जाते हैं। अब डॉ० लोगों का

जब आप किसी धर्मस्थान पर जाते हैं

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अपना लिखने का स्टाइल है। तो भी आप पूछते हैं कि डॉ० ने क्या कहा? वे बताते हैं कि यह बताया है। तो आप दवा बताते हैं कि यह करना। पर वो सुनते नहीं हैं।

उदाहरण के लिए एक दिन एक माई आई, उसने कहा कि भूख नहीं लगती। आप जान गये कि क्या समस्या है इसे। आपने कहा कि सुबह मूली, पपीता, खीरा खाना। क्योंकि तीनों भूख वर्द्धक हैं। साथ में कहा कि सुबह एक गिलास पानी में शहद मिलाकर पीना। आप नज़र से पढ़ लेते हैं कि क्या बीमारी है। जब आप दवा बताने लगे तो वो बीच में ही बोल पड़ी कि बड़ी दवाएँ की हैं। आपकी सुने ही न। आपने तो उसकी सारी बात सुन ली, पर वो आपकी बात सुनने को तैयार नहीं थी। फिर तीसरा आपने कहा कि नाम भजन करना। फिर उसने सवाल किया कि दवा खाएँ कि नहीं। आप दवा के लिए कभी मना नहीं करते। आपका मानना है कि यह काम तो मूर्खों वाला है। तो यह हाल कोई एक माई का नहीं है, सबका यही हाल होता है। समस्या बताते हैं तो आप ध्यान से सुनते हैं; पर जब आप उसका हल बताते हैं तो वो सुनने को तैयार नहीं होते हैं और आपका कीमती समय नष्ट करते हैं।


जब आप किसी धर्मस्थान पर जाते हैं

आपने सभी धर्मस्थानों को देखा है। कहीं-कहीं आप यह देखने के लिए चुपके से चले जाते हैं कि देखता हूँ कि वहाँ क्या-क्या चल रहा है। कहीं पर बलि के नाम पर रोज़ हज़ारों जीवों की हत्या की जाती देखी, कहीं कुछ। खैर, यह तो धर्म के नाम पर हो रहे पाप की बात हुई,

ऐसे हैं आपके काम

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पर आप जिस भी धर्मस्थान पर गये, वहाँ आप की बात हुई। यदि शिवजी के स्थान पर गये तो शिवजी से बात की, यदि हनुमान जी के स्थान पर गये तो उनसे बात की, यदि माता के स्थान पर गये तो उनसे बात की, यदि गंगा जी के पास गये तो उनसे भी बात की। यह सब वहाँ मौजूद होते हैं, पर आम आदमी तो ऐसे ही वापिस आ जाता है, वो बात करना नहीं जानता। पर आप सबसे बात करते हैं।


ऐसे हैं आपके काम

जम्भाल जी कहते हैं कि साहिब मेरा नौकर है। एक समय डोडा में कर्फ्यू लगा था और वे भी वहाँ थे। वे सड़क पर खड़े थे। एक आदमी को वहाँ खड़े डी. एस. पी. ने चाँटा मारा, कहा कि यहाँ क्यों खड़े हो! जम्भाल जी ने सोचा कि मेरी भी बारी आई। पर डी. एस. पी. ने उनके पास आकर कहा कि आपको कहाँ जाना है? जम्भाल जी ने कहा कि उधमपुर। डी. एस. पी. ने कुछ न कहा; वो आगे चला गया। इतने में एक मोटरसाइकिल वाला वहाँ आया। डी. एस. पी. ने उसे रोका, पूछा कि कहाँ जा रहे हो? उसने कहा कि उधमपुर। उसने जम्भाल जी के लिए कहा कि उन्हें भी साथ लेते जाओ। ये थे आप। जब उधमपुर आया तो मोटरसाइकिल वाले ने कहा कि उतरो। फिर कहा कि अच्छा जाना कहाँ है? जम्भाल जी ने कहा कि आगे तक। उसने कहा कि मुझे भी जाना है,

कोई वर्णन नहीं कर सकता है

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बैठो। कटड़े पहुँचे तो फिर उसने कहा कि यहाँ उतर जाओ। फिर खुद ही कहा कि अच्छा जाना कहाँ है? जम्भाल जी ने कहा कि अखनूर तक। वहाँ पहुँच गये। उसने कहा कि उतरो। फिर कहा कि अच्छा जाना कहाँ है? जम्भाल जी ने कहा कि बी. एस. एफ. के क्वार्टर तक। वहाँ पर पहुँचे तो कहा कि कितना दूर तक है? जम्भाल जी ने कहा कि आपका रास्ता दूसरा है, मेरा घर थोड़ी दूर है। मोटरसाइकिल वाले ने कहा कि घर छोड़कर आता हूँ। वहाँ पहुँचने पर उसने जम्भाल जी से कहा कि तुम चीज़ क्या हो, मैं तो तुम्हें छोड़ ही नहीं पा रहा था। मैं ऐसा हूँ ही नहीं। .....यह थे आप। आप ऐसे ही काम करते हैं। यह कोई एक नामी के साथ होने वाला किस्सा नहीं है और एक-दो बार होने वाला किस्सा भी नहीं है। राजू सरदार तो कहते हैं कि उनके साथ इतने करिश्में हो चुके हैं कि उन्हें याद भी नहीं हैं।

यह तो सत्य है कि आप पग-पग पर साथ देने के लिए तैयार रहते हैं। शर्त है कि श्रद्धा हो, विश्वास हो।


कोई वर्णन नहीं

कर सकता है

यदि कोई चाहे कि वो आपके गुणों का वर्णन करें तो निसंदेह यह नहीं हो पायेगा। वो वर्णन अधूरा ही रहेगा। अंत में उसे यही कहना होगा कि आप बहुत अच्छे हैं, आप बहुत ही निराले हैं। आपके गुणों का

ज़रूरत पड़ने पर मुर्दों में भी प्राण फूँकते हैं आप

निराले सद्गुरु \hfill 107

वर्णन करते-2 वाणी मौन हो जायेगी और वो शब्द नहीं मिल पायेंगे, जिनसे आपके गुणों का पूरा-पूरा वर्णन किया जा सके। सबसे पहले तो आपको कोई पूर्ण रूप से जान ही नहीं पायेगा। यदि कुछ जाना भी तो उसे वाणी में प्रकट नहीं कर पायेगा। यदि किया भी गया तो वो पूरा-पूरा, सही-सही वर्णन नहीं होगा, केवल उसका संकेत मात्र ही हो पायेगा।

ज़रूरत पड़ने पर मुर्दों में भी प्राण फूँकते हैं आप

आपने कई बार मरे हुओं को जीवित किया है, पर आप यह काम तमाशे के लिए नहीं करते। यही कारण है कि दुनिया को इन बातों की ख़बर नहीं हो पाती है। यदि कोई सिद्ध छोटा-सा करिश्मा दिखाता है तो दुनिया बांवरी होकर उसके पीछे भागने लग जाती है। वो तो शोहरत कमाने के लिए ऐसा करता है। क्योंकि उसके पास आत्मज्ञान नहीं है, यह सब ही है। वो तमाशे ही दिखाकर लोगों को इकट्ठा करेगा। जिसके पास जो है, वो दिखाना चाहता है, दूसरों को भी देना चाहता है। इसलिए महापुरुष ये काम नहीं करते, बल्कि वे आत्म ज्ञान द्वारा लोगों को अपनी ओर खींचते हैं। उनके पास परम सिद्धि आत्मज्ञान होता है।

ये जो करिश्मे हैं, ये आप सहज में कर देते हैं। इनका दिखावा नहीं करते हैं आप। ये तमाशे आप दुनिया तक नहीं पहुँचाना चाहते हैं। ये तो केवल कभी ज़रूरत पड़ने पर आप मजबूरी में कर दिया करते हैं। आप तो अपने ज्ञान को ही दुनिया तक पहुँचाना चाहते हैं ताकि आत्मा का कल्याण हो सके। बाकी इन चमत्कारों को दिखाने वालों की पहुँच ही यहीं तक होती है तो वो बेचारे भी क्या करें, यही सब दिखायेंगे।

आप यह सब तब करते हैं, जब कोई मजबूरी हो और वो भी बिना दिखावे के। उदाहरण के लिए जब आपके एक नामी की करंट लग जाने से मृत्यु हो गयी तो सबने आपसे कहा कि वो चला गया है, लोग बातें करेंगे कि साहिब बंदगी का था। आप दुनिया की चिंता ही नहीं करते

108 साहिब बन्दगी

हैं। आपने कहा कि जाने दो, फिर क्या है, सबको जाना है एक दिन। पर आपके ट्रस्टियों ने बार-बार आग्रह किया तो आपने विचार किया। जब आपको लगा कि इसकी अभी यहाँ पर ज़रूरत है तो ही आपने मजबूरी में उसमें प्राण फूँके।

यह एक की बात नहीं है, सैंकड़ों की बात है। पर यह काम आप बड़े चुपके से कर देते हैं। जब भी किसी में प्राण फूँकते हैं तो फिर उसे बता देते हैं कि अब बहुत ही सावधानी से काम करना, तुम्हें पुनर्जन्म मिला है; यदि कुछ गलत किया तो मैं भी भागीदार हो जाऊँगा।

मस्तगढ़, जम्मू के पंडित प्रभु दयाल जी ने पीलिया की बीमारी में प्राण त्याग दिये। उन्हें आप-ही-आप दिखने लगे। तब उनके पार्थिक शरीर को लेकर राँजड़ी लाया गया। सुबह के 5 बजे थे। उन्हें एक कुल्ले में लिटाया गया। जब आपने द्वार खोला तो उनका बेटा सामने था। आपने उससे पूछा कि आज इतनी सुबह कैसे आना हुआ; पंडित जी कहाँ हैं? तब वो अपने पिता जी को आपके समक्ष लाया। आपकी नज़र पड़ते ही उनके शरीर में प्राण वापिस आ गये। आपने पंडित जी से कहा-अरे पंडित जी! आप तो चले गये थे। वे आपके चरणों पर गिर पड़े; बंदगी की और रोने लगे। तब आपने उन्हें प्रसाद दिया और बहुत कुछ समझाकर घर भेज दिया।

नौग्राम की रक्षा बहन जी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। बीमारियों के कारण उनका शरीर छूट गया। हार्ट की भी उन्हें तकलीफ़ थी और अन्य छोटी-छोटी बीमारियाँ भी थीं। घर वाले उनके पार्थिक शरीर को लेकर आपके पास आए। आपने कहा कि अभी तो इनकी ज़रूरत है। तब आपने उनमें प्राण फूँके और फिर समझाया कि इस शरीर से अब कोई गलत काम नहीं लेना; इसे मेरा ही मानना; आपने तो छोड़ दिया था।

इसके अलावा हज़ारों लँगड़ों, हज़ारों पागलों को आपने ठीक किया है। अन्य भी कई बीमारों को, जो किसी डाक्टर के इलाज़ से ठीक नहीं हो पाए होते हैं, उन्हें भी अच्छा किया है। पर यह काम आप इतने चुपके से करते हैं कि वो ख़बर फैल नहीं पाती है। यह इसलिए करते हैं

निराले सद्गुरु
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कि यदि यह ख़बरें फैलने लगेंगी तो आपके पास फिर लाशें ही पहुँचेंगी। फिर तो राँजड़ी में भक्त लोगों को आपके दर्शन भी दुर्लभ हो जायेंगे। वैसे तो आप सहज में सबसे मिल लेते हैं, पर ऐसे में आपके दर्शन करना सच्चे भक्तों के लिए बड़ा मुश्किल काम हो जायेगा। इसलिए आप यह स्थिति उत्पन्न नहीं होने देना चाहते हैं।

सच तो यह है कि आपको इसके लिए किसी करिश्मे की भी ज़रूरत नहीं है। आप एक पर्दा करके संसार में चल रहे हैं। यदि आप केवल यह पर्दा हटा देंगे तो सब आपमें लय हो जायेंगे। कोई पंथ, कोई मत-मतान्तर नहीं रह जायेगा, सब आपमें लय हो जायेंगे। केवल आपका पंथ ही रह जायेगा। पर यह काम भी आप नहीं करना चाहते हैं। क्योंकि फिर तो सभी मुक्त हो जायेंगे। इसलिए आप युक्ति-युक्ति द्वारा जीवों के कल्याण का काम करना चाहते हैं। अपने ज्ञान द्वारा लोगों को अपनी ओर खींचना चाहते हैं, ताकि श्रद्धावान और साहिब के अंकुरी जीव सत्य भक्ति में आ सकें।

मुर्दे को जीवित तुम करके,
देते जीवन दान हो।
जग में जीवन सादा जीते,
तनिक भेद अपना न देते।
कोई न समझे कोई न जाने,
गुप्त सब तेरे काम हो॥
सुन भक्तों की दीन पुकार,
हरते उनके दुख अपार।
पल-पल रक्षा तुम हो करते,
काल की दुनिया से छुड़ा,
ले जाते अपने धाम हो॥
तुम्हारा भेद तुम ही जानो,
सब में तुम रहे समानो।
कहाँ लग कहें कुछ कहा न जाय,
धन साहिब तेरे काम हो॥

कोई समझे प्रेम दीवानी है

110 साहिब बन्दगी

कोई समझे प्रेम दीवानी है


समझ समझ कोई समझ कहानी,
आत्म हुई दीवानी है।
सुर नर मुनि त्रिदेव नहीं,
साहिब यह नूरानी है॥

न इसका कोई संगी साथी,
न इसकी कोई रानी है।
मात गर्भ में यह नहीं आता,
कहती संतन वाणी है॥

आता जो जन शरण में इसकी,
पाता अमर निशानी है।
चाम महल में यह नहीं रहता,
बोले मधुमय वाणी है॥

सबसे न्यारा साहिब है यह,
अद्भुत बड़ी कहानी है।
प्रेम नगर का है यह राजा,
कोई समझे प्रेम दीवानी है॥