भारतकोश
संग्रह पर लौटें

निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

साहिब बन्दगी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (उद्गम)

DevanagariHindipublished112 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची

श्री सद्गुरु वे नमः

निराले सद्गुरु

सब परबत स्याही करूँ, घोलू समुन्दर जाय। धरती का कागज करूँ, गुरु अस्तुति न समाय॥

साहिब [ श्री सद्गुरु वे नमः / सत्य ] बन्दगी


सन्त आश्रम रांजड़ी, पोस्ट राया, ज़िला साम्बा (जे. एण्ड के.)

निराले सद्गुरु

प्रचार अधिकारी
राम रतन, जम्मू

© SANT ASHRAM RANJRI DISTT. SAMBA (J & K)
ALL RIGHTS RESERVED

First EditionAugust, 2008
Copies5000

Website Address.
www.sahibbandgi.org


E-Mail Address.
*satgurusahib@sahibbandgi.org


Editor
Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri
Post -Raya, Distt.-Samba (J & K)
Ph. (01923) 242695, 242602


Mudrak: Sartaj Printing Press

(iii)

विषय सूचीपृष्ठ संख्या
☞ कौन है काल पुरुष व परम पुरुष9
☞ प्रेम के अथाह सागर हैं आप15
☞ आत्मा आपकी तरफ आकर्षित होती है16
☞ सब महात्माओं से अलग हैं आप17
☞ आपकी किसी से स्पर्द्धा (competition) नहीं है21
☞ सभी डर रहे हैं आपसे22
☞ सेवा है आपका लक्ष्य27
☞ बचपन से ही परिश्रमी रहे आप31
☞ भूत भी भाग जायेगा31
☞ वो समय भी था............35
☞ एक ही धुन में रहते हैं आप35
☞ अंत में ऐसे साथ देते हैं आप37
☞ सबके दुख को समझते हैं आप38
☞ मच्छर तक को नहीं मारते हैं आप41
☞ आपके आगे मन का ज़ोर नहीं चलता है42
☞ प्रोफेसर बोला-आप साधारण नहीं हैं43
☞ गहरी सुरति देनी पड़ी आपको44
☞ ठीक चौबीस घण्टे बाद वो हिला45
☞ बहुत कोमल हृदय है आपका46
☞ आपकी वाणी बड़ी ही प्यारी है47
☞ आपकी आँखें भी सबसे निराली हैं47
☞ महात्मा लोग भी समझ रहे हैं आपको48
☞ साहिब कबीर धरती पर उतर आए है50
☞ इसलिए शरीर धारण करना पड़ता है परम पुरुष को51
☞ आपका नाम सबसे निराला है53

(iv)

विषय सूची            पृष्ठ संख्या

☞ अभियान चलाया              56
☞ आपका ज्ञान देख वैज्ञानिक भी दंग रह गये     57
☞ वाणी पर पूरा कण्ट्रोल रहता है आपका       58
☞ आप दीन दुखियों के हैं            58
☞ इसलिए जगह-जगह आश्रम बनवाते हैं आप     60
☞ सिद्धांत के इतने पके हैं आप          61
☞ इंस्पेक्टर बोला-दो साल नौकरी आपने की है    61
☞ वापिस आना ही पड़ता है           61
☞ केवल श्रद्धा देखते हैं आप           62
☞ आपकी तान निराली है           62
☞ आपका भोजन भी सबसे निराला है        64
☞ बड़ा अन्याय किया जाता है आपके साथ      64
☞ भोजन बड़ा स्वादिष्ट बनाते हैं आप        66
☞ सिर पर बैठकर जो चाहते हैं करवा लेते हैं     67
☞ वो बोली-मुझे करंट पड़ रही है         68
☞ लड़की बोली-मेरे साथ साहिब हैं         69
☞ एक गुरु शिष्य का नाता ही मानते हैं आप     69
☞ ऐसी चीज़ों से आप निपट लेते हैं         69
☞ शब्द है आपका वाहन             70
☞ परमहंस की तरह रहते हैं आप          71
☞ निंदकों से भी प्रेम करते हैं आप          72
☞ शब्द नहीं देते हैं आप             73
☞ माँ की तरह है आपका व्यवहार         76
☞ संगत का एक पैसा भी नहीं लेते हैं आप      78

(v)

विषय सूचीपृष्ठ संख्या
☞ आप सौम्य हैं79
☞ सुलझावन हारी है आपकी वाणी80
☞ आपके पास हज़ार रूपया भी नहीं मिलता है81
☞ इसलिए लड़कियों की शादियाँ करवाते हैं आप82
☞ हरेक की शंका मिटा देते हैं आप83
☞ आपको नाराज़ करना ठीक नहीं है84
☞ बाहरी दिखावे से बहुत दूर रहते हैं आप86
☞ जासूसी करने आए थे और भक्त बन गये87
☞ दीनों के नायक हैं आप87
☞ फौज में रहे शान से89
☞ जब आप नाचे........89
☞ बदमाशों को भी सिखाया प्रेम आपने90
☞ वो भी करते हैं बंदगी90
☞ बिल्ली बोली-मेरे बच्चे कहां हैं92
☞ ऐसे निपटते हैं आप92
☞ आपको सबकी ख़बर रहती है98
☞ बड़े जिम्मेदार हैं आप100
☞ धुन के पक्के हैं आप102
☞ 500 कहानियाँ रोज़ सुननी पड़ती हैं आपको103
☞ जब आप किसी धर्मस्थान पर जाते हैं104
☞ कहे गंगा104
☞ ऐसे हैं आपके काम105
☞ कोई वर्णन नहीं कर सकता है106
☞ ज़रूरत पड़ने पर मुर्दों में भी प्राण फूँकते हैं आप107
☞ कोई समझे प्रेम दीवानी है110

दो शब्द

आप जब इस संसार में आए, तब महाकलयुग शुरू हो गया था। आम आदमी ही नहीं, भक्ति करने वाला इंसान भी भटक चुका था। आपने आकर केवल धार्मिक क्रांति ही नहीं लाई बल्कि समाज सुधार का काम भी किया। जहाँ धर्म में व्यवसाय, राजनीति, रोमाँस आदि ने स्थान ले लिया था, वहीं समाज में हिंसा, छल, कपट, ठगी, बेईमानी, चरित्रहीनता सहित अनेक बुराइयाँ अपनी चरम सीमा तक पहुँच रही थीं। कहीं सयाने बाबे हमारी माँ, बहन, बेटियों को नचा रहे थे तो कहीं नकली ज्योतिषि समाज को भटका रहे थे। आपने समाज को जगाया, बचो इनसे। इसके लिए आपको इस महाकलयुग में पाखण्डियों द्वारा बहुत निंदा झेलनी पड़ी।

कहीं उग्रवादी कहा गया। दुनिया भी कितनी भोली है, मान लिया। फौज में नौकरी करने वाले को उग्रवादी कहा। कितने बेवकूफ थे पाखण्डी। फिर मानने वाले तो भोले भाले थे, विचार भी नहीं किया। कहीं आपको मजनू कहा गया। आप तो किसी स्त्री को स्पर्श तक नहीं करते हैं और न ही आपने शादी की। यदि आपको जरूरत होती तो शादी कर लेते। यह भी किसी ने विचार नहीं किया। कहीं चमार कहा गया। आपके गुरू के लिए भी किसी की यह सोच रही थी। किसी ने उनकी जाति पूछी थी। आपके गुरू जी ने कहा कि जाति पाति पूछे न कोई। हरि को भजे सो हरि का होई।। तो उसने कहा कि यह तो रविदास जी ने कहा था, क्योंकि वे जाति से चमार थे। तब आपका दिल हुआ कि बता

<center>(vi)</center>

(vii)

दूँ कि गुरू जी ब्राह्मण हैं, पर गुरू जी ने इशारे से मना कर दिया। बाद में कहा कि अपनी जाति बतानी ही नहीं है। आप तो स्वयं साहिब हैं, फिर आपकी
जाति जो पूछे वो मूर्ख ही है। फिर पाखण्डियों ने आपको अनेक यातनाएं देने की कोशिश की, कहीं जहर दिया, कहीं जिंदा जलाने का प्रयास किया, कहीं तलवारों से मरवाने की कोशिश की, पर आपका कोई बाल भी बांका नहीं कर सका।

साहिब आए काल जगत में, निंदे सबही कोय।
महाकलयुग देत है दस्तक, पाखण्ड जय जय होय॥

पर आप चुप नहीं हुए, जो संदेश समाज को शुरू से दिया, उससे कभी हटे नहीं, कहीं आपने अपने शब्दों में बदलाव नहीं लाया। महाकलयुग में आप अनेक यातनाएं सहते हुए समाज को बुराइयों से, पाखण्डियों से बचा रहे हैं। इस कलयुग में जो काम आप कर रहे हैं, न आज कोई कर रहा, न आगे कर पायेगा।

इस अनथक बेमिसाल शूरवीर सद्गुरु मधु परमहंस जी के चरणों में अर्पण दो शब्द लिखने के लिए हमारी कलम नहीं रुक रही। जिसने 17 साल की आयु से ही भारत की थल सेना के महार ग्रुप में रह कर अपनी देश सेवा के दौरान ही संसार के, भूले भटके लोगों को भक्ति का ठीक रास्ता दिखाने के लिए संत सम्राट् सद्गुरु कबीर साहिब द्वारा दिया सच का प्रतीक, ‘सत्य का झंडा’ उठाया। निरंजन की भक्ति को छोड़कर सत्य पुरुष की भक्ति करने को कहा है।

मिठास के प्रतीक ‘मधु’ परमहंस जी के विशाल हृदय से निकलने वाली निर्मल धारा ने भक्ति के क्षेत्र में एक सैलाब व क्रांति ला रखी है।

(viii)

जिसने पाखंडवाद को झंझोड़ कर रख दिया है। यही कारण है कि भक्ति के नाम पर पल रहे सभी तपके, इस अथक नौजवान के विरोध में नित्य नये जाल बनाये जा रहे हैं। कोई कुल्ले जला रहा है कोई लाखों की फिरोती देकर, कोई जहर आदि देकर उस परम सत्य के सैलाब को रोकने की कोशिश कर रहा है।

मगर कौन रोक पायेगा ! सतसंग करना उनका शौक है पेशा नहीं। सतसंग द्वारा वे जीवात्मा को चेतन करके उसे अमर लोक का नाम प्रदान कर रहे हैं। जो शिष्य की सोते, जागते सुरक्षा करता है और जीवात्मा मन और माया से अजाद हो कर अमर-लोक चली जाती है। साहिब कहते हैं ‘नाम पाय सत्य जो बीरा, संग रहुँ मैं दास कबीरा’। इसीलिए साहिब बार-बार सुचेत करते हैं कि मैं बढ़ई वश नहीं कहता।

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“जो वस्तु मेरे पास है

वह ब्रह्माण्ड में कहीं

नहीं है।”

</div> <br>
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सतगुरु मारा तानि के, शब्द सुरंगे बान।
मेरा मारा फिर जिये, तो हाथ न गहुँ कमान॥

</div>

कौन है काल पुरुष व परम पुरुष

कौन है काल पुरुष व परम पुरुष ?

आओ इस भेद को थोड़ा समझें !

‘‘वेद चारों नाहिं जानत, सत्य पुरुष कहानियाँ॥’’

धर्म दास के पूछने पर आदि उत्पति का रहस्य संसार को सब से पहले कबीर साहिब जी ने दिया। आप ने कहा सत्य पुरुष पहले गुप्त और अकेले थे। वे कभी बने ही नहीं, न ही कभी मिटेंगे। जिस वस्तु का सर्जन होता है वह नष्ट भी अवश्य होती है। कबीर साहिब कहते हैं मैं तब की बात कहता हूँ जब साकार, निराकार, लोक-लोकांतर, सूर्य, चांद, तारे, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, काल निरंजन (मन) भी नहीं बना था।

सब से पहले उस गुप्त, अगम पुरुष ने अपनी इच्छा से शब्द उचारा। जिस से अद्भुत श्वेत प्रकाश उत्पन्न हुआ, जो इस संसारी प्रकाश जैसा नहीं था। जिस का एक-एक कण करोड़ों सूर्यों को भी लज्जा दे। अगम पुरुष स्वयं उस प्रकाश में समा गये और वह प्रकाश जीवित हो गया। अगम पुरुष जो पहले गुप्त थे, प्रकाश में आने से उनको सत्य पुरुष, परम पुरुष, दयाल पुरुष कहा गया। वो ही अमर लोक सतलोक कहलाया।

फिर उन्होंने अपनी मौज से अपने ही स्वरूप को अपने में से शटका दिया, अनन्त बूंदें हुई। जो वापस उस अद्भुत अनन्त प्रकाश में आई। लेकिन उनका अपना अलग वजूद रहा वो उस अद्भुत अनन्त प्रकाश में मिक्स नहीं हो पाई। क्योंकि सत्यपुरुष ने इच्छा की कि इनका अलग अस्तित्व रह जाये। वे ही जीव (आत्मा) कहलाई। वे सब जीव उसी प्रकाश में विचरण करने लगे जैसे पानी में मछली। अमर लोक में आत्मा का प्रकाश सोलह सूर्य जितना है।

9

10 साहिब बन्दगी

इसके बाद सत्य पुरुष ने सौलह शब्द उचारे जिससे इनके सोलह शब्द पुत्र उत्पन्न हुए। इसके पश्चात् सत्य पुरुष का पांचवां पुत्र निरंजन, जिसको निराकार, निरंजन, नारायण, अथवा मन आदि नामों से जाना जाता है जिसे संसारिक लोग राम, ब्रह्मा, आदि दिरंजन, कादर, क्रीम, प्रमेश्वर, प्रमात्मा, हरी, हरि, अद्वैत, भगवान, तथा अलख निरंजन आदि नामों से याद करते हैं। निरंजन ने 70 युग तक एकागर चित होकर पर्म पुरुष का एक पग पर खड़े होकर ध्यान किया। इस तप से खुश होकर सत्यपुरुष ने निरंजन को मानसरोवर दीप में जाकर रहने को कहा।

इस स्थान पर निरंजन बहुत खुश हुआ और फिर से 70 युग तक एक पग पर खड़े हो कर परम पुरुष का ध्यान किया। परमपुरुष के प्रसन्न होने से निरंजन ने कहा या तो मुझे अमर लोक का राज्य दो नहीं तो अलग से एक न्यारा देश दे दो जिस पर मेरा पूरा अधिकार हो। सत्यपुरुष ने कहा तुम्हें 17 चौकड़ी असंख्या युग का राज्य देता हूं। अपने बड़े भाई कुरम से बीज लेकर शून्य में एक अलग ब्रह्मांड की रचना बनाओ। निरंजन ने बिनती किए बिना कुरम के तीन सीस काट डाले और उनके पेट से पांच तत्व का बीज छीन लिया। इस तरह निरंजन ने 49 क्रोड़ योजन पृथ्वी, सूर्य, चंद्र, तारे सप्त पाताल, सप्त लोक आदि सब बना दिये और शून्य में रहने लगा लेकिन वहां जीव नहीं थे, सोचा जीव नहीं तो ब्रह्मांड का क्या लाभ। अतः उसने पुनः 64 युग तक फिर परमपुरुष का ध्यान किया। परम पुरुष ने पूछा अब क्या चाहते हो ? निरंजन ने कहा जीव ही नहीं है तो राज्य किस पर करूँ। इस लिए कृप्या कर थोड़े से जीव मुझे भी दे दो।

अब परमपुरुष ने आदि शक्ति की उत्पत्ति कर उसे अनन्त आत्मायें देकर कहां हे ! पुत्री मानसरोवर में निरंजन के पास जाओ और

निराले सद्गुरु 11

मिलकर सत्य सृष्टि करो। पांच तत्वों से बनी रूदर मांस वाली नहीं (यानि आत्माओं को शरीरों में डालने की आज्ञा नहीं दी गई)।

निरंजन आद्या शक्ति का सौंदर्य देख कामुक हो गया तथा उसे निगल गया। यह परमपुरुष को बुरा लगा और निरंजन को शाप दे दिया कि तूं एक लाख जीवों को रोज निगलेगा तो भी तेरा पेट नहीं भरेगा और सवा लाख उत्पन्न करेगा मगर तू सत्यलोक नहीं आ सकेगा। तब से इसका नाम काल पुरुष हुआ। सत्य पुरुष ने सोचा निरंजन ने पहले कुर्म के तीन शीश काटे फिर आदि शक्ति को निगल लिया, तो विचार किया कि निरंजन को मिटा देता हूं। सोचा इसे मिटा दिया तो सोलह पुत्र जो एक नाल में हैं वे भी मिट जाएंगे और जो मैंने 17 चौकड़ी असंख्य युग का राज्य दिया है, मेरा शब्द भी कट जाएगा।

परम पुरुष ने अपने को मथ ज्ञानी पुरुष (कबीर साहिब योग जीत) को निकाला वास्तव में वो खुद ही सत्यपुरुष थे और उसे निरंजन की गलतियां बताकर कहा निरंजन को मानसरोवर से निकाल दो (मानसरोवर अमरलोक का हिस्सा है) ताकि वो सतलोक न आ सके। साहिब की आज्ञा से योगजीत ने निरंजन को शून्य में फेंक दिया। वहां निरंजन डर से सम्भल कर उठा तो आदि शक्ति परमपुरुष का ध्यान कर उसके पेट से बाहर आ गई और निरंजन को देख डरने लगी।

अब निरंजन ने आदि शक्ति को प्यार से कहा मैं पाप पुन्य से नहीं डरता मेरे से इसका हिसाब लेने वाला कोई नहीं मैं आगे भी पाप पुन्य कर्मों का जाल ही बिछाऊंगा, मुझ से मत डरो। परमपुरुष ने तुम्हे मेरे लिए रचा है। आठ भुजाओं वाली आदि शक्ति काल निरंजन के साथ सहमत हो गई और दोनों एक साथ रहने लगे, जिस से इनके तीन पुत्र ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी पैदा हुए।

12 | साहिब बन्दगी

निरंजन ने आद्या शक्ति को कहा जीव और बीज तुम्हारे पास है और तीनों पुत्र भी सौंपता हूं। मैं शून्य में निराकार रूप में समाऊंगा और मन बन कर सभी जीवों के साथ रहूंगा। मेरा भेद किसी को नहीं देना। मेरा कोई दर्शन नहीं कर सकेगा, चाहे खोजते खोजते जन्म गवादे। तुमने तीनों पुत्रों के साथ राज्य करना। जब यह बड़े होंगे तो समन्दर मन्थन के लिए भेजना।

यहाँ नोट करने वाली बात यह है कि काल निरंजन ने आद्या शक्ति को परमपुरुष का भेद छुपाने के लिए आपने साथ मिला लिया और भी देखे तो निरंजन ने आद्या शक्ति को चार खानि व 84 लाख जूनिया कैसे बनाना है इसका पूरा भेद बताकर शून्य में समा गया और कहा मैं मन रूप में हर जीव के साथ रहूँगा है ताकि कोई भी जीव परम पुरुष का भेद न जान पाये।

बच्चे बड़े हुए तो माता आद्या शक्ति ने तीनों पुत्रों को समुन्दर मन्थन के लिए भेजा। इतने में काल निरंजन ने तमाशा किया स्वांस द्वारा पवन में वेद उत्पन्न किये। निरंजन ने वायु में वेद के शब्द किए कोई पुस्तक नहीं लिखी थी। इस लिए वेद निराकार तक की बात कहता है। वेद उसका पूरा भेद नहीं बता रहा है। समुन्दर मन्थन के बाद ब्रह्मा को वेद, विष्णु को तेज और शिवजी को विष मिला। माता ने कहा जो जो तीनों को मिला है अपने पास रख लें।

कबीर साहिब धर्मदास को बता रहे हैं के अब आदि शक्ति ने पुनः तीनों पुत्रों को समुद्र मन्थन के लिए भेजा तो इतने में आद्या शक्ति ने तीन कन्याओं की उत्पत्ति कर समुद्र में समाने को कहा। जब समुद्र मन्थन हुआ तो तीनों को तीन कन्याएँ मिली। माता पास आए तो माता ने सावित्री ब्रह्मा जी को, लक्ष्मी विष्णु जी को और पार्वती शंकर जी को

निराले सद्गुरु                          13

दे दी। तीनों भाई बड़े खुश हुए तीनों काम के वशीभूत उनमें रम गए। ऐसे में दैत्यों, देवताओं और राक्षसों की उत्पत्ति हुई। जगत की रचना शुरु हो गई।

ऐका माई जुगति वियाई तिनि चेले परवान।
एकु संसारी एकु भंडारी, एक लाये दिवान॥

सृष्टि रचना के लिए तीनों को अलग-अलग डिउटी दी गई। ब्रह्मा जी को उत्पत्ति करने की, विष्णु जी को पालनकर्ता की और शिवजी को संहारकर्त्ता का काम सौंपा गया। इसके आगे तेंतिस करोड़ देवी देवता जिनकी संसार किसी न किसी रूप में पूज रहा है यह सारा निरंजन का परिवार हुआ।

आओ, पाँच भोतिक तत्वों में से इसके अस्तित्व को देखें। चार तत्व तो हमें खुली आंखों से नजर आ रहे हैं लेकिन जो पांचवां तत्व आकाश तत्व है वह चारों तत्वों में रमा हुआ है, यह ही निरंजन है।

84 लाख योनियों में से जिस इंसानी देह को निरंजन ने अपने आप जैसा बनाया है, जिसको हरी मंदिर भी कहते हैं उसमें भी पांचवां तत्व जो आकाश तत्व है वहीँ काल पुरुष है। जो सभी शरीरों में मन रूप में रहता है। जब के जीव आत्मा का इस निरंजन के किसी भी देश, देवी, देवता व शरीर से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह तो निरंजन ने जीव आत्मा को रोकने के लिए 84 लाख किस्मों के कैद खाने बनाए हैं। जीव आत्मा जो सत्य पुरुष की अंश है यह बिना बाती और तेल के जलती है, यह बिना आंख के देखती है, बिना पांव चलती है, बिना कानों के सुनती है, इसे कोई काट नहीं सकता, इसे किसी का डर नहीं है। यह निडर है। इसका कभी भी अंत नहीं हो सकता।

14 <p align="right">साहिब बन्दगी</p>

शरीर रूपी कैद खानों से आत्मा को आज़ाद करवाने के लिए पूर्ण संत सद्गुरू से विदेह नाम लेना पड़ेगा। बिना विदेह नाम के जीव आत्मा सन्तलोक नहीं जा सकती।

निरंजन ने जिस बीज रुपी पाँच शब्दों से पांच तत्व के शरीर की रचना की उन शब्दों का स्थान भी शरीर में रख दिया। जिसे काया का नाम कहते हैं। जीव आत्मा को सत्य पुरुष से दूर रखने के लिए काल निरंजन ने जीवों को अपनी भक्ति में लगाने के लिए काया नाम के प्रगट शब्द गुरु मंत्र के रुप में जीवों को दीये जिसमें सभी जीव काया के नाम का सिमरन करने लगे और अन्दर में खोज करने लगे। बड़े-बड़े ऋषी, मुनि, सिद्ध, साथक, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, पीर, पैगम्बर, औलिया भी इन शब्दों में उलझ गये। निरंजन ने इस भक्ति से जीव को बड़ी-बड़ी शक्तिया, रिद्ध, सिद्ध, पावर, चार तरह की मुक्ती का स्वर्ग दे दिया, यहां तक के सभी साधक निरंजन भगवान् की साधना में रम गए और 70 प्रकार की अनहद धुनों में आनन्द मगन रहने लगे और चुप्प रह कर अनहद धुनों का रस लेने के लिए एकांत की तालाश में रहे। मगर आत्मा का ज्ञान न हुआ ऐसे में आत्मा शरीर से अलग ना हो कर अमर लोक अपने निज धाम न जा सकी।

<p align="right"><i>-विसथार के लिए देखें पुस्तक अनुराग सागर वाणी</i></p>

सुन्न गगन में सबद उठत है, सो सब बोल में आवै।

निःसबदी वह बोलै नाहीं, सो सत सबद कहावै॥

<p align="right"><b>-पलटू साहिब जी</b></p>

प्रेम के अथाह सागर हैं आप

निराले सद्गुरु


प्रेम के अथाह सागर हैं आप

आत्मा प्रेम से ओत-प्रोत है; उसमें प्रेम लबालब भरा हुआ है। आत्मपिता होने से आप प्रेम के अथाह सागर हैं। सागर की तो फिर भी एक थाह होती है, पर आपकी कोई थाह नहीं है। आप अथाह हैं, आपका प्रेम अथाह है। करोड़ों बड़ा-बड़ा प्रेम करने वाले प्रेमी भी आपमें समा जायेंगे और पता भी नहीं चल पायेगा।

यह आत्मा प्रेम की ही तलाश में है और यह प्रेम ही करना चाहती है। पर इसे प्रेम का सही रिस्पॉन्स नहीं मिल पाता है, इसलिए यह कभी संतुष्ट नहीं हो पाती है।

बाहर जहाँ भी प्रेम लगेगा, वो सच्चा नहीं होगा। वो शरीर की सीमा में आ ही जायेगा। वहाँ धोखा भी मिल सकता है। पर आपका प्रेम सत्य है, क्योंकि वो शरीर की सीमा से परे है। आपके यहाँ धोखा नहीं है। आपके पास से पूरा-पूरा सही जबाब मिलेगा।

एक माई आपके पास आई, बोली-गुरु जी! मैं जब छोटी थी, पढ़ती थी तो एक लड़के से प्रेम करने लगी। मैं प्रेम करना चाहती थी। वो भी मुझसे बहुत प्रेम करता था। पर कुछ देर बाद वो वासना पर उतर आया। मैंने उससे किनारा कर लिया। मुझे सच्चा प्रेमी नहीं मिल पाया। पर मैं प्रेम करना चाहती थी। इसलिए मैं फिर अपने ही मौहल्ले के एक लड़के से प्रेम करने लगी। पर कुछ देर बाद वो भी सही रिस्पॉन्स नहीं दे सका और वासना पर उतर आया। मैंने उससे भी किनारा कर लिया। मैं सच्चा प्रेमी चाहती थी। फिर मेरी शादी हो गयी और मैंने सोचा कि पति से ही प्रेम कर लेती हूँ। पर गुरु जी, पति तो जैसे सोचने लगा कि

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आत्मा आपकी तरफ आकर्षित होती है

16 साहिब बन्दगी

आत्मा आपकी तरफ आकर्षित होती है

आत्मा ईश्वर की प्राप्ति चाहती है, परमात्मा को पाना चाहती है। हर वस्तु जिसका भी अंश है, उसके इर्द-गिर्द रहती है। जल समुद्र का अंश है, फेंको तो बहने लगता है और बहते-बहते अपने अंशी की तरफ जाने लगता है; आग जलाओ तो वो ऊपर की ओर ही उठती है, अपने अंशी की ओर जाना चाहती है। ऐसे ही सब आपकी तरफ खिंचे चले आते हैं। जो नाम पा लेता है, अंदर से आत्मा जान जाती है कि यह रिश्ता नया नहीं है, बल्कि बहुत पुराना है, इसलिए वो आपसे जुदा नहीं हो पाता है। वो बार-बार खिंचा चला आता है आपके पास। सत्संग तो एक बहाना है; यदि आप उलटी गिनती भी गिनें तो भी संगत ऐसे ही आपके पास आती रहेगी। आपके नामी को 1-2 नहीं, 3-4 भी नहीं, 8-10 बार महीने में आपके दर्शन करके भी चैन नहीं आता है। कई तो दिन में एक बार करके भी चैन नहीं पाते हैं और आपसे मिलने वाले उस अमृत को पाने के लिए दिन में 3-3 सत्संग सुनने पहुँच जाते हैं। चाहे दिन में 5-5 बार भी आपके दर्शन कर लिए जाएँ तो भी चैन नहीं आता है। सच ही कहती है आपकी संगत-

साहिब तुझसे मिलने का, सत्संग बहाना है।
दुनिया वाले क्या जानें, हमारा रिश्ता पुराना है ॥

आपके प्रेम का स्वाद चख चुकी आत्मा कहीं चैन पा ही कैसे सकती है! आपके प्रेम का आस्वादन करने वाले नामी का कहीं भी दिल लग ही नहीं सकता है। आपके प्रेम का आकर्षण ही कुछ ऐसा है कि माँ-बाप, भाई, बहन आदि किसी का प्रेम आकर्षित नहीं कर पाता है। सारा प्यार ही जैसे आप खींच लेते हैं; केवल कर्त्तव्य निभाने मात्र के लिए उनके बीच रहते हैं। आपके प्रेमी तो बस जैसे जबरन कर्त्तव्य निभाने मात्र को अपने घर-परिवार में नज़र आते हैं; पर वास्तव में अन्दर से वे आपके पास ही रहते हैं। उन्हें यह समझ नहीं आता है कि कहाँ जाएँ! उन्हें तो

सब महात्माओं से अलग हैं आप

निराले सद्गुरु <span style="float: right;">17</span>

बस यही लगता है कि जहाँ आप हों, वहीं चले जाएँ। जब भी आप अपने प्रेमियों को याद करते हैं तो वे रुक नहीं पाते हैं, सब काम छोड़कर आपके पास पहुँच जाते हैं। तभी तो संगत कहती है-
जदों तारां खड़कदीयां, मेरे कोलों रुकेया नेइ जादां॥

सब महात्माओं से अलग हैं आप

किसी महापुरुष की पहचान दाढ़ी या जटाएँ नहीं है, इसलिए आपने इसकी ज़रूरत नहीं समझी, इसका सहारा नहीं लिया। कभी भभूत नहीं रमाई, बाल नहीं बढ़ाए, रँगे चोले नहीं पहने; सोचा कि बाहरी सहारा नहीं चाहिए। केवल भारत में आपका व्यक्तित्व है कि कोई चिह्न नहीं रखा। कुछ भिन्न-2 चिह्न रखकर इज्जत चाहते हैं। आपको इज्जत नहीं चाहिए। कुछ तो सत्संग में अपने लोगों को कहते हैं कि बीच-बीच में तालियाँ बजाते रहना..... हौसला बढ़ाने के लिए। फिर ताली से उसका क्या हाल होगा! वो तो नीचे गिर जाएगा। ‘अस्तुति निंदा नाहिं जिन, बैरी मीत समान। कह नानक सुन रे मना, मुक्त ताहि को जान॥’ महात्माओं के रहन-सहन को देख आपको दुख होता है। कोई साथ में बॉडीगार्ड लेकर घूम रहा है, कोई कमांडो, कोई लाल बत्ती का सहारा लेकर घूम रहा है। आपको भी सरकार ने एक बॉडीगार्ड दिया था। वो नाम भी नहीं लिया। मोटू-सा था। उसने सोचा कि यहाँ तो आज़ादी है, मिठाइयाँ वगैरह खाने को हैं, कोई टेंशन भी नहीं है। पर आपको वो चुभा। आपने अपने लोगों को कहा कि इसे हटाओ। मेरी संगत कह रही है कि साहिब जी असां डोरां तेरे उते सुट्टियाँ।’ इस बंदूक वाले को देख उनके दिल में आयेगा कि साहिब ने अपनी डोरें इस पर फेंकी हुई हैं ....रक्षा के लिए। इसलिए कहा कि इसे दूर करो।

एक ने आपसे कहा कि गाड़ी में लाल बत्ती लगवा लो; बड़ी संगत हो गयी है; आपको मंजूरी मिल जायेगी। आपने कहा कि नहीं

18
साहिब बन्दगी

लगानी है। जो गाड़ी रोशनी देती है, वही रहने दो। जिनको मंजूरी नहीं है, वे भी लगाए हुए हैं। ऐसा इसलिए करते हैं कि दिखाते हैं कि हम भी कुछ हैं। पर यह कोई महात्मा की निशानी नहीं है; यह तो दिखावे वाली बात है कि मैं खास आदमी हूँ।

शीश उतारे भूईँ धरे, तापर राखे पाँव। कहें कबीर धर्मदास से, ऐसा होय तो आव॥

ये महात्मा नहीं हैं। आपकी जान को तो बड़ा ख़तरा भी है। आपके लिए 10 लाख की सुपारी भी दी। आप नहीं डरे। आपके लोग डरे; उन्होंने अपने घरों से तस्वीरें निकाल दीं। क्योंकि ऐसा करने के लिए उन्हें मजबूर किया गया, धमकाया गया। आपने कहा कि ऐसा मत करो, बाद में पछताओगे। आप बेपरवाह रहे।

.....तो आपने कहा कि बॉडिगार्ड नहीं चाहिए। एक तो वो बात थी; फिर दूसरी बात थी कि वो मोटू था। आपने विचार किया कि जब तक कोई हमला करेगा, तब तक यह तो फैसला भी नहीं कर पायेगा जबकि मैं हमलावर की रिवालवर ही छीन लूँगा। क्योंकि आप फौज में रहे हैं; यही तो सीखा है। आप Quick Reaction Team के कमाण्डर भी रहे हैं। वो तो बार-बार पैंट ऊँची करता था; ऐसा लगता था कि ज़मीन में गिर जाएगी। तो कोई बात होती तो पहले अपनी पैंट ठीक करता, इसलिए आपने सोचा कि इसकी ज़रूरत नहीं है। फिर संतों को यह सब शोभा ही नहीं देता है। मुख्य बात यह है। कबीर साहिब का कौन सा बॉडिगार्ड था, नानक देव जी का कौन बॉडिगार्ड था! पर बलिहारी कलयुग के महात्माओं की।

एक आदमी आपके पास आया और कहा कि नाम दो। आपने कहा कि पहले कुछ सत्संग सुनो, तुम नये लग रहे हो। उसने कहा- महाराज! मेरी उम्र 55 साल हो गयी है; कब स्वाँस छूट जाए, कोई पता नहीं। उसने बताया; कहा कि मैं भारत वर्ष के बड़े-बडे पंथों को देखा,

निराले सद्गुरु
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महात्माओं के संपर्क में आया, उन्हें देखा, पर कोई मुझे जंचा नहीं। पहले एक के पास गया तो वहाँ देखा कि बाबा जी सोया है तो 4 बंदूक वाले आगे तो 4 बंदूक वाले पीछे पहरा दे रहे हैं। फिर बुलिट प्रूफ कैबिन के अंदर से वो सत्संग करता था। मैंने सोचा कि इसने संगत के लिए कुछ नहीं सोचा और अपनी सुरक्षा का पूरा इंतजाम किया हुआ है। यदि इसे खुद अपनी जान के लाले पड़े हुए हैं तो हमें निर्भयता कैसे प्रदान करेगा! एक महात्मा को किसका डर! यह सोच मैं वहाँ से बिना नाम लिए ही चला आया। फिर कहा कि मैं भारत के बहुत बड़े पंथ से जुड़ा। पर मैंने देखा कि वहाँ पैसे का सौदा था। पैसे वालों के लिए इंतजाम अच्छा था, ग़रीबों के लिए बेकार। कुल मिलाकर अच्छा नहीं लगा। फिर जम्मू आया तो आपकी बड़ी निंदा सुनी। आपको भी देखा। मैंने चुपके से आपको देखा। मैंने देखा कि आप सबसे निराले हैं, सब काम खुद करते हैं, कहीं पतीला माँजने लग जाते हैं, कहीं कुछ। फिर आप फकड़ टॉइप लगे। आप निडर होकर घूमते रहते हैं। कोई बॉडीगार्ड भी नहीं है आपका। मैंने आपको परख लिया है; अब मुझे नाम दे दो।

लोग मोटे-मोटे महात्माओं को देख रहे हैं तो सोच रहे हैं कि वाह! क्या महात्मा है! एक ने आपसे कहा कि बड़े दुबले हो; हमारे गुरु जी तो लाल, गोल-मटोल हैं। आपने कहा कि तुमने यह कभी सोचा है कि उन्हें कितनी परेशानी है। मैं जानता हूँ कि क्या करते होंगे। जितना खाया, उतना फैलेगा। कण्ट्रोल नहीं किया। जमकर खाया; रोग हो गये। आपने कहा कि गुरु जी को मेरे हवाले करो। जहाँ-जहाँ मैं जाऊँगा, उनको साथ-साथ ही रखूँगा; जो-जो करूँगा, उनसे भी करवाऊँगा। 15 दिन में वो ऐम्स में मिलेंगे। बेटे, उसने मेहनत नहीं की, इसलिए रोग आ गया मोटापे का।

कुछ कहते हैं कि हमारा गुरु जी तो हमें कुछ कहता ही नहीं है; कहता है कि जैसे चाहे वैसे रहो। आपने कहा कि फिर वो कोई सुधार

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भी नहीं कर पायेगा। वो दुनिया को खुश रखना चाह रहा है। उसकी कोई निंदा भी नहीं होगी। जबकि एक महात्मा की पहचान ही निंदा है। ‘जब चारों ओर मार मार धाए, तब लालों के लाल कहाय ॥’ जिसकी निंदा नहीं वो महात्मा नहीं हो सकता। क्यों है निंदा! 13 अगस्त 1985 को आप राँजड़ी में आए। इस दौरान कभी किसी माई ने नहीं कहा कि उसे छेड़ा है; पर दुनिया कितनी जालिम है, कहा कि दो लड़कियों को लेकर भाग गया। जब 25 साल के थे, तब आपने विवाह नहीं किया। कोई आँख ख़राब नहीं थी, कोई बीमारी नहीं थी; अगर ज़रूरत होती तो कोई मिल जाती। अब बूढ़ा होकर भागना था क्या! ख़ैर हमारे देश की परंपरा है कि यहाँ हड्डियों की पूजा ही होती है। आप जो मना करते हैं कि भूत-प्रेतों की पूजा नहीं करो, सयानों से बचो, इससे सयानों का नुक़सान है, उनकी आमदनी पर लात बजती है। जब कोई आपसे नाम लेता है तो वो भूत-प्रेत से न्यारा हो जाता है, औरों को भी लाता है। अब जिस सयाने ने उसे सालों से फँसाया होता है, वो परेशान हो जाता है। उसकी आमदनी कम हो जाती है। तो वो निंदा शुरू कर देता है। आपने कभी संगत को नहीं कहा कि सयानों को पकड़ कर मारो, आपने कभी नहीं कहा कि शिवजी बुरे हैं। विरोध तो इन बातों से है कि आप कहते हैं कि हत्या नहीं मनाना, चंदा नहीं करना। एक महात्मा आता है तो पहले 100-100 रुपये और 5-5 किलो चीनी लेता है। समाज कब सोचेगा! इन लोगों की आमदनी आपके कारण से कम हो रही है। इसलिए निंदा करते हैं। अपने हितों के लिए, अपने स्वार्थों के लिए निंदा करते हैं, कोई दोषों के लिए नहीं। वास्तविकता तो जानते हैं।

वास्तव में आप 10 साल में जो इतना मशहूर हुए, उसमें 70 प्रतिशत सहयोग तो निंदकों का रहा है। किसी की कोई निंदा करे तो कहता है कि मर जाए उधर ही, कीड़े पड़ जाएँ, पर आप चिंतित नहीं होते हैं। आप मानते हैं कि निंदक ही आपके सच्चे प्रचारक हैं। इसलिए आपने कभी उनके ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही भी नहीं की।