निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
साहिब बन्दगी द्वारा
स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (उद्गम)
निंदकों से भी प्रेम करते हैं आप
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आपने कहा कि मत बैठो, चलते-फिरते ही नाम-भजन कर लिया करो। वो कहने लगी कि नाम-भजन करने नहीं देता है। आपने कहा कि कमी तो मुझे तुममें नज़र आ रही है, उसमें नहीं। वो कोई तुम्हारी स्वाँस में तो बैठा नहीं है।
इस तरह कोई भी शिकायत लेकर आता है या कोई विवाद लेकर आपके पास पहुँचा है तो आप दोनों पक्षों को सुनते हैं और पक्षपात रहित होकर फैसला सुनाते हैं। आप किसी की शिकायत सुनकर किसी को कुछ नहीं कहते, बल्कि उसपर विचार करके, दूसरे का पक्ष सुनकर ही कुछ कहते हैं।
निंदकों से भी प्रेम करते हैं आप
आप अपनी संगत से तो प्रेम करते ही हैं, अपने निंदकों के प्रति भी आप किसी तरह का बैर भाव नहीं रखना चाहते हैं। क्योंकि आप जानते हैं कि यदि किसी के प्रति बुरा भाव आ गया तो उसका सर्वनाश हुए बिना नहीं रहेगा। सब अपने ही बच्चे समझकर आप उनके प्रति भी दया का भाव ही रखते हैं।
निंदकों के प्रति किसी इंसान की बुद्धि दया की भावना नहीं रख सकती है। उसके प्रति बैरभाव स्वाभाविक ही होता है। आप तो कहते हैं कि आपका काम ही निंदकों ने किया है। यदि निंदक नहीं होते तो आपका इतना प्रचार होना ही नहीं था। आप उन्हें भोले इंसान समझते हैं, जिनमें विचार करने की शक्ति नहीं है, जो दूसरों से कुछ भी सुनकर उसे सच मान लेते हैं और निंदा शुरू कर देते हैं। जो पाखण्डी हैं, उनकी बात और है, पर आप उनके प्रति भी कोई बैर भाव नहीं रखते हैं, केवल उनसे बचने को कहते हैं।
ये केवल कहने की ही बातें नहीं हैं। आपने अपने हज़ारों निंदकों को क्षमा करके नाम दान तक दिया है। नाम दान के समय आप हरेक
शब्द नहीं देते हैं आप
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को अपनी सुरति भी देते हैं। सुरति देना यानी प्रेम करना। इसका सीधा मतलब है कि आपके दिल में निंदकों के प्रति कोई घृणा है ही नहीं। यदि होती तो आप उन्हें नाम नहीं देते। आपने तो अखनूर आश्रम पर हमला करने वालों को भी नाम दे दिया था। फिर जो बेचारा भोला आदमी केवल बातों से निंदा कर रहा है, उसके प्रति आप क्या घृणा कर सकते हैं। वो बेचारा तो स्वयं ही नरक की ओर जा रहा है। इसके बाद यदि आप उसके प्रति और बैर रखेंगे तो फिर तो उसकी मुक्ति जन्म-जन्मांतरों तक भी नहीं हो पायेगी। यही विचार कर आप किसी के प्रति बैर भाव नहीं रखते हैं। आप यही विचारते हैं कि हो सकता है कि उन्हें पता नहीं है; जब पता चलेगा तो वो भी आयेंगे।
सब आपके ही हैं। यह एक परम रहस्य है, जिसे दुनिया के साधारण जन समझ नहीं पायेंगे। इसी रहस्य के कारण आपके लिए कोई न दोस्त है, न दुश्मन। जो भी जब भी अपनी भूल पर पछचाताप करके आपकी शरण में पहुँच जाता है, आप सहज ही उसे क्षमा करके नाम रूपी दौलत प्रदान कर देते हैं।
शब्द नहीं देते हैं आप
आप कोई भी शब्द बेकार में नहीं बोलते हैं। आपके हरेक शब्द में वज़न होता है। आप कभी किसी को आशीर्वाद नहीं देते कि ‘युग युग जिओ।’ महात्मा लोग ऐसे आशीर्वाद दे देते हैं। पर सच यह है कि ऐसा आशीर्वाद देना झूठ बोलने के बराबर होता है। यह तो अपने सिर पर पाप लादने वाली बात है। क्योंकि यदि जुग-युग जीने का आशीर्वाद दिया तो युग-युग जीने की शक्ति भी देनी होगी। यदि ‘पुत्रवती भवः’ का आशीर्वाद दिया तो बेटा भी देना होगा, नहीं तो झूठ हो जायेगा। इसी कारण आप कोई भी आशीर्वाद नहीं देते हैं।
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जब कोई आपको अपनी समस्या बताता है तो आप उसे यह नहीं कहते कि जाओ, तुम्हारा काम हो जायेगा। क्योंकि यह तो शब्द हो गया। फिर वो होना-ही-होना है। आप दिन भर लोगों की समस्याओं को सुनते हैं और रात को उसकी पूरी रील खोलते हैं। फिर जिस-जिस की समस्या का समाधान करना होता है, या जो कृपा के लायक समझते हैं, उनकी समस्या को चुपके से सुलझा देते हैं।
शब्द क्यों नहीं देते हैं आप? इसके पीछे एक रहस्य है। एक बार एक माई आपके पास आई। उसने फ़रियाद की कि उसके कोई संतान नहीं है; उसे बच्चा दो। आपने कहा-जाओ, पुत्र होगा। आपने शब्द दे दिया। रात को आपको सिग्नल मिला कि आज ठीक नहीं हुआ। जिस स्त्री को पुत्र होने का शब्द मिला है, उसके तो गर्भाशय ही नहीं है। अब पुत्र कैसे हो! तब उस स्त्री का गर्भाशय स्थापित किया गया और फिर उसे पुत्र हुआ। उसके बाद आपने किसी को भी शब्द नहीं दिया। हज़ारों माइयों को आपने पुत्र दिया। पर यह कहकर नहीं दिया कि पुत्र हो। आपने यही कहा कि भरोसा रखना। हज़ारों लँगड़ों की टाँगें आपने ठीक कर दी, पर किसी को नहीं कहा कि ठीक हो जायेगी। आपने भरोसा रखने के लिए कहा। हजारों लायलाज बीमारियों वाले आपके पास आकर ठीक हुए, पर आपने केवल भरोसा रखने के लिए ही कहा, शब्द नहीं दिया कि ठीक कर दूँगा। फिर तो आप शब्द में बँध जाते। फिर यदि वो कृपा का पात्र न होता तो भी आपको उसे ठीक करना पड़ जाता। एक नहीं, दो नहीं, सैकड़ों मृतकों को आपने नवजीवन दिया, पर किसी को यह नहीं कहा कि अभी जीवित करता हूँ। जिसे जीवित करना ज़रूरी समझा, उसे कर दिया। यह रहस्य पुनः जीवन प्राप्त किये हुए ही जानते हैं। यदि आप पहले ही कह देते कि जीवित कर देता हूँ तो गलत भी हो सकता था। यदि वो कृपा का पात्र न होता तो गलत हो जाता।
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एक शिष्य अपने गुरु के साथ नदी में नहा रहा था। वहाँ एक अँधा खड़ा था, जो ठीक से चल नहीं पा रहा था और गिर-गिर पड़ता था। चेले को दया आई, उसने गुरु जी से कहा कि इस पर कृपा करो, इसे ठीक कर दो। गुरु जी ने कहा कि भगवान ने इसे जैसा रखा है, रहने दो। पर चेले ने जिद्द की तो गुरु जी ने उसे ठीक कर दिया। अगले दिन जब वे नदी में नहाने आए तो वही अँधा लोगों को पकड़-पकड़कर नदी में डुबो रहा था। उसने चेले को भी पकड़ा। चेले ने कहा-गुरु जी, सोच क्या रहे हो, जल्दी से इसे अँधा करो। गुरु जी ने कहा कि मैंने तुम्हें पहले नहीं कहा था कि इसे रहने दो ऐसे ही। यह अँधा ही ठीक था।
...तो कई कारण होते हैं कि महात्मा लोग सबपर अपनी शक्ति नहीं लगाते हैं। यदि वही आदमी ठीक होकर गलत काम करने लग जाए तो फिर महात्मा भी उसके गलत कामों में शामिल हो जायेंगे। इसलिए वे इन झंझटों से दूर ही रहते हैं और यदि कृपा करते भी हैं तो सोच-समझकर।
यदि आप सबको कहकर जीवित करना शुरू कर दें तो राँजड़ी में लाशें ही लाशें पहुँच जायेंगी। फिर सत्संग सब समास हो जायेंगे और आपसे प्रेम करने वालों को आपके नज़दीक से दर्शन भी नसीब नहीं होंगे।
अब विश्वास रखने के लिए आप इसलिए कहते हैं कि यदि उसका विश्वास ही नहीं होगा, वो कहीं दूसरी जगह भी माथा मार रहा होगा तो ठीक होने के बाद वो समझेगा कि वो वहीं से ठीक हुआ है और फिर उसकी भक्ति खंडित हो जायेगी। इसलिए बहुत सी चीज़ें ध्यान में रखते हुए तब आप किसी पर कृपा करते हैं।
जैसे एक माई थी। उसे पुत्र नहीं था। दो बेटियाँ थीं। उसने आपसे प्रार्थना की। आपने कहा कि भरोसा रखना। पर तीसरी बार भी उसे पुत्र नहीं हुआ। वो आपके पास आई, कहा कि इस बार भी बेटी ही हुई है।
माँ की तरह है आपका व्यवहार
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आपने उसे चुपके से पूछा कि क्या तुमने संतोषी माता का व्रत नहीं रखा था? उसने अपनी भूल स्वीकार की। कहने का भाव है कि गुरु पर सब कुछ छोड़ा तो अन्य सहारा ढूँढ़ना ही नहीं है। यह तो चालाकी हुई गुरु से। यदि पुत्र हो जाता तो उसने कहना था कि संतोषी माता ने पुत्र दिया। संतोषी माता से आपका बैर नहीं है। पर गुरु-भक्ति खंडित हो जाती। इसलिए चाहे काम बने या न बने, गुरु शरण में ही रहना है। भाव यही होना चाहिए-
जीवन का अब सौंप दिया, सब भार तुम्हारे हाथों में।
है जीत तुम्हारे हाथों में, है हार तुम्हारे हाथों में॥
ज़रूरी नहीं है कि काम बने तभी समझो कि आप सच्चे हैं। नहीं। ऐसा बिलकुल नहीं समझना। कई बार आप भक्त लोगों को भक्ति में लगाने के लिए उनके काम नहीं करते हैं। उन्हें अभावों में रखते हैं, ताकि वे संसार से विरक्त होकर भक्ति कर सकें। इसलिए इस धोखे में नहीं रहना। भक्त को नहीं पता है कि उसके लिए क्या ठीक है, क्या नहीं। उसे यह सब गुरु पर ही छोड़ना है। फिर जो वो करे, उसी रज़ा में रहना है।
...तो अगली बार आपने उस माई को कहकर पुत्र दिया। पर उसे बता दिया कि भरोसा पक्का रखना।
माँ की तरह है आपका व्यवहार
अपने भक्तों से आप माँ की तरह व्यवहार करते हैं। जैसे माँ अपने बच्चे पर पूरा हक़ रखती है, ऐसे ही आप भी प्रत्येक नामी से हक़ से बात करते हैं। जैसे गलती होने पर माँ डाँटती है; उसे फ़िक्र रहती है कि उसका बेटा गलत न हो जाए, कहीं बुरी संगत में न फँस जाए, ऐसे ही आपको भी फिकर रहती है कि कहीं आपका नामी कहीं गलत तो नहीं चल रहा। यदि ऐसा है तो आप पूरे हक़ से उसे डाँट-फटकार कर सीधी राह पर लाते हैं। आपको हरेक की फ़िक्र रहती है। आपको हरेक
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का पता रहता है कि यह फलाना है, यह फलाना है। लाखों की संगत हो जाने पर भी आपको सबकी ख़बर है कि कौन क्या कर रहा है। फिर जैसे माँ का व्यवहार कोमल भी है; डाँटने के बाद अपने बच्चे को प्यार भी देती है। ऐसे ही आप भी प्यार देते हैं। फिर आपका प्यार पाकर वो डाँट भी भूल जाती है। कुछ तो चाहते हैं कि उन्हें डाँट पड़े, ताकि बाद में आपका बहुत सारा प्यार भी मिल सके। जैसे माँ के लिए सब बच्चे समान होते हैं, ऐसे ही आपके लिए भी सब समान हैं।
आपकी राह बड़ी कठिन है। कई समस्याएँ आपको सुननी पड़ती हैं। हररोज़ सैकड़ों लोग नयी-नयी समस्याएँ लेकर आते हैं। आप सबको सुनते हैं। फिर उसका हल भी बताते हैं, उन्हें संतुष्ट भी करते हैं। एक माई आई। उसके बेटे ने मोटर साइकिल पर एक्सीडेंट कर दिया था। लड़के का कंधा तोड़ दिया था। 4 महीने बाद घर में सम्मन आया। वकील किया तो वो 10 हज़ार रूपये माँग रहा था। माई ने कहा कि मैं ग़रीब हूँ; गाँव में मैं ही अकेली नामिन हूँ। अब आपको ऐसे लोगों की समस्या तो सुननी ही है, क्योंकि आप हैं ही ग़रीबों के। आपको ऐसे लोगों को तसल्ली देने के साथ-साथ ताक़त भी देनी पड़ती है ताकि दृढ़ रहें, घबराएँ नहीं।
आपको हर महीने अपने शिष्यों को दर्शन देने भी जाना पड़ता है। जहाँ-जहाँ भी आपके आश्रम हैं, वहाँ-वहाँ जाना पड़ता है। ग़रीब संगत होने से कुछ हर महीने नहीं आ पाते हैं। वे आपसे प्रार्थना करते हैं कि हर महीने दर्शन दिया करें। कभी आप कैंसल करने की सोचते हैं तो उनके चेहरे मुरझा जाते हैं। क्योंकि आपसे मिलने वाले उस अमृत को आपके नामी ही समझ पाते हैं। बाकी साधारण लोगों की बुद्धि से ये बातें बहुत परे की हैं। उनको ये बातें समझ में आने वाली नहीं हैं। क्योंकि उनके गुरु के पास यह अमृत नहीं है, जिसे लेने को वे बार-बार गुरु के पास पहुँचें। इसलिए तो वे कहते भी हैं कि क्या करना है बार-बार जाकर ! सीधा-सा मतलब है कि उन्होंने उस अमृत का कोई ज्ञान नहीं है,
संगत का एक पैसा भी नहीं लेते हैं आप
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जो संत सद्गुरु और केवल संत सद्गुरु ही दे सकते हैं। ....तो आप एक माँ की तरह स्वयं ही उन्हें वो अमृत प्रदान करने हर महीने पहुँचते हैं। जैसे माँ को बच्चे की फ़िक्र रहती है कि कुछ खाया कि नहीं। ऐसे ही आपको भी फ़िक्र रहती है कि आप सबको अपनी सुरति दे पाएँ।
संगत का एक पैसा भी नहीं लेते हैं आप
आप घर बना रहे थे तो दो कमरे ही बना पाए कि पैसे नहीं रहे। तब आपने 75 हज़ार लोन लिया और घर बनवाया। संगत का एक रूपया भी आप अपने निजी इस्तेमाल के लिए नहीं लगाते हैं। आपको जो पैंशन मिलती है, उसी से अपना गुज़ारा करते हैं। केवल जो आप घूम-घूमकर हरेक आश्रम में जाते हैं, वो संगत का पैसा होता है। आपको साढ़े सात हज़ार रूपया पैंशन मिलती है, जिसमें से आप रोटी खाते हैं।
यदि आपने संगत के लिए हक़ की कमाई का नियम बनाया है तो सबसे पहले खुद भी इसका पालन करते हैं आप। जो भी नियम आप संगत को बताते हैं, सबसे पहले स्वयं उनपर चलते हैं। आप कहते हैं कि यदि मैं बेइमानी शुरू कर दूँगा तो आप सब भी बेइमान हो जायेंगे। यदि मैं हक़ की कमाई से नहीं खाऊँगा तो आप भी नहीं खा पायेंगे। क्योंकि नाम के बाद अब आप सबमें मेरे ही गुण तो आयेंगे। जो जिसकी सुरति करता है, उसी के ही तो गुण आते हैं। इसलिए मैं कहीं पर भी गलत चलने लगूँगा तो आप सबका सत्यानाश हो जायेगा, सब डूब जाओगे।
पर सत्य तो यह है कि आप किसी भी तरफ से गलत चल ही नहीं सकते हैं। यह तो समझाने का एक तरीका है। आपने कभी यह कहा ही नहीं कि आप ही सब कुछ हैं या आप ही सब कुछ कर रहे हैं। आपका बड़प्पन इसी में है कि अमर लोक के मालिक होकर आप संसार में सेवक बनकर रहते हैं। आप शुरू से ही सेवक बनकर जिए हैं। पहले माँ की सेवा, फिर गुरु जी की सेवा और देश की सेवा और फिर संगत की
आप सौम्य हैं
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सेवा। सेवा ही आपको प्यारी है। आप स्वामी नहीं, बल्कि सेवक बनकर ही रहते हैं। तन-मन-धन और पूरा जीवन आपने सेवा में लगा दिया। आप फौज में जनरल नहीं थे, सूबेदार थे। करोड़ों की सम्पत्ति थी। पूरा जीवन गुरु-सेवा की, संगत की सेवा की। दो महीने छुट्टी पर आते थे तो उन महीनों का खर्चा आप ही करते थे। आपके पास नहीं होते तो उधार लेते। आप सोचते कि गुरु जी का खर्चा नहीं होने देना है। आपने कोई सरकारी फण्ड भी नहीं कटवाया, खाली हाथ रहे। रिर्टायर होने पर आपको 4 लाख मिले। अभी तो 15 लाख मिलते हैं सूबेदार को। आपने सोचा कि क्या करना है, 4 प्लॉट लिए-25-25 हज़ार के। अभी उनकी कीमत 15-15 लाख होगी। आपने अपनी कमाई से ही खाया; संगत के पैसे से चाय भी नहीं पीते हैं आप। बस, अपने को सेवक की तरह मानकर आप बढ़ते जा रहे हैं। कुछ भी अपने नाम नहीं रखा। फिर कोई अपने आप को ओसामा बिन लादेन बनाकर रखता है, कोई मजनू बनाकर रखता है। यह है दुनिया!
आपने कभी किसी से कुछ नहीं माँगा। करीब 150 आदमी को मकान बनाकर दिये। आप प्रेरित भी नहीं करते। एक माई ने आपको 10 हज़ार रुपये दिये, कहा कि मेरे पति के नाम पर पंखे लगा देना। आपने कहा कि फिर ले जा। यह दूसरे को प्रेरित करने वाली बात है ताकि दूसरा भी दे और चुपचाप अपना काम हो। आपने यह काम भी नहीं किया।
आप सौम्य हैं
आप सौम्य हैं; आप अत्यंत सौम्य हैं। आपकी वाणी बड़ी ही सौम्य है। कोई कितना भी सुने, अखरती नहीं है। आपका स्वभाव अत्यंत ही सौम्य है। किसी को भी अखरता नहीं है। आपका रोम-रोम सौम्य है। कोई आपको कितना भी देखता रहे, उसे अखरता नहीं है।
सुलझावन हारी है आपकी वाणी
80 | साहिब बन्दगी
सुलझावन हारी है आपकी वाणी
आपके शब्द कभी आपस में विपरीत दिशा में नहीं जाते हैं। वे एक ही लाइन पर होते हैं। और फिर जो बात आप आज कहेंगे, वही मानो 50 साल के बाद भी कहेंगे। कहीं भी आपकी वाणी में बदलाव नहीं मिलेगा। यानी आपकी हर बात में सत्यता है, इसलिए वो कभी बदलती नहीं। महात्मा लोगों को देखें तो वो उलझी हुई बातें कहते हैं। कुछ पहले शिवजी के जयकारे लगाते हैं, फिर अचानक विष्णु जी और फिर हनुमान जी के जयकारे शुरू हो जाते हैं। भक्त लोग उलझन में पड़ जाते हैं कि बाबा जी भक्त किसके हैं और हम किसकी भक्ति करें। कौन बड़ा है, यह समझ नहीं आता है। सच यह होता है बाबा जी खुद उलझे होते हैं, उन्हें खुद मालूम नहीं होता कि कौन बड़ा है, कौन छोटा। साहिब ने इस पर बड़ा प्यारा शब्द कहा है-
मैं कहता हूँ आँखिन देखी, तू कहता कागज की लेखी।
मैं कहता सुलझावन हारी, तू राख्यो उलझाई रे ॥..
कहने का भाव है कि जो खुद नहीं पहुँचा है, जो केवल कागज की लिखी बातें बोल रहा है, वो उलझाने वाली बात ही करेगा। किताबों में तो सबकी बात लिखी है। बस, महात्मा भी सबको महत्व दे रहे हैं। पर जो खुद किसी मुकाम पर पहुँचता है, वो उसी मुकाम की बात करता है और बड़े दावे से कहता है कि मैं वहाँ गया हूँ। फिर वो अपनी बात से पलटता भी नहीं है। क्योंकि उसने वो स्थान खुद देखा होता है। चाहे वो तीन लोक की सीमा में ही हो। कहने का भाव है कि महात्मा लोग आंतरिक दुनिया में बिलकुल भी नहीं गये होते हैं और केवल किताबों से पढ़कर ही दुनिया को उलझाया करते हैं। पर आपकी वाणी उलझाने वाली नहीं है। आप एक परम-पुरुष की भक्ति देते हैं। आपकी शरण में आने वाला इसलिए तो कहीं और भटकता नहीं है। क्योंकि उसे एक सही ठिकाना मिल जाता है। उसकी सब उलझने समास हो जाती हैं।
आपके पास हज़ार रूपया भी नहीं मिलता है
निराले सद्गुरु [81]
आपके पास हज़ार रुपया भी नहीं मिलता है
एक बार काबला सिंह जी आपके पास आए, कहा कि मैं अपनी 40 कनाल ज़मीन को बोरिंग कराना चाहता हूँ, बताओ कि किससे करवाऊँ? आपने बता दिया कि फलाने से करवाओ। अचानक आपको एक आश्रम से फ़ोन आया कि यहाँ काम लगा है, सामान ख़त्म हो गया है, पैसे चाहिए और सेवा के लिए लड़के भी भेजो। आपके पास पैसे ही नहीं थे। आपको पता था कि काबला सिंह महीना लगायेगा काम शुरू करने में। तो आपने काबला सिंह को कहा कि मुझे एक लाख उधार दे दो, बाद में जब काम लगवाओगे तो ले लेना। उन्होंने दे दिये। बाद में एक महीने बाद वे आए, कहा कि मशीन लगवाई है, पैसे चाहिए। पूर्णिमा के दिन 10 लाख मिले थे, वे पाँच मिनट में ख़त्म हो गये थे। तब आपको अन्य किसी से लेकर उन्हें देने पड़े।
आपका कोई बैंक में भी पैसा जमा नहीं है। आप कोई भी पैसा अपने पास नहीं रखते हैं। बाकी महात्माओं की तरह न आपका कोई बैंक में खाता है, न आप अपने घर में देते हैं। आपने तो शादी ही नहीं की और न ही अपनी माँ, अपने भाई, अपनी बहन या अपने रिश्तेदारों को ही कभी संगत का एक पैसा ही दिया।
आप संगत का पैसा संगत की सेवा में ही लगा देते हैं; आश्रम पर आश्रम बनाते जाते हैं; रोज़-रोज़ उनके लिए जहाँ सत्संग होता है, वहाँ भण्डारा खोल देते हैं। जब यात्रा होती है तब तो कहना ही क्या! माँ भी इतना नहीं खिलाती। क्योंकि आपको पाखण्डियों की तरह वो पैसा अपने निजी काम के लिए तो रखना ही नहीं है। उलटा आप उधार लेकर संगत को खिलाते हैं। आप पर 50 लाख से ऊपर उधार रहता ही है। यानी आप अपने को गिरवी रखकर संगत की सेवा कर रहे हैं।
इसलिए लड़कियों की शादियाँ करवाते हैं आप
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साहिब बन्दगी
इसलिए लड़कियों की शादियाँ
करवाते हैं आप
एक लड़की आपसे नाम लिये थी। उसकी शादी थी। सब आपके पास सुबह आए। लड़का नामी नहीं था। आपने लड़की की सास से कहा कि लड़की बाकी चीजें नहीं करेगी, एक परम-पुरुष की भक्ति करेगी। पहले बताना ही ठीक है; ताकि बाद में यह नहीं कहे कि किसी को नहीं मान रहे हैं। मान रहे हैं न। एक परम पुरुष को मान रहे हैं। पर लड़की की सास कहने लगी कि हम जहाँ भी जायेंगे, इसे भी साथ में ले जायेंगे; जहाँ माथा टेकेंगे, यह भी टेकेगी। पर लड़की यह सब नहीं करना चाहती थी।
यही कारण है कि आप लड़कियों की शादियाँ करवाते हैं और उनके लिए नामी लड़का ही ढूँढ़ते हैं। लड़की गैरनामी हो तो ठीक है; पर उस पर भी आप यह दबाव नहीं डालने देते कि नाम ले। वो उसकी मरजी है कि किसी को भी माने।
विश्राह में आपका एक नामी अपनी लड़की की शादी नौग्राम में करना चाहता था। एक शास्त्री का बेटा था लड़का। अब शास्त्री आपका कट्टर विरोधी था और लड़के वाले सारे उसके कट्टर अनुयायी थे। फिर वहाँ लड़की व्याहेंगे तो दिक्कत तो आयेगी। आपने कहा-नहीं, मैं चाहता हूँ कि लड़की गैरनामी के पास न जाए। क्योंकि फिर वो बाद में सताते हैं। इसलिए परेशान किया जाता है। गाँव वाले जानते हैं कि यह तो सारे परिवार को साहिब के यहाँ ले जायेगी, इसलिए सभी उसे परेशान करते हैं, जबरन उससे सब कुछ करने को कहते हैं। इसलिए लड़कियों की शादियाँ करवाना आपकी एक मजबूरी भी है।
हरेक की शंका मिटा देते हैं आप
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हरेक की शंका मिटा देते हैं आप
चण्डीगढ़ में एक जज साहब हैं। वे बड़े ही ईमानदार हैं। आपने उनसे कहा कि घूस नहीं लेना। पहले वे वकील थे। महीने में 4-5 लाख कमा लेते थे। जब जज बने तो आपसे पूछा कि क्या करूँ? आपने कहा कि जज वाली नौकरी कर लो। उन्होंने कहा कि वहाँ 50 हज़ार तनख़्वाह है जबकि यहाँ 4-5 लाख मैं कमा लेता हूँ महीने में। आपने कहा-यह मत सोचो। वहाँ आपको इंसाफ़ करने का मौका मिलेगा। पैसा ही सब कुछ नहीं है। आप जज बन जाएँ और लोगों को इंसाफ़ दिलाएँ। उसने आपको बाद में फ़ोन किया-कहा कि मैं ओथ (शपथ) तब लूँगा, जब आप यहाँ आयेंगे। जब दिल में ऐसा भाव था तो आपको जाना ही पड़ा। तब उन्होंने ओथ ली।
तो एक दिन आपका चण्डीगढ़ में प्रोग्राम था। उनको पता चला तो कहा कि वहाँ मेरे एक जज मित्र हैं; मैं उनको फ़ोन करता हूँ; वे आपके दर्शन के लिए आयेंगे। वे पंजाब हाईकोर्ट के जज हैं। उन जज साहब ने आपको फ़ोन किया और अपने घर चरण रखने को कहा। आपने सोचा कि ठीक है, मैं ही चला जाता हूँ। वहाँ सत्संग के बाद आप उनके घर गये तो उनकी बहुत सारी शंकाएँ थी। जज कोई मामूली चीज़ तो होते नहीं हैं। उन्होंने अपराध होते तो देखा होता नहीं है, पर फिर भी गवाहों और तर्कों के आधार पर जान जाते हैं कि अपराधी कौन है। तो आपकी उनसे आधा घण्टा बात हुई। उनकी उम्र भी कोई 55 साल के करीब होगी। और अपने दोस्त यानी आपके नामी की संगत में रहने के कारण ईमानदार भी बहुत थे। वे कोई गलत फैसला करने वालों में नहीं थे। बड़े गंभीर थे। उन्होंने कहा कि मुझे बहुत ख़तरनाक जजों में गिना जाता है। क्योंकि मैं घूस भी नहीं लेता हूँ। उन्होंने कई सवाल पूछे। आपने हरेक सवाल का बड़ा सुन्दर जवाब दिया, बड़े सरल तरीके से समझा
आपको नाराज़ करना ठीक नहीं है
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साहिब बन्दगी
दिया। वो आपको आने नहीं देना चाह रहे थे, पर आप आधे घण्टे बाद उठकर चल पड़े।
फिर बाद में उन्होंने आपको फ़ोन किया, कहा कि आपने आधे घण्टे में मेरी कई शंकाओं का निराकरण कर दिया। अब मुझपर कृपा करो और बताओ कि मैं कहाँ पर दीक्षा लेने आऊँ?
कहने का भाव है कि आप हरेक की शंकाओं को बहुत ही कम समय में मिटा देते हैं। पर कोई समझने वाला हो। यही कारण तो है कि आपके पास विभिन्न पंथ वाले अपने-अपने पंथों को छोड़कर आपके पास चले आते हैं, क्योंकि अध्यात्म के विषय में जो खोजी होते हैं, उनकी तो कई शंकाएँ रहती हैं। जब उनकी शंकाएँ अपने पंथ में नहीं मिट पाती हैं तो वे उन शंकाओं को लेकर आपके पास आते हैं। आप जब उन शंकाओं को मिटा देते हैं तो वे प्रभावित होकर आपसे नाम ले लेते हैं; वे समझ जाते हैं कि आपके पास सच्चा ज्ञान है, केवल किताबी ज्ञान नहीं।
आपको नाराज़ करना ठीक नहीं
आप किसी से नाराज़ होना ही नहीं चाहते हैं। पर जब होते हैं तो परेशान हो जाता है वो। आपकी नाराज़गी दिल में खलबली मचा देती है। पर यदि ज़्यादा हो गये तो पागल हो जायेगा बंदा और यदि बहुत ज़्यादा हो गये तो फिर तो मर ही जायेगा।
आपके गुरु ने आपको गद्दी देते समय कोई ज़्यादा समझाया नहीं कि ऐसे-ऐसे करना। बस, उन्होंने एक शब्द लिया, कहा कि मेरे बेटों से नाराज़ नहीं होना। क्योंकि वे जानते थे आपकी नाराज़गी को।
एक नामी ने आपकी सेवा की, ज़मीन दान में दी, पर वो कहीं अहंकार में आकर बदतमीजी कर गया। आप उससे दिल से नाराज़ हो गये; बहुत नाराज़ हो गये। बेटा बाप को चाँटा मार दे तो कैसा है!
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वो मर गया। कुछ देर बाद आपने सोचा कि देखते हैं कि कहाँ है। जब आपने देखा तो वो रेगीस्तान में गर्मी से तड़प रहा था। आपको दया आ गयी, सोचा कि कल्याण करूँ, पर फिर ख़्याल आया कि इसे तो अभी लाखों साल यहाँ सड़ना है। गुरु निंदा की यही सज़ा है। गुरु को नाराज़ करना ही नहीं है। आप समझाते हैं कि कभी यह मत सोचना कि गुरु को नाराज़ करके प्रभु की शरण में चले जायेंगे तो बच जायेंगे। नहीं! ऐसा नहीं होगा।
एक बादशाह के जहाँ यासीम खाँ बड़ी ऊँची पोस्ट पर था। वो कमाल जी का शिष्य था। मौलवियों ने बादशाह को शिकायत की कि इसे सज़ा देनी चाहिए, यह धर्म विरोधी बातें करता है। बादशाह ने कमाल को कहा कि ऐसा मत कहो; पर उन्होंने वही कहा। तो बादशाह ने कहा कि इसे ले जाकर चौराहे पर बाँध दो और हर आने-जाने वाले को कह दो कि इस पर पत्थर फेंके, थूके या मारे। जो नहीं मानेगा, उसे भी इसके साथ बाँध देना और उसके साथ भी यही कार्रवाही करना।
लोग आते गये और उनपर कुछ-न-कुछ फेंकते रहे; पर कमाल जी मुस्कराते रहे। यासीम खाँ उनका शिष्य था; वो भी संयोग से वहाँ से निकला। तो सिपाहियों ने कहा कि यह बादशाह का हुकुम है; आप तो हमारे अधिकारी हैं। पर कोई हमारी शिकायत कर देगा तो हमारी भी ख़ैर नहीं है, इसलिए कुछ भी मार दें। यासीम खाँ डर गया; उसने फूल की एक पखुण्डी उठाई और गुरु जी पर धीरे-से फेंका। कमाल ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे। यासीम खाँ ने कहा कि गुरु जी, लोग आपको पत्थर मार रहे थे, आपपर थूक रहे थे, पर आप मुस्करा रहे थे। मैंने आपपर फूल फेंका तो आप रोने लग गये। कमाल ने कहा कि वो अनजान हैं, मुझे नहीं जानते, पर तू तो मेरी रुहानी शक्तियों को जानता था, इसलिए यह चोट मेरे दिल पर लगी है। तू भी यहीं बँध जाना था मेरे साथ। तब तेरा नाम भी मेरे साथ अमर हो जाना था।
बाहरी दिखावे से बहुत दूर रहते हैं आप
86 साहिब बन्दगी
फिर यासीम खाँ ने क्षमा माँगी। उसका मस्तिष्क कुंद पड़ गया। पर कमाल खुश नहीं हुए। उसने सोचा कि कबीर साहिब के पास जाते हैं; ये तो उनके शिष्य हैं। साहिब के पास गये तो साहिब ने कहा कि मैं माफ़ नहीं कर सकता; माफ़ी तो तेरा गुरु ही दे सकता है। पर तू उम्मीद से आया है, इसलिए तेरे साथ चलता हूँ। लाहौर पहुँचे। साहिब ने कमाल से कहा कि इससे गलती हुई है। कमाल ने कहा कि आप तो समरथ हैं, पर यह मृत्यु के 32 साल तक अमर लोक नहीं जा पायेगा। तब 32 साल के बाद उसकी रूह कब्र फोड़कर अमर-लोक गयी।
आज भी लाहौर में यासीम खाँ की कब्र है। साहिब समझा रहे हैं-
गुरु गूँगे गुरु बाँवरे, गुरु के रहिये दास।
जो गुरु भेजे नरक में, तो राखिये स्वर्ग की आस ॥
बाहरी दिखावे से बहुत दूर रहते हैं आप
आप दिखावे की दुनिया से परे रहते हैं। आप अपने शरीर पर कोई अलंकरण धारण नहीं करते। न गले में फूल-मोतियों की माला, न माथे पर तिलक, न रँगा हुआ चोला, न लंबी-लंबी दाढ़ी, न लंबी-लंबी जटाएँ, न अन्य कोई स्वाँग। बाहरी दिखावे की इन चीज़ों से आप बिल्कुल दूर रहते हैं। आपका मानना है कि ये चीज़ें भक्ति की पहचान नहीं हैं।
इतना ही नहीं, आप अपने सामने अगरबत्ती नहीं जलाने देते। आप अपने गले में किसी को फूलों की माला नहीं डालने देते। आप किसी को अपने ऊपर फूल नहीं फेंकने देते। आप इन सब चीज़ों के लिए संगत को मना करते रहते हैं। मगर लोग हैं मानते ही नहीं जबरदस्ती गले में फूलों की माला डालते और आदर भाव से ऊपर फूल फेंकने लग जाते हैं।
जासूसी करने आए थे और भक्त बन गये
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क्योंकि आपके पास विभिन्न मत-मतान्तरों के लोग पहुँचते हैं। वो वहाँ ये सब करते हैं तो सोच बन गयी होती है कि इसी तरह से महात्मा लोग खुश होते हैं। इसलिए आप उन्हें समझाया करते हैं कि इन चीज़ों से भक्ति नहीं होती है। भक्ति दिल से की जाती है। दिल में श्रद्धा होनी चाहिए। आप तो यहाँ तक कहते हैं कि भूल कर भी फूल नहीं फेंकना। कुछ आपकी गाड़ी को हाथ लगाकर प्रणाम करते हुए चलते हैं। आप समझाते हैं कि ये बेकार की चीज़ें हैं, इनसे कुछ लाभ नहीं होने वाला है। गाड़ी को प्रणाम करने से क्या होगा!
जासूसी करने आए थे और भक्त बन गये
पंडित पी. आर. अवस्थी शास्त्री जी पहले पहल आपकी जासूसी करने आए थे। एक दिन वे आपके आगे लंबे लेट गये; कहा-मुझे अपनी शरण में ले लो; मैंने कई दिन आपकी जासूसी की है, पर अब मुझे दीक्षा दो; आज मैं जासूस बनकर नहीं आया हूँ; आज मैं भक्त बनकर आया हूँ।
इसी तरह सी. आई. डी. और आई. बी. के कई लोग आपके पास पहले जासूसी करने के मकसद से आए, पर जब आपकी असलियत पता चली तो आपके परम-भक्त बन गये।
दीनों के नायक हैं आप
आप दीन-दुखियों, गरीबों, पीड़ितों की रक्षा करते हैं। आप उन्हीं के हैं। आपने अमीरों को नहीं चुना; आपने गरीबों को चुना, उनका दर्द समझा और उसे दूर किया। एक भोली सी लड़की राँजड़ी में अपने मामा के घर रहने आयी थी। बगुना, सूचानी आदि के गुण्डों ने उसे देखा तो अपने गिरोह के सरदार को सूचना दी। उनका बड़े-बड़े नेता लोगों से भी संबंध था। वे रात को उसे उसके घर से ले गये। उसका पति भी वहीं था। लड़की बड़ी खूबसूरत थी। 10-12 गुण्डों ने मिलकर उसके
फौज में रहे शान से
निराले सद्गुरु
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आप कोई बॉडिगार्ड लेकर घूमने वाले या बुल्ट प्रूफ में बैठकर सत्संग करने वालों में नहीं हैं। आप सच्चे संत हैं, जिन्हें इस नश्वर शरीर की कोई परवाह नहीं है। इस नश्वर शरीर के मिटने का डर तो उसे होता है, जिसे आत्मा का ज्ञान नहीं मिल पाया हो। आप तो कहते हैं कि यदि यह शरीर नहीं भी रहा, मैं तो भी अपनी संगत से मिल लूँगा। इसलिए आप बिना किसी डर के, बिना अपनी जान की चिंता किये दीनों के लिए लड़ते हैं, उन्हें इंसाफ़ दिलाते हैं।
फौज में रहे शान से
आपने फौज की नौकरी बड़े शान से की। वहाँ सबसे माँस कटाया जाता था, पर आप नहीं काटते थे। आप सैनिक थे जो कमाण्डर था, उसने कहा कि माँस काटना है सबने। आपने कहा कि मैं खाता नहीं हूँ तो काटूँ क्यों? जो खाते हैं, उन्हीं को कहो। उसने कहा कि मैं चार्ज शीट पर लिख दूँगा। आप नहीं डरते थे, कहा कि लिख दो। पर कभी आपको सज़ा नहीं हो पाती थी। आपने किसी के साथ समझौता नहीं किया। वे जानबूझ कर करते थे। फिर जब दूसरा कमाण्डर था तो माँस को मच्छरदानी में रखकर काटते थे, ताकि मक्खियाँ न भिनभिनाएं तो सबको काटना होता था और सबकी मच्छरदानी का इस्तेमाल किया जाता था। पर आपने कभी अपनी मच्छरदानी नहीं दी। आपने कहा कि मैं खाता नहीं हूँ, मच्छरदानी क्यों दूँ? खून के छींटें पड़ते हैं और मुझे बदबू आती है। कमाण्डर ने कहा कि फिर लड़ाई कैसे करनी है? आपने कहा कि वो दूसरा मुद्दा है; वहाँ दुश्मन को मारकर खाना थोड़े है। आपके तर्क के आगे सब झुक जाते थे। वे कोई सज़ा भी नहीं दे पाते थे।
जब आप नाचे.....
31 दिसंबर का दिन, अखनूर आश्रम में विशाल प्रोग्राम और आप मौज में थे। जैसे ही आप झूमे तो संग ही आश्रम का कुल्ला भी झूमने
बदमाशों को भी सिखाया प्रेम आपने
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लगा, सब कुछ झूमने लगा, सबको लगा मानो पूरा ब्रह्माण्ड झूम रहा हो। वैसे तो आप नाचते नहीं हैं, पर एक बार तब आप मौज में थे और आपके साथ पूरा ब्रह्माण्ड प्रसन्नचित्त होकर नाच रहा था। यह नज़ारा देखते ही बनता था। जो भी वहाँ मौजूद था, वो ही इस अद्भुत नज़ारे का आनन्द उठा रहा था।
बदमाशों को भी सिखाया प्रेम आपने
प्रेम के द्वारा आप बदमाशों को भी सीधे रास्ते पर ले आते हैं। आपका प्रेम पाकर उनमें से भी प्रेम प्रस्फुटित होने लगता है। वे अपना स्वभाव भूल जाते हैं और आपके प्रेम में रंगकर दयालु स्वभाव के हो जाते हैं।
गलबड्डे का मक्खू जब आपके पास नाम लेने आया तो उसी के गाँव के लोगों ने आपसे कहा कि इसे नाम नहीं देना; यह बहुत बड़ा बदमाश है; इसने बड़े क़त्ल भी किये हैं। यदि इसे नाम दिया तो कोई आपके पास नहीं आयेगा। आपने कहा-इसे तो पहले नाम देना है। क्योंकि आप तो जानते हैं कि ऐसे लोगों को कैसे सुधारना है। जब आपने उसे सुरति दी, प्रेम दिया तो वो आपके प्रेम में रँगकर निर्मल हो गया; उसकी सारी बदमाशी समाप्त हो गयी। गाँव वाले उसके बदले हुए निर्मल स्वभाव को देख इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने भी आपसे नाम ले लिया। उन्होंने मिलकर आपको धन्यवाद दिया कि आपने ऐसे बदमाश को सुधार दिया, जो कभी सुधरने वाला नहीं था। ऐसे ही सैकड़ों बदमाशों को आपने अपने प्रेम द्वारा नेक इंसान बना दिया।
वो भी करते हैं बंदगी
पशु-पक्षी, कीट-पतंगे, पेड़-पौधे सब आपको प्रणाम करते हैं। आपके कुल्ले में अनेक साँप रहते हैं। आप कभी उन्हें भगाने का प्रयास
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नहीं करते। जब आश्रम में भीड़ होती है, तब वे सामने नहीं आते हैं, पर जब सभी अपने-अपने घरों को लौट जाते हैं तो वे सामने आ जाते हैं। कभी-कभी वे आपको बंदगी करने आते हैं और आपकी इच्छा से वे आपको बंदगी करके फिर अपने-अपने स्थान को लौट जाते हैं।
अखनूर आश्रम की नींव रखनी थी। पहली बार आपने वहाँ चरण रखे तो एक साँप सामने की ओर से, दो साँप एक सॉइड से और दो साँप दूसरी सॉइड से आपकी तरफ बढ़े और पास आकर आपके चरणों में सिर टिका दिया; बंदगी की और चले गये। आज बहुत समय हो गया है। वे बहुत बड़े हो गये हैं। आज भी वे चुपके से कभी-कभी आपको बंदगी करने आते हैं और प्रेम सहित आपको बंदगी करके लौट जाते हैं।
यह एक रहस्यमय सत्य है, पर दुनिया इन बातों पर आसानी से विश्वास नहीं कर पाती है।
पशु पक्षी नर नाग सभी जीव,
करते हैं साहिब आपको,
बारंबार परनाम।
कर बंदगी वे बारंबार,
सुरति के अमृत को पीकर,
पाते हैं विश्राम।
जानत वे मानुष आप नाहीं,
देखते सबमें आत्म का रूप,
नहीं चाम से काम।
हो साहिब आप अमर लोक के,
आए हो लेने
आत्म को निज धाम॥