भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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हस्तघ्न 'विश्वा' (सर्वाणि) सब 'वयुनानि' ( प्रज्ञानानि ) विज्ञानों को 'विद्वान्' (जानानः) जानते हुए 'पुमान्' पुरुष के समान 'पुमांसम्' ( एतं धनुर्धरम् ) इस धनुष् के धारण करने वाले पुरुष को 'विश्वतः' सब ओर से 'परिपातु' रक्षा करे [ यह हम चाहते हैं ] । 'पुमान्' क्या ? 'पुरुमनाः' वह स्त्री की अपेक्षा बड़े मन वाला होता है । अथवा पुरुषार्थ अर्थ में 'पुंस' (भ्वा०प० ) धातु से है । क्योंकि-वह महाकार्यों के लिये उद्यम करता है । 'अभीशवः' (११) ( अङ्गुलयः ) अङ्गुलियों का वाचक 'अभीशु' शब्द व्याख्यान किया जाचुका [अ०३पा०२खं०३में] 'तेषाम्०' उन अभीशुवों की = अङ्गुलियों की यह ऋचा है-॥५(१५)॥ ( खं० ६ ) निरु० “रथे तिष्ठन्नयति वाजिनः पुरो यत्र यत्र कामयते सुषारथिः। अभीशूनां महिमानं पनायत मनः पश्चादनुयच्छन्ति रश्मयः ॥” [ ऋ० सं० ५, १, २०, १ ) ॥ रथे तिष्ठन् नयति वाजिनः पुरस्तात् सतो यत्र यत्र कामयते सुषारथिः = कल्याणसारथिः । अभीशूनां महिमानं पूजयामि । मनः पश्चात् सन्तः अनुयच्छन्ति रश्मयः ॥ 'धनु;' धन्वतेर्गतिकर्मणः । वधकर्मणो वा । धन्वन्ति अस्माद् इषवः ।