निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २३५ ) ६ अ० २ पा० ७ खं० तस्य- एषा भवति- ॥६ (१६)॥ अर्थः- “रथे तिष्ठन्०” जो कि- यह 'सुषारथिः' (कल्याणसारथिः) चतुर सारथि 'रथे' रथ में = रथ के जूयें पर 'तिष्ठन्' बैठा हुआ 'यत्र यत्र' जहां जहाँ 'कामयते' योद्धा इच्छा करता है, उसकी इच्छा के अनुसार 'पुरः' (पुरस्तात् सतः) आगे बढ़ते हुए 'वाजिनः' घोड़ों को 'नयति' लेजाता है, उस सब 'अभीशूनाम्' अङ्गुलियों की महिमानम्' महिमा को 'पनायत' (पूजयामि) मानता हूं = पूजता हूं - जो कि- रश्मिएः (रासें) 'मनः पश्चात्' मन के अनुसार 'अनुयच्छन्ति' घोड़ों को ले जाती हैं। अर्थात्-जिस प्रकार कि-कोई चतुर सारथि अपने स्वामी योद्धा के इच्छानुसार युद्धस्थल में अति वेग वाले भी घोड़ों को इधर उधर लेजाता है, वह सब अङ्गुलियों की महिमा है, अङ्गुलियों के इशारे रासों पर ऐसे पड़ते हैं, जिन से घोड़े ठीक मन के अनुसार काम करते हैं, यदि अंगुलिएं न हों, तो चतुर सारथि भी क्या कर सकता है, यह ऋषि अंगुलियों की महिमा को बड़े निरू- पण के साथ देखता है। 'धनुः' (१३) पद गति अर्थ में 'धन्व' (भ्वा०प०) धातुसे है। क्योंकि - उसी से बाण चलते हैं। अथवा वध अर्थ में उसी धातु से है। क्योंकि वह शत्रु के वधके अर्थ ही उत्पन्न होता है॥ तस्य०" उस धनुष् की स्तुति की यह ऋचा है॥६(१६) (खं०७) निरु०-“धन्वना गा धन्वनाजिं जयेम धन्वना