भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1002

तीव्राः समदो जयेम । धनुः शत्रोरकामं कृणोति धन्वना सर्वाः प्रदिशो जयेम ॥” ( ऋ सं ५, १, १९, १) इति सा निगदव्याख्याता ॥ ‘समदः’ समदो वा अत्तेः । सम्मदो वा मदतेः। ‘ज्या’ जयतेर्वा । जिनातेर्वा । प्रजावयति इषून् इतिवा । तस्य एषा भवति ॥७।१७॥ अर्थः— “धन्वना०” “धन्वना गाः जयेम” धनुष् से हमशत्रुओं से गोओ को जीतें। “धन्वनाआ।जिंजयेम” धनुष् से हम चांद माली को जीतें जहां परस्पर की स्पर्द्धा से योद्धा लोग अपनी लक्ष्य वेध की चतुराई को प्रकाश करने के ही अर्थ अथवा वितर्क भाव से अपने प्रताप को दिखाने के अर्थ बाण चलाते हैं, उस आजि ( वाजी ) को हम धनुष से जीतें । “धन्वना तीव्राः समदो जयेम” धनुष से हम दारुण संग्रामों को जीतें,–जहां अनेक शस्त्रों के सम्पात संकट हैं अनेक वीर पुरुष व्याप्त हैं, उन्हें भी हम जीतें । “धनुः शत्रोः अकामं कृणोति”धनुष् शत्र को कामना रहित कर देता है-उसकी सब कामनाओं को जो हम से हैं नष्ट कर देता है । “धन्वना सर्वा प्रदिशो जयेम” धनुष् से हम सब दिशाओं को जीतें । यह ऋचा अपने उच्चारण से ही व्याख्यान की हुई है । ‘समदः’ (संग्राम) कैसे ? समदः = सम्—अद् । ‘सम्’ उप-