निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २३८ ) ६ अ० २ पा० ६ खं० तस्य एषा भवति- ॥ ८ (१८) ॥ अर्थः- " वक्ष्यन्ती-इव-इद्-आगनी गन्ति ( आगच्छति ) कर्णम् " ' इयं ज्या ' यह ज्या कुछ कहेगी जैसी कान के पास आती है-जैसे कोई स्त्री किसी इष्ट पुरुष के लिये कुछ रहस्य = गुप्त बात कहने को उसके कान के पास आती है, वैसे ही यह प्रत्यञ्जा ( तांत ) बाण चलाने की इच्छा वाले पुरुष से बाएं हाथ से खेंची हुई बाएं कान के पास और दाहिने हाथ से खेंची हुई दाहिने कान के पास अपने मध्य में बाण को लिये हुए आती है । कैसे ! “ प्रियं सखायं परिषस्वजाना ” ( प्रियमिव सखायं परिष्वज- माना ) प्यारे सखा को जैसे बाण को आलिङ्गन करती हुई “ योषा-इव शिङ्क्ते ( शब्दं करोति ) वितता अधि धन्वन् ( धनुषि ) ” धनुष् के ऊपर तनी हुई स्त्री के समान 'शी' कार शब्द करती है । “इयं ज्या समने पारयन्ती ( अस्तु ) ” यह प्रत्यञ्चा हमें संग्राम में शत्रु- ओं के पारको = अन्तको पहुंचाने वाली हो ॥ ‘इषु’ (बाण ) (१४) पद गति अर्थ में 'ईष' (भ्वा०आ० प०) धातु से है । क्योंकि-वह चलने के अर्थ ही किया जाता है । अथवा वध अर्थ में उसी धातुसे है । क्योंकि- वह वधके अर्थ ही जाता है । “तस्य०” उस इष (बाण) की यह ऋचा है-॥८ (१८) ॥ ( खं० ६ ) निरु०“सुपर्णं वस्ते मृगो अस्या दन्तो गोभिः