निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २५३ ) ९ अ० ३ पा० ५ खं० कुटिल भाव ही ग्रन्थि रूप हैं। अथवा 'भास्वती' होने से पर्ववती होकर 'पर्वणी' है। इस अर्थ में भासें = कान्तिये' ही पर्व हैं (५)। 'असिक्नी' क्यों? वहअशुक्ला है। सो क्या ? असिता = काली। सो कैसे ? 'सित' यह सुपेद वर्ण( रंग ) का नाम है। उसका निषेध 'असित' होता है। उस से काले जल वाली 'असिक्नी' है (६)। 'मरुद्वृधा' क्यों ? सब नदियें— यह सब नदियों का साधारण विशेषण है। क्यों कि—मरुत् उन्हें वृष्टि के द्वारा बढ़ाते हैं । इस लिये इस पद को मन्त्र में प्रत्येक नदी के नाम के साथ विशेषण देना चाहिये- हे मरुद्वृधे ! गङ्गे ! हे मरुद्वृध यमुने ! इत्यादि । 'वितस्ता' क्यों ? वह 'अविदग्धा' है और नदियों के समान यह दग्ध नहीं हुई- जली नहीं । क्यों कि— वैदेहक नाम एक अग्नि है, सुना जाता है कि—उसने और सबनदियों को जला दिया था औरइसे नहींजलाया'यह बात सामिधेनी ब्राह्मण में जानी जाती है। अथवा विवृद्धा बहुत बड़ी होने से या महाकूला होने से वह वितस्ता है (७)। 'आर्जीकीया' को 'विपाट्' या 'विपाशा' इस नाम से कहते हैं। 'आर्जीकीया' क्यों ? वह ऋजीक पर्वत से निकली है । अथवाऋजु(सीधा)गमन करती है।'विपाट्'क्यों ?'विपाटन से। क्यों कि- वह बहुत वेग वाली है, इससे चलती हुई पृथ्वी को पाटन करती है- फाड़ती है। अथवा विपाशन से = तोड़ने से इसमें क्या तोड़ा गया है ? सुना गया है कि-पुत्रमरण के शोकसे अपने को पाशों से बांध कर वसिष्ठ इस नदी में परने के अर्थ डूबे थे, उनकी ये सब फांसियां