निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २४४ ) ६ अ० ३ पा० ५ खं० जलसे टूट गईं, उस काल से इसका 'विपाट्' नाम कहा जाता है । उससे पहिले यह नदी 'उरुञ्जिरा' नाम से थी । 'उरु- ञ्जिरा' नाम बहुजला का है । (८) 'सुषोमा' नाम सिन्धु नदी का है। क्योंकि-और नदियां इसे अभिमसय = संगम करती हैं । 'सिन्धु' क्यों ? स्यन्दन से = बहने से । क्योंकि-वह वेग से बहता है (६) । 'आपः' (२१) (जल) यह पद व्याप्ति अर्थ में 'आप' (स्वा०प०) धातु से है। क्योंकि इनसे सब व्याप्त होता है । उन जलों की यह ऋचा है-॥ ५ (२६) ॥ व्याख्या । हमारे वेदानभिज्ञ वैदिक सहयोगी जो गङ्गा आदि तीर्थों में पावन शक्ति को नहीं मानते और उसका वेदमन्त्रों में अभाव समझ कर पुराणों पर खुनसाया करते हैं, उन्हें "इमं मे गङ्गे०" यह मन्त्र पढकर कुत्साकलुषित अपनी बाणी को "हे गङ्गे" एक बार कहकर धोडालना चाहिये । इस मन्त्र में एक ही साथ सब पवित्र नदियों के नाम हैं किन्तु सब में पहिले "गंगे" पद है, इससे "नदीनां च यथा गंगा" वाक्य का मूल भी यही मन्त्र है। क्योंकि- "अभ्यर्हितं पूर्वम्" 'पूज्य का नाम पहिले होता है' यह स्मृति है । इस मन्त्र के भाष्य में भाष्यकार मन्त्र के व्याख्यान करने की एक रीति प्रदर्शित करते हैं, जैसे-"इति समस्तार्थः"