निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 1021, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २५५ ) ६ अ० ३ पा० ६ खं० “अथ एकपदानिरुक्तम् ” पहिले मन्त्र का समस्त या मिलित अर्थ करना चाहिए और फिर एक २ पदका निर्वचन क्योंकि-बीचमें एक २ पद की स्वतन्त्र २ व्याख्या करने से वाक्यार्थ का ग्रहण विलम्बित हो जाता है ॥ ५ ( २६ ) ॥ (खं०६) [निरु०-आपोहिष्ठामयो भुवस्तान ऊर्जेदधातन । महेरणाय चक्षसे ॥ ” [ ऋ० सं०७,६,५,१ ] ॥ आपो हि स्थ सुखभुवः, तानो अन्नाय धत्त, महते च नो रणाय रमणीयाय च दर्शनाय ॥ ‘ओषधयः’ ओषद् धयन्ति-इति वा । ओषति एना धयन्ति इति वा । दोषं धयन्ति-इति वा । तासाम्-एषा भवति- ॥ ६ ( २७ ) ॥ अर्थः-“आपोहिष्ठा०”इस ऋचाका सिन्धुद्वीप ऋषि है। हे ‘आपः ! ’ जल ! (यूयम्) तुम ‘आपः’ व्यापन करने वाले ‘स्थ’ हो । ‘मयोभुवः’ ( सुखभुवः ) सुखको उत्पन्न करने वाले हो । ‘ताः’ सो आप ‘नः’ हमें ‘ऊर्जे’ ( अन्नाय ) अन्न के लिये ‘दधातन’ ( धत्त = धारयत ) धारण करो-जिसप्रकार हम अन्नको प्राप्त हों ऐसा करो । ‘महे-रणाय’ (महते रमणी- याय ) और महान् रमणीय = सुन्दर धनके अर्थ, और ‘चक्षसे’ ( दर्शनाय ) श्रुति, स्मृति में कहेहुए अर्थ के यथार्थ ज्ञान के लिये हमें धारण करो-जिसप्रकार यह सब हमें मिले ऐसाकरो। ‘ओषधयः’ (२२) (ओषधिएं ) क्यों ? ‘ओषद् धयन्ति’ जो कुछ शरीर में क्षय आदि रोग होता है, उसे सेवन की