निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( २५५ ) ६ अ० ३ पा० ६ खं० “अथ एकपदानिरुक्तम् ” पहिले मन्त्र का समस्त या मिलित अर्थ करना चाहिए और फिर एक २ पदका निर्वचन क्योंकि-बीचमें एक २ पद की स्वतन्त्र २ व्याख्या करने से वाक्यार्थ का ग्रहण विलम्बित हो जाता है ॥ ५ ( २६ ) ॥ (खं०६) [निरु०-आपोहिष्ठामयो भुवस्तान ऊर्जेदधातन । महेरणाय चक्षसे ॥ ” [ ऋ० सं०७,६,५,१ ] ॥ आपो हि स्थ सुखभुवः, तानो अन्नाय धत्त, महते च नो रणाय रमणीयाय च दर्शनाय ॥ ‘ओषधयः’ ओषद् धयन्ति-इति वा । ओषति एना धयन्ति इति वा । दोषं धयन्ति-इति वा । तासाम्-एषा भवति- ॥ ६ ( २७ ) ॥ अर्थः-“आपोहिष्ठा०”इस ऋचाका सिन्धुद्वीप ऋषि है। हे ‘आपः ! ’ जल ! (यूयम्) तुम ‘आपः’ व्यापन करने वाले ‘स्थ’ हो । ‘मयोभुवः’ ( सुखभुवः ) सुखको उत्पन्न करने वाले हो । ‘ताः’ सो आप ‘नः’ हमें ‘ऊर्जे’ ( अन्नाय ) अन्न के लिये ‘दधातन’ ( धत्त = धारयत ) धारण करो-जिसप्रकार हम अन्नको प्राप्त हों ऐसा करो । ‘महे-रणाय’ (महते रमणी- याय ) और महान् रमणीय = सुन्दर धनके अर्थ, और ‘चक्षसे’ ( दर्शनाय ) श्रुति, स्मृति में कहेहुए अर्थ के यथार्थ ज्ञान के लिये हमें धारण करो-जिसप्रकार यह सब हमें मिले ऐसाकरो। ‘ओषधयः’ (२२) (ओषधिएं ) क्यों ? ‘ओषद् धयन्ति’ जो कुछ शरीर में क्षय आदि रोग होता है, उसे सेवन की
हिन्दी निरुक्त ( २५६ ) ६ अ० ३ पा० ७ खं० हुईं नाश करदेती हैं या पानकर जाती हैं। अथवा ‘ओषति एना धयन्ति’ किसी अङ्ग को रोगी होने पर प्राणी इन्हें पान करते हैं। इन दोनों व्याख्याओं में ‘ओषति’ (भ्वा०प०) धातु से पूर्वभाग और ‘धयति’ (भ्वा० प०) धातु से दूसरा भाग है। मिलकर ‘ओषधि’ शब्द बनजाता है। पहिली व्याख्या में कर्तृ कारक और दूसरी में कर्म कारक वाच्य है अथवा ‘दोषं धयन्ति’ वात, पित्त आदि दोष को पान करती हैं, इस से ये ‘ओषधि’ हैं। उन (ओषधियों) की यह ऋचा है— ॥ ६ (२७) ॥ (खं० ७) निरु०– "या ओषधीः पूर्वा जाता देवेभ्य- स्त्रिर्युगं पुरा। मनैनुबभ्रूणामहं शतं धामानि सप्त च॥” (ऋ०सं० ८, ५, ८, १) ॥ या ओषधयःपूर्वा जाता देवेभ्यः त्रीणि युगानि पुरा, मन्ये नु तद् बभ्रूणाम्– अहं बभ्रुवर्णानां हरणानां भरणानाम्– इति वा। ‘शतं धामानि सप्त च’ । धामानि त्रयाणि भवन्ति— स्थानानि, नामानि, जन्मानि–इति। जन्मानि अत्रअभि- प्रेतानि। सप्त शतं पुरुषस्य मर्मणां, तेषु एना दधति– इति वा ॥ ‘रात्रिः’ व्याख्याता। तस्य एषा भवति ॥ ७[२८] ॥
हिन्दी निरुक्त ( २५७ ) ६ अ० ३ पा० ७ खं० अर्थ:-“ या ओषधीः” यह ऋचा ओषधि- सूक्त में पहिली ही है । अग्नि चयन कर्म में इस मन्त्र से क्षेत्र में ग्राम्य और वन्य (बनकी) ओषधियें बोई जाती हैं । 'याः' जो 'ओषधीः' ( ओषधयः ) ओषधियें ' देवेभ्यः' देवताओं से 'त्रियुगम्' (त्रीणि युगानि) तीन युग'पूर्वाः'पहिले 'जाताः' उत्पन्न हुई हैं—आद्य कल्प में कलि, द्वापर, और त्रेता युग से पूर्व कृतयुग में देवताओं से पहिले जन्मी हैं, क्यों कि— अन्न के विना देवताओं का जीवन या उनकी स्थिति नहीं हो सकती इससे ये देवताओं से पहिले ही हुईं, ' तद् ' (तांसाम्) उन 'बभ्रूणाम्'(बभ्रुवर्णानाम् ) कपिल वर्णवालियों के [हरणानाम् ] अथवा भूख आदि को हरने बालियों के (भरणानाम्—इति वा) अथवा प्राणियों के भरण = पोषण करने बालियों के 'अहम्' मैं 'शतम्' सौ (१००) (सप्त-च)और सात (७) कुल (१०७) धामों को 'मन्वे' [मन्ये] मानता हूं । धाम क्या? 'धाम शब्द के तीन अर्थ होते हैं—स्थान(१) नाम (२) और जन्म (३) उनमें यहां पर जन्मों से अभिप्राय है— अर्थात्— ओषधियों की एक सौ सात (१०७) जातियों को मानता हूं = जानता हूं । अथवा पुरुष के एक सौ सात ( १०७ ) कर्म- स्थान हैं, सभ्हीं में ये ओषधिये' प्राणियों को धारण करती हैं । इस पक्ष में ' धाम ' नाम स्थान का हो जाता है ॥ 'रात्रि'[२३]पद व्याख्यान किया जाचुका— “रातेर्दा- नकर्मणः” [निरु० २ अ०६ पा० १ खं० ]॥ “तस्याः” उस 'रात्रि' की यह ऋचा है ॥७(२८)||
(खं० ८) निरु०- “आ रात्रि ! पार्थिवं रजः पितुरप्रायि धामभिः । दिवःसदांसि बृहती वितिष्ठसे आत्वेषं वर्त्तते तमः ॥” (अथ०सं०का०१९अ०६सू०४७) । आपूपुरः त्वं रात्रि! पार्थिवं रजःस्थानैर्मध्यमस्य, दिवः सदांसि बृहती महती वितिष्ठसे आवर्त्तते त्वेषं तमो रजः ॥ ‘अरण्यानी’ अरण्यस्य पत्नी । ‘अरण्यम्’ अपार्णम् । ग्रामाद् अरमणं भवति इति वा । तस्य एषा भवति ॥८ [२९] ॥ अर्थ.-“आ रात्रि !” इस ऋचा का कुशिक ऋषि है अथवा रात्रि । हे ‘रात्रि !’ (त्वम्) तूने ‘पार्थिवं- रजः’ पृथिवी लोकको ‘आ- अप्रायि’ [ आपूपुरः ] पूर्ण किया है— अन्धकार से व्याप्त किया है । क्या इतना ही ? नहीं— ‘पितुः’ [मध्यमस्य] मध्यम लोक के धामभिः [स्थानैः] स्थानों के सहित- अन्तरिक्ष लोक को भी अन्धकार से छादेती है । क्या यही ? नहीं— ‘दिवः’ [द्युलोकस्य] द्यु लोक के ‘सदांसि’ स्थानों को भी-जिन में द्युलोक वासी जन निवास करते हैं अंधेरे से ढांपलेती है । ‘बृहती’ (महती) बड़ी ( त्वम् ) तू ‘वितिष्ठसे’ दबाकर स्थित होती है— क्यों कि- तू महती है, इस से दूर देशमें रहती हुई
हिन्दी निरुक्त ( २६९ ) ६ अ० ३पा० ६ खंड भी जम करके स्थित होती है। इतनाही नहीं किन्तु - 'त्वेषम्' ( महत् ) अपार 'तमः' ( रजः ) अंधेरा 'आवर्तते' लौटता है-इतना अधिक तेरा अन्धकार है कि-वह सारी त्रिलोकी को पूरण करके भी बचता है और वह इधर ही '( पृथिवी लोक में ) लौट आता है। ऐसे प्रभाव वाली तू हमारे लिये कल्याण रूप हो ॥ 'अरण्यानी' (२४) क्या ? अरण्य (वन) की पत्नी (स्त्री) । 'अरण्य' क्यों ? वह 'अपार्ण ' = अपगतजल = निर्जल होता है। अथवा ग्राम की अपेक्षा अरमण = असुन्दर होता है। “तस्या०”उस (अरण्यानी) की यह ऋचा है-॥८(२६) ॥ ( खं०६ ) निरु०-“अरण्यान्यरण्यान्यसौ या प्रेव नश्यसि कथा ग्रामं न पृच्छसि न त्वा भीरिव विन्दती ३॥ ( ऋ० सं० ८, ८, ४, १) ॥ 'अरण्यानि !' इति एनाम् आमन्त्रयते । या असौ अरण्यानि वनानि पराची इव नश्यसि, कथं ग्रामं न पृच्छसि, 'न त्वा भीर्विन्दति-इव' इति 'इवः' परिभयार्थेवा । 'श्रद्धा' श्रद्धानात् । तस्या एषा भवति-॥ ९ [३०] ॥ अर्थ:- “अरण्यान्यरण्यानि०” इस ऋचाका ऐरम्मद्
हिन्दी निरुक्त ( २६० ) ६ अ० ३ पा० ६ ख० देवमुनि ऋषि है। पहिला 'अरण्यानि' पद सम्बोधन एक- वचनान्त (स्त्री०) है और दूसरा 'अरण्यानि' द्वितीया बहु- वचनान्त(नं०) है। दिङ्मोह (दिशाओं की भ्रान्ति) से युक्त हुआ मन्त्र का द्रष्टा ऋषि वन में डरता हुआ अरण्य = वन की अधिष्ठात्री देवता से कहता है:- 'अरण्यांनि' इस पद से इस वन देवता को सम्बोधन करता है-हे'अरण्यानि' वनदेवते! 'या' जो 'असौ' (दृश्यमाना) देखी जाती हुई (त्वम्) तू 'अरण्यानि' (वनानि) वनों के प्रति केवल 'प्रेव' (पराची इव) नहीं लौटती हुई जैसी 'नश्यसि' अदृष्ट होजाती है- मैं इस भयावने वनमें डरता हूं, तू तो डरती नहीं, बल्कि- उसके अभिमुख जाती हुई उसी में लय होजाती है, इससे मैं कहता हूं-'कथा ग्रामं न पृच्छसि न त्वा भीरिव विन्दती ३" अर्थात्-'कथा (कथम्) क्यों 'ग्रामम्' जन- समूह को 'न' नहीं 'पृच्छसि' तू पूछती है। 'भीः' भय 'इव' जैसे 'त्वा' तुझे'न' नहीं'विन्दति' प्राप्त होता है। अथवा 'इव' शब्द परिभय = थोड़े भय अर्थ में है- जरा भी तुझे भय नहीं लगता। जब किसी को भय होता है, तो वह और लोगों को पुकारता है, उनका शरण लेता है, किन्तु तू किसी को नहीं पूछती' इसी से जानता हूं कि- तुझे भय जैसा या जरा भी भय नहीं लगता। मुझे भी तू अपने समान निर्भय बना, यह मैं आशीः मांगता हूं । 'श्रद्धा' (२५) क्यों ? 'श्रत्' = सत्य के धान = धारण से 'श्रत्' नाम और धारण अर्थ में 'धा' (जु० उ०) धातु से 'श्रद्धा' पद बनता है। क्यों कि-इसमें सत्य का धारण होता है, इसी से यह 'श्रद्धा' है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में यह इसी
हिन्दी निरुक्त ( २६१ ) ६ अ० ३ पा० १० खं० प्रकार है' ऐसी जो बुद्धि उसका अधि देवता का नाम 'श्रद्धा' है, और वह अग्नि देवता ही है, क्यों कि- सब प्रकाश अग्नि का ही है । उस 'श्रद्धा' की यह ऋचा है ॥६ (३०) ॥ ( खं० १० ) निरु०-“श्रद्धयाऽग्निःसमिध्यते श्रद्धया हूयतेहविः। श्रद्धां भगस्य मूर्द्धनि वचसा वेदयामसि ॥ ” [ ऋ० सं० ८, ८, ९, १ ] श्रद्धया अग्निः साधु समिध्यते, श्रद्धया हविः साधु हूयते, श्रद्धां भगस्य भागधेयस्यमूर्द्धनि प्रधानाङ्गे वचनेन आवेदयामः । 'पृथिवी' व्याख्याता । तस्य एषा भवति ॥१०(३१) ॥ अर्थः- श्रद्धयाग्निः०”इस ऋचा का श्रद्धा कामायनी ऋषि है । (यः एव) जो ही 'अग्निः' अग्नि 'श्रद्धया' आस्तिक्यबुद्धि को अवलम्बन करके [कर्मणि] कर्म में 'समिध्यते' दीपन किया जाता है, वही (साधु) 'समिध्यते' भले प्रकार दीपन किया जाता है । किन्तु जो अश्रद्धा से अग्नि जलाया जाता है, वह फल शून्य होने से नहीं जलाया हुआ = व्यर्थ जलाया हुआ होता है । इसी प्रकार जो 'हविः' 'श्रद्धया' श्रद्धा से 'हूयते' होम किया जाता है, वही 'साधु' ठीक होम होता है । [वयम्] हम 'श्रद्धाम्' श्रद्धा को 'भगस्य' (भागधेयस्य) कर्म के 'मूर्द्धनि
[ प्रधानाङ्गे ] मूर्द्धा में = प्रधान अङ्ग में 'वचसा' (मन्त्रगतेन) मन्त्र रूप वचन से 'आवेदयामसि' (आवेदयामः) आवेदन कर- ते हैं श्रद्धा ही धर्म का शिर है- प्रधान अङ्ग है, श्रद्धाके विना धर्म का लाभ नहीं होता, यह हम मन्त्र वाक्य से ही पुकार कर कहते हैं- श्रद्धा रहित को धर्म नहीं मिलता।"नाश्रद्द- धानाय हविर्जुषन्ति देवाः" जो सत्य को धारण नहीं करता उसके हविः को देवता सेवन नहीं करते। "अश्रद्धा- मनृते दधाच्छ्रद्धां सत्ये प्रजापतिः" प्रजापति (ब्रह्मा) ने अश्रद्धा को अनृत [ मिथ्या ] में और श्रद्धा को सत्य में धारण किया है। 'पृथिवी' (३६) व्याख्यान की जाचुकी " अथ वै दर्शनेन पृथुः" [ नि०, १ अ०४ पा० ३ खं० ] । "तस्या०" उस पृथिवी की यह ऋचा है-॥१०(३१)॥ ( खं० ११ ) निरु०-"स्योना पृथिवि भवानृक्षरा निवेशनी यच्छा नः शर्म सप्रथः ॥” [ ऋ०सं०१,२,६,५य० वा०सं० ३५, २१]॥ सुखा नः पृथिवि ! भव। अनृक्षरा निवेशनी । 'ऋक्षरः' कण्टकः। ऋच्छतेः । 'कण्टकः' कन्तपो वा । क्रन्ततेर्वा । कण्टते- र्वा स्याद् गतिकर्मणः ।
हिन्दी निरुक्त ( २६३ ) ६ अ० ३ पा० ११ खं० उद्गततमो भवति । यच्छ नः शर्म यच्छन्तु शरणं सर्वतः पृथु । ‘ अप्वा ’ व्याख्याता । तस्या एषा भवति—॥ ११ (३२) ॥ , अर्थः-“स्योना पृथिवि०” इस का मेधातिथि ऋषि है । हिरण्यनाश की प्रायश्चित्तेष्टि में भूमिदेवताक एक कपाल पुरोडाश की पुरोऽनुवाक्या है । हे 'पृथिवि ! (त्वम्) तू ‘ नः ’ (अस्माकम्) हमारी 'स्योना' (सुखा) सुखरूप 'भव' हो कैसी ? 'अनृक्षरा' (निष्क- ण्टका) निष्कण्टक और 'निवेशनी' निवास के योग्य हो । 'नः' हमारे लिये 'सप्रथः' (सर्वतः-पृथु) सब से मोटा 'शर्म' सुख 'यच्छ' दे ॥ 'ऋक्षर' क्या ? कण्टक (कांटा) । कैसे ? ‘ऋच्छ’ (तु०प०) धातु से । 'कण्टक' क्यों ? कन्तप = 'किसको मैं तपाऊं', इस लिये निकला हुआ है । अथवा छेदन अर्थ में 'कृत' (तु० प०) धातु से है । क्योंकि-कृन्तन = छेदन करता है। अथवा गति अर्थ में 'कण्ट' [भ्वा०प०] धातु से है। क्योंकि-वह वृक्ष से ऊपर को गया हुआ = निकला हुआ होता है । 'अप्व्वा' (२७) [भय या व्याधि] व्याख्यान की जाचुकी “ यदेनया विद्धोऽपवीयते व्याधि र्वा भयंवा ” [ निरु० ६ अ० ३ पा० ३ खं० ] ॥ “तस्याः०”उस अप्वा की यह ऋचा है-॥ ११ [३२] ॥
हिन्दी निरुक्त ( २६४ ) ९ अ० ३ पा० १२ खं० ( खं० १२ ) निरु०- "अमीषां चित्तं प्रति लोभयन्ती गृहाणा- ङ्गान्यप्वे परेहि । अभिप्रेहि निर्दह हृत्सु शोकैर- न्धेनामित्रास्तमसा सचन्ताम् ॥ [ ऋ०सं०८,५, २३, ६ । सा०सं० उ० आ० ९, ३, ५, १ ] (अथ० सं० ३, २, ५ ) ॥ अमीषां चित्तानि प्रज्ञानानि प्रतिलोभयमाना गृहाण अङ्गानि अप्वे ! परेहि अभिप्रेहि निर्दह एषां हृदयानि शोकः अन्धेन अमित्राः तमसा संसेव्यन्ताम् ॥ 'अग्नायी' अग्नेः पत्नी । तस्या एषा भवति- ॥ १२ ( ३३ ) ॥ अर्थ:- "अमीषाम्०" इसका अप्रतिरथ ऋषि है। हे 'अप्वे !' व्याधे ! ( त्वम् ) तू 'अमीषाम्' उन हमारे शत्रुओं के 'चित्तम्' ( चित्तानि = प्रज्ञानानि ) चित्तों को या इन्द्रियों को 'प्रतिलोभयन्ती' ( प्रतिलोभयमाना ) क्षोभित करती हुई 'अङ्गानि' उनके अङ्गों को 'गृहाण' पकड़ 'परेहि' इन्हें दूर लेजा, 'अभिप्रेहि' इनके अभिमुखजा, और फिर ( एषाम् ) इनके 'हृत्सु' ( हृदयानि ) हृदयों को 'शोकैः' शोकों से 'निर्दह' जला 'अन्धेन' गाढे 'तमसा' अन्धेरे से 'अमित्राः' शत्रुओं को 'सचन्ताम्' ( संसेव्यन्ताम् ) सेवन कर = उन्हें व्याप्त कर ॥
हिन्दी निरुक्त ( २६५ ) ६ अ० ३ पा० १३ खं० 'अग्नायी' ( २८ ) अग्नि की पत्नी ( स्त्री ) “तस्याः०” उस अग्नायी की यह ऋचा है-॥ १२(३३)॥ ( खं० १३ ) निरु०-“इहेन्द्राणीमुपह्वये वरुणानीं स्वस्तये । अग्नायीं सोमपीतये ॥” (ऋ०सं० १, २, ६, २ ) ॥ इति सा निगदव्याख्याता ॥ १३ [३४] ॥ इति नवमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ९, ३ ॥ अर्थः-“इहेन्द्राणीम्०” 'इह' इस कर्म में 'इन्द्राणीम्' इन्द्र की पत्नी को 'वरुणानीम्' वरुणकी पत्नी को और 'अग्नायीम्' अग्निकी पत्नी को 'सोमपीतये' सोम के पीने के अर्थ और 'स्वस्तये' अपने कल्याण के अर्थ 'उपह्वये' बुलाता हूं ॥ यह ऋचा अपने उच्चारणसे व्याख्यात है ॥ १३ (३४)॥ यद्यपि इस मन्त्र में इन्द्राणी, वरुणानी और अग्नायी तीनों देवताओं का आवाहन है, इस से इसे केवल अग्नायी की ही कहना उचित नहीं बल कि-सोम पान के संबन्ध से इसे मध्यम देवता की कहना चाहिए, तथापि “सोमं पिब मन्दसानो गणश्रिभिः” [ऋ०सं० ४, ३, १५, ८] इस ऋचा में अग्निको भी सोमपान का संबन्ध कहागया है, इस लिये 'अग्नायी'के लिये कहना भी उपपन्न होता है। किंच भाष्य- कार अग्नायी शब्द उदाहरणार्थ उपयुक्त होनेकेकारण इस ऋचा को यहां उद्धृत करते हैं, इससे देवता विशेषका सम्बन्ध कोई उत्पन्न नहीं होता। केवल यहां अग्नायी शब्द के संयोग से उसके सम्बन्ध का अनुवादमात्र है, किन्तु विद्यमान देवतान्तर
हिन्दी निरुक्त ( २६६ ) ६ अ० ४ पा० १ खं० के सम्बन्ध का इससे निराकरण नहीं होता । अतः औरों की होने परभी इसका नाम होने से इसकी भी है, यह होसकता है ॥ १३ ( ३४ ) ॥ इति हिन्दीनिरुक्तेनवमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥६,३॥ — ० — चतुर्थः पादः ॥ ( खं० १ ) निघ०-उलूखलमुसले॥२९॥हविर्धाने ॥ ३० ॥ द्यावापृथिवी ॥ ३१ ॥ विपाट् छुतुद्री ॥३२॥ आर्त्ती ॥३३॥ शुनासीरौ ॥३४॥देवीजोष्ट्री॥३५॥देवीऊर्जाहुती॥३६॥ इति षट्त्रिंशत (३६) पदानि ॥३॥ निरु०- अथातोऽष्टौ द्वन्द्वानि- 'उलूखलमुसले' [१] । 'उलूखलं' व्याख्यातम् । 'मुसलं' मुहुःसरम् । तयोः-एषा भवति ॥१(३५)॥ अर्थ:-“अथातो०” यहां से आठ (८) द्वन्द्व पद हैं- दो दो पद द्वन्द्व समास से एक २ पद के रूप में हैं । उनमें 'उलूखलमुसले' (२९) यह पद है । इसका पहिला 'उलूखल' पद व्याख्यान किया जाचुका- “उरुकरम्” इत्यादि रूप से [अ० ९ पा० २ खं० १०]
हिन्दी निरुक्त ( २६७ ) ६ अ० ४पा० १ खं० 'मुसल' क्या ? मुहुःसर = बार २ चलने वाला । “तयोः”उन दोनों(उलूखल-मुसलों)की यह ऋचा है॥१(३५)॥ व्याख्या । “अथातः” यह अधिकार वचन है । यद्यपि अश्वादि वर्ग का अधिकार अभी चलाही आता, है तो भी इनकी द्वन्द्व- रूपता औरों से विलक्षण है,यह दिखाने के लिये फिर अधि- कार वचन दिया है । “ अष्टौ ” इस पद के न होने से भी शब्दों के पाठ से अष्टत्व ( ८ ) संख्या का ज्ञान हो सकता है, किन्तु आठ ही द्वन्द्व हैं. न्यून या अधिक नहीं यह जनाने के अर्थ इस की आवश्यकता है । आठ ही द्वन्द्वों के पाठ की यहां आवश्यकता है, औरों की नहीं यह तात्पर्य है ॥ और द्वन्द्वों का पाठ क्यों नहीं ? “उषासानक्ता ” “ दैव्याहोतारा” इनका अभी देवताओं में पाठ हो चुका, अतः फिर समाम्नान होने से पुनरुक्ति होगी । “मित्रावरुणौ” “अग्नीषोमौ” आदि और जो द्वन्द्व हैं, उनमें मित्र, वरुण आदि एक २ देवताओं की अलग २ भी स्तुति मिलती है, इस कारण उनके पाठ में अपूर्वता न होने से वे छोड़ दिये गए हैं, या इनकी गणना में नहीं आसकते । यद्यपि पृथक् स्तुति के सादृश्य से “उलूखल-मुसल” और “द्यावा-पृथिवी” इन का भी यहां पाठ न होना
चाहिए, क्योंकि इनमें भी एक २ की स्तुति मिलती है, तथापि “मुसल” और “दिव” ( द्यावा ) की अलग स्तुति नहीं मिलती किन्तु ऐसे ही विशिष्ट रूपोंसे स्तुति मिलती है, इस कारण इनका पाठ आवश्यक हुआ । “अश्विनौ” का पाठ द्युलोक के देवताओं में होगा । यहां भी पाठ होने से संकर होजायगा, और आर्थिक अनु- कूलता भी यहां कोई नहीं है । इस कारण यहां छोड़ दिया गया । यद्यपि “शुनासीरौ” ( वायु-आदित्य ) का पाठ यहां नहीं चाहिए था क्योंकि—यहां पृथिवीस्थान देवताओं का प्रकरण है, और मध्यम और उत्तम लोक के हैं, तथापि द्वन्द्व की समानता से या वे पृथिवी लोक के उपकारार्थ हैं अथवा इनका प्रयोग पृथिवी पे होता है,जैसा कि— ‘तेनेमाभ्युप- सिञ्चतम्” ‘उससे तुम दोनों इस पृथिवी को सेचन करो’ इस कारण इनका यहां पर पाठ है । ‘द्यावापृथिवी” देवता होने से सब द्वन्द्वों में प्रथम चाहिये था, किन्तु ‘द्यावा’ या ‘दिव्’ पृथिवीस्थान नहीं है, द्वन्द्व की समानतामात्र से यहां परिगणित हुआ है । “द्यावापृथिव्यौ” और “शुनासीरौ” इन दोनों में पृथिवी के सम्बन्ध से पहिला पद गणमें पहिले पढागया है । “उलूखलमुसले” इस का सब से पहिले पाठ इस लिये है कि—बिना आपत्ति के ये पृथिवीस्थान ही सिद्ध है, और इनका द्वन्द्व यो जोड़ा ही काम में आता है ॥
हिन्दी निरुक्त ( २६६ ) ६ अ० ४ पा० १ खं० ( खं० २ ) निरु०-“ आयजी वाजसातमा ता ह्यु १ च्चा विजर्भृतः । हरी इवान्धांसि बप्सता ॥” [ऋ०सं० १, २, ६६, २ ] ॥ आयष्टव्ये अन्नानां संभक्ततमे तेह्युच्चै र्विह्रियेते हरी इवान्नानि भुञ्जाने ॥ ‘हविर्धाने’ हविषां निधाने । तयोः-एषा भवति— ॥ २ [३६] ॥ अर्थः- “ आयजी वाज०” ‘ता’ (ते उलूखल- मुसले ) वे उलूखल = ऊखल और मूसल ‘आयजी’ (आयष्टव्ये) संमुख भाव से पूजनीय ‘वाजसातमे’ (अन्नानां संभक्ततमे ) अन्नों के भले प्रकार सेवन करने वाले ‘उच्चा’ ( उच्चैः ) ऊंचे ‘विजर्भृतः’ ( विह्रियेते ) विहार करते हैं, या विहरण किये जाते हैं। अवघात = मूसल की चोट से ऊखल ऊपर को आता है, और मूसल मारने के लिये उठाया जाता है, यही दोनों का उच्च विहार है। वे दोनों हमारे घर में ‘हरी- इव’ घोड़ों के समान ‘अन्धांसि’ (अन्नानि ) अन्नों को ‘बप्सता’ भुञ्जाने ) संस्कारक या सुधारने वालों के रूप में खाने वाले हों-( यह हम चाहते हैं ) । ‘हविर्धाने’ ( ३० ) ( दो शकट या गाडे ) क्यो ? हवि- ष्यों के धारण करने वाले । “तयोः” उन दोनों हविर्धानों की यह ऋचा है- ॥ २ ( ३६ ) ॥
हिन्दी निरुक्त ( २७१ ) ६ अ० ४ पा० ३ खं० ( खं० ३ ) निरु०- "आवा मुपस्थमद्रुहा देवाः सीदन्तु यज्जि याः । इहाद्य सोमपीतये ॥” ( ऋ०सं० २, ८, १०, ६ ) ॥ आसीदन्तु वाम् 'उपस्थम्' उपस्थानम्, अद्रोग्ध- व्ये इति वा । यज्जि याः देवा यज्ञसम्पादिनः इह अद्य सोमपानाय ॥ 'द्यावापृथिव्यौ' व्याख्याते । तयोः एषा भवति- ॥ ३ ( ३७ ) ॥ अर्थः-“आवाम्०” और “द्यावा नः पृथिवी०” इस ऋचा का गृत्समद ऋषि है । हविर्धान (शकट) के प्रवर्तन (चलाने) में विनियोग है । हे हविर्धाने ! 'अद्रुहा' (अद्रोग्धव्ये) नहीं द्रोह करने योग्य तुम दोनों से कहा जाता है-‘इह' यहां 'अद्य' आज 'सोमपानाय' सोमके पीनेके अर्थ 'यज्जि याः' [ यज्ञसम्पादिनः ) यज्ञके सम्पादन करने वाले 'देवाः' देवता 'वाम्' तुम दोनों की उपस्थम्' ( उपस्थानम् ) पीठपर 'आ-सीदन्तु' बैठें (यह हम चाहते हैं ॥ 'द्यावा पृथिव्यौ' (३१) ( द्यौश्च पृथिवी च ) 'द्य' और 'पृथिवी' व्याख्यान किये जाचुके [ ] ॥ “तयोः” उन दोनों (द्यावा पृथिवीयों) की यह ऋचा है- ॥ ३ ( ३७ ) ॥
हिन्दी निरुक्त ( २७१ ) ६ अ० ४ पा० ४ खं० (खंड४) निरु०-“द्यावा नः पृथिवी इमं सिध्र मद्य दिवि- स्पृशम्। यज्ञं देवेषु यच्छताम्॥[ऋ०सं०२,८,१०,५] द्यावापृथिव्यौ नः इमं साधनम् अद्य दिविस्पृशं यज्ञं देवेषु नियच्छताम् ॥ ‘विपाट् शुतुद्रचौ’ व्यारुङ्गाते । तयोः एषा भवति ॥४ (३८)॥ अर्थः-“द्यावानः०” ( ये एते ) जो ये ‘द्यावापृथिवी’ द्युलोक पृथिवी लोक देखते हैं, सो ‘नः’ हमारे ‘इमम्’ इस ‘दिविस्पृशम्’ द्यु (आकाश = द्युलोक) को स्पर्श करने वाले ‘सिध्रम्’ (साधन) साधने वाले ‘यज्ञम्’ यज्ञ को ‘अद्य’ आज ‘देवेषु’ देवताओं में ‘यच्छताम्’ (नियच्छताम्( देवे’ ॥ ‘विपाट् शुतुद्रयौ’ (३२) (विपाशा और शुतुद्री नदिये’) उपख्यान की जाचुकी हैं [ ] ॥ “तयोः०” उन दोनों ( विपाशा और शुतुद्री ) की यह ऋचा है ॥ ४ (३८)॥ व्याख्या । विपाशा (व्यास) और शतद्रू ( सतलुज ) : पंजाब शिक्षा विभाग के “पंजाबभूगोल”नामपुस्तक में जो इस देशकी चतुर्थ कक्षा की पाठ्य पुस्तक है, इन दोनों नदियों का वर्णन इस प्रकार है । “व्यासा - इसको पंजाबी लोग वियाह कहते हैं,यह नदी एक झील में से निकलती हैं, जिसको व्यास कुंड कहते हैं,
हिन्दी निरुक्त ( २७३ ) ९ अ० ४पा० ४ सं० पहिले कुल्लू के नीचे होकर मंडी में आती है । फिर जिला कांगड़ा और हुशियार पुर से होती हुई हरि के पत्तन परजो जिला फीरोज पुर और अम्रत सर की सीमा पर है सतलुज नदी से मिलजाती है । यहां से इस नदी का नाम धारा हो जाता है। फिर बहावलपुर की सीमा पर प्रह्लाद पुर के नीचे रावी चेनाव जेहलम नदियां भी जो ऊपर से मिली हुई आती हैं इसमें मिल जाती हैं ॥” (पृ० ४) “सतलुज — जिसका पुराना नाम शतद्रु है । यह नदी तिब्बत के पहाड़ों में से जो झील मान सरोवर के निकट हैं निकलती है। और का हलूर पहाड़ के बीच में से होकर कुल्लू में जाती है । विलासपुर के नीचे जहां पहाड़ में से निकलती है । वहा उसकी दो धारा होगई है । रोपड़ नगर के नीचे आकर दोनों धारा मिल गई हैं। यहां सरकार ने इस नदी में से एक बहुत बड़ी नहर निकाली है फिर छोटा माछियां नामी नगर से होकर फिल्लौ के नीचे आती है । यहां इस नदीपर एक बड़ापुल बांधा हुआ है । बड़ी सड़क और रेलकी सडक इसी पुलपर से होकर जाती है । फिर यहनदी जालन्धर के जिले को फिरोजपुर से अलग करती हुई हरिके पत्तन पर ब्यासा से मिल जाती है ॥” (पृ०३) ब्यासा। नाम से विपाशा और सतलुज नाम से शतद्रु मिलता हुआ है । मन्त्रोक्त वर्णन इस पूर्वोक्त भूगोलसे मिलता हुआ है । पर्वतो से आना और फिर मिलजाना यह दोनों ही बातें मन्त्र में “पर्वतानाम्-उपस्थात्” और “उशती” इन पदों से स्पष्ट उक्त होती हैं। दोनों नदियों को जोघोड़ियों और व्याई हुई गोओं की उपमा मन्त्र में आई है,उससेमन्त्र-
हिन्दी निरुक्त ( २७३ ) ६ अ० ४ पा० ५ ख० द्रष्टा ऋषि के पर्वतों से उतरती हुई नदियों पर कई प्रकार के भाव प्रकट होते हैं। घोड़ियों की उपमा से. ऋषि देखता है मानों दो घुड़सालों से दो घोड़ियां छूट कर दौड़ रही हैं, और शीघ्रता पूर्वक एक दूसरी से मिलना चाहती है। एवम् ब्याई हुई गायों के दृष्टान्त से एक की एकपर वत्सलता प्रतीत हो रही है। इत्यादि। इस वर्णन को देख कर मन्त्र में यह वर्णन इन्हीं नदियों का प्रतीत होता है पहिली नदी का नाम 'व्यासा' व्यास कुण्ड से उत्पन्न होने के कारण और दूसरा 'विपाशा' नाम इसमें व्यास जी के पाश कट जाने के कारण है। पुत्र वियोग के कारण कभी व्यास जी शोकातुर होकर पाशबन्ध से प्राण त्याग करना चाहते थे, उन का पाश इस नदी में टूट गया था। यह कथा पुराण की है॥ (खं० ५ ) निरु०- "प्रपर्वताना मुशती उपस्था दश्वे इव विषिते हासमाने । गावेव शुभ्रे मातरो रिहाणे विपाट् शुतुद्री पयसा जवेते॥”[ऋ०सं०३,२,१२,१] ॥ पर्वतानाम् 'उपस्थात्' उपस्थानात् उशत्यौकाम यमाने अश्वे इव । विमुक्ते इति वा । विषणे इति वा । हासमाने । 'हासतिः' स्पर्धायाम्'। हर्षमाणे वा । गावौ-इव 'शुभ्रे' शोभने मातरौ संरिहाणे 'विपाट् शुतुद्र्यौ' पयसा प्रजवेते ॥ 'आर्ती' अर्त्तन्याँवा । अरण्यौ वा । अरिषण्यौ वा। तयोः-एषा भवति ॥५[३९] ॥
हिन्दी निरुक्त ( २७४ ) ६ अ० ४ पा० ६ ख० अर्थः- “प्रपर्वताना०” विश्वामित्र कहता है- (येचएते) और ये 'विपाट् शुतुद्र्यौ' विपाशा और शुतुद्री नदिये 'उशती' (उशत्यौ = कामयमाने) परस्पर के समागम = संगम की इच्छा करती हुईं 'विषिता' (मन्दुराणतःविमुक्ते ) घुड़साल से छोड़ी हुई (विषवणे इति वा) एक साथ जूये में जाती हुई 'अश्वे- इव' घोड़ियोँ के समान ' हासमाने ' परस्पर स्पर्धा करती हुईं - होड़ करती हुई [क्योंकि- 'हास' (भ्वा० प० ) धातु स्पर्धा अर्थ में है ।] अथवा (हर्षमाणे) हर्ष करती हुई 'अश्वे इव ' दो घोड़ियोँ के समान, तथा (सं) ' रिहाणे' अपने वत्स को चाटने की इच्छा करती हुईं ' मातरा ' ( मातरौ ) माताओं 'गावा- इव' (गावो-इव ) गोओँ के समान, ' पर्वतानाम् ' पर्वतों के 'उपस्थात्' (उपस्थानात्) कमर से = मध्य से 'पयसा, जल से 'प्र-जवेते' वेग से दौड़ती है ॥ आर्त्नी (३३) (धनुष के सिरे) क्यों ? ये अर्तनी = बाणो के चलाने वाली होती हैं । अथवा अरणी = शरण या गमन के योग्य होने से वे आर्त्नी है । अथवा अरिषणी = शत्रुओँ को मारने वाली होने से आर्त्नी हैं । “तयोः०” उन दोनों (आर्त्नियों) की यह ऋचा है-॥५(३६) ( खं० ६ ) निरु०- “ ते आचरन्ती समनेव योषा मातेव पुत्रं बिभृता मुपस्थे। अप शत्रून् विध्यतां संविदाने आर्त्नी इमे विस्फुरन्तीअमित्रान् ॥”[ऋ०सं०५,१, १९,४] (य०वा० सं० २९, ४) ॥ ते आरचन्त्यौ समनसौ इव योषे, माता- इव