निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २६५ ) ६ अ० ३ पा० १३ खं० 'अग्नायी' ( २८ ) अग्नि की पत्नी ( स्त्री ) “तस्याः०” उस अग्नायी की यह ऋचा है-॥ १२(३३)॥ ( खं० १३ ) निरु०-“इहेन्द्राणीमुपह्वये वरुणानीं स्वस्तये । अग्नायीं सोमपीतये ॥” (ऋ०सं० १, २, ६, २ ) ॥ इति सा निगदव्याख्याता ॥ १३ [३४] ॥ इति नवमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ९, ३ ॥ अर्थः-“इहेन्द्राणीम्०” 'इह' इस कर्म में 'इन्द्राणीम्' इन्द्र की पत्नी को 'वरुणानीम्' वरुणकी पत्नी को और 'अग्नायीम्' अग्निकी पत्नी को 'सोमपीतये' सोम के पीने के अर्थ और 'स्वस्तये' अपने कल्याण के अर्थ 'उपह्वये' बुलाता हूं ॥ यह ऋचा अपने उच्चारणसे व्याख्यात है ॥ १३ (३४)॥ यद्यपि इस मन्त्र में इन्द्राणी, वरुणानी और अग्नायी तीनों देवताओं का आवाहन है, इस से इसे केवल अग्नायी की ही कहना उचित नहीं बल कि-सोम पान के संबन्ध से इसे मध्यम देवता की कहना चाहिए, तथापि “सोमं पिब मन्दसानो गणश्रिभिः” [ऋ०सं० ४, ३, १५, ८] इस ऋचा में अग्निको भी सोमपान का संबन्ध कहागया है, इस लिये 'अग्नायी'के लिये कहना भी उपपन्न होता है। किंच भाष्य- कार अग्नायी शब्द उदाहरणार्थ उपयुक्त होनेकेकारण इस ऋचा को यहां उद्धृत करते हैं, इससे देवता विशेषका सम्बन्ध कोई उत्पन्न नहीं होता। केवल यहां अग्नायी शब्द के संयोग से उसके सम्बन्ध का अनुवादमात्र है, किन्तु विद्यमान देवतान्तर