भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1030

हिन्दी निरुक्त ( २६४ ) ९ अ० ३ पा० १२ खं० ( खं० १२ ) निरु०- "अमीषां चित्तं प्रति लोभयन्ती गृहाणा- ङ्गान्यप्वे परेहि । अभिप्रेहि निर्दह हृत्सु शोकैर- न्धेनामित्रास्तमसा सचन्ताम् ॥ [ ऋ०सं०८,५, २३, ६ । सा०सं० उ० आ० ९, ३, ५, १ ] (अथ० सं० ३, २, ५ ) ॥ अमीषां चित्तानि प्रज्ञानानि प्रतिलोभयमाना गृहाण अङ्गानि अप्वे ! परेहि अभिप्रेहि निर्दह एषां हृदयानि शोकः अन्धेन अमित्राः तमसा संसेव्यन्ताम् ॥ 'अग्नायी' अग्नेः पत्नी । तस्या एषा भवति- ॥ १२ ( ३३ ) ॥ अर्थ:- "अमीषाम्०" इसका अप्रतिरथ ऋषि है। हे 'अप्वे !' व्याधे ! ( त्वम् ) तू 'अमीषाम्' उन हमारे शत्रुओं के 'चित्तम्' ( चित्तानि = प्रज्ञानानि ) चित्तों को या इन्द्रियों को 'प्रतिलोभयन्ती' ( प्रतिलोभयमाना ) क्षोभित करती हुई 'अङ्गानि' उनके अङ्गों को 'गृहाण' पकड़ 'परेहि' इन्हें दूर लेजा, 'अभिप्रेहि' इनके अभिमुखजा, और फिर ( एषाम् ) इनके 'हृत्सु' ( हृदयानि ) हृदयों को 'शोकैः' शोकों से 'निर्दह' जला 'अन्धेन' गाढे 'तमसा' अन्धेरे से 'अमित्राः' शत्रुओं को 'सचन्ताम्' ( संसेव्यन्ताम् ) सेवन कर = उन्हें व्याप्त कर ॥

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