निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २६३ ) ६ अ० ३ पा० ११ खं० उद्गततमो भवति । यच्छ नः शर्म यच्छन्तु शरणं सर्वतः पृथु । ‘ अप्वा ’ व्याख्याता । तस्या एषा भवति—॥ ११ (३२) ॥ , अर्थः-“स्योना पृथिवि०” इस का मेधातिथि ऋषि है । हिरण्यनाश की प्रायश्चित्तेष्टि में भूमिदेवताक एक कपाल पुरोडाश की पुरोऽनुवाक्या है । हे 'पृथिवि ! (त्वम्) तू ‘ नः ’ (अस्माकम्) हमारी 'स्योना' (सुखा) सुखरूप 'भव' हो कैसी ? 'अनृक्षरा' (निष्क- ण्टका) निष्कण्टक और 'निवेशनी' निवास के योग्य हो । 'नः' हमारे लिये 'सप्रथः' (सर्वतः-पृथु) सब से मोटा 'शर्म' सुख 'यच्छ' दे ॥ 'ऋक्षर' क्या ? कण्टक (कांटा) । कैसे ? ‘ऋच्छ’ (तु०प०) धातु से । 'कण्टक' क्यों ? कन्तप = 'किसको मैं तपाऊं', इस लिये निकला हुआ है । अथवा छेदन अर्थ में 'कृत' (तु० प०) धातु से है । क्योंकि-कृन्तन = छेदन करता है। अथवा गति अर्थ में 'कण्ट' [भ्वा०प०] धातु से है। क्योंकि-वह वृक्ष से ऊपर को गया हुआ = निकला हुआ होता है । 'अप्व्वा' (२७) [भय या व्याधि] व्याख्यान की जाचुकी “ यदेनया विद्धोऽपवीयते व्याधि र्वा भयंवा ” [ निरु० ६ अ० ३ पा० ३ खं० ] ॥ “तस्याः०”उस अप्वा की यह ऋचा है-॥ ११ [३२] ॥