भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1032

हिन्दी निरुक्त ( २६६ ) ६ अ० ४ पा० १ खं० के सम्बन्ध का इससे निराकरण नहीं होता । अतः औरों की होने परभी इसका नाम होने से इसकी भी है, यह होसकता है ॥ १३ ( ३४ ) ॥ इति हिन्दीनिरुक्तेनवमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥६,३॥ — ० — चतुर्थः पादः ॥ ( खं० १ ) निघ०-उलूखलमुसले॥२९॥हविर्धाने ॥ ३० ॥ द्यावापृथिवी ॥ ३१ ॥ विपाट् छुतुद्री ॥३२॥ आर्त्ती ॥३३॥ शुनासीरौ ॥३४॥देवीजोष्ट्री॥३५॥देवीऊर्जाहुती॥३६॥ इति षट्त्रिंशत (३६) पदानि ॥३॥ निरु०- अथातोऽष्टौ द्वन्द्वानि- 'उलूखलमुसले' [१] । 'उलूखलं' व्याख्यातम् । 'मुसलं' मुहुःसरम् । तयोः-एषा भवति ॥१(३५)॥ अर्थ:-“अथातो०” यहां से आठ (८) द्वन्द्व पद हैं- दो दो पद द्वन्द्व समास से एक २ पद के रूप में हैं । उनमें 'उलूखलमुसले' (२९) यह पद है । इसका पहिला 'उलूखल' पद व्याख्यान किया जाचुका- “उरुकरम्” इत्यादि रूप से [अ० ९ पा० २ खं० १०]