भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1033

हिन्दी निरुक्त ( २६७ ) ६ अ० ४पा० १ खं० 'मुसल' क्या ? मुहुःसर = बार २ चलने वाला । “तयोः”उन दोनों(उलूखल-मुसलों)की यह ऋचा है॥१(३५)॥ व्याख्या । “अथातः” यह अधिकार वचन है । यद्यपि अश्वादि वर्ग का अधिकार अभी चलाही आता, है तो भी इनकी द्वन्द्व- रूपता औरों से विलक्षण है,यह दिखाने के लिये फिर अधि- कार वचन दिया है । “ अष्टौ ” इस पद के न होने से भी शब्दों के पाठ से अष्टत्व ( ८ ) संख्या का ज्ञान हो सकता है, किन्तु आठ ही द्वन्द्व हैं. न्यून या अधिक नहीं यह जनाने के अर्थ इस की आवश्यकता है । आठ ही द्वन्द्वों के पाठ की यहां आवश्यकता है, औरों की नहीं यह तात्पर्य है ॥ और द्वन्द्वों का पाठ क्यों नहीं ? “उषासानक्ता ” “ दैव्याहोतारा” इनका अभी देवताओं में पाठ हो चुका, अतः फिर समाम्नान होने से पुनरुक्ति होगी । “मित्रावरुणौ” “अग्नीषोमौ” आदि और जो द्वन्द्व हैं, उनमें मित्र, वरुण आदि एक २ देवताओं की अलग २ भी स्तुति मिलती है, इस कारण उनके पाठ में अपूर्वता न होने से वे छोड़ दिये गए हैं, या इनकी गणना में नहीं आसकते । यद्यपि पृथक् स्तुति के सादृश्य से “उलूखल-मुसल” और “द्यावा-पृथिवी” इन का भी यहां पाठ न होना