निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचाहिए, क्योंकि इनमें भी एक २ की स्तुति मिलती है, तथापि “मुसल” और “दिव” ( द्यावा ) की अलग स्तुति नहीं मिलती किन्तु ऐसे ही विशिष्ट रूपोंसे स्तुति मिलती है, इस कारण इनका पाठ आवश्यक हुआ । “अश्विनौ” का पाठ द्युलोक के देवताओं में होगा । यहां भी पाठ होने से संकर होजायगा, और आर्थिक अनु- कूलता भी यहां कोई नहीं है । इस कारण यहां छोड़ दिया गया । यद्यपि “शुनासीरौ” ( वायु-आदित्य ) का पाठ यहां नहीं चाहिए था क्योंकि—यहां पृथिवीस्थान देवताओं का प्रकरण है, और मध्यम और उत्तम लोक के हैं, तथापि द्वन्द्व की समानता से या वे पृथिवी लोक के उपकारार्थ हैं अथवा इनका प्रयोग पृथिवी पे होता है,जैसा कि— ‘तेनेमाभ्युप- सिञ्चतम्” ‘उससे तुम दोनों इस पृथिवी को सेचन करो’ इस कारण इनका यहां पर पाठ है । ‘द्यावापृथिवी” देवता होने से सब द्वन्द्वों में प्रथम चाहिये था, किन्तु ‘द्यावा’ या ‘दिव्’ पृथिवीस्थान नहीं है, द्वन्द्व की समानतामात्र से यहां परिगणित हुआ है । “द्यावापृथिव्यौ” और “शुनासीरौ” इन दोनों में पृथिवी के सम्बन्ध से पहिला पद गणमें पहिले पढागया है । “उलूखलमुसले” इस का सब से पहिले पाठ इस लिये है कि—बिना आपत्ति के ये पृथिवीस्थान ही सिद्ध है, और इनका द्वन्द्व यो जोड़ा ही काम में आता है ॥