भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1027

हिन्दी निरुक्त ( २६१ ) ६ अ० ३ पा० १० खं० प्रकार है' ऐसी जो बुद्धि उसका अधि देवता का नाम 'श्रद्धा' है, और वह अग्नि देवता ही है, क्यों कि- सब प्रकाश अग्नि का ही है । उस 'श्रद्धा' की यह ऋचा है ॥६ (३०) ॥ ( खं० १० ) निरु०-“श्रद्धयाऽग्निःसमिध्यते श्रद्धया हूयतेहविः। श्रद्धां भगस्य मूर्द्धनि वचसा वेदयामसि ॥ ” [ ऋ० सं० ८, ८, ९, १ ] श्रद्धया अग्निः साधु समिध्यते, श्रद्धया हविः साधु हूयते, श्रद्धां भगस्य भागधेयस्यमूर्द्धनि प्रधानाङ्गे वचनेन आवेदयामः । 'पृथिवी' व्याख्याता । तस्य एषा भवति ॥१०(३१) ॥ अर्थः- श्रद्धयाग्निः०”इस ऋचा का श्रद्धा कामायनी ऋषि है । (यः एव) जो ही 'अग्निः' अग्नि 'श्रद्धया' आस्तिक्यबुद्धि को अवलम्बन करके [कर्मणि] कर्म में 'समिध्यते' दीपन किया जाता है, वही (साधु) 'समिध्यते' भले प्रकार दीपन किया जाता है । किन्तु जो अश्रद्धा से अग्नि जलाया जाता है, वह फल शून्य होने से नहीं जलाया हुआ = व्यर्थ जलाया हुआ होता है । इसी प्रकार जो 'हविः' 'श्रद्धया' श्रद्धा से 'हूयते' होम किया जाता है, वही 'साधु' ठीक होम होता है । [वयम्] हम 'श्रद्धाम्' श्रद्धा को 'भगस्य' (भागधेयस्य) कर्म के 'मूर्द्धनि