निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २६० ) ६ अ० ३ पा० ६ ख० देवमुनि ऋषि है। पहिला 'अरण्यानि' पद सम्बोधन एक- वचनान्त (स्त्री०) है और दूसरा 'अरण्यानि' द्वितीया बहु- वचनान्त(नं०) है। दिङ्मोह (दिशाओं की भ्रान्ति) से युक्त हुआ मन्त्र का द्रष्टा ऋषि वन में डरता हुआ अरण्य = वन की अधिष्ठात्री देवता से कहता है:- 'अरण्यांनि' इस पद से इस वन देवता को सम्बोधन करता है-हे'अरण्यानि' वनदेवते! 'या' जो 'असौ' (दृश्यमाना) देखी जाती हुई (त्वम्) तू 'अरण्यानि' (वनानि) वनों के प्रति केवल 'प्रेव' (पराची इव) नहीं लौटती हुई जैसी 'नश्यसि' अदृष्ट होजाती है- मैं इस भयावने वनमें डरता हूं, तू तो डरती नहीं, बल्कि- उसके अभिमुख जाती हुई उसी में लय होजाती है, इससे मैं कहता हूं-'कथा ग्रामं न पृच्छसि न त्वा भीरिव विन्दती ३" अर्थात्-'कथा (कथम्) क्यों 'ग्रामम्' जन- समूह को 'न' नहीं 'पृच्छसि' तू पूछती है। 'भीः' भय 'इव' जैसे 'त्वा' तुझे'न' नहीं'विन्दति' प्राप्त होता है। अथवा 'इव' शब्द परिभय = थोड़े भय अर्थ में है- जरा भी तुझे भय नहीं लगता। जब किसी को भय होता है, तो वह और लोगों को पुकारता है, उनका शरण लेता है, किन्तु तू किसी को नहीं पूछती' इसी से जानता हूं कि- तुझे भय जैसा या जरा भी भय नहीं लगता। मुझे भी तू अपने समान निर्भय बना, यह मैं आशीः मांगता हूं । 'श्रद्धा' (२५) क्यों ? 'श्रत्' = सत्य के धान = धारण से 'श्रत्' नाम और धारण अर्थ में 'धा' (जु० उ०) धातु से 'श्रद्धा' पद बनता है। क्यों कि-इसमें सत्य का धारण होता है, इसी से यह 'श्रद्धा' है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में यह इसी