निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २६९ ) ६ अ० ३पा० ६ खंड भी जम करके स्थित होती है। इतनाही नहीं किन्तु - 'त्वेषम्' ( महत् ) अपार 'तमः' ( रजः ) अंधेरा 'आवर्तते' लौटता है-इतना अधिक तेरा अन्धकार है कि-वह सारी त्रिलोकी को पूरण करके भी बचता है और वह इधर ही '( पृथिवी लोक में ) लौट आता है। ऐसे प्रभाव वाली तू हमारे लिये कल्याण रूप हो ॥ 'अरण्यानी' (२४) क्या ? अरण्य (वन) की पत्नी (स्त्री) । 'अरण्य' क्यों ? वह 'अपार्ण ' = अपगतजल = निर्जल होता है। अथवा ग्राम की अपेक्षा अरमण = असुन्दर होता है। “तस्या०”उस (अरण्यानी) की यह ऋचा है-॥८(२६) ॥ ( खं०६ ) निरु०-“अरण्यान्यरण्यान्यसौ या प्रेव नश्यसि कथा ग्रामं न पृच्छसि न त्वा भीरिव विन्दती ३॥ ( ऋ० सं० ८, ८, ४, १) ॥ 'अरण्यानि !' इति एनाम् आमन्त्रयते । या असौ अरण्यानि वनानि पराची इव नश्यसि, कथं ग्रामं न पृच्छसि, 'न त्वा भीर्विन्दति-इव' इति 'इवः' परिभयार्थेवा । 'श्रद्धा' श्रद्धानात् । तस्या एषा भवति-॥ ९ [३०] ॥ अर्थ:- “अरण्यान्यरण्यानि०” इस ऋचाका ऐरम्मद्