निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(खं० ८) निरु०- “आ रात्रि ! पार्थिवं रजः पितुरप्रायि धामभिः । दिवःसदांसि बृहती वितिष्ठसे आत्वेषं वर्त्तते तमः ॥” (अथ०सं०का०१९अ०६सू०४७) । आपूपुरः त्वं रात्रि! पार्थिवं रजःस्थानैर्मध्यमस्य, दिवः सदांसि बृहती महती वितिष्ठसे आवर्त्तते त्वेषं तमो रजः ॥ ‘अरण्यानी’ अरण्यस्य पत्नी । ‘अरण्यम्’ अपार्णम् । ग्रामाद् अरमणं भवति इति वा । तस्य एषा भवति ॥८ [२९] ॥ अर्थ.-“आ रात्रि !” इस ऋचा का कुशिक ऋषि है अथवा रात्रि । हे ‘रात्रि !’ (त्वम्) तूने ‘पार्थिवं- रजः’ पृथिवी लोकको ‘आ- अप्रायि’ [ आपूपुरः ] पूर्ण किया है— अन्धकार से व्याप्त किया है । क्या इतना ही ? नहीं— ‘पितुः’ [मध्यमस्य] मध्यम लोक के धामभिः [स्थानैः] स्थानों के सहित- अन्तरिक्ष लोक को भी अन्धकार से छादेती है । क्या यही ? नहीं— ‘दिवः’ [द्युलोकस्य] द्यु लोक के ‘सदांसि’ स्थानों को भी-जिन में द्युलोक वासी जन निवास करते हैं अंधेरे से ढांपलेती है । ‘बृहती’ (महती) बड़ी ( त्वम् ) तू ‘वितिष्ठसे’ दबाकर स्थित होती है— क्यों कि- तू महती है, इस से दूर देशमें रहती हुई