भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1023, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 1023

हिन्दी निरुक्त ( २५७ ) ६ अ० ३ पा० ७ खं० अर्थ:-“ या ओषधीः” यह ऋचा ओषधि- सूक्त में पहिली ही है । अग्नि चयन कर्म में इस मन्त्र से क्षेत्र में ग्राम्य और वन्य (बनकी) ओषधियें बोई जाती हैं । 'याः' जो 'ओषधीः' ( ओषधयः ) ओषधियें ' देवेभ्यः' देवताओं से 'त्रियुगम्' (त्रीणि युगानि) तीन युग'पूर्वाः'पहिले 'जाताः' उत्पन्न हुई हैं—आद्य कल्प में कलि, द्वापर, और त्रेता युग से पूर्व कृतयुग में देवताओं से पहिले जन्मी हैं, क्यों कि— अन्न के विना देवताओं का जीवन या उनकी स्थिति नहीं हो सकती इससे ये देवताओं से पहिले ही हुईं, ' तद् ' (तांसाम्) उन 'बभ्रूणाम्'(बभ्रुवर्णानाम् ) कपिल वर्णवालियों के [हरणानाम् ] अथवा भूख आदि को हरने बालियों के (भरणानाम्—इति वा) अथवा प्राणियों के भरण = पोषण करने बालियों के 'अहम्' मैं 'शतम्' सौ (१००) (सप्त-च)और सात (७) कुल (१०७) धामों को 'मन्वे' [मन्ये] मानता हूं । धाम क्या? 'धाम शब्द के तीन अर्थ होते हैं—स्थान(१) नाम (२) और जन्म (३) उनमें यहां पर जन्मों से अभिप्राय है— अर्थात्— ओषधियों की एक सौ सात (१०७) जातियों को मानता हूं = जानता हूं । अथवा पुरुष के एक सौ सात ( १०७ ) कर्म- स्थान हैं, सभ्हीं में ये ओषधिये' प्राणियों को धारण करती हैं । इस पक्ष में ' धाम ' नाम स्थान का हो जाता है ॥ 'रात्रि'[२३]पद व्याख्यान किया जाचुका— “रातेर्दा- नकर्मणः” [निरु० २ अ०६ पा० १ खं० ]॥ “तस्याः” उस 'रात्रि' की यह ऋचा है ॥७(२८)||

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