निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २५६ ) ६ अ० ३ पा० ७ खं० हुईं नाश करदेती हैं या पानकर जाती हैं। अथवा ‘ओषति एना धयन्ति’ किसी अङ्ग को रोगी होने पर प्राणी इन्हें पान करते हैं। इन दोनों व्याख्याओं में ‘ओषति’ (भ्वा०प०) धातु से पूर्वभाग और ‘धयति’ (भ्वा० प०) धातु से दूसरा भाग है। मिलकर ‘ओषधि’ शब्द बनजाता है। पहिली व्याख्या में कर्तृ कारक और दूसरी में कर्म कारक वाच्य है अथवा ‘दोषं धयन्ति’ वात, पित्त आदि दोष को पान करती हैं, इस से ये ‘ओषधि’ हैं। उन (ओषधियों) की यह ऋचा है— ॥ ६ (२७) ॥ (खं० ७) निरु०– "या ओषधीः पूर्वा जाता देवेभ्य- स्त्रिर्युगं पुरा। मनैनुबभ्रूणामहं शतं धामानि सप्त च॥” (ऋ०सं० ८, ५, ८, १) ॥ या ओषधयःपूर्वा जाता देवेभ्यः त्रीणि युगानि पुरा, मन्ये नु तद् बभ्रूणाम्– अहं बभ्रुवर्णानां हरणानां भरणानाम्– इति वा। ‘शतं धामानि सप्त च’ । धामानि त्रयाणि भवन्ति— स्थानानि, नामानि, जन्मानि–इति। जन्मानि अत्रअभि- प्रेतानि। सप्त शतं पुरुषस्य मर्मणां, तेषु एना दधति– इति वा ॥ ‘रात्रिः’ व्याख्याता। तस्य एषा भवति ॥ ७[२८] ॥