निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २७३ ) ६ अ० ४ पा० ५ ख० द्रष्टा ऋषि के पर्वतों से उतरती हुई नदियों पर कई प्रकार के भाव प्रकट होते हैं। घोड़ियों की उपमा से. ऋषि देखता है मानों दो घुड़सालों से दो घोड़ियां छूट कर दौड़ रही हैं, और शीघ्रता पूर्वक एक दूसरी से मिलना चाहती है। एवम् ब्याई हुई गायों के दृष्टान्त से एक की एकपर वत्सलता प्रतीत हो रही है। इत्यादि। इस वर्णन को देख कर मन्त्र में यह वर्णन इन्हीं नदियों का प्रतीत होता है पहिली नदी का नाम 'व्यासा' व्यास कुण्ड से उत्पन्न होने के कारण और दूसरा 'विपाशा' नाम इसमें व्यास जी के पाश कट जाने के कारण है। पुत्र वियोग के कारण कभी व्यास जी शोकातुर होकर पाशबन्ध से प्राण त्याग करना चाहते थे, उन का पाश इस नदी में टूट गया था। यह कथा पुराण की है॥ (खं० ५ ) निरु०- "प्रपर्वताना मुशती उपस्था दश्वे इव विषिते हासमाने । गावेव शुभ्रे मातरो रिहाणे विपाट् शुतुद्री पयसा जवेते॥”[ऋ०सं०३,२,१२,१] ॥ पर्वतानाम् 'उपस्थात्' उपस्थानात् उशत्यौकाम यमाने अश्वे इव । विमुक्ते इति वा । विषणे इति वा । हासमाने । 'हासतिः' स्पर्धायाम्'। हर्षमाणे वा । गावौ-इव 'शुभ्रे' शोभने मातरौ संरिहाणे 'विपाट् शुतुद्र्यौ' पयसा प्रजवेते ॥ 'आर्ती' अर्त्तन्याँवा । अरण्यौ वा । अरिषण्यौ वा। तयोः-एषा भवति ॥५[३९] ॥