भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1040

हिन्दी निरुक्त ( २७४ ) ६ अ० ४ पा० ६ ख० अर्थः- “प्रपर्वताना०” विश्वामित्र कहता है- (येचएते) और ये 'विपाट् शुतुद्र्यौ' विपाशा और शुतुद्री नदिये 'उशती' (उशत्यौ = कामयमाने) परस्पर के समागम = संगम की इच्छा करती हुईं 'विषिता' (मन्दुराणतःविमुक्ते ) घुड़साल से छोड़ी हुई (विषवणे इति वा) एक साथ जूये में जाती हुई 'अश्वे- इव' घोड़ियोँ के समान ' हासमाने ' परस्पर स्पर्धा करती हुईं - होड़ करती हुई [क्योंकि- 'हास' (भ्वा० प० ) धातु स्पर्धा अर्थ में है ।] अथवा (हर्षमाणे) हर्ष करती हुई 'अश्वे इव ' दो घोड़ियोँ के समान, तथा (सं) ' रिहाणे' अपने वत्स को चाटने की इच्छा करती हुईं ' मातरा ' ( मातरौ ) माताओं 'गावा- इव' (गावो-इव ) गोओँ के समान, ' पर्वतानाम् ' पर्वतों के 'उपस्थात्' (उपस्थानात्) कमर से = मध्य से 'पयसा, जल से 'प्र-जवेते' वेग से दौड़ती है ॥ आर्त्नी (३३) (धनुष के सिरे) क्यों ? ये अर्तनी = बाणो के चलाने वाली होती हैं । अथवा अरणी = शरण या गमन के योग्य होने से वे आर्त्नी है । अथवा अरिषणी = शत्रुओँ को मारने वाली होने से आर्त्नी हैं । “तयोः०” उन दोनों (आर्त्नियों) की यह ऋचा है-॥५(३६) ( खं० ६ ) निरु०- “ ते आचरन्ती समनेव योषा मातेव पुत्रं बिभृता मुपस्थे। अप शत्रून् विध्यतां संविदाने आर्त्नी इमे विस्फुरन्तीअमित्रान् ॥”[ऋ०सं०५,१, १९,४] (य०वा० सं० २९, ४) ॥ ते आरचन्त्यौ समनसौ इव योषे, माता- इव