निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी-निरुक्त ( २७५ ) ६ अ० ४ पा० ६ खं० पुत्रं बिभृता मुपस्थे उपस्थाने अपविध्यतां शत्रून् संविदाने आर्त्न्यौ इमे विघ्नन्त्यौ अमित्रान् ॥ 'शुनासीरौ' 'शुनो'-वायुः। शु एति अन्तरिक्षे। 'सीरः' आदित्यः । सरणात् । तयोः एषा भवति ॥६ (४०) ॥ अर्थ:-" ते आचरन्ती ० " इस मन्त्र से अश्वमेध में आर्तिर्नयों का ही अनुमन्त्रण किया जाता है । (ये एते) जो ये 'आर्त्नी' धनुष् की कोटिये' ' समना ' (समनसौ) एक पति वालीं 'योषा' [योषे] इव' दो स्त्रियों के समान, आचरन्ती' ( आचरन्त्यौ ) आचरण करने वाली हैं- जिस प्रकार एक पति वालीं दो स्त्रियें एक पति के प्रतिआ- लिङ्गन करने के अर्थ आचरण करती हैं, वैसे ही ये दोनों धनुष् की कोटिये' आक्रष्टा = खेंचने वाले के प्रति आचरण करती हैं । 'ये' 'आर्त्नी' जो आर्तिर्नियें ' 'माता' पुत्रम् - इव' माता पुत्र को जैसे (आक्रष्टारम्) खेंचने वाले धनुष्मान् को 'उपस्थे' (उपस्थाने) गोद में 'बिभृताम्' रक्षा के लियेधारण करती हैं। (ये) जो 'इमे' ये आर्तिर्नियें ' 'अमित्रान् ' शत्रुओं के 'विस्फुरन्ती' (विस्फुरन्त्यौ) [विघ्नन्त्यौ] विनाश करती हुई होती हैं, 'ते' वे आर्तिर्नियें 'संविदाने' आपस में संवाद जैसा करती हुईं 'शत्रून्' शत्रुओं को 'अपविध्यताम्' वेधन करें = मारें ॥ 'शुनासीरौ' (३४) ( वायु और आदित्य ) कैसे ? 'शुन' वायु होता है । क्यों ? 'शु एति अन्तरिक्षे'—शीघ्र अन्तरिक्ष में गमन करता है । 'सीर' आदित्य होता है । क्यों सरण = गमन से ।