निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २७६ ) ६ अ० ४ पा० ७ खं० उन दोनों की यह ऋचा है ॥ ६ (४०) ॥ ( खं० ७ ) निरु०-‘शुनासीराविमां वाचं जुषेथां यद्दिवि चक्रथुः पयः । तेनेमामुपसिञ्चतम् ॥” [ऋ० सं० ३, ८, ९, ५ । य० वा० सं० १२, ६९] । (अथ० सं० ३, १७, ७) ॥ इति सा निगदव्याख्याता ॥ ‘देवीजोष्ट्री’ देव्यौ जोषयित्र्यौ । द्यावापृथिव्यौ इति वा । अहोरात्रे इति वा । ‘शस्यं च समा च’- इति कात्थक्यः ॥ तयोः- एष सम्प्रैषो भवति ॥ ७ (४१) ॥ अर्थः-“शुनासीरा०” इस ऋचा का वामदेव ऋषि है । शुनासीर्ये में विनियोग है । हे ‘शुनासीरौ’ वायु- और आदित्य ! (युवाम्) तुम दोनो ‘इमाम्’ इस ‘वाचम्’ वाणी को = स्तुति को ‘जुषेथाम् सेवन करो । ‘यत्’ जो ‘दिवि’ द्युलोकमें ‘पयः’ जल चक्रथुः तुमने किया है, ‘तेन’ उस जल से ‘इमाम्’ इस पृथ्वी को ‘उपसिञ्चतम्’ सींचो । यह ऋचा अपने उच्चारण से ही व्या- ख्यान की हुई है । ‘देवी जोष्ट्री’ ( ३५ ) क्यों ? ‘जोषयित्र्यौ’ सबको तृप्त करने वाली हैं । वे कौन ? अथवा द्यावापृथिवी = द्युलोक और पृथिवी लोक । अथवा अहोरात्र = दिन और रात्रि ।