भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1043

शस्य (ब्रीहि = धान आदि) और समा (संवत्सर) 'देवीजोष्ट्री' हैं, यह कात्थक्य आचार्य मानते हैं। “तयोः०” उन दोनों का यह सम्प्रैष (यजुः) है- ॥ ७ (४१) ॥ ( खं० ८ ) निरु०- “देवीजोष्ट्री वसुधिती ययोरन्याघा द्वेषांसि यूयव दन्यावक्षद्वसु वार्याणि यजमानाय वसुवने वसुधेयस्य वीतां यज ॥” [ य० वा० सं० २८, १५] ॥ ‘देवीजोष्ट्री’ देव्यौ जोषयित्र्यौ ‘वसुधिती’ वसुधान्यौ। ययोः अन्या अघानि द्वेषांसि अवया- वयति । आवहति अन्या वसूनि वननीयानि यजमानाय वसुधानाय च ‘वीतां’ पिबेताम्, कामयेतां वा। ‘यज’ इति सम्प्रैषः ॥ ‘देवी ऊर्जाहुती’ देव्यौ ऊर्जाह्वान्यौ। द्यावा- पृथिव्यौ-इति वा। अहोरात्रे-इति वा। ‘शस्यं च समा च’-इति कात्थक्यः ॥ तयोः-एष संप्रैषो भवति- ॥८ (४२) ॥ अर्थः- “देवीजोष्ट्री०” 'देवीजोष्ट्री' (देव्यौ जोषयित्र्यौ) सब जगत्‌को तृप्तकरने वाली देविएं ‘वसुधिती’ (वसुधान्यौ) धन और धान्य अथवा वसुओं को धारण करने वालीं, ‘ययोः’ जिन दोनों में ‘अन्या’ एक ‘अघानि’ (अघानि)